“श्रद्धाधन”

     एक विद्यार्थी काशी में पढ़ने गया। 

     वह गुरुकुल में ही था कि एक दिन गुरुदेव उसके घर पहुँच गये। 

     उसके पिता ने पूछा : ‘मेरा पुत्र  क्या करता है ?’

     गुरूजी ने कहा : ‘उसकी बहुत चिन्ता रहती है।  क्योंकि वह स्वयं तो कुछ भी नहीं जानता और जो  मैं समझाता हूँ उसे वह मानता नहीं है।’

     हम भी उस शिष्य की तरह हैं। …… आत्मा में विराजमान परमात्मा का हम अनुभव नहीं कर सकते और अनुभव करके कोई इस विज्ञान को बताये तो श्रद्धापूर्वक मान भी नहीं सकते। इसलिए हमारी हालत ‘अतो भ्रष्ट ततो भ्रष्ट’ जैसी हो गयी है। इसलिए या तो अनुभव करो या अनुभव न होने पर श्रद्धापूर्वक अनुसरण करो। 

     अविद्वान्, स्त्री, बालक के लिए तो श्रद्धा ही बड़ा धन है। 

     श्रद्धा लेकर आप जहाँ भी जायेंगे वहाँ अवश्य सफल होंगे। 

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आप अपने में ही स्थित रहिये!

     सुख भी अपने हृदय में है। 

     दुःख भी अपने हृदय में है। 

     जब आपका हृदय कथामृत के भगवद्-रस में सराबोर रहता है तब बताइये, आपको दुकान, दुश्मन, रोग, कुछ भी याद आता है ? उन सब प्रपंचों का विस्मरण तब हो ही गया न ?

     आपको राग-द्वेष और मोह के फंदे से मुक्त करने के लिए ही और आपको अपने हृदय में स्थिर रहने का प्रयोग कथा द्वारा होता है।

     आपका मन आपकी प्रकृति में स्थिर होगा तो राग-द्वेष आपको परेशान नहीं करेंगे !  फिर तो आपके हृदय में विराजमान प्रभु के प्रति प्रेम और सेवा का निर्झर बहने लगेगा। और, तब आपको विश्वास होगा कि सम्पूर्ण सुखों के स्रष्टा आप ही हैं, और सम्पूर्ण सुखों के अक्षयभण्डार आप ही हैं।  

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नाचो जी नाचो

     मैं छोटा था तब एक महापुरुष ने मुझे कहा था : ‘आनन्द का आस्वादन करना हो तो कमरे में बन्द होकर प्रभुप्रेम में मस्त होकर नाचो।’

     मैंने पूछा : ‘इससे क्या लाभ ?’

     तब उन्होंने बताया : ‘इससे दूसरे किसीकी भी सहायता के बिना तुम्हें अपने सुख के विषय में विचार करने की प्रक्रिया मिल जायेगी।’

     प्रेम की चाल का नाम है, नृत्य। 

     प्रेम की बोली का नाम है, संगीत। प्रेम माने तृप्ति। प्रेम माने रसानुभूति। 

     भौतिक रसानुभूति प्राप्त करने के लिए कोई मुँह में रसगुल्ले डालता है तो कोई गांठिया खाता है।  और उसके लिए तो पैसा, वस्तु और व्यक्ति चाहिए। 

     बिना वस्तु, व्यक्ति और पैसे की अपेक्षा के जीवन का अनन्त आनन्द प्राप्त करना हो तो प्रभु प्रेम में मस्त बन जाओ। फिर हृदय की गति के ताल पर नाचो। 

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बस,वर्तमान को सुधार लो !

