‘दुर्गुण और सद्-गुण’

    धन के लिए सेठ की पूजा, ईश्वर की नहीं, धन की पूजा है। स्त्री को ‘प्राणेश्वरी, हृदयेश्वरी’ कहना उसके रूप की, काम की पूजा है। किसी के दोष भी गुण दीखना, राग वश उसे ही पूर्ण मानना ईश्वर की नहीं, मोह की पूजा है। अपने को सर्व श्रेष्ठ मानकर दूसरों को हेय समझना, तिरस्कार करना अपने अहं की पूजा है। 

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    जीव के जीवन में चार सबसे बड़े बन्धन हैं-अज्ञान अनैश्वर्य, अवैराग्य और अधर्म। ये बन्धन ही उसके दुःख के कारण हैं। अज्ञान को ज्ञान से, शरणागति द्वारा अनैश्वर्य को, भक्ति से अवैराग्य को और धर्म से अधर्म रूप बन्धन को काटो और सुखी हो जाओ। 

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    जो जितना अधिक निर्वासन होगा, उसे भगवद्-भजन, भगवन्नाम का उतना ही अधिक रस, आनन्द आयेगा। संसार के पदार्थों में मन अटका रहे तो नाम-जप, कीर्तन आदि से संसार ही मिलेगा, भगवान् नहीं। भजन का नियम यह है कि निर्वासन होकर करने से भगवान् मिलते हैं। वासना युक्त भजन विलम्ब से चित्त शुद्ध करता है। 

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    निन्दा की परवाह न करना बहादुरी हो सकती है; परन्तु स्तुति का मीठा ज़हर पचा लेना उससे भी बड़ी बहादुरी है।  

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निष्काम कर्मयोग

इसकी चार भूमिकाएँ हैं :-

  1. फलासक्ति का त्याग 

  2. कर्तापन के अभिमान का त्याग 

  3. कर्मासक्ति का त्याग 

  4. अकर्तापन के अभिमान का त्याग 

    इनमें प्रथम दो तो समझ में तुरन्त आ जाती हैं और अभ्यास एवं प्रयत्न करने पर आचरण में भी उतर आती है। परन्तु फल की इच्छा तथा कर्तापन का अभिमान न होते हुए भी  हम उपस्थित कार्य पूरा करना अवश्य चाहते हैं। भला क्यों, किसलिए ? माना, हम श्रीहरि की प्रसन्नता के लिए कथा कर रहे हैं। श्लोकों की अर्धाली बोली, आरती का घंटा बज गया। क्या बता सकते हो, हम क्यों श्लोक का उच्चारण पूरा करना चाहते हैं ? जब हम कुछ फल नहीं चाहते, जब हम कर्ता नहीं, किस लक्ष्यार्थ से इच्छा करते हैं कि श्लोक का पाठ पूरा हो जाये ? घर-गृहस्थी के काम भी क्यों पूरे हों ? क्यों न हम इस क्षण, इसी स्थान से, सब व्यवस्था छोड़कर, विरक्त होकर चले जाएँ, अथवा विदेहमुक्त हो जाएँ।  क्या हमारे मन में अगले क्षण की कुछ आसक्ति बनी है? यदि है तो छोड़नी पड़ेगी। इतनी सब आसक्ति छोड़ने के बाद चित्त में अनासक्ति आती है; परन्तु अकर्तापन का एक अभिमान बना रहता है जो बड़ा सूक्ष्म होता है और कठिनता से कटता है। ;यदि वह कट जाये तो ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, क्योंकि इस प्रकार का निष्काम कर्मयोग साधन नहीं, तत्त्व है। 

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‘साधन-पथ’

कृपण कौन ?

भगवान् भले ही न मिलें, पर संसार न छूटने पाए- ऐसी चेष्टा वाला। 

बुद्धिमान् कौन ?

