जीवन में पूर्णता का अवतरण-1

अर्जुनकी युद्ध प्रवृत्तिका उद्देश्य है सबका हित। वे श्रीकृष्ण के सम्मुख स्पष्ट रूप से अपने हृदयका उद्गार प्रकट करते हैं कि ‘अहो ! हम जिन लोगों के लिए राज्य, सुख एवं भोग चाहते हैं वे ही अपने प्राण तथा धन का परित्याग करके मरने और मारने के लिए युद्धभूमिमें खड़े हैं।’ इसका अभिप्राय यह है कि अर्जुन व्यक्तिगत स्वार्थसिद्धि के लिए अथवा सामूहिक युद्धाभिनिवेश के वशवर्ती होकर नरसंहारमें प्रवृत्त नहीं हैं। वे धर्मा- धर्मका शुद्ध विवेक करके ही युद्ध में प्रवृत्त होना चाहते हैं। इसके विपरीत दुर्योधनकी बुद्धि युद्धोन्मादसे अभिभूत हो गयी है। उसको इस बातका हर्ष है कि लोग उसके स्वार्थ और अधिकार- लिप्साको पूर्ण करने के लिए अपनी जान हथेलीपर लेकर सामने खड़े हैं और मरनेपर तुले हुए हैं: “मदर्थे त्यक्तजीविताः” केवल इतनी ही बात ध्यान में रखकर गीताका स्वाध्याय किया जाय तो यह निष्कर्ष निकलेगा कि अर्जुन में दैवी सम्पत्ति और दुर्योधन में आसुरी सम्पत्ति जन्मसे ही विद्यमान है ।

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पत्रोत्तर

सप्रेम शुभाशीष,

प्रत्येक परिस्थिति में चाहे वह बाहर से कैसी भी क्यों न हो – भगवान् की कृपा और प्रेम प्राप्त है। भगवान् तुम्हारे तन में, मन में, रोम-रोम में और कण-कण में निवास करते हैं। वे क्षण-क्षण में रूप-परिवर्तन करके प्रेम-नर्तन करते रहते है और सभी संबंधों का रसास्वादन करते-कराते रहते हैं। सारी विश्वसृष्टि प्रभु का ही उल्लास-विलास है। वे तात, मात, गुरु, सखा एवं सभी हितकारी सम्बन्धों के रूप में प्रकट-अप्रकट होते रहते हैं। यह प्रसन्नता की बात है कि तुम उनको सभी प्रकाश एवं विकास में संबंधी के रूप में पहचान लेते हो। जो सब है उसके साथ सब सम्बन्ध होते हैं। सभी कुछ उसकी सेवा का साधन होता है। सभी रूपों में वह सेवनीय होता है। उसके लिए कभी दुर्भाग्य या अभाव अनुभव करने का अवकाश नहीं होता। वह मन के अंतरतम प्रदेश में प्रवेश किये हुए हैं। मन के साथ ही उदय-विलय होता रहता है। वही मन को अपनी पसंद का बनाकर विविध क्रीड़ा करता रहता है। वह निरन्तर अपनी मूर्ति की स्फूर्ति से तुम्हारे मन को पूर्ति प्रदान करे।

हृदय में बार-बार भगवान् के दर्शन-स्पर्श, मुस्कान, चितवन के अनुभव के लिए उसका नाम-स्मरण ही सर्वोत्तम निमित्त है। यह उसकी कृपा और प्रेम ही है कि तुम्हारे जीवन में जप का विशेष प्रकाश हो रहा है, भगवत्-संकल्प से निरन्तर इसकी वृद्धि एवं समृद्धि हो। शेष शुभ !