     अबतक आपने अपने जीवन का उद्देश्य निश्चित न किया हो तो, आज ही, अभी कर लीजिए, क्योंकि उद्देश्यहीन जीवन व्यर्थ है। 

     जीवन की दिशा निश्चित  कर लीजिए। जीवन की प्रत्येक क्रिया और प्रत्येक संकल्प उसी दिशा में आगे बढ़ने के लिए होना चाहिए। 

     आपको परमात्मा की ओर आगे बढ़ना है किन्तु रास्ते में लुभाने वाले विश्राम-स्थान और आनन्द-प्रमोद के धाम आनेपर लुब्ध न हो जाइये। भयानक रास्ते आने पर घबराकर पीछे न हटिये। आपके पास एक महान् शक्ति है और वह आपकी सतत रक्षा करती है।

     अनुभव करें ! आपको एक महान् प्रकाश घेरे हुए है। वह अन्दर और बाहर, आगे और पीछे, ऊपर और नीचे, नस-नस में व्याप्त हो रहा है।

     अपना ज्ञान, शक्ति और सत्ता उसमें डुबा दो, डूबने दो।

    फिर, आप व्यवहार में रहकर भी अपने जीवन में एक नई स्फूर्ति और उल्लास का अनुभव करेंगे।

     आप देखोगे कि आपका जीवन प्रत्येक क्षण परमात्मा के समीप जा रहा है।

     आप चाहें किसी भी परिस्थिति में हों, परमात्मा आपके साथ ही है। और फिर आपकी सहिष्णुता और धैर्य को हँसते-हँसते देख रहा है।

     ऐसे आनन्द के सामने क्या आप क्षुब्ध रह सकेंगे ?

     उसमें  उनके सुकोमल करकमलों के स्पर्श का सतत अनुभव करें।

     देखें ! इस समय भी उनके करकमलों की छत्र-छाया आपके सिर पर है।

     जो बीत गया है उसे भूल जायँ। जो आनेवाला है वह आपके अधिकार के बाहर है।

     इसलिए भूतकाल और भविष्यकाल में मत भटकें और अपने वर्तमान् को ही सुधारें। कहीं यह क्षण भी व्यर्थ न बीत जाय इसके लिए सावधान रहें।

     अनुभव करें कि आपका आज का दिन सार्थक बीत रहा है और आप भगवान् की ओर जा रहे हैं।  

 

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तमसो मा ज्योतिर्गमय

  • सत्य सर्वदा सरल होता है। उसमें दावपेंच नहीं होते। चेष्टा सत्य की प्राप्ति के लिए नहीं, असत्य के त्याग के लिए करनी चाहिए।
  • धर्म क्रिया प्रधान है इसलिए उसके लिए स्थूल शरीर की अपेक्षा है। धर्म अधर्म का निवर्तक है।

           उपासना भाव प्रधान है, इष्टाकार-वृत्ति है। इसमें सूक्ष्म शरीर की अपेक्षा है। यह अनेकाकारता को                  निवृत्त करती है। 

           योग निराकार स्थित्यात्मक है। अतः कारण शरीर प्रधान है। यह विकल्प का निवर्तक है।

  • हठयोग में क्रियालम्बन है। मंत्रयोग में शब्दालम्बन है। लययोग में इदंरूप प्रतीकालम्बन और राजयोग में अहंरूपालम्बन है।
  • सेवा में दुःख तब होता है जब वह ज्ञानशून्य हो, विवेकरहित  हो तथा संसार के पदार्थों में राग हो।
  • परमात्मा के साक्षात्कार के लिए ज्ञान अनिवार्य है। परन्तु अंतःकरण की शुद्धि के बिना ज्ञान नहीं हो सकता। अंतःकरण की शुद्धि के लिए सबसे बड़ी औषध भक्तिरूप रसायन है। अंतःकरण शुद्धि के लिए एक आलंबन की आवश्यकता है।
  • भक्ति का संयोग यदि भगवान् के साथ ठीक-ठीक होगा तो पुत्ररूप में ज्ञान का प्रकाश और वैराग्य की निर्मलता एक साथ प्राप्त होंगे। वैराग्य अर्थात्त् चित्त में राग-द्वेषका न होना। अंतःकरण के संकल्परूप मन की शुद्धि भगवान् के स्मरण से होती है। स्मरण से राग-द्वेष दोनों क्षीण होंगे।
  •   अज्ञान के चार विकास हैं –

