“ईश्वरकी अप्राप्तिका कारण”

 

                  ईश्वर के सम्बन्ध में यह बात ध्यानमें रख लें कि वह इस कालमें, वर्तमानमें न हो तो किसी कालमें नहीं होगा; क्योंकि वह कालसे कट गया, परिच्छिन हो गया। वह इस स्थान, देशमें न हो तो किसी स्थान में नहीं होगा; क्योंकि तब वह देशसे कट गया, परिच्छिन हो गया। वह इन्हीं रूपों -विषयोंमें न हो तो किन्हीं रूपोंमें नहीं होगा; क्योंकि तब वह विषय परिच्छिन हो गया। हम लोगोंमें ईश्वर न हो तो फिर कहाँ हो सकता है ?ईश्वरका अभी ,यहीं और इन्हीं रूपोंमें होना आवश्यक है। ऐसी अवस्थामें ईश्वरकी अप्राप्तिका कारण क्या है ?उसको न पहचानना। 
                                       
                                       इसके लिये हमारे अन्तःकरणमें ,हमारी बुद्धिमें एक ऐसी ज्ञान -वृत्ति का उदय होना चाहिये ,जिससे हम परमात्माको पहचानें। हमारे चित्त में जो परमात्माके विषयमें अज्ञान है, वह दूर हो। नारायण ,ईश्वर है तो सभी के हृदय में, किन्तु वह सुप्त निष्क्रिय है। अतः अविद्याको निवृत्त करने वाला ,विक्षेपका निवर्तक ईश्वर हमारे हृदय में प्रकट हो ,इसकेलिये हमें कुछ करना पड़ेगा। तो देखो, अधिभूत रूपमें यह ईश्वर प्रकट ही है ,विराट् विश्व ईश्वर ही है और अधिदैव रूपमें भी ईश्वर ही इसका नियमन कर रहा है ,किन्तु अज्ञानकी निवृत्ति के लिये अध्यात्म रूपमें ईश्वरके प्रकट होनेकी आवश्यकता है। वृत्त्यारूढ़ हुये बिना ब्रह्म अविद्या निवर्तक होता नहीं। तो जब मनुष्यके जीवनमें अन्तःकरणकी शुद्धि तथा प्रकाशिका वृत्ति का उदय होता है ,जब दोनों एकत्र होते हैं ,तभी परमात्माका आविर्भाव होता है। 
new sg

सत्संग वार्ता- 5

प्रश्न : यह अज्ञान अनादि है अथवा सादि ?
उत्तर : ब्रह्म का कोई शक्तिरूप यह अज्ञान अनादि है। यदि सादि हो तो उसका कोई कारण मानना चाहिए और बिना इसके कारण की निवृत्ति हुए, यह अपने आप निवृत्त न होगा, ऐसा अज्ञानका कोई कारण कहीं प्रसिद्ध नहीं है। इसलिए अज्ञान अनादि है। प्रागभावकी तरह उस अनादि अज्ञानकी ज्ञानसे ही निवृत्ति होती है और वह भी अत्यन्त-निवृत्ति । यदि लेशाविद्या ज्ञानसे पीछे स्वीकार करें, तो ज्ञानका फल ही क्या हुआ ? ज्ञान से अज्ञान की अत्यन्त निवृत्तिरूप बाध होता है, ध्वंस नहीं; क्योंकि ध्वंस में तो घटके ध्वंसकी तरह परमाणु शेष रहते हैं ।
ब्रह्माकारवृत्तिरूप ज्ञानका फल ब्रह्म की साक्षिभावापत्ति है । वह साक्षी स्वरूपसे निरावरण है। उसमें अज्ञानका लेश भी नहीं । ब्रह्म में पूर्व अज्ञानी की दृष्टिसे अज्ञान था भी और बोधके अनन्तर रहा भी नहीं। साक्षीके आप निरावरण होनेसे उससे अज्ञान निवृत्त भी नहीं हुआ ।
तात्पर्य यह कि मिथ्या अज्ञानकी प्रतीतिका, बोधसे मिथ्यात्व निश्चयरूप बाध होता है। पूर्व भी अत्यन्त निवृत्ति ही थी, परन्तु अध्यास वेगसे वैसा भान नहीं होता था। अब बोधसे भी निश्चय ही अत्यन्त निवृत्तकी ही निवृत्ति हुई, क्योंकि कल्पितकी निवृत्ति अधिष्ठान रूप होती है। यदि बाधितकी अनुवृत्ति मानिये, तो वह भी अधिष्ठान रूप ही है; क्योंकि मिथ्यात्वनिश्चयपूर्वक ही अनुवृत्ति है, अधिष्ठान से भिन्न नहीं, आत्माका ही चमत्कार है। इसीलिए कहा है :

