भगवान् की गोद-5

     यदि ऐसी भावना जो कि वास्तविक और उनके अङ्क तथा सान्निध्य का अनुभव करने की है, न चले तो भागवत अर्थात् भगवान् के भक्तों का ही अङ्क सामीप्य प्राप्त हो। सर्वात्मना विषयी पुरुषों का सङ्ग त्याग कर इन्हीं का सङ्ग किया जाय। ये तो भगवान् के मूर्तिमान्विग्रह ही हैं। इनका सङ्ग दुर्लभ अगम्य और अमोघ है। ये मृत्यु में संसार-सागर से परे पहुँचाकर अवश्य-अवश्य प्रभु की आनन्दमयी गोदी में बैठा देंगे।

     परन्तु समय के प्रभाव से या हमारे दुर्भाग्य अथवा बहिर्मुखता से संतों का मिलना, उनका पहिचाना जाना भी इस समय असम्भव-सा है। वे ही कृपा करके हमारे सन्मुख अपनेको प्रकट करें तो सम्भव है,हम कल्याणमय प्रभु को पाने का तत्परता से यत्न करने में लग जायें अन्यथा अपनी दुष्टता के फलस्वरूप हम उन विषयों में भी मृत्युमय संसार में बद्ध होने की ही उत्तेजना प्राप्त करेंगे।

     इसलिए आजकल श्रीमद्भागवताङ्ककी अर्थात् भगवान् के साक्षात् श्रीविग्रह भागवत-महापुराण की शरण ही एकमात्र हम जीवों के कल्याण के लिए स्वर्ण-सोपान रह गयी है। इस युग में यही भगवान् की साकार मूर्ति है। सब धर्मों के प्रतिष्ठा स्वरुप होने के कारण और धर्मों का परित्याग करके अन्य धर्मों की अपेक्षा न करके एक मात्र इसी का आश्रय-शरण ग्रहण करनी चाहिए। वेद के, उपनिषद् के सार-तत्त्व अमृतत्व की, ब्रह्मसूत्र के वास्तविक तात्पर्य की, गायत्री और प्रणव के लक्ष्यार्थ की, तथा महावाक्यों के द्वारा सङ्कलित वस्तु की सरल अनुभूति इसी भगवद्विग्रह की उपासना से इसी के अङ्क में विश्वास के साथ पड़ जाने से होगी। हम अज्ञानान्ध जीवों के नेत्र पटल खोलने के लिए श्रीप्रभु ने यह विग्रह धारण किया है, इसीलिए श्रीभागवतरूपी भुवनभास्कर के रूप में भगवान् प्रकट हुए हैं। इस युग में इसके श्रवण, कीर्त्तन, स्मरण, पूजन और परिणामतः आत्म-निवेदन से परमानन्द की प्राप्ति होगी। इसी के पावन प्रसाद से शोक-मोहप्रद अज्ञान भस्मसात् होगा। ज्ञान वैराग्य की प्रतिष्ठा होगी। इसी के बल पर देवर्षि नारदने जो कि भक्ति-मार्ग के आचार्य हैं, घोर प्रतिज्ञा की है कि घर-घर में, व्यक्ति-व्यक्ति में भक्ति की प्रतिष्ठा करूँगा श्रीभागवत भगवान् दया करके हमें अपने अङ्क में शरण दें कि यह जीवन उन्हीं के पद-पद्मसुधारस का आस्वादन करते हुए व्यतीत हो। 

श्रीमद्भागवतानन्दसुधाब्धौ रमतां सताम्।

पादारविन्द विन्दूद-प्लावितः स्यां भवे भवे।।  

 