        (1) स्वरूपज्ञान 

        (2) सत्य को असत्य और असत्य को सत्य समझना। 

        (3) सत्य से राग और असत्य से द्वेष। 

        (4) सत्य में चिपक जाना अर्थात् दुराग्रह। 

  • ज्ञान (विचार) तत्त्व शोधन के लिए प्रयोज्य है और भक्ति जीवन-शोधन के लिए। 
  • कोई भी संसार नहीं चाहता। वह चाहता है शाश्वत सुख। शाश्वत सुख संसार में नहीं है; वह तो ईश्वररूप है। इसलिए सर्वत्र, सर्वदा, सर्वथा और सब में परिपूर्ण सुख का अभिलाषी ईश्वर की ही उपासना करता है। 
  • भक्ति क्या है ? सर्वरूप में विराजमान परमात्मा की सेवा और इसकी पूर्णता है – सर्वत्र भगवद्भाव। 
  • पूतना का अंतःकरण शुद्ध है। वह भगवान् की ओर चलती है। स्तन में विष लगाकर- अपने दोषों को प्रकट करके  भगवान् के पास आती है। परन्तु उसके भीतर है अमृततुल्य दूध। भगवान् उसके दोषों को पचा लेते हैं और दूध पी जाते हैं। उसे माता की गति देते हैं। तात्पर्य यह है कि तुम जैसे हो, वैसे ही भगवान् की ओर चलो, उनसे मिलो। भगवान् भी जैसे हैं, वैसे ही तुमसे मिल जायेंगे। दोषों से डरो मत।
  •  एक महात्मा गये भिक्षा माँगने। बुढ़िया ने नाराज़ होकर घर लीपने-पोतने का पोतना फेंककर मारा। महात्मा उसे उठाकर कुटिया पर ले आये। धो-सुखाकर बत्ती बनायी और भगवान् के लिये दीपक में प्रयुक्त किया। भगवान् की कृपा हुई। बुढ़िया को पोता हुआ। 

           पूतना भी भगवान् को दूध पिलाने के लिए गयी, परन्तु बहार से लपेटा विष। भगवान् ने पोतने की                तरह उस जहर को भी स्वीकार कर लिया। भगवान् की कृपा से पूतना को मातृत्व मिला। महात्मा और             भगवान् की इस महिमा को स्वीकार कर उनकी ओर चलो। 

 

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उलूखल बन्धन लीला-32

     श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं-भक्तों के वश में भगवान् हैं। भक्तों में भी श्रीब्रजेश्वरी के तो सर्वथा ही अधीन हैं। अपार परवशता धारण किये हुये हैं। मूल में ‘विमुक्ति’ शब्द का अर्थ है- विशिष्ट मुक्ति = प्रेम। उसे देने वाले हैं श्री कृष्ण। कृष्ण से यशोदा को जो प्रसाद प्राप्त हुआ वह ब्रह्मा शिव लक्ष्मी को भी नहीं मिला। नकार और क्रियापद की तीन बार आवृत्ति कीजिए ,अतिशय अप्राप्त है – यह अर्थ है। दूसरा अर्थ इस प्रकार है ब्रह्मा, शंकर और लक्ष्मी को प्रसाद नहीं मिला, ऐसा नहीं, मिला तो सही परन्तु जो प्रसाद गोपी को मिला, वह उन्हें नहीं मिला। ब्रह्मा और शिव दास हैं उनसे श्रेष्ठ लक्ष्मी हैं, वक्षःस्थल पर स्थित प्रेमवती पत्नी। जो प्रसाद उन्हें नहीं मिला वह प्रसाद यशोदा को कैसे मिला? क्योंकि वे तो पहले वसुपत्नी धरा थीं। ब्रह्मा को प्रसाद न मिले और वे जिसको वर दें उसे मिल जाय- ऐसा कैसे हो सकता है ? ब्रह्मा ब्रजरज के प्रेमी हैं। इस उक्ति-युक्ति से सिद्ध होता है कि नन्द-यशोदा नित्य सिद्ध हैं।