पश्यन्नपि न पश्यति ।

अर्थात् विद्वान् ब्रह्मरूपसे दर्शन करता हुआ भी जगत् रूपसे नहीं देखता। ज्ञानसे पूर्व भी सर्व ब्रह्म ही है। ज्ञानका फल केवल अब्रह्म निश्चयका बाध है। ब्रह्माकारवृत्तिका नाम ज्ञान है। उससे केवल अज्ञानकी निवृत्ति होती है। ब्रह्म ज्यों-का-त्यों है, व्यवहार में भी।
व्यवहार का परिवर्तन या उपमर्दन वैसी विरोधी सामग्रीसे होगा । प्रवृत्ति सब भावना ( वासना ) के वश है। विरोधी गावनासे वासना का अभाव करो। ब्रह्म सर्वविशेषोसे विनिर्मुक्त है । सम्पूर्ण अध्यास ‘नेति-नेति’ इत्यादि श्रुतिविचारसे निवृत्त होता है ।

new sg

सत्सङ्ग वार्ता-6

प्रश्न : प्रमाण क्या है और प्रमाणोकी सफलता कहाँ होती है ?
उत्तर: जिस-जिस पदार्थ में जैसा-जैसा होने की योग्यता होती है, उस-उसमें ही प्रमाण प्रवृत्त होते हैं और उसी-उसीमें प्रमाणोंकी सफलता होती है । जिस-जिस पदार्थमें जैसा-जैसा होनेको योग्यता नहीं होती, प्रथम तो उसमें प्रमाण प्रवृत्त ही नहीं होगा। यदि प्रवृत्त होगा तो आप ही अप्रमाण हो जायगा और सफल न होगा ।
अब सोचना चाहिए कि ‘तत्वमसि’ ( छा० उ० ६.८.७ ) आदि वेदान्तवाक्य जीव-ब्रह्मकी एकताका बोधन करते हैं और वे ही वेदान्त वाक्य प्रमाण हैं तथा एकत्वको ही विषय करते हैं। अन्यथा वे वाक्य उस एकताके बोधनमें प्रवृत्त न होते और न उनकी सफलता होती। इसी कारण जीवको ब्रह्मत्वकी योग्यता है; क्योंकि जीवत्व भ्रममात्र है ।
अन्यत्र जहाँ-कहीं जीव, ईश्वर, जगत् के भेदको कथन करनेवाले वाक्य हैं, सो लौकिक अनुवादमात्र हैं और आरोपवादका कथन करते हैं तथा प्रमाण नहीं हैं, क्योंकि उनका ‘नेति नेति’ आदि वाक्योंसे बाध हो जाता है और महावाक्यों के विचारद्वारा केवल अखण्ड अद्वितीय ब्रह्माकारवृत्तिरूप साक्षात्कार होता है ।

वाक्य रटने का नाम ब्रह्माकारवृत्ति नहीं है। निरूढ़ ब्रह्माभिमान ही ब्रह्माकारवृत्ति है।
स्वप्न, जाग्रत्, मनोराज्य तथा अन्यत्र सर्व भ्रम स्थलोमें ( १ ) अभ्रमातामें प्रमाताका अध्यास है, ( २ ) अप्रमाण में प्रमाणका अभ्यास है, ( ३ ) अप्रमेयमें प्रमेयका अध्यास है और ( ४ ) अप्रमा में प्रमाका अध्यास है। जाग्रत् भी स्वप्नसदृश है। इस कारण जाग्रत् राग द्वेषादि सभी आविद्यक अध्यास हैं। वास्तव में एक ब्रह्माकार मन हो प्रमाता उत्पन्न होता है, वेदान्तजन्य ब्रह्माकारवृत्ति प्रमाण है, ब्रह्म प्रमेय है और ब्रह्मज्ञान है प्रमा

