पत्रोत्तर

परम प्रेमास्पद

सप्रेम नारायणस्मरण

जो स्वप्न का द्रष्टा आत्मा है समग्र स्वप्न ही उसका शरीर है। वह भी सप्ताङ्ग है। स्वप्न में भी जो सूर्य, चन्द्रमा, आकाश आदि हैं, वे स्वप्नद्रष्टा के शरीर ही हैं। देश, काल, वस्तुएँ सब दृष्टि में कल्पित आकृतियाँ हैं। स्वप्न में मैं कुम्भ मेला देखने गया। प्रयाग की विशाल भूमि दृश्य है। वहाँ दिन-रात काल भी दृश्य है। सूर्य-चन्द्रमा भी दृश्य है। देश-काल और वस्तु का इतना लम्बा-चौड़ा विस्तार,उसमें जो स्नानार्थी यात्री हैं, सब स्वप्न पुरुष हैं। उन्हीं में एक मैं भी धक्का खा रहा हूँ, स्नान कर रहा हूँ। मैं- सहित सब यात्री स्वप्न पुरुष हैं मैं तो वह हूँ जो यह स्वप्न देख रहा है। स्वप्न के पूर्वोक्त सातों पदार्थ स्वप्न देखनेवाले के मन के ही रूप हैं। वहाँ दीखने वाला कोई भी पूर्व-जन्म का पापी या पुण्यात्मा जीव नहीं है। स्वप्न में जो जीव दीखते हैं, उनका पूर्व जन्म या उत्तर जन्म नहीं होता। वे तो उसी समय दीखते हैं। वहाँ के पति-पत्नी पहले के ब्याहे हुए नहीं हैं। वहाँ के पिता-पुत्र की उम्र छोटी-बड़ी नहीं है। उन स्नान करने वालों को स्वर्ग भी नहीं मिलेगा। वह सब स्वप्न द्रष्टा की दृष्टि है। जीवाभास, द्रव्याभास, देशाभास और कालाभास चमक रहे हैं। वहाँ कोई वस्तु है तो स्वप्न देखने वाला। वह एक है, उसमें अनेकता नहीं है। जरा दृश्य से अलग करके उसके स्वरुप को समझो। स्वप्न दृश्य का निर्माता,स्वप्नपुरुषो का स्वामी, स्वप्न के बदलने और मिटने का साक्षी, कोटि-कोटि स्वप्नों में एक है। परमात्मा से अलग-अलग होने पर उसका कोई स्वरुप सिद्ध नहीं हो सकता। परमात्मा से एक होना ही उसका सत्-चित् आनन्दरूप है। यदि उसकी दृष्टि का विपरिलोप हो जाय तो विपरिलोप को कौन देखेगा ?

जो है, हो रहा है, दीख रहा है, बदल रहा है, मर रहा है- बस, यही सहज समाधि है।

शेष भगवत्कृपा

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पत्रोत्तर

परम प्रेमास्पद

शुभाशीर्वाद

तुम अपने मन भावों को भाषा देने में निपुण हो। प्रश्न यह है कि मन में कई आकृतियाँ चल-चित्र-सी उभरती-मिटती हैं, कोई अभिव्यक्ति स्थिरता ग्रहण नहीं करती। यह ठीक है। ऐसा ही होता है।