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कपट अनुग्रह में बहुत बाधक है

अच्छा तो सुनो !शिष्य के मन का कपट एक ही है। हमको देवता का दर्शन हुआ है। जिस सगुण भगवान् की आरधना भक्त लोग करते हैं;उनका इन्हीं आँखों से मैंने प्रत्यक्ष दर्शन किया है। जो ब्रह्मात्मैक्य-बोध, प्रमाण से उत्पन्न होता है, प्रभा होती है, जिससे अविद्या का, भ्रांति का समूल विध्वंश होता है, वह बोध मैंने प्राप्त किया। ईश्वर गुरु से कपट का कोई कारण नहीं है। उसका भाव तुम्हारे प्रति कभी बिगड़ नहीं सकता। यह भी एक बात है। जिसको तुम बहुत बुरा समझते हो,अरे यह मालूम हो जायेगा तो क्या कहेंगे, यह मालूम होगा तो उनका भाव हमारे प्रति बिगड़ जायेगा। गुरु लोग जानते हैं कि दुनियाँ में जितनी बुराई है वह सब हमारी है चोर मैं हूँ और चोरी मैं करता हूँ। जुआरी मैं हूँ और जुआ मैं खेलता हूँ। उसकी आत्मा मैं हूँ। उसका सब, उसकी चोरी, उसका जुआ, उसका व्यभिचार, उसका अनाचार,उसका दुराचार मुझपर ब्रह्म परमात्मा में ही अध्यस्त हैं। हम किसी को कभी छोड़ सकते हैं ? किसी को बुरा मानेंगे तो अपने को ही बुरा मानेंगे। अपना ही आत्मा है, अपना ही स्वरुप है। अपने में ही सब प्रतिफलित हो रहा है। कहो, ईश्वर कहाँ नहीं है ? इसी से हमने भागवत में पढ़ा। चोर के रूप में ईश्वर है कि नहीं ? अच्छा; छेड़-छाड़ करनेवाले के रूप में ईश्वर है कि नहीं ? भागनेवाले के रूप में ईश्वर है कि नहीं ? झूठ बोलनेवाले के रूप में ईश्वर है की नहीं ?बँधा हुआ ईश्वर है कि नहीं ? यशोदा मैया ने बाँध दिया न ?जिसके पाँव में तीर लगे और तीर लगने पर जो इस संसार को छोड़ दे वह भगवान् है कि नहीं ? तब ?जिसको तीर लगता है वह भी भगवान् है जो बाँधता है वह भी भगवान् है। जो चोरी करता है वह भी भगवान् है जो छेड़-छाड़ करता है वह भी भगवान् है देखा ना, रोता है हमारा भगवान्। युद्ध भूमि से भागता है भगवान्, भगवान् का क्या रूप है, क्या देखते हो ? देखो, भगवान् के बेटे भगवान् की बात नहीं मानते। कहीं भी किसी भी रूप में तुम्हें श्रद्धा है तो भगवत्ता का दर्शन हो जाता है। शिष्य लोग श्रद्धा से गुरु को मानते हैं भगवान् और गुरु लोग अपने अनुभव से मानते हैं शिष्य को भगवान्। दोनों में बहुत फर्क है। चेला लोग तो ईश्वर को जानते नहीं कि क्या होता है, श्रद्धा करते हैं जैसे मूर्ति में श्रद्धा करते हैं वैसे आदमी में श्रद्धा करते हैं कि भगवान् हैं और गुरु लोग तो जानते हैं मुझ परमात्मा के सिवाय दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है। वह निर्द्वन्द्व स्थिति प्राप्त कर ली क्या ? कोई छोटी-मोटी किताब पढ़ ली, यह अच्छा है यह बुरा है, सुन आये। बचपन में कोई चीज दिमाग में भर दी गयी, यह अच्छा है यह बुरा है, मूर्खतापूर्ण मान्यता को जिन्दगी भर ढोते चलना यह कोई बुद्धिमत्ता है ?अरे भाई श्रद्धा और अनुभव से उसको परिपूर्ण कर लो।