new sg

सत्संग वार्ता-4

प्रश्न : ब्रह्मज्ञानीकी समाधि कैसी होती है ? और उसका व्यवहार अर्थात् शरीर-यात्रादि क्रिया कैसी होती है ?
उत्तर: सब चराचरात्मक भूतजात ब्रह्मस्वरूपावस्थानरूपी समाधिमें स्वभाव से ही स्थित है। कोई कदापि व्युत्थानको नहीं प्राप्त हो सकता । वृक्ष पाषाण, जड़ चेतन सब ज्यों-के-त्यों ब्रह्मस्वरूप निर्विकल्प-दशा में हैं । अज्ञानकी महिमासे जीवोंको समाधिमे व्युत्थानका भ्रम हो रहा है । अक्रियमें क्रियाका अध्यास हो रहा है। समाधिमें ही विद्वान् का व्यवहार भी बन जाता है; क्योंकि उसके निश्चयमें तो अधिष्ठान आत्मासे इतर कुछ वस्तु है नहीं । कान, नाक, मुखको दबानेसे किसीकी समाधि लग ही नहीं सकती । जो समाधि पहले सदासे हो लगी हुई नहीं है, उसको कोई लगा नहीं सकता। स्वरूपसे लगी हुई समाधिसे कोई व्युत्थान नहीं कर सकता । प्राण सदा अधिष्ठानरूपसे अचल हैं, चल नहीं सकते। लोगोंको अचलमें चल होने का भ्रम हो रहा है । कोई भी पुरुष अपनी चिन्मात्र सत्तास्वरूप में स्थितिरूपी समाधिसे हिल नहीं सकता। आत्मामें अनात्माका अध्यास है, सो विचारसे निवृत्त करो। कुछ कर्तव्य नहीं है, केवल ज्ञातव्य है। क्योंकि प्रचारः स तु विज्ञेयः ऐसा लिखा है। अर्थात् निर्विकल्प मनका ब्रह्मावस्थानरूप जो प्रचार है, वह तो विज्ञेय है अर्थात् जाननेयोग्य निश्चय है, कुछ क्रिया-कर्तव्य नहीं है। सर्व अखण्ड अद्वैत आत्मा अपना आपा ही है उसमें कभी द्वैत हुआ ही नहीं, यहीं परम निश्चयरूप समाधि है । छान्दोग्य उपनिषद् में कहा है :

यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति स भूमा । (७.२४.१) •

इसका तात्पर्य यह है कि भूमा अकर्म है, दर्शनादि सर्वक्रिया विनिर्मुक्त है। तुम पूछोगे कि कहाँ प्रतिष्ठित है ? मैं कहता हूँ तुम भले ही मानो कि अपनी नामरूपात्मक महिमामें है, परन्तु में ऐसा नहीं कहता; क्योंकि अन्य में ही अन्य प्रतिष्ठित हुआ करता है। इसलिए महिमामें भी प्रतिष्ठित कहना नहीं बनता। बस, यह आप ही आप है।

new sg

सत्संग वार्ता-3

प्रश्न-सर्वं खल्विदं ब्रह्म (छा० ३.१४.१) इस श्रुति ने जो सर्व को ब्रह्मरूप कहा है, यह कैसे ?

उत्तर: जो उत्पत्ति नाशवाला है वह अनात्मा है, जैसे घट | सत् वस्तु और असत् वस्तु दोनोंकी उत्पत्ति नहीं होती | प्रतीति सदा सत् की होती है । असत् की प्रतीति हो तो शशशृङ्गकी भी प्रतीति होनी चाहिए । नाम-रूपकी प्रतीति नहीं होती, अध्यासमात्र होता है। प्रतीति ब्रह्मकी ही होती है। इसलिए निश्चय करके “सर्व” यह ब्रह्म ही है, यह श्रुतिका तात्पर्य है ।

new sg

सत्सङ्ग वार्ता-2

प्रश्न-ये विषय दु:खस्वरूप हैं, इनसे बड़ा विक्षेप होता है, इनसे निवृत्ति किस प्रकार हो, यह कृपा करके बतलाइये।

