उलूखल बन्धन लीला-32

     श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं-भक्तों के वश में भगवान् हैं। भक्तों में भी श्रीब्रजेश्वरी के तो सर्वथा ही अधीन हैं। अपार परवशता धारण किये हुये हैं। मूल में ‘विमुक्ति’ शब्द का अर्थ है- विशिष्ट मुक्ति = प्रेम। उसे देने वाले हैं श्री कृष्ण। कृष्ण से यशोदा को जो प्रसाद प्राप्त हुआ वह ब्रह्मा शिव लक्ष्मी को भी नहीं मिला। नकार और क्रियापद की तीन बार आवृत्ति कीजिए ,अतिशय अप्राप्त है – यह अर्थ है। दूसरा अर्थ इस प्रकार है ब्रह्मा, शंकर और लक्ष्मी को प्रसाद नहीं मिला, ऐसा नहीं, मिला तो सही परन्तु जो प्रसाद गोपी को मिला, वह उन्हें नहीं मिला। ब्रह्मा और शिव दास हैं उनसे श्रेष्ठ लक्ष्मी हैं, वक्षःस्थल पर स्थित प्रेमवती पत्नी। जो प्रसाद उन्हें नहीं मिला वह प्रसाद यशोदा को कैसे मिला? क्योंकि वे तो पहले वसुपत्नी धरा थीं। ब्रह्मा को प्रसाद न मिले और वे जिसको वर दें उसे मिल जाय- ऐसा कैसे हो सकता है ? ब्रह्मा ब्रजरज के प्रेमी हैं। इस उक्ति-युक्ति से सिद्ध होता है कि नन्द-यशोदा नित्य सिद्ध हैं।

     भागवत-सिद्धान्त है कि भगवत्प्रेम ही सब पुरुषार्थों का शिरोमणि है। भक्त नित्यसिद्ध होंगे तो उनमें प्रेम भाव नित्य प्रतिष्ठित होगा, अन्यथा अनित्य हो जायेगा। भक्तों में गोकुलवासी श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे वात्सल्य, सख्य आदि भाव से प्रेम करते हैं। उनके रागानुगामी भक्तों को ही श्रीकृष्ण सुलभ हैं। देहाभिमानी कर्मी, देहाध्यास रहित ज्ञानी और भगवान् के ही अवतार ब्रह्मा-शंकर तथा स्वरुप-शक्तिरूपा लक्ष्मी-ये भगवान् के आत्मभूत ही हैं, तथापि उनके लिए  ये सुलभ नहीं हैं। ब्रह्मा, शंकर आदि को अपने-अपने लोक में रहना पड़ता है, लक्ष्मी को भी। वे ब्रजरस का आस्वादन कैसे कर सकते हैं? ब्रजवासियों की अनुगति भी उनके लिए अप्राप्य है।

     सिद्धान्तप्रदीपकार  का अभिमत है कि भक्ति मुक्ति से भी दुर्लभ है- यह इस प्रसंग में कहा गया है। भक्ति-सम्बन्ध-वर्जित धर्म, योग, ज्ञान भगवत्प्राप्ति के साधन नहीं हैं। भक्ति ही एकमात्र भगवत्प्राप्ति का साधन है।

     भक्तिरसायनकार  श्रीहरिसूरि कहते हैं कि भगवान् जिन्हें बाल लीला का सुख देते हैं उन्हें ऐश्वर्य का सुख नहीं और जिन्हें ऐश्वर्य का सुख देते हैं उन्हें बाल लीला का सुख नहीं। परन्तु अपने श्रेष्ठ भक्तों को वे दोनों का ही सुख देते हैं। बन्धन न होने से ऐश्वर्यसुख है और होने से बाललीला-सुख। यशोदा को दोनों प्राप्त हुए।

येषां बालतया सुखोदयकरस्तेषां न षाड्गुण्यतो 

येषां तादृशरूपतश्च सुखदस्तेषां न बालत्वतः।

सच्चिद्रूपतया च बालकतया निःसीमसौख्यप्रद-

स्तेषामेव सुभक्तिमन्त इह  येऽत्रो दाहृतिर्गोपिका।।     

     उलूखलबन्धन-लीला भृत्यवश्यता, प्रेम-परवशता, वात्सल्य-स्नेह का अनुपम उदहारण है। भगवान् में कितना अनुग्रह है और माता में कितना प्रेम है – इन दोनों का स्पष्ट दर्शन होता है इस लीला में।