     भागवत-सिद्धान्त है कि भगवत्प्रेम ही सब पुरुषार्थों का शिरोमणि है। भक्त नित्यसिद्ध होंगे तो उनमें प्रेम भाव नित्य प्रतिष्ठित होगा, अन्यथा अनित्य हो जायेगा। भक्तों में गोकुलवासी श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे वात्सल्य, सख्य आदि भाव से प्रेम करते हैं। उनके रागानुगामी भक्तों को ही श्रीकृष्ण सुलभ हैं। देहाभिमानी कर्मी, देहाध्यास रहित ज्ञानी और भगवान् के ही अवतार ब्रह्मा-शंकर तथा स्वरुप-शक्तिरूपा लक्ष्मी-ये भगवान् के आत्मभूत ही हैं, तथापि उनके लिए  ये सुलभ नहीं हैं। ब्रह्मा, शंकर आदि को अपने-अपने लोक में रहना पड़ता है, लक्ष्मी को भी। वे ब्रजरस का आस्वादन कैसे कर सकते हैं? ब्रजवासियों की अनुगति भी उनके लिए अप्राप्य है।

     सिद्धान्तप्रदीपकार  का अभिमत है कि भक्ति मुक्ति से भी दुर्लभ है- यह इस प्रसंग में कहा गया है। भक्ति-सम्बन्ध-वर्जित धर्म, योग, ज्ञान भगवत्प्राप्ति के साधन नहीं हैं। भक्ति ही एकमात्र भगवत्प्राप्ति का साधन है।

     भक्तिरसायनकार  श्रीहरिसूरि कहते हैं कि भगवान् जिन्हें बाल लीला का सुख देते हैं उन्हें ऐश्वर्य का सुख नहीं और जिन्हें ऐश्वर्य का सुख देते हैं उन्हें बाल लीला का सुख नहीं। परन्तु अपने श्रेष्ठ भक्तों को वे दोनों का ही सुख देते हैं। बन्धन न होने से ऐश्वर्यसुख है और होने से बाललीला-सुख। यशोदा को दोनों प्राप्त हुए।

येषां बालतया सुखोदयकरस्तेषां न षाड्गुण्यतो 

येषां तादृशरूपतश्च सुखदस्तेषां न बालत्वतः।

सच्चिद्रूपतया च बालकतया निःसीमसौख्यप्रद-

स्तेषामेव सुभक्तिमन्त इह  येऽत्रो दाहृतिर्गोपिका।।     

     उलूखलबन्धन-लीला भृत्यवश्यता, प्रेम-परवशता, वात्सल्य-स्नेह का अनुपम उदहारण है। भगवान् में कितना अनुग्रह है और माता में कितना प्रेम है – इन दोनों का स्पष्ट दर्शन होता है इस लीला में।

     इसमें सन्देह नहीं कि यह लीला भावुक भक्तों को लीन-तन्मय कर लेती हैं अपने में। प्रेम-भक्ति के लिए उन्मुख करती है। इस प्रसंग में यह उल्लेख करके कि भगवान् का बन्धन भी दूसरों की मुक्ति का साधन है जैसे नलकूबर-मणिग्रीव का उद्धार, हरिसूरि के भक्ति रसायन स्थित एक श्लोक का रसास्वादन करते हुए इस निबन्ध को समाप्त करते हैं –

अन्य एव मम बन्धको भवत्यन्य एव मम मोचकोऽपि च।

न स्वतोऽस्ति मम बन्धनं न वा मुक्तिरित्यकृत स्फुटार्थकम्।।

भगवान् श्री कृष्ण अपने मन में विचार कर रहे हैं कि दूसरा कोई (जैसा माता) मुझे बन्धन में डाल देता है, बद्ध समझ लेता है और दूसरा ही कोई (जैसे पिता नन्द ) मुझे मुक्त कर देता है अर्थात् मुक्त के रूप में साक्षात्कार कर लेता है। मेरे वास्तविक स्वरुप में  न बन्धन है और न तो मुक्ति।  