गङ्गा बह रही थी। तरङ्ग के बाद तरङ्ग। हर-हर-हर-हर। मैं तटस्थ था। मैं केवल देख रहा था। तरङ्गों के बहने-बदलने से, उनकी तीव्र एवं मधुर ध्वनि से, द्रुत तथा विलम्बित गति से मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। मैं तटस्थ, कूटस्थ, मैं केवल द्रष्टा; साक्षी, निष्पन्द, निःसंग, निस्तरंग देख रहा था, और केवल देख रहा था। स्थिरता आकृतियों को नहीं देना है। उन्हें कितनी भी स्थिरता दी जाये, थोड़ी देर के बाद टूट जायेगी। वैसे न भी टूटे, तो भी नींद मन की सभी आकृतियों को तोड़ देती है। ऐसी अवस्था में इसे अन्तर्यामी की ही एक लीला समझनी चाहिए कि आकृतियाँ टूटती-छूटती-फूटती रहती हैं। अन्तर्यामी खेल रचता रहता है। साक्षी पहले खेल देखता है और उन आकृतियों से अन्तरङ्ग, किन्तु स्वयं से बहिरङ्ग अंतर्यामी को देखता रहता है। तुम स्थिर साक्षी हो यह सत्य है। अन्तर्यामी को अपनी दृष्टि से स्थिर बना सकते हो यह भी सत्य है, परन्तु चलचित्र को स्थिर बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है उसकी उपेक्षा कर दो अथवा उसके खेल और खिलाड़ी का आनन्द लो !सटाओ मत, हटाओ मत। दोनों अवस्थाओं को अपने साथ पटालो। जीवन कड़वे से शत्रुता और मीठे से मित्रता करने के लिए नहीं है। दोनों का स्वाद लेने के लिए है। वे दोनों ही एक दूसरे के स्वाद के पूरक हैं।

यदि तुम्हें यही ठीक लगता हो कि कोई आकृति स्थिर कर दी जाय तो उसका नाम रखो- कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण। यह नाम तुम्हारे अन्तरतम में गुप्त-लुप्त-सुप्त प्रियता को मूर्ति देकर अभिव्यक्त कर देगा और तुम देखोगी कि उस मूर्ति की चलता भी तुम्हें प्रिय लगेगी। जिससे प्रेम होता है उसकी चञ्चलता-छेड़छाड़ भी प्रिय लगती है। चितवन चञ्चल, मुस्कान चञ्चल, अंग-प्रत्यंग तरंगायित।जैसे सिनेमा का चित्र चंचल होने पर भी एक लगता है, वैसे ही अन्तर्देश के सूक्ष्मतम प्रदेश में वह मधुर मूर्ति भी हँसकर, नाचकर, गाकर स्पंदित रहेगी; परन्तु तुम्हें एक और ज्यों-की-त्यों जान पड़ेगी। इस अवस्था में अन्तर और बाहर का भेद मिट जाता है। आह्लाद के चरम प्रकाश में बाहर-भीतर और अपने पराये का भेद नहीं होता। वह तुम्हारी आत्मा ही है जो प्रियता की अभिव्यक्ति में मुस्करा रही है और वह भी तुम्हीं हो जो उसको देख-देखकर तृप्त हो रहे हो।

शेष भगवत्स्मरण

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पत्रोत्तर

परम प्रिय

आनन्द में मस्त रहा करो।

अलमस्त फकीरा रहम अल्ला। अल्ला की रहम से फकीर अलमस्त हो गया है। सचमुच गुरु, दीक्षा के साथ ही शिष्य के हृदयदेश में प्रवेश करता है। यदि हृदय में पहले से कोई रह रहा हो या बहुत कुछ रह रहा हो, तो उनका असर खत्म करने में या उन्हें बाहर निकालने में देर लगती है। रोग प्रबल हो तो पहले इंजेक्शन से कोई फायदा दीखने में नहीं आता। वैसे कुछ-न-कुछ फायदा तो होता ही है। जब गुरु रोम-रोम में प्रवेश कर जाता है, तब मौत का डर, मूर्खता और दुःख भाग जाते हैं। गुरु जब अपने आत्मा से एक हो जाते हैं तब वही मन्त्र परमेश्वर के प्रेम के रूप में प्रकट होता है। जो भीतर प्यारा लगता है उसको बाहर देखने का भी मन होता है। जिससे हृदय में प्रेम है,उसको बाहर भी देखना चाहते हैं। ठाकुरजी की एक मूर्ति मंदिर में अचल बैठी रहती है, दूसरी उत्सव-मूर्ति रथ पर बैठाकर बाहर घुमाई जाती है। क्यों ठीक है न ? जो भीतर अच्छा लगता है, वह बाहर भी मिलता रहे, तो कितना अच्छा है ? क्या आँख बन्द करने पर दोस्त दीखे और खोलने पर दुश्मन, तो अच्छा लगेगा? सेवा तो प्रेम का अनुभाव है। प्रेम अन्तरङ्ग है, सेवा उसका जाहिर रूप है। सेवा के बिना प्रेम कैदी है। प्रेम के बिना सेवा केवल बटन दबाकर मिलनेवाली मिठाई है।

शेष भगवत्कृपा

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पत्रोत्तर

1.