     इसमें सन्देह नहीं कि यह लीला भावुक भक्तों को लीन-तन्मय कर लेती हैं अपने में। प्रेम-भक्ति के लिए उन्मुख करती है। इस प्रसंग में यह उल्लेख करके कि भगवान् का बन्धन भी दूसरों की मुक्ति का साधन है जैसे नलकूबर-मणिग्रीव का उद्धार, हरिसूरि के भक्ति रसायन स्थित एक श्लोक का रसास्वादन करते हुए इस निबन्ध को समाप्त करते हैं –

अन्य एव मम बन्धको भवत्यन्य एव मम मोचकोऽपि च।

न स्वतोऽस्ति मम बन्धनं न वा मुक्तिरित्यकृत स्फुटार्थकम्।।

भगवान् श्री कृष्ण अपने मन में विचार कर रहे हैं कि दूसरा कोई (जैसा माता) मुझे बन्धन में डाल देता है, बद्ध समझ लेता है और दूसरा ही कोई (जैसे पिता नन्द ) मुझे मुक्त कर देता है अर्थात् मुक्त के रूप में साक्षात्कार कर लेता है। मेरे वास्तविक स्वरुप में  न बन्धन है और न तो मुक्ति।  

 

श्री हरिः 

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उलूखल बन्धन लीला-31

     श्रीवीरराघवाचार्य का भाव है कि भगवत्प्रसाद भक्ति से ही प्राप्त होता है। उसके लिए ब्रह्मा-शंकर या लक्ष्मी होने की आवश्यकता नहीं है, प्रेम-पूर्वक अनुध्यानादि-रूप भक्ति की आवश्यकता है। जब वह गोपी के हृदय में विद्यमान है तब उसे भगवत्प्रसाद अवश्य ही प्राप्त चाहिए। उसी के लिए वे सुख-साध्य हैं। 

    श्री विजयध्वजतीर्थ कहते हैं कि निरन्तर निरतिशय भक्ति ही वह परम सुन्दरी नायिका है जो भगवान् को भी अपनी ओर आकृष्ट करने में परम विदग्ध है। 

    आचार्य वल्लभ ने कहा – भगवान् श्रीकृष्ण ने यहाँ नयी बात क्या दिखलाई ? ऐसा भाव तो पुरातन काल से ही शास्त्रों में प्रसिद्ध है। इसकी मीमांसा कीजिये। जो प्रसाद यशोदा को मिला वह इससे पहले किसी को नहीं मिला। यह महान् भक्तों को ही प्राप्त होता है। भक्तों में भक्ति से और स्वरुप से तीन महान् हैं- ब्रह्मा पुत्र हैं, भक्त हैं, प्रवृत्तिमार्ग के सब धर्मों के प्रवर्तक  हैं और सबके पिता हैं। महादेव पौत्र हैं, निवृत्तिधर्मों के प्रवर्तक हैं, प्रलय के हेतु एवं गुणावतार हैं। भगवान् के लिए ही सब कुछ छोड़ कर तपस्या करते हैं। इन दोनों से अंतरंग हैं लक्ष्मी। वह पत्नी हैं। ब्रह्मानन्द स्वरुप हैं, जगज्जननी हैं। वक्षःस्थल पर निवास प्राप्त होने पर भी चरणसेवा में संलग्न हैं। जब इन्हीं को यह प्रसाद नहीं मिला तो दूसरे को कहाँ-से मिलेगा ? इनमें -से किसी एक को नहीं मिला तथा पूरे समुदाय को नहीं मिला – यह सूचित करने के लिए तीन बार नकार और बहुवचन में ‘लेभिरे’क्रिया का प्रयोग है। इनमें कोई त्रुटि भी नहीं है; क्योंकि तीनों भगवान् के अंगाश्रित हैं। वक्षःस्थल पर लक्ष्मी, नाभि में ब्रह्मा और चरणों में शंकर। यशोदा में ये तीनों विशेषताएँ नहीं हैं। जो प्रसाद मिला वह अनिर्वचनीय है। सबको मुक्ति देने वाला अपने को बन्धन में डाल दे, यह क्या कम आश्चर्य है ? यदि यशोदा का दुःख ही दूर करना था तो ज्ञान या कैवल्य देकर उसे दूर कर सकते थे। सचमुच भक्त को भक्ति के बन्धन में डाल देना सबसे बड़ा प्रसाद है।