उत्तर : लोग कहते हैं कि विषय दुःखरूप हैं, परन्तु विचार करके देखा जाय तो विषय दुःखरूप नहीं हैं। यदि विषय दुःखरूप होते तो सबको दुःख देते, परन्तु ऐसा देखने में नहीं आता। एक ही विषय किसीको सुखदायी है, तो दूसरेको वही विषय दुःख देनेवाला है । दुःख भी सबको दु:ख नहीं देता, जैसे शत्रुका दुःख तो सुख ही देता है। इससे ज्ञात होता है कि मन ही सबको बांधता और दुःख देता है। यदि कोई कहे कि तब तो मनका विषयसे विभाग कर देना चाहिए। परन्तु मनका इन्द्रिय द्वारा विषयमें प्रवेश है और विषयका वासना द्वारा मनमें प्रवेश है, इसलिए विषयसे मनका विभाग कैसे हो ? इस शंकाका यों समाधान करते हैं: विवेक द्वारा दृढ़ विचार करना चाहिए कि अविचारसे मन और बन्धादि भासता है; विचारसे बन्ध नहीं रहता । विचार यह है कि इदन्ता भ्रमसे कल्पित है । इदम्रू-रूपसे किसी वस्तुको न देखो, सब अहंरूप आत्मा तुम्ही सत्तास्फूर्तिस्वरूप हो । इदन्ता तथा देश-कालादि कुछ नहीं हैं। अहं ही अहं है, जैसे बाह्यदृष्टिसे शिखर भासता है, शिखरपर आरूढ़ होनेसे तुम ही तुम हो । शिखर पृथक् बाह्य वस्तु कुछ नहीं है। इसी तरह जब इदन्ता का बाध करके सबके अहं, सबको सत्ता-स्फूर्ति आप हुए, तब मन और दुःख कहाँ है ?
सुखस्वरूप आत्मासे भिन्न सुख कुछ नहीं होता, ज्ञानसे केवल भेददृष्टि निवृत्त होती है, वही दुःखनिवृत्ति है; शेष अद्वितीय अखण्ड स्वरूप अपना अनुभव है। ‘आप’ केवल सुख है, दुःखसे दबा हुआ है। इसी कारण दु:खसे द्वेप होता है और दुःख भी अध्यास-मात्र है, वास्तव में है नहीं; इसलिए सर्वदा सुख ही सुख है ।

new sg

सत्सङ्ग वार्ता – 1

प्रश्न – विधिमुख और निषेधमुख – इन भेदों से दो प्रकार के वाक्यों द्वारा, श्रुति ब्रह्म का उपदेश करती है, परन्तु ब्रह्मबोध में इन वाक्यों का किस प्रकार उपयोग होता है ?

उत्तर – श्रवण करो, इस वार्ताको हम रज्जु-सर्पके दृष्टान्त से समझाते हैं। जिस प्रकार किसी पुरुष ने मन्द अन्धकारमें रज्जुको सन्दिग्ध सामान्य रूपसे देखा, मानो कोई वस्तु पड़ी हुई है। क्योंकि ऐसा नियम है कि जब आलोक द्वारा वस्तुके साथ चक्षुका सन्निकर्ष होता है, तभी चाक्षुष-विशेष-प्रत्यक्ष होता है । मन्द अन्धकार में विशेष-प्रत्यक्ष नहीं हुआ, सामान्य-ज्ञान हुआ कि कुछ है। उस पुरुषने किसी आप्तवक्ता पुरुषसे पूछा : इदं किम् अर्थात् ‘यह क्या है ?’, तब आप्तवक्ता पुरुषने उत्तर दिया इयं रज्जुः‘यह रज्जु है। बस, इतने उपदेशसे रज्जुका पूर्णबोध हो गया। सर्पका भ्रम हुआ ही नहीं था, इसलिए उसके लिए निषेधकी आवश्यकता नहीं। यह एक प्रकारका अधिकारी कहा। अब दूसरा सुनो। किसी दूसरे पुरुषको रज्जुमें स्पष्ट सर्पका भ्रम हुआ। और वह डरकर भागा तब आप्तवक्ता पुरुषने कहा: ‘डरो मत, नायं सर्पःयह सर्प नहीं है।’ तब उसने स्वस्थ होकर पूछा : किमिदं तर्हियह सर्प नहीं तो क्या है ? आप्तवक्ता पुरुषने कहा : इयं रज्जुःयह रज्जु है। तब उसको रज्जुका पूर्ण बोध हुआ । यह पुरुष मिथ्या-सर्प से डरा था। जब उसका निषेध करके सत्य वस्तुका उसको उपदेश किया गया, तब बोध हुआ। अब तद्वत् दार्ष्टान्तिक सुनो ।