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आश्रय-निष्ठा2

तीर्थयात्रा क्रमशः आगे बढ़ती गयी। यात्री देवता और ऋषियों ने देखा मार्ग में एक अत्यन्त सूखा वृक्ष है। उसके कोटर में एक शुक तोता निवास कर रहा है। वह भूखा-प्यासा दुर्बल व्याकुल है। फिर भी उस वृक्ष को नहीं छोड़ता है। इन्द्र ने शुक से प्रश्न किया – ‘पक्षिराज ! यह वृक्ष तो अत्यन्त सूखा हुआ है। इसमें फल-फूल-पत्ता कुछ भी नहीं है। इससे तुम्हें भोजन-पान छाया कुछ नहीं मिलता। फिर इस पर क्यों रहते हो ?’ शुक ने कहा- ‘महाराज ! पहले यह वृक्ष साधारण वृक्ष नहीं, कल्पवृक्ष था। इसमें अमृत-रस से भरे हुए फल लगा करते थे। मैंने चिरकाल तक इसके आश्रय से अपने को जीवित रखा है। काल के प्रभाव से अब यह सूख गया और इसके पास कुछ नहीं है। ऐसी विपत्ति में इसको छोड़ कर मैं कैसे जा सकता हूँ ? यह कृतघ्नता मुझसे नहीं होगी। इन्द्र ने कहा- ‘शुक ! तुम मूर्ख हो। अब इस वृक्ष में कोई सार नहीं है। इसने क्या जानबूझकर तुमको फल खिलाया है ?’ इस जड़ के प्रति कृतघ्नता का कोई अर्थ नहीं है। शुक ने उत्तर दिया-‘जड़-चेतना’ का विभाग मिथ्या है। ब्रह्मा ने कर्मानुसार किसी को चर शरीर दिया है, किसी को अचर। माना कि वृक्ष अचर एवं अचेतन है फिर भी मैं तो सचेतन और समझदार हूँ। वह चाहे जैसा भी हो क्या अपने को धर्म से भ्रष्ट कर दूँ ? ब्रह्मा ने प्रजा के उपकार के लिए वृक्षों का निर्माण किया। जल, अग्नि और वायु के समान ही ये प्राणियों का हित करते हैं। इनमें भी ज्ञान है, चेतना है, बुद्धि है। मैं अपने आश्रय का परित्याग नहीं कर सकता।

इन्द्र ने कहा – ‘पक्षिराज, तुम धन्य हो, तुम्हें यह विज्ञान, ऐसी धर्मनिष्ठा किस तपस्या से प्राप्त हुई है वह मुझे बताओ। शुक ने उत्तर दिया- ‘देवराज मैंने आजीवन मित्र-द्रोह कभी नहीं किया। मृत्यु के भय से भी मैं धर्मनिष्ठा से विचलित नहीं हुआ हूँ। माता-पिता की सेवा की। पर स्त्री का सहवास कभी नहीं किया। अपनी पत्नी का अपमान नहीं किया। किसी का अनादर नहीं किया। दूसरे का हक दबाया नहीं। इसीसे मुझे इस निर्मल विज्ञान की प्राप्ति हुई है। इन्द्र ने कहा- ‘पक्षिराज तुम्हारी इस सद्बुद्धि और धर्मनिष्ठा से मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। तुम जो चाहो मुझसे वरदान माँग लो।’ शुक ने कहा – ‘महाराज,मुझे स्वर्ग, विमान या सुख नहीं चाहिए। आप वर देना चाहते हैं- यह आपकी बड़ी कृपा है। मैं आपसे यह वर माँगता हूँ कि मेरा यह आश्रय वृक्ष फिर वैसा ही हरा-भरा हो जाय। इन्द्र शुक के सद्भाव और धैर्य से अतिशय प्रभावित हुए। उन्होंने वृक्ष को अपनी शक्ति से ज्यों-का-त्यों बना दिया। शुक की निष्ठा अपने आश्रय दाता का परित्याग न करना- यह ज्यों-की-त्यों बनी रही। इसी से लोक-परलोक और परमार्थ सब बन गए।