 

श्री हरिः 

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उलूखल बन्धन लीला-31

     श्रीवीरराघवाचार्य का भाव है कि भगवत्प्रसाद भक्ति से ही प्राप्त होता है। उसके लिए ब्रह्मा-शंकर या लक्ष्मी होने की आवश्यकता नहीं है, प्रेम-पूर्वक अनुध्यानादि-रूप भक्ति की आवश्यकता है। जब वह गोपी के हृदय में विद्यमान है तब उसे भगवत्प्रसाद अवश्य ही प्राप्त चाहिए। उसी के लिए वे सुख-साध्य हैं। 

    श्री विजयध्वजतीर्थ कहते हैं कि निरन्तर निरतिशय भक्ति ही वह परम सुन्दरी नायिका है जो भगवान् को भी अपनी ओर आकृष्ट करने में परम विदग्ध है। 

    आचार्य वल्लभ ने कहा – भगवान् श्रीकृष्ण ने यहाँ नयी बात क्या दिखलाई ? ऐसा भाव तो पुरातन काल से ही शास्त्रों में प्रसिद्ध है। इसकी मीमांसा कीजिये। जो प्रसाद यशोदा को मिला वह इससे पहले किसी को नहीं मिला। यह महान् भक्तों को ही प्राप्त होता है। भक्तों में भक्ति से और स्वरुप से तीन महान् हैं- ब्रह्मा पुत्र हैं, भक्त हैं, प्रवृत्तिमार्ग के सब धर्मों के प्रवर्तक  हैं और सबके पिता हैं। महादेव पौत्र हैं, निवृत्तिधर्मों के प्रवर्तक हैं, प्रलय के हेतु एवं गुणावतार हैं। भगवान् के लिए ही सब कुछ छोड़ कर तपस्या करते हैं। इन दोनों से अंतरंग हैं लक्ष्मी। वह पत्नी हैं। ब्रह्मानन्द स्वरुप हैं, जगज्जननी हैं। वक्षःस्थल पर निवास प्राप्त होने पर भी चरणसेवा में संलग्न हैं। जब इन्हीं को यह प्रसाद नहीं मिला तो दूसरे को कहाँ-से मिलेगा ? इनमें -से किसी एक को नहीं मिला तथा पूरे समुदाय को नहीं मिला – यह सूचित करने के लिए तीन बार नकार और बहुवचन में ‘लेभिरे’क्रिया का प्रयोग है। इनमें कोई त्रुटि भी नहीं है; क्योंकि तीनों भगवान् के अंगाश्रित हैं। वक्षःस्थल पर लक्ष्मी, नाभि में ब्रह्मा और चरणों में शंकर। यशोदा में ये तीनों विशेषताएँ नहीं हैं। जो प्रसाद मिला वह अनिर्वचनीय है। सबको मुक्ति देने वाला अपने को बन्धन में डाल दे, यह क्या कम आश्चर्य है ? यदि यशोदा का दुःख ही दूर करना था तो ज्ञान या कैवल्य देकर उसे दूर कर सकते थे। सचमुच भक्त को भक्ति के बन्धन में डाल देना सबसे बड़ा प्रसाद है।