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भगवान् की गोद-4

     हमारे सिर पर मृत्यु का उद्दण्ड तांडव नृत्य हो रहा है, प्रतिपल उस प्रभु को कालरूप में ही अनुभव करने के लिए हम आगे बढ़ रहे हैं, तो अपने नियमानुसार उसे भी मृत्युरूप में ही हमारे सन्मुख आना ही चाहिए। वही प्रभु हमारे अन्तरतल में पुरुषरूप से ,आत्मरूप से अमृतत्व की धारा बहा रहा है, बाहर कालरूप से मृत्यु के आवागमन के कराल गतिचक्र में डालकर पीस रहा है। कारण यह है कि उसने रमणके, विहारके, क्रीड़ा के उद्देश्य से ही अपने बहुत रूप किये हुए हैं। प्रत्येक अंतःकरण से भिन्न-भिन्न रूप में एक अखण्डानन्दका पृथक्-पृथक् आस्वादन करनेके लिए ही बिखरे हुए अणुओं को प्रेमसे, आकर्षणसे, चुम्बनसे पिण्डीभूत करके स्वयं ही उन-उन रूपों में अपने परमानन्द का आस्वादन कर रहा है। जहाँ आनन्द की ओर दृष्टि नहीं है, कालरूपसे, मृत्युरूपसे, उन्हें आत्मसाक्षात् करना भी उसका ही अनुग्रह है। परन्तु अपना वास्तविक स्वरुप, स्वभाव, अमृत और आनन्द होने के कारण हम उसे अनुग्रह के रूप में ग्रहण करना नहीं चाहते।

     विकर्षण यह कि हमारी ही भूल से, अज्ञान से प्रभु की आनन्दमयी किरणों का प्रकाश हमारे अनुभव में नहीं आ रहा है।  हम अमृत सिंधु में आनन्द की अनन्त धारा में निवास करते हुए भी प्यास के कारण, अतृप्ति के कारण व्याकुल हो रहे हैं, छटपटा रहे हैं। परम प्रकाश को भी अन्धकार समझकर हम इधर-उधर टटोल रहे हैं। हम अपने गले में ही स्थित हार को भूलकर कस्तूरी मृगकी तरह इधर-उधर भयानकता में भ्रमण कर रहे हैं अपने ही स्वरुप अंतःस्थिर प्रभु = वास्तविक स्व को छोड़कर अन्यत्र ढूंढने को दौड़ लगा रहे हैं।

     इन सब अनर्थों का एकमात्र भेषज है ‘श्रीमद्भागवताङ्क ‘ जिसकी अनुभूति से, संगसे, सेवासे यह भूल मिटकर प्रभु का चिदानंदमय स्वरुप उपलब्ध हो सकने की आशा की जा सकती है।

     भागवताङ्क का अर्थ है भगवान् की गोद और उनकी सन्निधि ‘अङ्क समीप उत्सङ्गे’। हम प्रतिपल चलते, बैठते, सोते उसी का अनुभव करें। चलते समय हमारी भावना हो प्रभु के अनन्त आनन्द पारावार की एक सुधामयी तरङ्ग हैं। बैठने के समय हमें ऐसा मालूम पड़ता रहे कि अखण्ड चित्स्वरूप प्रकाश के धागे में पिरोये हुए हम एक मणि हैं। सोने के समय हमारे अंतस्थल की वृत्तियाँ उसी अपार चिदानन्दमय प्रभु में ही डूब जायें। विषयों की प्रतीति और उनके द्वारा प्राप्त यत्किञ्चित् सुख में भी हम अन्तरानन्द से ही तृप्त हो रहे हैं, यह भावना-उपासना, प्रभु की सच्ची आराधना चलती रहे।  

(क्रमशः)