जो परमात्मा को पाने के लिए संसार छोड़ने को उद्यत है। 

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ध्यान के पॉँच विघ्न 

  1. लय – मन का सो जाना।
  2. विक्षेप- मन का चञ्चल होना। 
  3. रसास्वाद – मज़ा लेना, भोक्ता होना। 
  4. कषाय – रागास्पद या द्वेषास्पद का स्मरण। 
  5. अप्रतिपत्ति – ध्येय के स्वरूप को ठीक-ठीक ग्रहण न कर सकना। 

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    साधना का मार्ग प्राइवेट है। अकेले चलने का, अन्तरङ्ग मार्ग है। इसमें सगे-सम्बन्धी, स्वजन परिजन को साथ लेकर नहीं चला जा सकता। ये सब तो यहीं छूट जाते हैं। संसार के सब रास्ते, सब सम्बन्ध जहाँ समाप्त हो जाते हैं, साधन-पथ वहीं से प्रारम्भ होता है।  

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विचारणीय बिन्दु

    सेठ जी बहुत क्रुद्ध हुए नौकर के अपराध पर।  उसे नौकरी से अलग करने लगे। मैंने उनसे कहा- ‘उसे सेवा से अलग करो या जुर्माना करो, वह तो बाद में दुःखी होगा; आपने तो क्रोध की आग से अपना सुख पहले ही फूँक दिया। दण्ड देने का, निकालने का मज़ा तो तब है जब आपका सुख यथापूर्व बना रहे। 

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    दुःख कहाँ है ? अपनी नासमझी में। तुम जैसी स्थिति में इस संसार में आये थे, उस स्थिति के लिए सदा तैयार रहो तो कोई दुःख नहीं- ‘यथा जातरूपधरः’। कुछ भी चला जाय, कोई भी बिछुड़ जाय- जरा भी दुःख नहीं। बेईमानी से पैसा कमाया, बड़ी ख़ुशी।  पैसा चला गया तो रोने लगे। चौपाटी पर चाट खायी, जीभ की खाज शान्त की, बड़े खुश हुए। और, पेट में दर्द हुआ तो रोने लगे। बेवक़ूफ़, रोना था तो पहली स्थिति में रोता। 

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    दुःख केवल उसका ही स्थिर रहता है, जो दुनिया में तो फेरफार करना चाहता है; परन्तु अपने मन को थोड़ा भी इधर-उधर सरकाना स्वीकार नहीं करता। 

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प्रेरक प्रसङ्ग

     एक बार महाराजश्री के सामने किसी ने नास्तिकों की निन्दा की। उन्होंने बीच में ही किन्तु बड़े प्रेम से कहा- ‘भैया, नास्तिक भी भगवान् के वैसे ही हितैषी हैं, जैसे किसी बड़े आदमी का सेवक अपने मालिक का। इसे यों समझना चाहिए कि जैसे मालिक को विश्राम करते देखकर सेवक आगन्तुक से कह देता है कि मालिक घर में नहीं है, वैसे नास्तिक भी- ‘भगवान् नहीं हैं’ यह कह कर उनके नित्य-निकुञ्ज-विहार में बाधा नहीं पड़ने देता। और, फिर नास्तिक भी तो भगवान् की ही सृष्टि में हैं। भला गर्भस्थ शिशु की किसी भी क्रिया से माँ नाराज़ होती है ? भगवान् भी किसी नास्तिक से नाराज़ नहीं होते।’

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    एक बार कोई साधु जनकपुर से वृन्दावन आए। श्रीमहाराजश्री ने उनके वहाँ के समाचार पूछे। साधु ने कहा-  ‘है तो सब ठीक, पर वहाँ के साधुओं में कथा-सत्सङ्ग प्रचलित नहीं है। सब मन्दिरों के अपने खेत हैं और सब साधु हल चलाते हैं। श्रीमहाराजश्री यह सुनकर बोले- ‘अरे महात्मा, श्रीजनक जी महाराज को हल चलाने से ही जानकी जी की प्राप्ति हुई थी न, इसीलिए वे लोग भी अपनी साधना ‘हल चलाने में ही मानते हैं।’

    किसी का भी दोष देखना असल में आपके स्वभाव में ही नहीं था।   

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‘व्यवहार की शिक्षा’

