धर्म-प्रेरणा के स्रोत-(6)

    प्राकृत वस्तुओं के अनुकरण-कौशल के उत्कर्ष से कला का विकास होता है, उनपर आधिपत्य प्राप्त करके उपयोगी बनाने की प्रक्रिया से विज्ञान का। बाह्य पदार्थों के परिवर्तन, प्रवर्तन अथवा संशोधन के लिए श्रम की अपेक्षा होती है, परन्तु धर्म वह काम करता है जो इनमें किसी के द्वारा सम्पन्न नहीं होता। उसका काम है- अंतःकरण की शुद्धि द्वारा ज्ञाता के प्रकाशित होने के मार्ग में जो प्रतिबन्ध हैं, उनको दूर करना। विशेष करके अंतःकरण से मलिन वासनाओं को निकाल देना और उसको एक विशेष आकार में पहुँचाना धर्म का काम है। ऐसी स्थिति में धर्म की प्रेरणा के लिए अज्ञात ज्ञापक, शासनात्मक, वासना-प्रतिरोधी, बाह्य-क्रियात्मक स्रोत की अपेक्षा है। फल मिलने पर धर्म का पता चलने से केवल आगे के लिए अनुभव संग्रह किया जा सकता है या अमुक प्रकार की वृत्ति से  जो उत्पन्न अदृष्ट या अपूर्व होगा, पता नहीं  वह कब हमारे काम आयेगा ? वस्तुतः धर्म ऐसा होना चाहिए  कि हम अपनी क्रिया और भाव के द्वारा इसी समय, इसी स्थान में, किसी वस्तु का ठीक-ठीक सदुपयोग कर सकें। जैसे, अकाल के समय दुर्भिक्ष-पीड़ित स्थान में  क्षुधा-पीड़ित जनता को अपने हाथ से उठा कर हम कुछ अन्न-धन दे सकें। यदि धर्म का ऐसा रूप नहीं होगा तो वह किसी मनुष्य के द्वारा कैसे अनुष्ठित होगा ? और यदि अनुष्ठित नहीं हो सकेगा तो धर्म का अर्थ ही क्या ? इसको प्राचीन भाषा में यों कहा जा सकता है कि पुण्यकाल में यज्ञशाला के अन्दर यज्ञ करानेवाले ऋत्विज को जब दक्षिणा दी जायेगी, तब धर्म होगा। धर्म का रूप सर्वथा दृष्ट होना चाहिए, उससे अदृष्ट की उत्पत्ति हो या दृष्ट का फल मिले। उसके लिए चाहिए – अधिकारी, श्रद्धा, विधान, क्रिया, सम्पत्ति, सहायक और समग्रता आदि।    

                                                                                                                              (क्रमशः)

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धर्म-प्रेरणा के स्रोत-(4)

        क्या आप वस्तु के गुणावगुण और क्रिया कलाप के द्वारा  निष्पन्न होने वाले परिणामों पर अन्वय-व्यतिरेक की दृष्टि से विवेक  करके धर्माधर्म का निर्णय करते हैं ? द्रव्य के गुणावगुण विवेक केवल साधारण दृष्टि से रासायनिक प्रक्रिया के द्वारा नहीं किया जा सकता। उसके लिए देश,काल, जाति, व्यक्ति, मान्यता, अवस्था, स्थिति, शक्ति, वय आदि का सम्पूर्ण ज्ञान अपेक्षित होता है। कब, कहाँ, किसके लिए, किस परिस्थिति में क्या हितकारी है ? यह सर्वज्ञ ईश्वर के अतिरिक्त और कौन जान सकता है ? रही बात क्रिया-कलापकी, सो समग्र मानव-जाति के लिए सर्वकालिक एवं सार्वभौम उदार दृष्टि से विचार करने का दावा कौन कर सकता है ? अनुदीर्ण और संकीर्ण  दृष्टि होनेपर अपने ग्रन्थ और पन्थ  का बोल-बाला  हो जाता है और अपनी डफली और अपना राग बजने लगता है। द्रव्य के गुणानुवाद और क्रिया-कलाप के परिणामों का लौकिक सम्बन्ध यथाकथंचित् ज्ञात भी हो जाये तो पारलौकिक सम्बन्ध ज्ञात करनेका कोई उपाय नहीं है। इसलिए यदि आप केवल अपनी बुद्धि और विवेक के द्वारा धर्म की प्रेरणा प्राप्त करते हैं तो आप पुनर्विचार कीजिये – आपका युक्तिवाद भुक्ति का हेतु हो सकता है, मुक्ति का नहीं। क्या बालक, वृद्ध और मूर्खजन भी इस युक्तिसे धर्म-प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं ? यदि नहीं, तो  धर्म के उद्गम-स्थान को और भी गहराई में ढूँढना आवश्यक है। धर्म के प्रेरक तत्त्व इतने उथले स्तर पर नहीं रहा करते।  