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भगवान् की गोद-3

      आह ! अपने व्यापक बाँसुरीनाद से त्रिलोकी को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं, बिना अधिकारी का विचार किये सबका एक स्वर से आवाहन कर रहे हैं, आकाश, वायु, अग्नि, समुद्र कल-कलनिनादिनी नदियों, पृथिवी, अंतरिक्ष और दिशा-विदिशाओं को प्रतिध्वनि द्वारा कण-कण अणु-अणु को निमंत्रण दे रहे हैं, अपनी लम्बी-लम्बी भुजाओं को फैलाकर छाती से लगाने के लिए आतुरता प्रकट कर रहे हैं, व्याकुल हो रहे हैं, मचल रहे हैं, अनन्त चुम्बन देने के लिए अपना देव-दुर्लभ अधरामृत पिलाने के लिए अधर-सिंधु से हमें सराबोर, आप्लावित करने के लिए ललक रहे हैं। वे पाने प्रेम दयावत्सलता और करुणा की शान्ति में किरणों से सारे जगत् को अभिषिक्त कर रहे हैं। उन्हीं करुणा-वरुणालय प्रभु की प्रेममयी सुधा-धारा से हम सभी आप्लावित हो रहे हैं, उसी में उन्मज्जन-निमज्जन-अवगाहन-स्नान सब कुछ कर रहे हैं। हमारा सारे जगत् का कण-कण उन्हीं में स्थित है, स्वास-प्रश्वास, स्पंदन-स्पंदन  और जीवन-मरण सब उन्हीं के अन्दर, उन्हीं की प्रेममयी प्रेरणा से चल रहा है,यह सब उनका प्रेममय, आकर्षणमय और चुम्बनमय स्वरुप ही है। उन प्रेम, आनन्द और शान्ति की अनन्त मूर्ति में वियोगविकर्षण तथा क्लेश की सत्ता ही नहीं है उनसे इनका स्पर्श ही नहीं है और उनकी अनन्तता के कारण ये हैं ही नहीं; ये मिथ्या हैं। अज्ञान जन्य हैं,कल्पनामात्र] प्रतीतिमात्र हैं। अब प्रश्न यह होता है – उनकी अपार करुणा है और उनकी सत्ता ही नहीं, तो हम इस चक्कर में क्यों पड़े हैं ?हमें नाना प्रकार के क्लेशों की प्रत्यक्ष अनुभूति क्यों होती है ? हमें साक्षात् ही भीषणता के दर्शन क्यों होते हैं ? इन प्रश्नों का उत्तर सुनकर आश्चर्य न करें। यही सच्ची बात है। हम इन्हें ही-चाहते हैं अपनाये हुए हैं, इन्हीं के साथ सन गये हैं और एक हो गये हैं, हम स्वेच्छा से जान-बूझकर क्लेश, भीषणता और भव-चक्र को ही वरण किये हुए हैं। हमने स्वयं चाह कर आनन्द-प्रेमस्वरूप प्रभु को इन रूपों में बना लिया है। हम क्या चाहते हैं ? पुत्र, कलत्र, वित्त, लोक, परलोक और मान-प्रतिष्ठा तथा इनके द्वारा शरीर को क्षणिक सुख, बस यही  तो ! यह मिलते हैं। फल वही होता है, जो होना चाहिए। इन चंचल क्षणिक और अनित्य, पदार्थों से नित्य सुख की आशा  कैसे की जा सकती है ?  जो स्वयं ही विनष्ट-प्राय  हैं, भला कैसे अविनाशी सुख का दर्शन करा सकते हैं ? 

      तनिक ध्यान दें ! जिस शरीर के लिए ही हमारी प्रत्येक चेष्टाएँ होती हैं, जिसको आराम पहुँचाना ही हमारे समस्त कार्यों का लक्ष्य रहता है, जो सबसे अधिक हमारी ममता का भाजन है, यहाँ तक कि जिससे हम अहंता भी करते हैं, वह शरीर ही कितने समय तक साथ देगा और किन पदार्थों के संयोग से बना हुआ है।  इसके सम्बन्धियों की तो चर्चा ही छोड़ दीजिये।  यह महा अपवित्र विष्ठा, मूत्र, माँस, पीव, रक्त, अस्थि, चर्म आदि ऐसे पदार्थों की पोटली है – कि विचार मात्र से ही इससे घृणा होनी चाहिए। इससे प्रेम होने का अभिप्राय है कि हम नरक से ही प्रेम करते हैं, इसीसे आसक्ति, ममता और तादात्म्य होने के कारण ही हम काम, क्रोध आदि अंतःकरणस्थ शत्रुओं तथा निद्रा, प्रमाद और आलस्य आदि कारण शत्रुओं के अधीन अथच उनके द्वारा अहर्निश विताडित हो रहे हैं। उन्हीं के सेवन में सारा समय व्यतीत कर रहे हैं।  

(क्रमशः)