     ब्रह्मा आदि महान् हैं और यशोदा तो श्रीकृष्ण को ईश्वर के रूप में पहचानती भी नहीं। ऐसी स्थिति में यशोदा के प्रति प्रसादानुग्रह उनके प्रति किये गये प्रसादानुग्रह से बड़ा कैसे हो सकता है ? ध्यान दीजिये, यहाँ बन्धनमात्र विवक्षित नहीं है।किन्तु वश्यता,भक्तवश्यता विवक्षित है।वह किसी और को नहीं मिलती। देहाभिमानी कर्मी और निरभिमान मुक्तज्ञानी दोनों के लिए यह भगवान् सुखलभ्य नहीं हैं। एक में देहाभिमान दोष है तो दूसरे में भगवान् के प्रति भी निरपेक्षता। क्या पार जाने मात्र से ही महाराज की प्राप्ति हो जाती है। विशेषता यह है कि भक्तों को इसी लोक में मिल जाते हैं; क्योंकि वे गोपी के पुत्र हो गये हैं। इसका अभिप्राय ही यह है कि लोग इसी लोक में, इसी अवतार में भक्ति करें।

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-30

     करोड़ कल्प में भी भगवत्स्वरूप बन्धन की संभावना से युक्त नहीं हो सकता परन्तु भक्त के संकल्प और अल्पप्रयत्न से ही बन्ध गये। यह लीला वस्तुतः भक्तों का हृदय अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए ही है और क्या कहूँ, भगवान् भक्त के वश में।

     श्रीधर स्वामी ने अवतरणिका में कहा है कि भगवत्प्रसाद तो दूसरे भक्तों को भी प्राप्त होता है परन्तु यशोदा माता को जो कुछ मिला वह अत्यन्त विचित्र है। पुलकित शरीर से शुकदेव जी ने कहा  कि ब्रह्मा पुत्र हैं, शंकर आत्मा हैं और लक्ष्मी पत्नी हैं फिर भी उन्हें यह प्रसाद नहीं मिला। देहाभिमानी तपस्वी और अभिमानरहित ज्ञानियों के लिए भी यह गोपीकानन्दन भगवान् सुलभ नहीं हैं। उन्हें मिलते तो हैं परन्तु भक्तों के लिए सुगम हैं उतने उनके लिए नहीं।

     श्रीजीवगोस्वामी विस्तार से अपना अभिप्राय प्रकट करते हैं। उनका कहना है कि जब राजा परीक्षित ने यशोदा -नन्द के उस पुण्याचरण के सम्बन्ध में प्रश्न किया जिससे भगवान् की बाल लीला का आनन्द उन्हें मिला, तब शुकदेव जी ने सामान्यरूप से उन्हें महापुरुष ब्रह्मा के कृपा-प्रसाद का उल्लेख कर दिया। तब क्या धरा-द्रोण  वसु दम्पती को नैमित्तिक रूप से ही यह शुभावसर प्राप्त हुआ ? नहीं, अब तात्त्विक समाधान किया जाता है। भक्तों के आदि गुरु हैं ब्रह्मा। वैष्णवों के आदर्श हैं शंकर। नित्य प्रेयसी हैं लक्ष्मी। वह तो वक्षःस्थल पर निवास करती हैं। उन्हें भक्तिरूप प्रसाद की प्राप्ति हुई ? भगवान् मुक्ति देना = जेलखाने से छोड़ देना तो पसन्द करते हैं परन्तु भक्ति देना अर्थात् अपनी सेवा में लगा लेना सबके लिए सुलभ नहीं करते। परन्तु जो प्रसाद – अनिर्वचनीय महाप्रसाद जिसका ठीक-ठीक निरूपण प्रसाद शब्द के द्वारा भी नहीं हो सकता, वह प्रेम-परिपाक यशोदा को प्राप्त हुआ। वह ब्रह्मा, शंकर और लक्ष्मी को भी न मिला, न मिला, न मिला। तीनों नकार अन्वय ‘लेभिरे’ के साथ है। लक्ष्मी को ऐश्वर्य का ज्ञान है। अवश्य ही पति के रूप में उनकी ममता विशेष है परन्तु यशोदा को ऐश्वर्य ज्ञान न होने के कारण केवल ममता ही ममता है। इसलिए यशोदा की प्रीति ब्रह्मा का प्रसाद नहीं है। वह नित्यसिद्ध श्रीकृष्ण-माता हैं। ब्रह्मा तो स्वयं ब्रजरज की प्राप्ति के लिए लालायित रहते हैं।