     ब्रह्मा आदि महान् हैं और यशोदा तो श्रीकृष्ण को ईश्वर के रूप में पहचानती भी नहीं। ऐसी स्थिति में यशोदा के प्रति प्रसादानुग्रह उनके प्रति किये गये प्रसादानुग्रह से बड़ा कैसे हो सकता है ? ध्यान दीजिये, यहाँ बन्धनमात्र विवक्षित नहीं है।किन्तु वश्यता,भक्तवश्यता विवक्षित है।वह किसी और को नहीं मिलती। देहाभिमानी कर्मी और निरभिमान मुक्तज्ञानी दोनों के लिए यह भगवान् सुखलभ्य नहीं हैं। एक में देहाभिमान दोष है तो दूसरे में भगवान् के प्रति भी निरपेक्षता। क्या पार जाने मात्र से ही महाराज की प्राप्ति हो जाती है। विशेषता यह है कि भक्तों को इसी लोक में मिल जाते हैं; क्योंकि वे गोपी के पुत्र हो गये हैं। इसका अभिप्राय ही यह है कि लोग इसी लोक में, इसी अवतार में भक्ति करें।

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-30

     करोड़ कल्प में भी भगवत्स्वरूप बन्धन की संभावना से युक्त नहीं हो सकता परन्तु भक्त के संकल्प और अल्पप्रयत्न से ही बन्ध गये। यह लीला वस्तुतः भक्तों का हृदय अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए ही है और क्या कहूँ, भगवान् भक्त के वश में।

     श्रीधर स्वामी ने अवतरणिका में कहा है कि भगवत्प्रसाद तो दूसरे भक्तों को भी प्राप्त होता है परन्तु यशोदा माता को जो कुछ मिला वह अत्यन्त विचित्र है। पुलकित शरीर से शुकदेव जी ने कहा  कि ब्रह्मा पुत्र हैं, शंकर आत्मा हैं और लक्ष्मी पत्नी हैं फिर भी उन्हें यह प्रसाद नहीं मिला। देहाभिमानी तपस्वी और अभिमानरहित ज्ञानियों के लिए भी यह गोपीकानन्दन भगवान् सुलभ नहीं हैं। उन्हें मिलते तो हैं परन्तु भक्तों के लिए सुगम हैं उतने उनके लिए नहीं।

     श्रीजीवगोस्वामी विस्तार से अपना अभिप्राय प्रकट करते हैं। उनका कहना है कि जब राजा परीक्षित ने यशोदा -नन्द के उस पुण्याचरण के सम्बन्ध में प्रश्न किया जिससे भगवान् की बाल लीला का आनन्द उन्हें मिला, तब शुकदेव जी ने सामान्यरूप से उन्हें महापुरुष ब्रह्मा के कृपा-प्रसाद का उल्लेख कर दिया। तब क्या धरा-द्रोण  वसु दम्पती को नैमित्तिक रूप से ही यह शुभावसर प्राप्त हुआ ? नहीं, अब तात्त्विक समाधान किया जाता है। भक्तों के आदि गुरु हैं ब्रह्मा। वैष्णवों के आदर्श हैं शंकर। नित्य प्रेयसी हैं लक्ष्मी। वह तो वक्षःस्थल पर निवास करती हैं। उन्हें भक्तिरूप प्रसाद की प्राप्ति हुई ? भगवान् मुक्ति देना = जेलखाने से छोड़ देना तो पसन्द करते हैं परन्तु भक्ति देना अर्थात् अपनी सेवा में लगा लेना सबके लिए सुलभ नहीं करते। परन्तु जो प्रसाद – अनिर्वचनीय महाप्रसाद जिसका ठीक-ठीक निरूपण प्रसाद शब्द के द्वारा भी नहीं हो सकता, वह प्रेम-परिपाक यशोदा को प्राप्त हुआ। वह ब्रह्मा, शंकर और लक्ष्मी को भी न मिला, न मिला, न मिला। तीनों नकार अन्वय ‘लेभिरे’ के साथ है। लक्ष्मी को ऐश्वर्य का ज्ञान है। अवश्य ही पति के रूप में उनकी ममता विशेष है परन्तु यशोदा को ऐश्वर्य ज्ञान न होने के कारण केवल ममता ही ममता है। इसलिए यशोदा की प्रीति ब्रह्मा का प्रसाद नहीं है। वह नित्यसिद्ध श्रीकृष्ण-माता हैं। ब्रह्मा तो स्वयं ब्रजरज की प्राप्ति के लिए लालायित रहते हैं।