ऐसे निष्ठावान् धर्मात्मा पक्षिराज शुक से सान्निध्य और आलाप से देवताओं की तीर्थयात्रा सफल हो गयी और लक्ष्मीजी पुनः अपने आश्रय स्वरुप भगवान् वामन के वक्ष:स्थल पर विराजमान हो गयीं।

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आश्रय-निष्ठा1

पौराणिक कथा

भारत वर्ष में बुक्क-साम्राज्य अपनी धर्मनिष्ठा के लिए अत्यन्त प्रसिद्ध रहा है। एक बार राजा बुक्क ने अपने कुलगुरु एवं मंत्री श्रीमाधवाचार्य से प्रश्न किया – ‘महाराज आपने बड़े-बड़े शास्त्र मुझे सुनाये। वे सब सत्य हैं, मुझे कोई सन्देह नहीं; परन्तु जिसकी बुद्धि सीमित है उनके लिए वे बहुत गहन हैं। हमको कुछ सरल उपाख्यान सुनाइये।’

श्रीमाधवाचार्य ने कहा- ‘मेरे भाई हैं सायणाचार्य। वे वेदों के व्याख्याता तथा पुराणों के प्रौढ़ पारदर्शी विद्वान् हैं। उन्हें मैं आज्ञा कर देता हूँ वे तुम्हें सुना देंगे। उन्होंने सायणाचार्य को आज्ञा दी। राजा उनसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सम्बन्धी शताधिक उपाख्यान सुने । उनमें से एक उपाख्यान आपके सम्मुख प्रस्तुत है।’

सायणाचार्य ने बुक्क नरपति को सम्बोधित करके कहा- ‘राजन् !पुराणों में यह कथा प्रसिद्ध है कि भगवान् ने वामन का रूप धारण करके राजा बलि से उनकी राज्यलक्ष्मी माँग ली। बलि ने सहर्ष दे दिया परन्तु बात यहीं पूरी नहीं हुई। भगवती लक्ष्मी वामन भगवान् से रूठ गयीं : तुमने दैत्य लक्ष्मी को ग्रहण किया है। अब मैं तुम्हारे साथ कैसे रहूँगी ? वामन भगवान् लक्ष्मीजी को संतुष्ट नहीं कर सके।’

घर का झगड़ा बाहर फैल गया। ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवता इकट्ठे हुए। यह निर्णय हुआ-इस दोष की निवृत्ति के लिए वामन भगवान् के साथ सब देवता तीर्थ यात्रा करें , तब लक्ष्मी जी प्रसन्न हो जाएँगी और इनमें दिव्य लक्ष्मी को ग्रहण करने की शक्ति आ जायेगी।

तीर्थयात्रा के प्रसंग में एक अत्यन्त सुन्दर पुष्करिणी मिली। उसमें सुन्दर-सुन्दर कमल खिले हुए थे। ऋषि, मुनि एवं देवताओं ने अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उसमें -से कमल ग्रहण किये। उनमें-से एक सर्वश्रेष्ठ कमल जो सहस्त्र दल से युक्त था महर्षि अगस्त्य ने अपने लिए चुन लिया।

कुछ समय बाद वह कमल नहीं मिला।किसीने सबकी आँखें बचाकर उसे ले लिया था। महर्षि ने एक-एक से पूछा। सबने कहा- ‘हम उस कमल के बारे में कुछ नहीं जानते।’ इन्द्र ने कहा- ‘जिसने बहुत-से यज्ञ किये और स्वर्ग में रहता है उसने वह कमल लिया होगा। सब समझ गये यह इन्द्र का काम है। अगस्त्य का कमल मिल गया। वे इन्द्र पर प्रसन्न हुए। यह बहुत धर्मात्मा है।

(क्रमशः)