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भगवान् की गोद-2

     हम तो त्रिगुण की लीलाभूमि हो रहे हैं, अनिमेष दृष्टि से उन्हीं को देख रहे हैं, सोच रहे हैं। उन्हीं में सने हुए हैं और वही हो गये हैं। गुण तज्जन्य त्रिविध शरीर और अवस्थाओं को भोगते हुए तद्रूप=तादात्म्यापन्न होते हुए हम अपने वास्तविक ‘स्व’ को, आनन्दघन प्रभु को भूल गये हैं। उसीका यह दुष्परिणाम हुआ है कि हम काल के कराल गति चक्र के खिलौने हो रहे हैं, अहंता-ममता, राग-द्वेष, जन्म-मृत्यु, आधि-व्याधि आदि द्वंद्वों के भार से हमारा हृदय मष्तिष्क और शरीर दब रहा है, चकनाचूर हो रहा है। उन्हीं को वास्तविक रमणीय और सुखप्रद समझकर उनकी अवास्तविकता, अरमणीयता तथा दुःखरूपता को न जानकर सर्वान्तःकरण से परमानन्द प्रभु की ही कामना होने पर भी हम उन्हीं गुणों के मृगजल से प्यास बुझा कर तृप्ति प्राप्त करने के मोह में पड़े हुए हैं। जैसे हड्डी चबाने के कारण तालु फूट जाता है,  तब अपने खून का आस्वादन करके कुत्ता अपने को सुखी मान लेता है, वैसे ही विषयों के प्राप्त होने पर एक क्षण के लिए जब कामना शान्त होती है, अभाव दूर हो जाता है, तब वृत्तियों की एकाग्रता से कुछ सुखाभास की उपलब्धि, अनुभूति-सी हो जाती है, क्योंकि वृत्ति लहरियों की शान्ति में मानस-सर में आनन्द-सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ने लगता है- तब हम सुखाभास को विषयों से प्राप्त हुआ मान कर और भी बन्धन में – राग की वंशपरम्परा में पड़ जाते हैं। किन्तु दूसरे ही क्षण में वासना-वायु के झकोरों से मानस क्षुब्ध हो जाता है, वृत्तियों की चंचलता से दृश्य व्याकुल हो जाता है और उन भगवान् सूर्य का प्रतिबिम्ब भी नहीं दीख पड़ता। फिर उसी मोह के हम शिकार हो जाते हैं। उन्हीं की मौज से, इच्छा से, प्रेरणा से यह सब हो रहा है, ऐसा सोच-विचारकर हम संतोष का मार्ग भी निकाल लेते हैं, किन्तु विषय-भोग से संतोष नहीं होता। यह भी उन्हीं की मर्जी पर छोड़ने को जी नहीं चाहता, उसके लिए सरतोड़ परिश्रम करते रहते हैं। कितनी विडंबना है ! बात ऐसी है कि यदि उन्हीं की इच्छा पर छोड़ना है, तो स्वार्थ और परमार्थ दोनों को छोड़ दें, कामना न करें, वाञ्छा  न करें, वे ही सारी व्यवस्था करते हैं, करेंगे, करने दें, अपनी डेढ़ चावल की खिचड़ी अलग न पकायें। पूर्ण आत्मसमर्पण हो, सर्वतोभावेन शरण हो, लोक-परलोक, धर्म-अधर्म  और ज्ञान-अज्ञान सब कुछ उनके चरणों पर निछावर करके सच्ची प्रपन्नता हो। और यदि स्वार्थ के लिए तो अहर्निश प्रयत्न करते रहें, जब परमार्थ का स्मरण हो, चर्चा आवे, तब उनपर छोड़ दें, यह तो घोर प्रमाद है, तामसिकता है, और बहिर्मुखता का परिणाम है।

     वास्तविकता यह है कि जन्म से ही हमें अपने दोष अस्वीकार करके उन्हें दूसरे के सिर मढ़ देने की आदत पड़ गयी है, जिसके कारण हम अपने प्रमाद की ओर दृष्टिपात न करके, उसे दूर न करके, ईश्वर, काल और प्रारब्ध पर मिथ्या दोष लगा कर अपने अनिवार्य कर्तव्य, प्रभु प्राप्ति की चेष्टा, साधन से विमुख रहने की भूल या जी चुराने की चेष्टा करते हैं।  इसका प्रतिकार होना चाहिए। अपनी सारी शक्ति-बल अपने पास जो कुछ है सबका प्रवाह उसी ओर कर देना चाहिए। उनकी अपार करुणा, प्रेम वात्सल्य का रसास्वादन करने के लिए अपने हृदय को सर्वदा उन्मुक्त कर देना चाहिए। 

(क्रमशः)