    मूल में स्पष्ट है कि भले ही तपस्या और ज्ञान से महानारायण या परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति होती हो परन्तु गोपिकानन्दन की प्राप्ति उनके लिए भी कठिन है बिना किसी विशेषण के गोपिका-सुत कहने का अभिप्राय यह है कि गोपिका ही सबके लिए उपादेय है। ‘इह’ शब्द के प्रयोग का  यह भाव है कि गोपिका और गोपिका-सुत की स्थिति नित्य है और सभी देश में, सभी काल में सच्चे प्रेमियों के लिए सुलभ हैं। यशोदा के समान ही नन्दबाबा आदि परिकर भी नित्य ही हैं। धरा-द्रोण के रूप में जो निरूपण किया गया था वह तो जब तक पूर्णतया लीला-रहस्य का प्रबोध न हो जाय, तभी तक के लिए कहा गया था।  

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-29

     श्री कृष्ण ने विचार किया – मैं परमैश्वर्यशाली सहस्रगुण सद्वृत्ति हूँ,तथापि भक्तों के गुण के बिना मेरे गुण पूर्ण नहीं होते। अतएव उन्होंने यशोदा के गुणों से अपने उदर को भर लिया।

षाड्गुण्यं भजतः सहस्रगुणसद्वृत्तेरनन्तात्मनो

नित्यानन्तगुणोल्कसत्- सुचरितस्यापीह मेऽवस्थितिः।

पूर्णत्वं गुणतः प्रयाति न विना मद्भावभाजां  गुणा –

लम्बं जातुच्चिदित्यबोधयदसौ पूर्णोदरस्तद्गुणात् ।।

     अपने भक्त के प्रेमपोषक परिश्रम को भी मैं  नहीं सह सकता, अन्य की तो बात ही क्या है ? मैं माता का खेद दूर करने के लिए अश्लाघ्य बन्धन को भी सह लूंगा।

मत्प्रेमपोषकमपि श्रममात्मभक्त-

देहे सेहे न भुवि जातु कुतस्तदन्यम्।

किं चास्य खेदमपनेतुमहं सहेये –

त्यश्लाघ्यमप्यकृत-बन्धनतः स्फुटं सः।।

     तत्त्वदृष्टि से मुझमें कोई गुण संलग्न नहीं है। यदि गुण क्वचित् भासमान भी हैं तो मध्य में ही (जो आदि-अन्त में नहीं होता वह मध्य में भी नहीं होता, मिथ्या ही भासता है। ) श्रीकृष्ण ने मानो इसी श्रौत तात्पर्य को प्रकट करने के लिए मध्य भाग में ही रस्सी का सम्बन्ध स्वीकार किया।

न मां तत्त्वदृष्ट्या गुणः कोऽपि लग्नः क्वचित्भासमानोऽपि  चेन्मध्य एव ।

इति   श्रौतमर्थं   तदानीमधीशः   स   दाम्ना   स्वमध्येन   मन्ये  व्यतनीत् ।।

     गोकुलगत रज्जुओं से बन्धन अंगीकार करने का अभिप्राय है कि गोकुलवासी ऐन्द्रियक व्यवहार में संलग्न व्यक्ति भी प्रेम से मुझे बाँध लेते हैं, वश में कर लेते हैं।

     महापुरुषों का यह गौरवपूर्ण सद्गुण है कि भले ही कोई उसे न समझे,अभीष्ट कार्य की पूर्ति कर देता है। यह दामोदर-लीला से स्पष्ट है।

     यदि दैववश खलगुण का अपने आप से सम्बन्ध हो जाय तो बन्धन की प्राप्ति अवश्य होती है, भले ही वह महापुरुष ही क्यों न हो। ऊखल एवं रज्जु के सम्बन्ध से श्रीकृष्ण को भी बँधना पड़ा।