    मूल में स्पष्ट है कि भले ही तपस्या और ज्ञान से महानारायण या परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति होती हो परन्तु गोपिकानन्दन की प्राप्ति उनके लिए भी कठिन है बिना किसी विशेषण के गोपिका-सुत कहने का अभिप्राय यह है कि गोपिका ही सबके लिए उपादेय है। ‘इह’ शब्द के प्रयोग का  यह भाव है कि गोपिका और गोपिका-सुत की स्थिति नित्य है और सभी देश में, सभी काल में सच्चे प्रेमियों के लिए सुलभ हैं। यशोदा के समान ही नन्दबाबा आदि परिकर भी नित्य ही हैं। धरा-द्रोण के रूप में जो निरूपण किया गया था वह तो जब तक पूर्णतया लीला-रहस्य का प्रबोध न हो जाय, तभी तक के लिए कहा गया था।  

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-29

     श्री कृष्ण ने विचार किया – मैं परमैश्वर्यशाली सहस्रगुण सद्वृत्ति हूँ,तथापि भक्तों के गुण के बिना मेरे गुण पूर्ण नहीं होते। अतएव उन्होंने यशोदा के गुणों से अपने उदर को भर लिया।

षाड्गुण्यं भजतः सहस्रगुणसद्वृत्तेरनन्तात्मनो

नित्यानन्तगुणोल्कसत्- सुचरितस्यापीह मेऽवस्थितिः।

पूर्णत्वं गुणतः प्रयाति न विना मद्भावभाजां  गुणा –

लम्बं जातुच्चिदित्यबोधयदसौ पूर्णोदरस्तद्गुणात् ।।

     अपने भक्त के प्रेमपोषक परिश्रम को भी मैं  नहीं सह सकता, अन्य की तो बात ही क्या है ? मैं माता का खेद दूर करने के लिए अश्लाघ्य बन्धन को भी सह लूंगा।

मत्प्रेमपोषकमपि श्रममात्मभक्त-

देहे सेहे न भुवि जातु कुतस्तदन्यम्।

किं चास्य खेदमपनेतुमहं सहेये –

त्यश्लाघ्यमप्यकृत-बन्धनतः स्फुटं सः।।

     तत्त्वदृष्टि से मुझमें कोई गुण संलग्न नहीं है। यदि गुण क्वचित् भासमान भी हैं तो मध्य में ही (जो आदि-अन्त में नहीं होता वह मध्य में भी नहीं होता, मिथ्या ही भासता है। ) श्रीकृष्ण ने मानो इसी श्रौत तात्पर्य को प्रकट करने के लिए मध्य भाग में ही रस्सी का सम्बन्ध स्वीकार किया।

न मां तत्त्वदृष्ट्या गुणः कोऽपि लग्नः क्वचित्भासमानोऽपि  चेन्मध्य एव ।

इति   श्रौतमर्थं   तदानीमधीशः   स   दाम्ना   स्वमध्येन   मन्ये  व्यतनीत् ।।

     गोकुलगत रज्जुओं से बन्धन अंगीकार करने का अभिप्राय है कि गोकुलवासी ऐन्द्रियक व्यवहार में संलग्न व्यक्ति भी प्रेम से मुझे बाँध लेते हैं, वश में कर लेते हैं।

     महापुरुषों का यह गौरवपूर्ण सद्गुण है कि भले ही कोई उसे न समझे,अभीष्ट कार्य की पूर्ति कर देता है। यह दामोदर-लीला से स्पष्ट है।

     यदि दैववश खलगुण का अपने आप से सम्बन्ध हो जाय तो बन्धन की प्राप्ति अवश्य होती है, भले ही वह महापुरुष ही क्यों न हो। ऊखल एवं रज्जु के सम्बन्ध से श्रीकृष्ण को भी बँधना पड़ा।