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भगवान् की गोद-1

     हमारे प्रभु की लीला का रहस्य,उनकी क्रीड़ा का उद्देश्य इतना गम्भीर और साथ ही सरल होता है कि कभी सोचते-सोचते, तो कभी सरलता का आस्वादन करते-करते  हम तन्मय, आत्मविस्मृत, आनन्दविभोर हो जाते हैं। न जाने अन्तर्देश के किस प्रदेश में लुक-छिपकर बैठे रहते हैं, और हमारी प्रत्येक अभिलाषाओं की निगरानी करते हैं  रोम-रोम की, पल-पल सारी लालसाओं को जानते हैं, किन्तु सम्भवतः अति लज्जाशील ही बनाये रखने की इच्छा है, घूँघट-पट के अन्दर ही रखने की मौज है, अतृप्ति की विरहाग्नि में तपाने का ही निश्चय है। अन्यथा हमारी माता प्रकृति और हम सब नन्हें-नन्हें शिशु अनादिकाल से जिन्हें पाने के लिए जिनकी चारु-चितवन मन्द-मुसकान  और माधुरी मूर्ति के दर्शन के लिए, एक घूँट बस एक घूँट अधरामृत- अधर  सिंधु पीने के लिए लालायित हैं, व्याकुल हैं, अशान्त हैं, अहर्निश दौड़ लगा रहे हैं, यहाँ से वहाँ भटक रहे हैं और सो भी जन्म-जन्मान्तरोंसे, उन परमानन्द प्रभु की एक बिन्दु भी नसीब नहीं हुई होती ? अवश्य-अवश्य हम उनकी रहस्य लीला के आनन्द पारावार में उन्मज्जन-निमज्जन करते डूबते-उतराते होते यदि हमारे प्रभु की महती कृपा का एक कण भी हमें प्राप्त हुआ होता। आज वे अनन्त अजन्मा और निराकार प्रभु हमारे सन्मुख खड़े होते, हमारे सिर पर हाथ रखे होते; हमें पुचकारते, दुलारते, बोलने को कहते, और हम अपनी आनन्दाश्रुधारा से उन मुरली-मनोहर श्यामसुन्दर के चरणारविन्दों को भिगोते होते, वाणी न निकलती, कण्ठ गद्गद  होता, शरीर पुलकित होता।

     इसके बाद, इसके बाद वे बलात् हमें अपने कर-कमलों से खींच कर अपनी छाती से चिपका लेते- गाढ़ आलिङ्गन देते, और, और क्या करते ? जिसके लिए गोपियाँ तरसती रहती थीं, प्रार्थना करती रहती थीं –

‘सुरतवर्द्धनं शोकनाशनं स्वरित वेणुना सुष्ठुचुम्बितम्।

इतररागविस्मारणं नृणां, वितर वीर न स्तेऽधरामृतम्।।

अधरसीधुनाऽऽप्याययस्व नः ।।

     बस फिर क्या था हम कृतार्थ,धन्य-धन्य हो गये होते। पर हम बड़े ही मन्दभागी हैं। हमारे भाग्य में तो दूसरा ही कुछ बदा है।

(क्रमशः)

 

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भगवान् और धर्म से बातचीत

     एक दिन मैं एक मन्दिर में गया। पुजारी जी सामने खड़े थे। भगवान् उनके पीछे खड़े थे। मैंने देखा कि भगवान् कुछ उदास हैं। मैंने पूछा : ‘प्रभु ! क्या बात है? चार छः बार आपको भोग लगता है।आरती होती है ?’ भगवान् बोले : ‘देखो स्वामीजी ! इस पुजारी ने हमको मन्दिर में कैद कर रखा है। हमको बाहर नहीं जाने देता। स्वयं हमारी ओर पीठ करके खड़ा है। पैसेवालों की ओर देखता है।’ मैंने पूछा : ‘महाराज !आपके खुश होने की कोई तरकीब है ?’ भगवान् बोले : ‘हाँ ! हमारे खुश होने की एक तरकीब है कि हम सिर्फ मन्दिर में कैद न रहें। हमको बाहर ले चलो और एक-एक आदमी के दिल में हमको देखो। हर पुरुष, स्त्री, पशु-पक्षी तथा हर जड़-चेतन में मुझे देखो।  सच बात यह है कि जब आप मुझे सबमें देखोगे तो मैं प्रसन्न हो जाऊँगा। किसी से द्वेष और किसी के साथ नफरत नहीं करोगे तो मैं प्रसन्न हो जाऊँगा।’