                                                                                                                                        (क्रमशः)

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धर्म-प्रेरणा के स्रोत-(3)

     आपका धर्म आपके अस्तित्व, ज्ञान, आनन्द, नियंत्रण शक्ति और समन्वय भावना की रक्षा के लिए होना चाहिए। धारणा के अभिप्राय से ‘धर्म’ शब्द के  प्रयोग का यही अर्थ है। इसके लिए सामाजिक परिस्थिति से प्रेरणा लेने पर सुधार-भावना का जन्म होता है। भौगोलिक परिस्थिति से विचार करने पर राष्ट्रीयता परिपक्व होती है। ऐतहासिक दृष्टिकोण से देखने पर संस्कृति-प्रेम का जन्म होता है। आचार्य-परंपरा पर ध्यान देने से संप्रदाय-मर्यादा जुड़ती है। मूल पुरुष की प्रधानता से जातीयता आती है। श्रम और अर्थ की प्रधानता से विचार करने पर वर्ग-विशेष से तादात्म्य होता है। ऐसे अनेक बाह्य कारण हो सकते हैं, जिससे आप धर्म की प्रेरणा ग्रहण करते हों, परन्तु ये सब-की-सब  दृष्टियाँ अधूरी हैं और धर्म के केवल तात्कालिक एवं एकांगी रूप का परिचय देती हैं । कभी-कभी ये परस्पर संघर्ष करती हैं और धर्म के नाम पर अधर्म को ही अभिव्यक्ति देती हैं। दृष्टि-विशेष में आविष्ट पुरुष तमसावृत्त होकर अधर्म को ही धर्म मानने लगता है। उससे अपने ही प्रयोजन का गला घुट जाता है। इनमें से किसी एक में आपकी प्रियता आपको पक्षपाती और दूसरों के प्रति क्रूर बनाती है। क्या आप इनसे मुक्त रहकर धर्म का सच्चा ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं ?

                                                                                                                                       (क्रमशः )

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धर्म-प्रेरणा के स्रोत-(2)

        क्या आप  ईश्वर की प्रेरणा और पूर्व संस्कारों की प्रेरणा में भेद कर सकते हैं ? पूर्व संस्कार अच्छे-बुरे दोनों प्रकार के होते हैं। उनसे समय-समय पर दोनों प्रकार की प्रेरणा भी प्राप्त होती है। यदि आप पूर्वसंस्कारों के द्वारा ही अपने जीवन को संचालित करेंगे तो आपका अन्तर्द्वन्द्व कभी मिट नहीं सकेगा। अनादि कर्म-प्रवाह से उत्पन्न संस्कार और उनसे बना हुआ स्वभाव समुद्र के बाह्य-आभ्यंतर दबाव और उथल-पुथल के समान परस्पर संघर्षरत रहते हैं। इनपर अपने जीवन को छोड़ा नहीं जा सकता। हाँ, इनसे ईश्वर की प्रेरणा को पृथक् करना विशिष्ट अंतर्दृष्टि के बिना सम्भव नहीं है। 