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रुचि और आसक्त्ति

  रुचि किसमें है ?अपनी रुचि को समझना कठिन पड़ता है। मालूम पड़ता है कि हमको दर्शन -शास्त्र में रुचि है ,लेकिन जब कहानी की क़िताब मिलती है तो उसमें मन ऐसा लगता है कि दर्शन -शास्त्र रखा ही रह जाता है। इससे मालूम पड़ता है कि रुचि कहाँ है ?रुचि भजन में जब होती है तो स्वाद आने लगता है। भजन माने मन -ही मन भगवत्सेवन। ‘भजनं नाम रसनम् ‘ जैसे लोगों को चाट खाने में मज़ा आता है ,उसी तरह से जब भगवान् का भजन करने लगते हैं तो मज़ा आता है। मथुरा के चौबे जैसे रबड़ी खाने में मज़ा लेते हैं ,जैसे खुरचन खाने में मज़ा लेते हैं ,वैसे ही जब भगवान् के भजन में मज़ा आने लगे और आसक्त्ति हो भगवान् में ;तो आसक्त्ति का विषय भगवान् हैं और उनकी सेवा में ,भजन में रुचि है।           

रुचि और आसक्त्ति ,ये दो नहीं हैं। पहले की अवस्था को रुचि बोलते हैं और उत्तर अवस्था को आसक्त्ति बोलते हैं। जैसे अधौटा और मलाई -एक ही चीज़ है ,दूध ही है दोनों। जब भगवान् में आसक्त्ति होती है तो हृदय निर्मल हो जाता है। आसक्त्ति माने चिपक जाना। मन चिपक गया तो आसक्त्ति। आसक्त्ति हृदय के शीशे को ऐसा स्वच्छ बना देती है कि उसमें भगवान् का प्रतिबिम्ब दिखने लगता है। भगवान् में मन लगाने का सङ्कल्प नहीं करना पड़ता ,प्रयत्न नहीं करना पड़ता। स्वयं मन कब चला गया भगवान् में ,इसका पता नहीं चलता। मन कहीं दूसरी जगह टिकता ही नहीं है। जब देखो भगवान् में !  जब देखो भगवान् में ! !

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पत्रोत्तर

विश्वं दर्पण दृश्यमाननगरी तुल्यं निजान्तर्गतं,

पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया ।

यः साक्षात् कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं,

तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये । ।

इसमें कहा गया है कि श्रीदक्षिणामूर्ति भगवान् शंकर ही श्रीगुरुमूर्ति हैं। उन्हें मेरा यह प्रत्यक्ष नमस्कार है। जैसे वे सामने खड़े हों और देख रहे हों। वे अपने ब्रह्मात्मैक्य-बोध की मर्यादा में अपने आत्मा को ही अद्वितीय ब्रह्म के रूप में साक्षात् करते रहते हैं। उनकी दृष्टि क्या है ? उनकी दृष्टि यह है कि यह सम्पूर्ण विश्व दर्पण में दृश्यमान नगरी के समान है। वे इसे अपने आत्मा में ही देखते हैं। ‘निद्रा’ शब्द का अर्थ ‘स्वप्न’ है और ‘यथा’ शब्द का अर्थ ‘इव’ है। जैसे स्वप्न-दशा में भीतर उद्भूत सृष्टि ही बाहर के समान जान पड़ती है, वैसे ही यह विश्व-प्रपञ्च माया से अपने स्वरुप में प्रकट प्रतीत होने पर भी बाहर के समान ज्ञात होता है। अर्थात् वे अपने को अद्वितीय ब्रह्म और विश्व प्रपञ्च को स्वप्नवत् माया का विलास देखते रहते हैं। उन्हें है यह मेरा नमस्कार। इसमें कुछ भी अध्याहार करने की आवश्यकता नहीं है।