     एक दिन बहुत आग्रह करके भक्तजन हमको यज्ञशाला में ले गये। यज्ञशाला बहुत सुन्दर बनी हुई थी। ऊँची वेदी, सजे-धजे ब्राह्मण ! देवताओं की पूजा और हवन हो रहा था। परन्तु जब मेरी धर्म पर नजर गयी तो उनका शरीर धुएँ से काला पड़ गया था और उनकी आँखों से  आँसू  बह रहे थे। मैंने पूछा :’धर्म जी महाराज ! क्यों रो रहे हैं ? शरीर आपका काला पड़ गया है। आखिर क्यों ? खूब आहूतियाँ पड़ रही हैं और ब्राह्मणों को दक्षिणाएँ मिल रही है।’ धर्म बोले : ‘महाराज, यज्ञशाला में रहते-रहते अब मैं ऊब गया हूँ। अब मैं चाहता हूँ कि लोगों के आफिसों में जाऊँ, मिलों और दुकानों पर जाऊँ गृहस्थों के घरों में घूमूँ। वहाँ का भी थोड़ा आनन्द लूँ। क्योंकि यदि मैं (धर्म) आफिसों,मिलों, दुकानों और घरों में नहीं जाऊँगा तो यज्ञशाला के अन्दर रहनेवाला धर्म मनुष्य का भला कहाँतक कर सकेगा। मनुष्य का भला करने के लिए धर्म यज्ञशाला से निकल कर हमारे घरमें, हमारी दुकान में, हमारी मिलों और दफ्तरों में आना चाहिए। आज हम धर्म इसीलिए करते हैं कि उससे स्वर्ग मिलेगा। लेकिन धर्म यदि इस दृष्टि से हमारा भला करे कि मरने के बाद उससे हमको लाभ होगा तो वह धर्म हमारे आज के जीवन में टिक नहीं सकता। आज हमको वह धर्म चाहिए जो हमारे जीवन की समस्याओं को यहीं हल करें। यदि आज धर्म गरीबी को दूर करने में मददगार नहीं होगा, यदि आज  धर्म पिछड़े लोगों को साथ नहीं मिलायेगा, यदि आज धर्म मूर्ख को पण्डित नहीं बनायेगा, यदि आज धर्म नंगे को कपड़ा और भूखों को अन्न नहीं देगा, यदि आज धर्म हमारे हित की वर्तमान समस्याओं को हल नहीं करेगा तो भले ही आप आज के लोगों को कहो कि ये लोग धर्मभ्रष्ट हो गये हैं। हमारे बच्चे बिगड़ रहे हैं, ‘संस्कृति’ का नाश हो रहा है, तो भी धर्म उन्नति नहीं करेगा। धर्म की उन्नति के लिए आपको उसे यज्ञशाला से बाहर लाना होगा, ताकि वह आज की समस्याओं को हल करे जिन्हें हल करने की उसमें पूरी सामर्थ्य है।  

     यह भगवान् और धर्म के साथ हुआ हमारा संवाद आपको बहुत बड़ा संदेश देता है। हमारा भगवान् अब हमें मंदिरों में दीखना चाहिए और साथ ही हर प्राणी के रूप में भी, ताकि हमको विश्व के हर प्राणी से प्रेम हो जाय :

सिया राममय सब जग जानी। 

करहुँ प्रणाम जोरि जग पानी।।

     केवल धर्म-धर्म की दुहाई से अब काम नहीं चलेगा। अब तो धर्म हमारे जीवन में आना चाहिए। हमारे घरों, दूकानों, दफ्तरों और मिलों में  उसकी स्थापना होनी चाहिए, तभी यह दुराचार, बेईमानी, रिश्वतखोरी, काम-चोरी और एक दूसरे के साथ घृणा का अन्त हो सकेगा।