परमप्रिय …………

सप्रेम श्रीकृष्ण-स्मरण !

तुम्हें जैसा अनुभव होता है हुआ है और आगे भी होता रहेगा। प्रभु की प्राप्ति से भी बड़ी है – प्रभु की प्राप्ति के लिए व्याकुलता। व्याकुलता जितनी सच्ची और गहरी होगी, उतना ही अंतःकरण निर्मल होगा। निर्मल मन को प्रभु की प्राप्ति होती है।

शेष भगवत्कृपा !

2.

परम प्रेमास्पद …….……..

सप्रेम नारायण-समरण !

दलीय राजनीति का सबसे बड़ा दोष यह है कि अपनी पार्टियों के दुष्ट व्यक्तियों और गलत नीतियों का भी समर्थन करना पड़ता है। दूसरी पार्टी के शिष्ट-व्यक्तियों और अच्छाइयों का भी विरोध करना पड़ता है। यह भी एक प्रकार का भाई-भतीजावाद ही है। यही कारण है कि विश्व में कोई भी पार्टी टिकाऊ नहीं होती, बदलती रहती है।

आप सच्चे हृदय से जनता-जनार्दन की सेवा करते रहेंगे, तो आपकी विमुखता भी ऐसी होगी जैसे कोई बालक अपने पिता की गोद में बैठकर उसकी ओर पीठ किये हुए हो उसकी ओर मुँह न किये हो।

आपकी यह बात समझ में नहीं आयी कि आपको अपना नित्य नियम करने का पूरा समय नहीं मिलता। आप कठोरता से कह दीजिये- हम इस समय से इस समय तक एक घण्टेतक किसीसे नहीं मिलेंगे। जब लोग लौटने लगेंगे, प्रसिद्ध हो जायेगा तो उस समय आना बन्द कर देंगे। अपने घर के बाहर एक पट लगा दीजिये। कोई बैठा रहे तो उसके बैठने की व्यवस्था कर दीजिये। मन्त्र-पूजा प्रार्थना के समयपर यह निश्चय कर लीजिये कि –

सत हरि भजन, जगत सब सपना। ।

कहीं भी रहो, लोगों में सच्चरित्रता, सदाचार, पवित्रता एवं सद्भाव भरता रहे, ऐसा जीवन रखो।

भगवान् तुम्हें भक्ति-शक्ति और पवित्र अभिव्यक्ति देगा। सबको शुभाशीर्वाद।

शेष भगवत्कृपा !

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श्रीवृन्दावन-2

वृन्दा माने श्री राधा। उनका वन-वृन्दावन ! वृन्दावन श्रीराधारानी का व्यक्तिगत उद्यान है ! वह चिन्मय है ! जड़ तत्त्वों से बना हुआ नहीं है ! उसमें काल की दाल नहीं गलती। अनादि-अनन्त है ! आवश्यकता के अनुसार स्थान का संकोच-विस्तार प्रकट होता है। उसमें लौकिक देश का प्रवेश नहीं है ! वहाँ स्त्री जाति का जो कुछ है – वह सब राधा है ! वहाँ पुरुष जाति का जो कुछ है, वह कृष्ण है। लता-वृक्ष, पशु-पक्षी, कण-कण राधा कृष्ण स्वरुप हैं। एक प्यास है दूसरी तृप्ति। एक तृप्ति है – दूसरी प्यास। प्यास और तृप्ति के तरंगों का नाम ही वन है ! यह रस का वन है। ब्रह्म वन है ! रसिक संत इसी में निवास करते हैं ! वेदों में वन के नाम से ब्रह्म का वर्णन है ! उपनिषदों में ब्रह्म को ही वन कहा गया है। वन अर्थात् अनेकता में एकता ! सबमें वही सच्चिदानन्द भरपूर है, नाम, रूप चाहे कुछ भी क्यों ना हो। भू देवी का प्रेमोल्लास, हास-विलास, हार्द-विकास वृन्दावन है।