आपको दृष्टान्त की यह मर्यादा अवश्य ही ज्ञात होगी कि वक्ता का दृष्टान्त में जितना विवक्षित अर्थ होता है, उतना ही ग्रहण किया जाता है। यदि दृष्टान्त और दार्ष्टान्त सर्वथा समान हों, तो दृष्टान्त दृष्टान्त नहीं रह जाता, दोनों एक हो जाते हैं। मोहन के समान सोहन होने पर भी व्यक्ति दो होते हैं और उनकी अपनी-अपनी विशेषता भी होती है। निश्चय ही दर्पण में किसी बिम्ब का प्रतिबिम्ब पड़ता है, परन्तु यहाँ वक्ता बिम्ब-प्रतिबिम्ब भेद नहीं समझाना चाहता, दर्पण में दृश्यमान पदार्थ का मिथ्यात्व समझाना चाहता है। जिस दर्पण = ब्रह्मरूप अधिकरण या अधिष्ठान में यह विश्व-प्रपञ्च दीख रहा है उसमें सर्वथा नहीं है। नगर का वजन, लम्बाई-चौड़ाई, उसमें छोटे-बड़े, नीच-ऊँच, क्रम विस्तार,जो कुछ वस्तुओं का दीख रहा है, वह सब दर्पण में कुछ भी नहीं है। जो वस्तु जहाँ दीख रही हो, वहीं उसका अभाव भी हो, तो उसे मिथ्या कहते हैं। दर्पण दृश्यमान नगरी के अत्यन्ताभाव का अधिकरण है। अतएव वहाँ दृश्यमान नगरी मिथ्या है।

प्रतीति का अर्थ है मालूम पड़ना, होना नहीं। जैसे-आकाश में नीलिमा है नहीं, प्रतीत होती है। इस प्रतीति का कारण क्या है ? नेत्रके द्वारा आकाश का ग्रहण न होने के कारण यह अग्रहण ही अन्यथा ग्रहण के रूप में परिणत हो जाता है। जब हम पीतल को ठीक-ठीक नहीं देख पाते तब वह सोना मालूम पड़ता है। बालक भ्रमसिद्ध पदार्थ को भी सत्य मानता है। जब वस्तु का यथार्थ बोध हो जाता है तब सत्यत्व का भ्रम निवृत्त हो जाता है। अधिष्ठान ज्ञान के बिना अध्यस्त का मिथ्यात्व निश्चय नहीं होता।

जब तक मनुष्य नेत्र के द्वारा आकाश की ओर देखेगा, तब तक उसे नीलिमा दीखेगी। आँख बंद कर लेने पर नहीं दीखेगी। आँख न होने पर भी नहीं दीखेगी। आँख की उपाधि से आकाश को देखने के कारण वह नीला भासता है। इसी प्रकार, अनादि संस्कार-प्रवाह से युक्त अंतःकरण के द्वारा देखने पर ब्रह्म प्रपञ्च रूप में भासता है ! ब्रह्म-बोध के द्वारा प्रपञ्च मिथ्यात्व का निश्चय तो हो जाता है किन्तु प्रतीति नहीं मिटती। ठीक वैसे ही जैसे नीलिमा को मिथ्या जानने वालों के प्रति भी नीलिमा की प्रतीति नहीं मिटती। जबतक अंतःकरण के द्वारा व्यवहार करते रहेंगे तबतक प्रपंच की प्रतीति होती रहेगी; परन्तु उसमें सत्यत्व की भ्रान्ति नहीं रहेगी। जब अंतःकरण काम करना बंद कर देगा या लिंगभंग हो जायेगा तब विश्व-प्रपंच की प्रतीति नहीं होगी, माया कहते ही उसे हैं कि जो अविद्यमान वस्तु को दिखा दे और विद्यमान वस्तु को ढक दे। यही जादू का खेल है। माया अज्ञान-काल में जान पड़ती है, ज्ञान-काल में नहीं। अतः अज्ञान-काल में उसे ‘ना’ नहीं बोल सकते और ज्ञान काल में ‘हाँ’ भी नहीं बोल सकते। ‘हाँ’-‘ना’ का व्यवहार इसी माया में चलता है।