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श्रम या धर्म

     वस्तु-शिक्षा और धर्मशिक्षा में कुछ अन्तर होता है। पहली, विज्ञान की प्रधानता से होती है और वह यांत्रिक विज्ञान की कसौटी पर निरीक्षण करके प्रत्यक्ष प्रमाणित की जा सकती है। बाह्य वस्तु में परिवर्तन करना या उस पर आधिपत्य प्राप्त करके उसे लोकोपयोगी बनाना विज्ञान का काम है। वह श्रम को सफल करता है और दिशा भी देता है। धर्म का क्षेत्र इससे भिन्न है। वह हृदय में शोधन, परिवर्तन अथवा विशेष का आधान करने के लिए है। धर्म में इतनी सामर्थ्य है कि वह अंतःकरण को निर्वासन बना दे, ईश्वराकार बना दे, समाधि लगा दे अथवा परम सत्य से अभिन्न स्थिति प्राप्त करा दे। श्रम बाह्य-वस्तु प्रधान होता है तो धर्म आन्तर-वस्तुप्रधान। इसलिए धर्म-शिक्षा में केवल बाह्य-वस्तु-विज्ञान, यांत्रिक परीक्षण-निरीक्षण की प्रधानता अथवा प्रबल तर्कयुक्तियों का बल काम नहीं दे सकते; क्योंकि धर्म की रासायनिक परिणति यंत्र के द्वारा नहीं दिखाई जा सकती, कम-से-कम तत्काल। अतः धर्म की शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रारंभ में थोड़ी-सी श्रद्धा की अपेक्षा होती है। श्रद्धा से धर्म-रस की उत्पत्ति होती है। यह रस ही कर्तव्य के प्रति उत्साह, लगन, निष्ठा और लक्ष्य की प्राप्ति में प्रेरणा का उद्गम होता है।

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हृदयाकाश के हीरे

  • एकबार विश्वास के साथ भगवन्नाम लेना प्रारम्भ कर दो। उसका ऐसा संस्कार पड़ेगा कि कभी किसी आपत्ति-विपत्ति में वही नाम आशा की किरण, शान्ति की किरण बनकर उस दुःख को हल्का कर देगा।  
  • मूर्तिपूजा का अभिप्राय है- लौकिक में अलौकिक की स्थापना। प्रतीकरूप से परोक्ष ईश्वर को प्रत्यक्ष करना।  शालिग्राम बाहर परन्तु हृदय में चतुर्भुज विष्णु।
  • ईश्वर की प्राप्ति का उपाय है- निराश्रय, अर्थात् दुनियाँ में कहीं भी, कभी भी, किसी भी वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, भाव में आबद्ध न होना, ईश्वर के अतिरिक्त तृण का भी सहारा न हो।
  • भगवान् का गोकुल में आना अर्थात् जीव के दैहिक व्यवहार में आना। आँख से देखें तो भगवान् दीखें, जीभ से बोलें तो भगवान् के विषय में, स्पर्श करें तो ऐसा अनुभव हो कि भगवान् का ही स्पर्श कर रहे हैं, चलने में भी भगवान्, दाता-ग्रहीता भी वही इत्यादि। भगवान् का देहस्थ हो जाना ही उनका गोकुल में आना है। 
  • ब्रजरज चाहना अथवा चरण रज की याचना करना अथवा रज बन जाने की कामना निष्कामता की पराकाष्ठा है। रज किसी भी इन्द्रिय के सुख का विषय नहीं है। रज बनना अर्थात् विषय सुख से विरत होना।
  • नित्य परोक्ष तथा नित्य अपरोक्ष वस्तु की अज्ञातता शब्द प्रमाण से ही निवृत्त होती है।
  • अविचार ही तत्त्वज्ञान में प्रतिबन्ध है और उस तत्त्वज्ञान का अधिकारी है-जिज्ञासु।
  • कौशल क्या है ?काजल की कोठरी में ऐसे रहो कि न देह में, न वस्त्रों में कालिख लगे। कुश ऐसे ढंग से उखाड़ो कि न जड़ टूटे, न जीव-हिंसा हो और न अपना हाथ कटे। इसी प्रकार न दुनियाँ का कुछ बिगड़े, न देह का  और अपने को उससे अलग कर लो- यही कौशल है ।  

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विश्व शरीरके कीटाणु

     मैं बहुत छोटा था तब से ईश्वर की ओर झुकाव हो गया था। एक महात्मा ने मुझे कहा : ‘तेरे शरीर में कितने कीटाणु हैं इसकी तुझे खबर है ? उसे मालूम कर, तभी तू यह जानेगा कि तेरे शरीर में कितने विश्व छिपे हैं।’