       ईश्वर की तटस्थता एवं असंगता पर दृष्टि डाली जाय तो वह कोई स्वैच्छिक, स्वतंत्र एवं नवीन प्रेरणा नहीं दे सकता। वह आपकी अंतःकरण की उपाधि को अपने सान्निध्य मात्र से आभासित और संचालित करता है। ऐसी स्थिति में ईश्वर का नियमन भी पूर्व संस्कारानुसार ही मानना पड़ेगा। तब फिर हमें गंभीरता से यह देखना होगा कि जब हम पूर्व संस्कार अथवा उसकी उपाधि स्वीकार करके ईश्वर के द्वारा संचालित होते हैं तो हम सदा उनके द्वारा नियंत्रित कठपुतली ही बने रहेंगे; कर्म-चक्र से मुक्त नहीं हो सकते। हमें कुछ नवीन कर्म करने होंगे, जो अनादिकाल से अनवरत प्रवाहित कर्म-धारा को नया मोड़ दे और हमारी यात्रा को मुक्ति के लिए उन्मुख करे। कम-से-कम वह ऐसी तो होनी ही चाहिए जो स्थूल देह और उसके सम्बन्धों को शिथिल करके सूक्ष्म शरीर को प्रधानता दे। परलोक,आन्तर रसास्वादन,समाधि अथवा शुद्धिकी भावना जाग्रत् करके सत्य तत्त्व की जिज्ञासा की ओर ले जाय। इसके लिए नवीन क्रिया-कलापकी प्रेरणा क्या आप पूर्व संस्कारों पर छोड़ देते हैं। अथवा इसके लिए कोई नवीन स्रोत ढूंढते हैं ? 

                                                                                                                        (क्रमशः)

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धर्म-प्रेरणा के स्रोत-(1)

       जैसे वायु का धर्म गति और अग्नि का धर्म दाह है, वैसे ही मनुष्य धर्म मनुष्यत्व है। मनुष्य-शरीर में मज्जागत एक विशेषता है, रक्तगत एक वीर्यवत्ता है, चित्तगत एक संस्कार है, बुद्धिगत एक विचारधारा है, स्वभावगत एक रसप्रवाह है, आत्मगत एक अनुवृत्ति-व्यावृत्ति का बोध है। वस्तुतः मनुष्य धर्म छोड़ कर जीवित नहीं रह सकता। भिन्न-भिन्न वस्तुओं के चिन्तन में लगे रहने के कारण मनुष्य आत्म-निरीक्षण नहीं कर पाता। आप थोड़ी देर के लिए स्वस्थचित्त से अपने धर्म के सम्बन्ध में चिन्तन कीजिये। आपको धर्म-प्रेरणा कहाँ से प्राप्त होती है ?

        क्या आपको ऐसा प्रतीत होता है कि ईश्वर धर्म के लिए प्रेरित करता है ? वह प्रेरणा किस प्रकार की होती है ? क्या उसका रूप कुछ ऐसा होता है कि तुम अपने मन एवं इंद्रिय को इस कर्म से, भोग से, संग्रह से और भाषण से अलग रखो ? इस निषेधात्मक प्रेरणा का बड़ा महत्त्व  है। आप इस पर गंभीरता से ध्यान दीजिये। अथवा ईश्वर से इस प्रकार की प्रेरणा मिलती है कि इस  प्रकार का कर्म, भोग, संग्रह और भाषण करो ? प्रवर्तक प्रेरणा में धर्म को पहचानना कठिन है। क्या आप अज्ञानियों को ज्ञान, कंगालों को अन्न-वस्त्र, रोगियों को औषध देने की प्रेरणा ग्रहण करके उसके अनुसार आचरण ग्रहण करते हैं ?