ब्रह्मज्ञान होने पर अंतःकरण दर्पण, उसमें दृश्यमान प्रपञ्च सब मिथ्या रूप से निश्चित हो जाता है। मनुष्य को ब्रह्मज्ञान के लिए प्रयास करना चाहिए।

भगवान् दिनों-दिन आपकी भक्ति-भावना बढ़ायें। साथ ही अद्वैत श्रद्धा भी शिथिल न होने पाये। शेष शुभ !

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वैदिक धर्म का सार है हित

हमारे वैदिक धर्म का सार है हित। यदेव हिततमं- यह उपनिषद् बोलती है। किसी का ऑपरेशन न करना पड़े यह बहुत बढ़िया बात है, इस भावना में अहिंसा है। रोगी को ऐसी दवा दे दो कि उसे दर्द न मालूम पड़े, आराम मिले, यह करुणा है। किन्तु ऑपरेशन करने से दुःख दूर हो जाय तो ऑपरेशन करो, मीठा खिलाने से दुःख दूर हो जाय तो मीठा खिलाओ, कड़वा खिलाने से दुःख दूर हो तो कड़वा खिलाओ -यह वैदिक धर्म है सृष्टि के अनादि अनन्त शाश्वत इतिहास में अनेक बार युद्ध और शान्ति के प्रसङ्ग आते हैं। काल अनादि है और हमेशा चलता रहता है। इसमें भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रसङ्ग आते रहते हैं। इसमें सबके हितपर जो दृष्टि है वही वैदिक धर्म है। अहिंसा से सबका भला हो तो ठीक है,करुणा से सबका भला करो। सबकी भलाई के लिए आवश्यकता हो तो हिंसा, आवश्यक हो तो अहिंसा, आवश्यकता हो तो करुणा और आवश्यकता हो तो कठोरता करो। हित करुणा में भी है और कठोरता में भी। आप श्रीरामचन्द्र का चरित्र देख लें; वे हित प्रधान हैं। श्रीरामचन्द्र के चरित्र में आपको करुणा भी मिलेगी, गीध पर कितनी करुणा है उनकी। किन्तु आपको उनके चरित्र में करुणा के साथ कठोरता भी मिलेगी। बड़ी भारी कठोरता मिलेगी। श्रीरामचन्द्र स्वजननिष्ठुर हैं। उन्होंने भरत के प्रति, सीता के प्रति, लक्ष्मण के प्रति स्वयं अपने प्रति कुछ कम कठोरता नहीं की। परन्तु उनकी कठोरता में हित की दृष्टि है। इसी प्रकार उनकी कोमलता में भी हित की दृष्टि है। भवभूति ने कहा-

वज्रादपि कठोराणि मृदुनि कुसुमादपि।

लोकोत्तराणां चेतांसि को नु विज्ञातुमर्हति। ।

अर्थात् लोकोत्तर पुरुष का चित्त कठोर भी होता है और मृदु भी होता है, परन्तु उनमें हित का वियोग कभी नहीं होता। उनका मन सदा-सर्वदा से हित से संयुक्त रहता है।