दो प्रकारके जिज्ञासु होते हैं: (१) तत्त्वजिज्ञासु, (२) संसार-भीरु | प्रथम अधिकारी ने पूछा : इदं किम्यह दृश्यजात क्या है ? उस पुरुषके प्रति केवल इतना उपदेश आवश्यक है कि सर्वं खल्विद ब्रह्म, अर्थात् निश्चय करके यह सब नाम-रूपात्मक दृश्य ब्रह्म ही है। बस, इस वेदवाक्य से पूर्ण अद्वैत-ब्रह्मबोध हो गया। इसके अनन्तर उस जिज्ञासुके प्रति निषेधमुख वाक्यों द्वारा उपदेश करने की कोई आवश्यकता नहीं है । फिर उपदेशकी विधि भी नहीं है ।
दूसरा अधिकारी जो संसार-भीरु है, वह प्रपञ्च से डरता है, इसलिए उसको श्रुति
नेति नेति
अर्थात् यह इदन्तागोचर दृश्य नहीं है, यह उपदेश करती है। तदनन्तर उस अधिकारीको जिज्ञासा होती है कि यह दृश्य नहीं है तो क्या है ? उसके प्रति विधिमुख वाक्य द्वारा श्रुति पुन: उपदेश करती है : ब्रह्मेति– यह ब्रह्म है। तत्सत्यं तत्त्वमसि – अर्थात् वह सत्य है सो तू है । इन श्रुतियोंसे पूर्णबोध हो जाता है और इदं सर्वं यदयमात्मा सोऽहमस्मि अर्थात् जिस कारण से जो यह सब यह अपरोक्ष आत्मा ( अपना आप ही ) है सो मैं ही हूँ, इस प्रकार अपरोक्ष साक्षात्कार हो जाता है, जिस प्रकार कि प्रथम पुरुषको मन्द अन्धकारमें रज्जु देखकर सन्दिग्ध सामान्य-ज्ञान हुआ था कि यह क्या है ? पुनः उपदेशसे दृढ़ निश्चय हुआ कि यह रज्जु हैं, तद्वत् । विशेष ज्ञानकी सामग्री के अभाव में भी जो विशेष ज्ञान है सो भ्रम है। यह भ्रम दो प्रकारका होता है : १. संवादी, २. विसंवादी । वस्तुमें वस्तुत्वकी सम्भावना संवादी है भ्रम और विपरीत भावना है विसंवादी भ्रम | जैसे रज्जुमें अन्धकार होते हुए जो रज्जुत्व सम्भावना है, सो संवादी भ्रम जानना चाहिए और रज्जुमें जो सर्प-भ्रम है, वह विसंवादी भ्रम है। इसी प्रकार साक्षात्कारसे पूर्व सर्वका ब्रह्मरूपसे ध्यान संवादा भ्रम है, और उसी अभ्यास से साक्षात्कार-दशा में प्रमा भी हो जाती है। जगत् रूपसे मानना विसंवादी भ्रमरूप मिथ्या ज्ञान है, उसका साक्षात्कारसे बाध हो जाता है
सभी विधिमुख और निषेधमुख वाक्योंका अद्वितीय अखण्ड ब्रह्म साक्षात्कार कराने में तात्पर्य है। उन दोनों में से विधिमुख वाक्य जो
सर्व खल्विद ब्रह्म, आत्मैवेदं सर्वम् इत्यादि हैं, वे सर्व विशेषको सामान्य ब्रह्मरूप बोधनद्वारा निःसामान्यविशेषरूप अद्वितीय अखण्ड ब्रह्मसाक्षात्कार कराते हैं, तथा नेति नेति, नेह नानास्ति किंचन, अस्थूलमनणु आदि निषेधमुख, सर्वविशेषोंके अत्यन्ताभाव बोधन द्वारा सामान्य-विशेषभावसे विनिर्मुक्त अद्वितीय ब्रह्मका साक्षात्कार कराते हैं; इन दोनों प्रकार के वाक्यों का निर्विशेष ब्रह्मबोध में उपयोग कथन किया है।