यह वृन्दावन स्थूल, सूक्ष्म और कारण की कल्पना से युक्त है ! व्रज सत् है ! लता-वृक्ष, पशु-पक्षी, ग्वाल-बाल चित् हैं ! गोप-गोपी,सखा-सखी आनन्द हैं ! श्री राधा-कृष्ण परमानन्द- रस सर्वस्व-सार हैं। भू-देवी का विलास होने के कारण ही रस के घनीभाव में तारतम्य होता है ! वन, कुञ्ज, निकुञ्ज ! निकुञ्ज में भी लीला-निकुञ्ज, नित्य-निकुञ्ज, निभृत-निकुञ्ज, निभृत-निकुञ्ज में सखा सखी किसी का प्रवेश नहीं है। वहाँ केवल आह्लाद आह्लादिनी युग्म की रसमयी क्रीड़ा है, मुस्कान है, चितवन है, परस्पर स्पर्श है। वहाँ न मान है, न भ्रम है, न विरह है ! पस्पर मिलन की तीव्र लालसा एक को दूसरे का रूप बना देती है। राधा कृष्ण से मिलने के लिए राधा हैं। कृष्ण राधा से मिलने के लिए कृष्ण हैं। दोनों लालसा रूप हैं ! परस्पर बदलते हैं। परस्पर नवीन मिलन होता है ! नया रस, नयी पहचान। नया मिलन। नये -नये राधा-कृष्ण। भेद है प्रेम का विलास, प्रेम का उल्लास ! दोनों ही प्रेम के द्वारा संचालित होते हैं। सबके नियन्ता को भी प्रेम-नियंत्रित करता है ! वैकुण्ठ लक्ष्मी का विलास है ! वहाँ ऐश्वर्य की प्रधानता है ! वृन्दावन भू-देवी का विलास है, यहाँ माधुर्य की प्रधानता है !श्री और भू दोनों ही राधारानी के अङ्ग हैं, अङ्गी राधा हैं। कृष्ण अङ्ग हैं- राधा अङ्गी हैं ! राधा अङ्ग हैं कृष्ण अङ्गी हैं ! विलास के लिए नाम दो हैं, वस्तु एक ही है।

सत् एक है, आकार दो हैं ! जैसे स्वर्ण और आभूषण ! चित् एक है, वृत्तियाँ दो हैं ! जैसे नेत्रेन्द्रिय एक गोलक दो ! आनन्द एक है, रस तरङ्ग दो हैं ! श्रीराधा-कृष्ण में कोई विभाजक रेखा नहीं है ! जहाँ दो होते हैं वहीं मिलन में देरी, दूरी या दूसरापन होता है ! एक में इनकी गति नहीं है। विपरीत ज्ञान भ्रम है, दूसरे से विरह है ! अपनेपन में मान है। रस-लीला में ये तीनों ही विवर्त हैं, वास्तविक नहीं। अतएव नित्य-निभृत-निकुञ्ज में इन भावों का प्रवेश नहीं है। ये लीला के बहिरंग भाव हैं, अंतरंग नहीं ! “एक स्वरुप सदा द्वै नाम, आनन्द की आह्लादिनी श्यामा, आह्लादिनी के आनन्द श्याम।” यहाँ आराधिका, आराधना एवं आराध्य का विभाग नहीं है। वे न द्वैत हैं, न त्रैत हैं ! न एकत्व है, न बहुत्व है !सच्चिदानंद वाग्वृत्ति, क्रियावृत्ति, अथवा भोगवृत्ति में आरूढ़ नहीं है ! स्पन्द एवं निःस्पन्द दोनों हित हैं, प्रेम-रस बोध है।