   यह सुनकर मैं इरविन अस्पताल में गया और डॉक्टर की खुर्दबीन द्वारा खून के एक ही बूँद में असंख्य कीटाणुओंको घूमते-फिरते देखा। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ।

    जैसे अपने शरीर के कीटाणुओं को हम देख नहीं पाते, वैसे ही हमारे शरीर के कीटाणु भी हमको नहीं जानते।

     भागवत कहता है : जिस तरह आकृतियाँ नेत्र को नहीं जानती,पुष्प का रंग और कृति आँख को नहीं पहचानते, शरीर के कीटाणु हमको नहीं पहचानते।’

     रोग बढ़ाने वाला अन्न शरीर में जाने पर शरीर में उपस्थित रोग के कीटाणुओं को आनन्द-ही-आनन्द हो जाता है और रोग कम करनेवाली दवाइयाँ अन्दर जाती हैं तब रोग के कीटाणुओं में उथल-पुथल मच जाती है कि हमारे विनाश का यह मूल कहाँ से आया ?

     जिस महान् शरीर (विश्व) के हम कीटाणु हैं उस महान् शरीर को हम भी नहीं जानते।

     हम खुर्दबीन लगाके और सब देख सकते हैं परन्तु हम जिसके कीटाणु हैं उस विश्व शरीर को नहीं देख पाते। क्योंकि विज्ञान भी एक मर्यादा है।

     एकमात्र ईश्वर ही मर्यादा से विलक्षण अमर्याद है। साथ-ही-साथ वह अमर्त्य और अनादि है।  

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चलो- दुःख में – से सुख बनायें ।

     सुख या  दुःख बाहर की कोई परिस्थिति नहीं है, मन की स्थिति है। 

     मन के सम्वेदन में  सुख या दुःख बैठे हैं। वासना की दुर्गन्ध अर्थात् दुःख। 

     निस्पृहता की सौरभ माने सुख। 

     हमारे जीवन में सुख-दुःख दूसरे किसी के हाथ में नहीं, अपने ही हाथ में है। 

    हमारे माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी-पुत्र सुख या दुःख नहीं दे सकते। हमारे मन की वृत्ति ही सुख-दुःख की जननी बनती है।

     किसी लड़की से मैं पूछता हूँ कि, ‘क्या तुम्हें रोटी बनाना आता है।’ तो तुरन्त ‘हाँ’ कहती है, किन्तु मैं जो ऐसे पूछूँ  कि क्या तुम्हें दुखमें-से सुख बनाना आता है ? तो तुरन्त ही शरमा जाती है या मुरझा जाती है। 

     अच्छा भोजन मिले तो आनन्द से पाओ, किन्तु भोजन बिलकुल ही न मिले  तो एकादशी मानकर खुश हो जाओ। 

    एक दिन एक महात्मा ने मुझे बहुत गालियाँ दी !!

     मैं तो बैठा ही रहा। फिर जब वे शान्त हुए तब मैंने गाली देने का कारण पूछा।

     उन्होंने कहा : ‘अरे भाई ! तुझे इस संसार में बहुत ही गालियां खानी पड़ेंगी। उस समय तू घबड़ा न जाय उसकी शिक्षा देने के लिए ही गालियाँ देता हूँ। गालियाँ आनन्द से खाने की आदत पड़ जाय तो अवसर आने पर चित्त कितना प्रसन्न रह सके !’

     इसलिए हम सबको सुख पैदा करने की विद्या सीख लेनी चाहिए।  

     एक समय हम प्रेमपुरी जी महाराज के साथ वर्षा के दिनों में मोटर में जा रहे थे, एक दूसरी मोटर तेजी से पास से निकल गयी, और कीचड़ का फुहारा उड़ाया और हम सबके कपड़े रङ्ग दिये, साथ ही साथ कीचड़ स्वामीजी के मुँह में भी घुस गया।

     प्रसंग तो मोटरवाले के ऊपर गुस्सा आ जाय, ऐसा था, किन्तु प्रेमपुरी जी महाराज खुश हो गये और बोले; ‘वाह ,आज तो मोटर का चरणामृत मिल गया।’

     दुःख को सुख में पलटने की कितनी सुन्दर कला है !

     प्रतिकूलता को अनुकूलता में पलट देने की कला आ जाये तो सदासर्वदा परमानन्द ही परमानन्द रहे।  

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