new sg

जीवन में पूर्णता का अवतरण-12

प्रज्ञाकी स्थिरतामें प्रति बन्धक विषय चिन्तन विषयासक्ति, काम, क्रोध, सम्मोह, स्मृतिविभ्रम और बुद्धिनाशसे बचकर, क्योंकि ये प्रणाशके कारण हैं, अपने मनको गुरु और शास्त्रका आज्ञाकारी बनाना चाहिए। इसीको गीतामे ‘विधेयात्मा’ कहते हैं। अध्रुव प्रपंच अविनाशी ध्रुव की इच्छा करनेवाला बालक है, ‘आकृतात्मा’ है। यह मृत्यु द्वारा फैलाये पाशमें स्वयं फैल जाता है। विधेयात्मा पुरुष ही इस पाश को काटता है। इसकी युक्ति है, राग-द्वेष रहित होकर व्यवहार करना और केवल जीवन निर्वाह के लिए भोग करना । इन्द्रियों का अपने वश में होना परमावश्यक है। इसीसे प्रसादकी उपलब्धि होती है। अन्तःकरणका निर्विकार और निर्मल होना ही प्रसाद है। प्रसाद ही प्रज्ञा की स्थिरताका जनक है। मन इन्द्रियोंके पीछे न चले, प्रज्ञाके पीछे चले। हम संसारके भोगों का पीछा न करें, भोग स्वयं हमारी ओर आयें और हमारी पूर्णता में समा जायँ। निष्कामतामें ही शान्ति मिलती है। जब यह शान्ति तत्त्वज्ञानपूर्वक होती है तब इसे ‘ब्राह्मी स्थिति’ कहते हैं । वस्तुतः यह एक व्यावहारिक शान्ति है और भगवद्वाणी की प्रेरणाके अनुसार जीवन निर्माण करनेपर यह इसी जीवन में प्राप्त होती है ।

new sg

जीवन में पूर्णता का अवतरण-11

 तत्त्वज्ञान के बिना सच्ची स्थितप्रज्ञता नहीं आ सकती । तत्त्वज्ञान अन्तःकरणकी शुद्धिके बिना नहीं हो सकता। कर्मयोगके बिना अन्तःकरण की शुद्धि नहीं हो सकती । ब्रह्मसत्यके साक्षात्कार में कर्मयोगका असाधारण महत्व है। अपने अन्तःकरण की शुद्धि और ईश्वरप्रीति के लिए किया जानेवाला पुरुषका प्रत्येक विहित प्रयत्न कर्मयोग है। शारीरिक प्रयत्न धर्म है। मानसिक प्रयत्न उपासना है। बौद्धिक प्रयत्न सांख्य है। ये सच पुरुष प्रयत्न साध्य होनेका कारण कर्मयोगकी ही बहिरङ्ग-अन्तरङ्ग शाखाएं हैं। इनके द्वारा चित्तशुद्धि होकर महावाक्य के द्वारा भूमासत्यविषयक चरमा वृत्ति होती है। यही अज्ञान का नाश करती है।
सम्पूर्ण आध्यात्मिक उन्नतिका मूल कर्मयोग है। भगद्वाणीकी स्पष्ट उद्घोषणा है कि कर्मयोग ही नैष्कर्म्य का एकमात्र उपाय है। केवल कर्म संन्यास सिद्धिका उपाय नहीं है। सम्पूर्ण कर्मोंका परित्याग होना सम्भव भी नहीं है। वे शरीरधारी के लिए प्रकृतिसिद्ध हैं । निष्काम एवं आसक्ति रहित कर्मयोग सकाम कर्मत्यागसे विशिष्ट है । अकर्मण्यता और कर्मठता के द्वन्द्वमें कर्मानुष्ठान ही श्रेष्ठ है। कर्मके बिना तो जीवन निर्वाह भी नहीं हो सकता — ऐसी-ऐसी अनेक युक्तियों के द्वारा समर्थित भगवद्वाणीकी कर्मयोग-प्रेरणा सर्वथा उपादेय है। परमात्मा की प्राप्तिके निभृत अन्तर्देश में प्रवेश प्राप्त करने के लिए यही द्वार है।