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श्रीवृन्दावन -1

वृन्दावन शब्द का अर्थ है – तुलसी का वन। तुलसी प्रेम की देवी है। उसे भगवान् ने आत्मीयरूप से स्वीकार किया है। उसे सर्वदा अपने सिर पर धारण करते हैं !आपने देखा होगा – शालग्राम पर तुलसीदल। बिना तुलसी के भगवान् को भोग नहीं लगता। तुलसी का भगवान् से प्रेम है। वह उनके स्पर्श के बिना नहीं रहती। भगवान् का तुलसी से प्रेम है, वे उसके बिना भोजन नहीं करते ! वृन्दावन अर्थात् परस्पर-समरस प्रेम का स्थान।

वृन्दावन : वृन्दा तुलसी के समान छोटे-छोटे पौधों का वन। बड़े-बड़े और पुराने वृक्षों के वन में हिंसक पशु निवास करते हैं। शेर, चीता, सांप अजगर- परन्तु वृन्दावन में हिंसक पशुओं का निवास नहीं है !भागवत शास्त्र के अनुसार वहाँ नैसर्गिक मित्रता का विलास है ! इसलिए वह भजन करने का पावन धाम है ! वैर, विरोध के स्थान में भजन नहीं होता। वहाँ शत्रु-मित्र चिन्तन होने लगता है ! वन शब्द का प्रकृतिगत अर्थ है- सम्यक् भक्ति ! संसार को अलग रखकर भगवत्प्रेम का रसास्वादन करना। सचमुच वृन्दावन ऐसा ही वन है :

वृन्दा श्रीराधारानी की एक सखी का नाम है ! सखी-शब्द का अर्थ है – जिसकी ख्याति समान हो !जहाँ वृन्दा वहाँ राधा – जहाँ राधा वहाँ वृन्दा ! जिस वन की व्यवस्था पर स्वामिनी वृन्दा हो – उसका नाम वृन्दावन ! वृन्दा सखी राधा-माधव की लीला सेवा के लिए सामग्री का सम्पादन करती है। शयन के समय शीतलता, मिलने के समय सायं काल, वियोग-लीला के समय प्रातः काल। स्नान के समय पद्यपरागमण्डित सरोवर, शयन के समय पुष्पों की सुख-शय्या, रास के समय कोमल-भूमिका विस्तार, सुगन्ध, माधुर्य, सुख-स्पर्श वायु, चन्द्रिका-चर्चित-आह्लाद-दायक प्रकाश, कोयल की कूक, पपीहा की पी-कहाँ, वस्त्र,अङ्ग-राग, वाद्य-संगीत- सबकी व्यवस्था वृंदा सखी करती है ! लीला में किसी वस्तु की न्यूनता न हो, इसलिए लीला की समग्रता सम्पादन करना इनका काम है! इनकी आज्ञा के बिना वृन्दावन में कोई प्रवेश नहीं कर सकता। वृन्दा का वन ही वृन्दावन है

(क्रमशः)

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जिज्ञासा और समाधान

प्रश्न : हिन्दू पद्धति में अनेक महिलाओं को विधवा जीवन बिताना पड़ता है। उनका जीवन सुखी कैसे हो ?

उत्तर : भारतीय संस्कृति संयम प्रधान है, इसलिए इसमें जितने उपदेश, आदेश दिये जाते हैं, सब संयम की प्रधानता से। स्वाभाविक विकारों को नियंत्रित करने से ही संस्कृति की रक्षा हो सकती है। वैसे, कुछ द्विजातियों को छोड़ कर अन्यत्र विधवा-विवाह प्रचलित है और वह शास्त्र के विरुद्ध नहीं है। अनेक पुरुषों से सम्बन्ध एवं भ्रूणहत्या आदि पापों की अपेक्षा तो किसी एक से विवाह होना ही श्रेष्ठ है। कन्यादान दुबारा नहीं हो सकता। विषयभोग में ही सुख है, यह विचार एकांगी है। इसलिए समाज-सुधारकों को इन बातों को ध्यान में रख कर ही लोगों की मनोवृत्ति में सुधार करने का प्रयास करना चाहिए।

मस्ती

मैंने श्रीउड़ियाबाबा जी महाराज से प्रश्न किया- ‘ब्रह्मज्ञान के अनन्तर जीवन में एक अद्भुत मस्ती का आना अनिवार्य है क्या ?’