     भगवान् श्रीकृष्ण ने माता के मनका निर्बन्ध (आग्रह) देखकर आत्मबंधन स्वीकार कर लिया। भक्त के प्रेम के सामने अपना कार्य गौण हो जाता है।

     भगवान् श्रीकृष्ण अपने मन में परामर्श करने लगे। देवर्षि नारद ने नलकूबर, मणिग्रीव को शाप देकर वृक्ष बना दिया है और यह वचन दे दिया है कि शीघ्र ही व्रजराज कुमार तुम्हें मुक्त कर देंगे। यह ठीक है कि मैं मुक्त हूँ स्वयं और मुक्त करता हूँ दूसरों को तथापि देवर्षि की वाणी ने तबतक के लिए मुझे बन्धन में डाल दिया है जब तक इन दोनों पर कृपा करके मुक्त नहीं कर देता है। यही विचार करके भगवान् ने देवर्षि नारद के वचनों के बन्धन से ही अपने को बद्ध बना लिया। यही तो भक्तवश्यता है। 

मच्छापादचिरेण वां यदुपतिर्मोक्तेति वाचाऽऽर्षया

तावत् बद्ध इवाहमस्मि सततं मुक्तोऽपि मोक्ताऽपि च।

यावद्वार्क्षपदादिमौ न कृपया सम्मोचितावित्यसौ

तद्बन्धात् किमबोधयद् भुवि विभुर्भक्तैकवाग्वश्यताम्।।  

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-28

     श्रीहरिसूरि यह विकल्प उठाते हैं कि यशोदामाता ने घर की छोटी-बड़ी सभी रस्सियों को अलग-अलग कृष्ण के कटि-भाग में लगाया अथवा सबको एक साथ ? इनमें -से यदि पहली बात मानी जाय तो यह भाव ध्वनित होता है कि समदर्शी दयानिधान भगवान् में छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं है। दूसरी बात यह कि रज्जु ने यह सूचना दी – प्रभु के समान अनन्तता और अनादिता हम क्षुद्रों में कहाँ-से आ सकती है। अतः हम इन्हें बाँध नहीं सकते।

     यदि ऐसा माना जाय कि सभी गुणों (रस्सियों) का प्रयोग एक साथ ही किया गया तो वे सब अनन्त गुण परमात्मा में लीन हो गये। समुद्र में सभी नदियाँ लीन हो जाती हैं। न नाम रहा, न रूप। समुद्र में एक मेरी श्यामता है और दूसरी यमुना की। दो अंगुल की न्यूनता के द्वारा प्रभु ने यह भाव प्रकट किया।

     आश्चर्य तो यह है कि वामन की भाँति अपने रूप को छोटा नहीं किया। त्रिविक्रम के समान बढ़ाया नहीं। रस्सी छोटी नहीं की। उनके पृथक् या युगपत् प्रयोग में कोई बाधा नहीं डाली। फिर भी किसी रूप में श्रीकृष्ण को गुणस्पर्श नहीं हुआ।

     माता की थकान और भूषण-भ्रंश देखकर कृष्ण के हृदय में कृपा का उद्रेक हुआ। वे सोचने लगे- माता के हृदय से द्वैत- भावना दूर नहीं होती तो फिर इसके सम्मुख अपनी असंगता प्रकट करना व्यर्थ है। इस भाव से उन्होंने बन्धन को स्वीकार कर लिया।

न द्वैतमस्या हृदयादपैति  तत् किं वृथा स्वां प्रकटीकरोषि।

 निःसंगतामित्यवधार्य तादृग् दामस्थितेरास विभुः सम्बन्धः।।

भक्त के छोटे-से गुण को भी भगवान् पूर्ण कर देते हैं यही सोचकर छोटी-सी रस्सी को भी अपने बन्धन योग्य पूर्ण बना दिया। 

लघुमपि मद्भक्तगुणं हार्दस्थितितो नयामि पूर्णपदम्।

ध्वनयन्नेवमनन्तो       निन्ये      पूर्णत्वमेतदल्पमपि।।   

(क्रमशः)

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