new sg

जीवन में पूर्णता का अवतरण10

 यद्यपि ब्रह्मबोध अविद्या निवृत्ति के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं करता, तथापि ब्रह्मज्ञानीके जीवनमें अविद्यानिवृत्ति के कुछ परिणाम स्पष्टरूपसे दृष्टिगोचर होते हैं। जीवनकालिक विविध और विषम परिस्थितियों में एक ऐसी स्थिर- प्रज्ञाका उदय हो जाता है, जिससे व्यवहार में स्थित महापुरुष स्थितप्रज्ञ हो जाता है और एक स्थिर आधार मिल जानेके कारण मनकी चञ्चलता और विचलता समाप्त हो जाती है; क्योंकि प्रज्ञाके स्थिर होनेपर कुछ बातें अपने आप जीवमें उतरती हैं:
( i ) अपने हृदय में आत्माकी विद्यमानता से ही सन्तुष्ट रहना। इसका स्वाभाविक फल यह होता है कि कामनाएँ स्वयं शान्त हो जाती हैं ।
(ii) इन्द्रियों को प्रिय लगनेवाले विषयों में आसक्ति न रहता। इसलिए उनके वियोग में उद्वेग, संयोग में स्पृहा, भोगमें राग, नाशका भय और नाशक पर क्रोध नहीं होता ।
(iii) स्वतःसिद्ध साध्य की प्राप्ति हो जाने के कारण साधनपक्ष में दुराग्रह का न होना । फलस्वरूप साधनहीन और साधनविरोधीसे भी द्वेष नहीं होता । साथ ही अपनी रुचिके अनुकूल साधन करनेवालों के प्रति अभिनन्दन और पक्षपात भी नहीं रहता । सर्वात्मक ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान साधन के अभिनिवेशको शिथिल कर देता है ।
(iv) ऐन्द्रियक भोगोंसे तृप्ति प्राप्त होने की दुराशा छूट जानेके कारण स्वयं ही सेवामें अन्तर्मुखता उपस्थित हो जाना है। विषयानन्द ऐन्द्रियक है। ब्रह्मानन्द मन और इन्द्रियोंकी शान्ति है | विषयानन्दपर बार-बार कर्मका आवरण आता है । शान्ति निरावरण, स्थिर और अपने अधिष्ठान ब्रह्म से अभिन्न है । इसलिए शान्ति ही नित्यतृप्ति है। फिर कामपूर्तिमूलक रति, लोभ पूर्तिमूलक तुष्टि और भोगपूर्ति मूलक तृप्तिकी अपेक्षा न रहकर आत्मरति, आत्मतुष्टि और आत्म तृप्ति सदा विराजमान रहने लगती है ।
(v) अभिमान और ममत्वकी निवृत्ति हो जाने के कारण जीवनमें स्वाभाविक ही त्यागकी प्रतिष्ठा हो जाना। त्यागमें विराग और विराग के अन्तरङ्गमें तत्त्वज्ञान । इसका अभिप्राय यह है कि ब्रह्मलोक उत्तरकालीन स्वाभाविक त्याग में स्वयं ही रस-रागका निरोध और आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है ।
( V ) मनका अपने आश्रयस्वरूप परमात्मामे न किंचित् हो जाना । स्फुरित होनेपर आत्मासे पृथक् उसकी स्थिति, गति नहीं होती। इसलिए प्रमाथी इन्द्रियोंके इन्द्रजाल से वह मुक्त हो जाता है और सबका संयम करके युक्त और आत्मपरायण रहता है ।
यह कहनेकी आवश्यकता नहीं कि इन छः विशेषताओं के आनेपर
बुद्धिके परिवर्तन और विचलनका कोई कारण नहीं रह जाता और प्रज्ञा के स्थिर होनेपर इनका आ जाना सर्वथा स्वाभाविक है

new sg

Previous Older Entries