उन्होंने तुरन्त प्रतिप्रश्न किया- ‘मस्ती जीवधर्म है या ब्रह्मधर्म ?’ अर्थात् ब्रह्मदृष्टि से मस्ती-बेमस्ती का कोई अर्थ नहीं है। जीवदृष्टि से जिसका जैसा अभ्यास-संस्कार है, उसकी अनुकूलता-प्रतिकूलता से मस्ती-बेमस्ती होती है। अभ्यास और तपस्या के द्वारा ज्ञानी की रहनी ऐसी हो जाती है- बेख़्वाहिश-बेपरवाह।

जैसे झींगुर और मच्छर अपनी प्रकृति के अनुसार बोलते और चेष्टा करते रहते हैं, एक मनुष्य उनकी ओर ध्यान नहीं देता,वैसे ही ज्ञानी पुरुष निर्भय और निर्द्वन्द्व रहते हैं।

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भगवान् की गोद-5

     यदि ऐसी भावना जो कि वास्तविक और उनके अङ्क तथा सान्निध्य का अनुभव करने की है, न चले तो भागवत अर्थात् भगवान् के भक्तों का ही अङ्क सामीप्य प्राप्त हो। सर्वात्मना विषयी पुरुषों का सङ्ग त्याग कर इन्हीं का सङ्ग किया जाय। ये तो भगवान् के मूर्तिमान्विग्रह ही हैं। इनका सङ्ग दुर्लभ अगम्य और अमोघ है। ये मृत्यु में संसार-सागर से परे पहुँचाकर अवश्य-अवश्य प्रभु की आनन्दमयी गोदी में बैठा देंगे।

     परन्तु समय के प्रभाव से या हमारे दुर्भाग्य अथवा बहिर्मुखता से संतों का मिलना, उनका पहिचाना जाना भी इस समय असम्भव-सा है। वे ही कृपा करके हमारे सन्मुख अपनेको प्रकट करें तो सम्भव है,हम कल्याणमय प्रभु को पाने का तत्परता से यत्न करने में लग जायें अन्यथा अपनी दुष्टता के फलस्वरूप हम उन विषयों में भी मृत्युमय संसार में बद्ध होने की ही उत्तेजना प्राप्त करेंगे।

     इसलिए आजकल श्रीमद्भागवताङ्ककी अर्थात् भगवान् के साक्षात् श्रीविग्रह भागवत-महापुराण की शरण ही एकमात्र हम जीवों के कल्याण के लिए स्वर्ण-सोपान रह गयी है। इस युग में यही भगवान् की साकार मूर्ति है। सब धर्मों के प्रतिष्ठा स्वरुप होने के कारण और धर्मों का परित्याग करके अन्य धर्मों की अपेक्षा न करके एक मात्र इसी का आश्रय-शरण ग्रहण करनी चाहिए। वेद के, उपनिषद् के सार-तत्त्व अमृतत्व की, ब्रह्मसूत्र के वास्तविक तात्पर्य की, गायत्री और प्रणव के लक्ष्यार्थ की, तथा महावाक्यों के द्वारा सङ्कलित वस्तु की सरल अनुभूति इसी भगवद्विग्रह की उपासना से इसी के अङ्क में विश्वास के साथ पड़ जाने से होगी। हम अज्ञानान्ध जीवों के नेत्र पटल खोलने के लिए श्रीप्रभु ने यह विग्रह धारण किया है, इसीलिए श्रीभागवतरूपी भुवनभास्कर के रूप में भगवान् प्रकट हुए हैं। इस युग में इसके श्रवण, कीर्त्तन, स्मरण, पूजन और परिणामतः आत्म-निवेदन से परमानन्द की प्राप्ति होगी। इसी के पावन प्रसाद से शोक-मोहप्रद अज्ञान भस्मसात् होगा। ज्ञान वैराग्य की प्रतिष्ठा होगी। इसी के बल पर देवर्षि नारदने जो कि भक्ति-मार्ग के आचार्य हैं, घोर प्रतिज्ञा की है कि घर-घर में, व्यक्ति-व्यक्ति में भक्ति की प्रतिष्ठा करूँगा श्रीभागवत भगवान् दया करके हमें अपने अङ्क में शरण दें कि यह जीवन उन्हीं के पद-पद्मसुधारस का आस्वादन करते हुए व्यतीत हो। 