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जीवन में दो वस्तु आवश्यक है

जीवन में दो वस्तु आवश्यक है -एक बुद्धि और दूसरा कर्म।

कभी-कभी दोष कर्म में भी आ जाता है और बुद्धि में भी आ जाता है। दोनों में समरसता आवश्यक है। बुद्धि से संगत कर्म करें और कर्म से संगत बुद्धि रखें। बुद्धि और कर्म में वैसी ही मित्रता होनी चाहिए, जैसी मित्रता श्रीकृष्ण और अर्जुन में है। श्रीकृष्ण और बलराम में मतभेद है परन्तु श्रीकृष्ण और अर्जुन में मतभेद नहीं। महाभारत तथा भागवत में बलराम जी का जो अन्तिम जीवन है, वह श्रीकृष्ण से किञ्चित् पृथक् हो गया है। परन्तु अर्जुन का जीवन निरन्तर श्रीकृष्ण के साथ मिला हुआ है। आप कोई काम करते समय सीधी-सी बात देखिए। उसमें आपकी बुद्धि का विरोध तो नहीं ? यदि है तो उसको अनुकूल बनाइये। यह देखिये कि आप जो कुछ सोचते हैं उसमें कर्त्तव्यपालन का विरोध तो नहीं ?बुद्धि और कर्म दोनों का एक साथ मिलकर काम करना अनिवार्य है, उनमें मतभेद नहीं होना चाहिए।समझ श्रीकृष्ण की और कर्म अर्जुन का। दोनों के समुच्चय-दोनों के सामञ्जस्य से ही सफलता मिलती है। उनमें किञ्चित् भी अटपटापन नहीं होना चाहिए।

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अपना अध्यात्मशास्त्र भी चिकित्साशास्त्र है

हमारे आयुर्वेद के अनुसार जो चिकित्सा होती है उसमें एक होती है व्याधिप्रत्यनीक चिकित्सा और दूसरी होती है हेतुप्रत्यनीक चिकित्सा। जैसे किसी को जल्दी सर्दी हो जाती है। उसे एक दवा खिला दी, इंजेक्शन दे दिया, सेंक कर दिया और सर्दी मिट गयी तो यह व्याधिप्रत्यनीक चिकित्सा हुई। हेतुप्रत्यनीक चिकित्सा वह होती है, जो हमेशा के लिए दोष को मिटाने का प्रयास करे। अपना अध्यात्मशास्त्र भी चिकित्साशास्त्र है। इसके भी चिकित्सा के समान ही चार भेद होते हैं। यदि आप हिंसा मिटाना चाहते हैं तो क्रोध कम कीजिये। क्रोध कम करना चाहते हैं तो किसी व्यक्ति से, जाति से; सम्प्रदाय अथवा राष्ट्र से द्वेष मत कीजिये।

अब आगे आपको बताते हैं कि किसी कर्म से भी द्वेष मत कीजिये। नहीं तो वह कर्म जिसके अन्दर दिखेगा उसीसे आपका द्वेष हो जायेगा। गीता में है –

‘न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुसज्जते।’

तात्पर्य यह कि किसी भोग से द्वेष मत कीजिये। किसी वस्तु से द्वेष मत कीजिये। किसी चीज को देखकर आपके हृदय में आग न जले। हमारे कर्म में चोरी-बईमानी होती है वह क्यों होती है ? लोभ की अधिकता से होती है। काम की पूर्ति और दूसरी अपूर्ति। कामना की पूर्ति होने पर लोभ होता है और अपूर्ति होने पर क्षोभ होता है- कामात् क्रोधोऽभिजायते। काम के दो बेटे हैं-लोभ और क्रोध। पूरा हुआ तो लोभ और पूरा न हुआ तो क्रोध। भगवान् कहते हैं कि यदि तुम फल पर ही दृष्टि रखोगे तो पराधीन हो जाओगे। फल पराधीन है, कर्म स्वाधीन है। जो तुम कर सकते हो वह करो। कोई बीमार है। वह मरे नहीं, यह आपके हाथ में नहीं है। परन्तु अपनी शक्ति के अनुसार उसकी सेवा आपके हाथ में है। यदि आप यह चाहते हैं कि वह कभी नहीं मरे तो शास्त्र के विपरीत इच्छा करते हैं। वह एक-न-एक दिन मरेगा। तो कर्म कीजिये। कर्म करना, कर्त्तव्यपालन करना आपका धर्म है; परन्तु उसका फल समाज के हाथ में छोड़िये।

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