 

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ध्यान का रहस्य- (4)

      अच्छा, आप इस पर दृष्टि डालिये कि आप अंतःकरण के द्रष्टा उससे पृथक् हैं। अब यह देखिये कि अंतःकरण और आपके बीच में तीसरी कौनसी वस्तु है ? वह अंतःकरण का अभाव है। वह भी दृश्य है। एक कार्यरूप-दृश्यरूप है, एक बीज-विशिष्ट कारणरूप दृश्य है। अंतःकरण में जो चेतन है, वह जीव है। अन्तःकरणाभाव में जो चेतन है, वह ईश्वर है। आप भाव-अभाव दोनों के ही द्रष्टा हैं। असल में, यह बीज और अंकुर क्या हैं ? अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य  और अन्तःकरणाभावावच्छिन्न चैतन्य में भेद ही क्यों है ?आप स्वयं साक्षी चैतन्य हैं। इस भेद का कारण आपका अपनी ब्रह्मता का अज्ञान ही है, अर्थात् आप ही अभावावच्छिन्न ईश्वर चैतन्य हैं और भावावच्छिन्न जीव चैतन्य हैं। चैतन्य में अवच्छिन्नता – अनवच्छिन्नता का भेद नहीं है। अपने स्वरुप के ज्ञान में भेद का लोप हो गया। ज्ञान भान का विरोधी नहीं है, भ्रम का विरोधी है। अब ईश्वर, जीव, अंतःकरण  और उसका अभाव भासने दीजिये। आपकी समाधि अखण्ड है, सहज है। आपके सामने ईश्वर, जीव, अंतःकरण, जगत्- सब भास रहे हैं। आप अद्वय तत्त्व हैं।      

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ध्यान का रहस्य- (3)

      दैहिक जीवन की दृष्टि से ही अंतःकरण, बहिःकरण का भेद होता है। तात्त्विक जीवन में इनका कोई सत्त्व-महत्त्व नहीं है।  संस्क्रिया चित्त, विक्रिया मन, अहंक्रिया अहंकार और प्रक्रिया का नाम बुद्धि है। इनको क्रम से खजाना, सङ्कल्प, मैं-पना  और निश्चय भी कह सकते हैं। यह समूचा अतःकरण के नाम से प्रसिद्ध है  जब आप परमार्थ का कोई आकार मन में बनाते हैं, बुद्धि में उसका निश्चय करते हैं, वह मैं ही हूँ- ऐसा सोचते हैं या शान्त होकर बैठ जाते हैं तो ये चारों स्थितियाँ अंतःकरण की ही होती हैं। ये चेतन से प्रकाशित हैं अर्थात् आप इसके द्रष्टा-साक्षी हैं। आपको द्रष्टा-साक्षी बनना नहीं है, होना भी नहीं है, केवल समझ लेना है कि आप असङ्ग -उदासीन  कूटस्थ-तटस्थ हैं। न आपको अन्तर में घुसना है, न थोड़ी देर के लिए निष्क्रिय होना है, न दृश्य को देखने लगना है। यह सब अन्तर, थोड़ी देर और दृश्य तो आपकी दृष्टि की चमक है। आप देखिये, कोई वस्तु ही नहीं है, दृष्टि ही है। जिस अंतःकरण के पेट में सब कुछ प्रतीत होता है  उसमें तो संस्कार-युक्त ज्ञान-रश्मियों के अतिरिक्त और कोई पदार्थ ही नहीं है। वह अंतःकरण-रूप फिल्म आपमें आपसे ही प्रकाशित है। वस्तुतः आप ही हैं। अंतःकरण और अन्तःकरणस्थ ईश्वर, जीव एवं देश-काल-द्रव्यात्मक जगत् बिना हुए ही भास रहे हैं। गम्भीरता से देखने पर फिल्म बिखर जाएगी, केवल चेतन रहेगा, क्योंकि वह चेतन के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। अंतःकरण की फिल्में ही देश-काल-वस्तु सब हैं, चेतन में नहीं। आप स्वयं अखण्ड चेतन हैं।   

                                                                                                                                             (क्रमशः)

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