श्रीमद्भागवतानन्दसुधाब्धौ रमतां सताम्।

पादारविन्द विन्दूद-प्लावितः स्यां भवे भवे।।  

 

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भगवान् की गोद-4

     हमारे सिर पर मृत्यु का उद्दण्ड तांडव नृत्य हो रहा है, प्रतिपल उस प्रभु को कालरूप में ही अनुभव करने के लिए हम आगे बढ़ रहे हैं, तो अपने नियमानुसार उसे भी मृत्युरूप में ही हमारे सन्मुख आना ही चाहिए। वही प्रभु हमारे अन्तरतल में पुरुषरूप से ,आत्मरूप से अमृतत्व की धारा बहा रहा है, बाहर कालरूप से मृत्यु के आवागमन के कराल गतिचक्र में डालकर पीस रहा है। कारण यह है कि उसने रमणके, विहारके, क्रीड़ा के उद्देश्य से ही अपने बहुत रूप किये हुए हैं। प्रत्येक अंतःकरण से भिन्न-भिन्न रूप में एक अखण्डानन्दका पृथक्-पृथक् आस्वादन करनेके लिए ही बिखरे हुए अणुओं को प्रेमसे, आकर्षणसे, चुम्बनसे पिण्डीभूत करके स्वयं ही उन-उन रूपों में अपने परमानन्द का आस्वादन कर रहा है। जहाँ आनन्द की ओर दृष्टि नहीं है, कालरूपसे, मृत्युरूपसे, उन्हें आत्मसाक्षात् करना भी उसका ही अनुग्रह है। परन्तु अपना वास्तविक स्वरुप, स्वभाव, अमृत और आनन्द होने के कारण हम उसे अनुग्रह के रूप में ग्रहण करना नहीं चाहते।

     विकर्षण यह कि हमारी ही भूल से, अज्ञान से प्रभु की आनन्दमयी किरणों का प्रकाश हमारे अनुभव में नहीं आ रहा है।  हम अमृत सिंधु में आनन्द की अनन्त धारा में निवास करते हुए भी प्यास के कारण, अतृप्ति के कारण व्याकुल हो रहे हैं, छटपटा रहे हैं। परम प्रकाश को भी अन्धकार समझकर हम इधर-उधर टटोल रहे हैं। हम अपने गले में ही स्थित हार को भूलकर कस्तूरी मृगकी तरह इधर-उधर भयानकता में भ्रमण कर रहे हैं अपने ही स्वरुप अंतःस्थिर प्रभु = वास्तविक स्व को छोड़कर अन्यत्र ढूंढने को दौड़ लगा रहे हैं।

     इन सब अनर्थों का एकमात्र भेषज है ‘श्रीमद्भागवताङ्क ‘ जिसकी अनुभूति से, संगसे, सेवासे यह भूल मिटकर प्रभु का चिदानंदमय स्वरुप उपलब्ध हो सकने की आशा की जा सकती है।

     भागवताङ्क का अर्थ है भगवान् की गोद और उनकी सन्निधि ‘अङ्क समीप उत्सङ्गे’। हम प्रतिपल चलते, बैठते, सोते उसी का अनुभव करें। चलते समय हमारी भावना हो प्रभु के अनन्त आनन्द पारावार की एक सुधामयी तरङ्ग हैं। बैठने के समय हमें ऐसा मालूम पड़ता रहे कि अखण्ड चित्स्वरूप प्रकाश के धागे में पिरोये हुए हम एक मणि हैं। सोने के समय हमारे अंतस्थल की वृत्तियाँ उसी अपार चिदानन्दमय प्रभु में ही डूब जायें। विषयों की प्रतीति और उनके द्वारा प्राप्त यत्किञ्चित् सुख में भी हम अन्तरानन्द से ही तृप्त हो रहे हैं, यह भावना-उपासना, प्रभु की सच्ची आराधना चलती रहे।  

(क्रमशः)

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