    दोषों तथा दुःख का अत्यन्ताभाव केवल ब्रह्मज्ञान से होता है; परन्तु व्यवहार में सुखी होने के लिए किसी प्रकार का आवेश कभी नहीं होना चाहिये – न काम का, न क्रोध का, न लोभ का। पैसे की आमदनी और खर्च का उचित प्रबन्ध करना चाहिये; परन्तु उसमें महत्त्वबुद्धि तथा संग्रह का रस नहीं आना चाहिए। धन उद्योग व दान से बढ़ता है,परन्तु धन-प्राप्ति में असफल होने पर खर्च घटाना चाहिए, धन-प्राप्ति के लिए निन्दनीय कार्य नहीं करने चाहिए। माता-पिता, भाई-बहन व पत्नी-बच्चों से प्रेम का व्यवहार रखें, छोटी-छोटी बातों पर लड़ें नहीं। कुछ बातें मान कर व कुछ मनवाकर मेल से रहना चाहिए, जिद्द करना अल्प-बुद्धि का लक्षण है। अपने शरीर एवं बुद्धि से सबकी सेवा करते रहो, परन्तु मन में उसका कोई संस्कार या स्मृति न बने ऐसी चेष्टा भरसक करनी चाहिए। संसार को हमारा धन व तन चाहिए, मन नहीं। मन के भूखे अमना भगवान् हैं, उनको ही मन देना चाहिए। संसार के काम कभी समाप्त नहीं होते, इसलिए कालयापन करना चाहिए। इसका मन्त्र है, प्रत्येक अवस्था और परिस्थिति से तुरन्त अपना हाथ बचा कर निकाल ले। ऐसा न हो कि हम कहीं फँसे रह जाएँ। हमको किसी से प्रेम हो तो कर लें और अपने स्वेच्छा से छोड़ दें, परन्तु यह भ्रान्ति कभी न रखें कि कोई अन्य व्यक्ति हमसे प्रेम करता है। दुःख व बन्धन को किसी हाल में स्वीकृति नहीं दें। किसी के प्रेमाग्रह से ज्यादा या प्रतिकूल भोजन कभी नहीं करना चाहिए, क्योंकि अन्नब्रह्म से पेटब्रह्म अधिक महत्त्वपूर्ण है। अपने वैराग्य के अभिमान के कारण किसी से लड़ना नहीं चाहिए। अपने नियमों के पालन में यथासम्भव दृढ़ रहो, परन्तु नियम का अभिमान नहीं हो। बड़ा नियम होता है, नियम को धारण करने वाला नहीं। स्वास्थ्य की रक्षा करना आवश्यक है। निरन्तर भजन करने के नाम पर स्वास्थ्य खराब कर लेना मूर्खता है। ऐसा मनुष्य पूर्णता का अधिकारी नहीं है। जीवन सरल और स्निग्ध होना चाहिए। 

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सत्सङ्ग-चर्चा

    एक दिन किसी स्त्री ने महाराजश्री से प्रार्थना कर कहा – ‘आशीर्वाद दीजिये कि भगवान् श्रीकृष्ण में मेरी दृढ़ भक्ति हो।’ श्रीमहाराजश्री ने कहा- ‘बस ! तुम इसी तरह, जड़-चेतन जो भी तुम्हारे सामने आए, उसे प्रणाम कर श्रीकृष्ण-भक्ति की याचना करती रहो, तुम्हें शीघ्र ही उसकी प्राप्ति हो जायेगी। इस लालसा का दृढ़ होना ही तो भक्ति है।’

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    किसी भक्त ने महाराजश्री से प्रश्न किया- ‘अनन्य भक्त कौन ?’

    श्री महाराजश्री ने उत्तर दिया- ‘जो आठों प्रहर अन्तर्मुख रहता हो।’ इस पर श्रीसाईंसाहब, जो वहाँ बैठे थे, बोले कि ऐसा भजन तो आप ही करते हैं।’ इस पर श्रीमहाराजश्री बोले- ‘मैं भजन नहीं करता, बल्कि भगवान् ही मेरा भजन करते हैं। उनका अनुग्रह देखकर ही मेरा हृदय आनन्द से गद्-गद रहता है। बात असल में यह है कि जीव में तो उनके भजन करने की शक्ति ही नहीं है। जो कुछ होता है, उनकी दया से ही होता है।’

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    एक बार यह प्रसङ्ग चल रहा था कि भगवान् सर्वत्र हैं और सबमें हैं। एक शिष्य ने पूछा, ‘महाराजश्री,आप उसे कैसे देखते हैं।’

    श्री महाराजश्री तुरंत बोले- जैसे तुम्हें देख रहे हैं।’   

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