     भगवान् श्रीकृष्ण ने माता के मनका निर्बन्ध (आग्रह) देखकर आत्मबंधन स्वीकार कर लिया। भक्त के प्रेम के सामने अपना कार्य गौण हो जाता है।

     भगवान् श्रीकृष्ण अपने मन में परामर्श करने लगे। देवर्षि नारद ने नलकूबर, मणिग्रीव को शाप देकर वृक्ष बना दिया है और यह वचन दे दिया है कि शीघ्र ही व्रजराज कुमार तुम्हें मुक्त कर देंगे। यह ठीक है कि मैं मुक्त हूँ स्वयं और मुक्त करता हूँ दूसरों को तथापि देवर्षि की वाणी ने तबतक के लिए मुझे बन्धन में डाल दिया है जब तक इन दोनों पर कृपा करके मुक्त नहीं कर देता है। यही विचार करके भगवान् ने देवर्षि नारद के वचनों के बन्धन से ही अपने को बद्ध बना लिया। यही तो भक्तवश्यता है। 

मच्छापादचिरेण वां यदुपतिर्मोक्तेति वाचाऽऽर्षया

तावत् बद्ध इवाहमस्मि सततं मुक्तोऽपि मोक्ताऽपि च।

यावद्वार्क्षपदादिमौ न कृपया सम्मोचितावित्यसौ

तद्बन्धात् किमबोधयद् भुवि विभुर्भक्तैकवाग्वश्यताम्।।  

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-28

     श्रीहरिसूरि यह विकल्प उठाते हैं कि यशोदामाता ने घर की छोटी-बड़ी सभी रस्सियों को अलग-अलग कृष्ण के कटि-भाग में लगाया अथवा सबको एक साथ ? इनमें -से यदि पहली बात मानी जाय तो यह भाव ध्वनित होता है कि समदर्शी दयानिधान भगवान् में छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं है। दूसरी बात यह कि रज्जु ने यह सूचना दी – प्रभु के समान अनन्तता और अनादिता हम क्षुद्रों में कहाँ-से आ सकती है। अतः हम इन्हें बाँध नहीं सकते।

     यदि ऐसा माना जाय कि सभी गुणों (रस्सियों) का प्रयोग एक साथ ही किया गया तो वे सब अनन्त गुण परमात्मा में लीन हो गये। समुद्र में सभी नदियाँ लीन हो जाती हैं। न नाम रहा, न रूप। समुद्र में एक मेरी श्यामता है और दूसरी यमुना की। दो अंगुल की न्यूनता के द्वारा प्रभु ने यह भाव प्रकट किया।

     आश्चर्य तो यह है कि वामन की भाँति अपने रूप को छोटा नहीं किया। त्रिविक्रम के समान बढ़ाया नहीं। रस्सी छोटी नहीं की। उनके पृथक् या युगपत् प्रयोग में कोई बाधा नहीं डाली। फिर भी किसी रूप में श्रीकृष्ण को गुणस्पर्श नहीं हुआ।

     माता की थकान और भूषण-भ्रंश देखकर कृष्ण के हृदय में कृपा का उद्रेक हुआ। वे सोचने लगे- माता के हृदय से द्वैत- भावना दूर नहीं होती तो फिर इसके सम्मुख अपनी असंगता प्रकट करना व्यर्थ है। इस भाव से उन्होंने बन्धन को स्वीकार कर लिया।

न द्वैतमस्या हृदयादपैति  तत् किं वृथा स्वां प्रकटीकरोषि।

 निःसंगतामित्यवधार्य तादृग् दामस्थितेरास विभुः सम्बन्धः।।

भक्त के छोटे-से गुण को भी भगवान् पूर्ण कर देते हैं यही सोचकर छोटी-सी रस्सी को भी अपने बन्धन योग्य पूर्ण बना दिया। 

लघुमपि मद्भक्तगुणं हार्दस्थितितो नयामि पूर्णपदम्।

ध्वनयन्नेवमनन्तो       निन्ये      पूर्णत्वमेतदल्पमपि।।   

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-27

     जिस पर प्रभु का कृपा-प्रसाद उतरता है, जिसपर उनकी अनुग्रह दृष्टि पड़ जाती है उसे भी बन्धन का अनुभव नहीं होता। श्री कृष्ण ने जब रस्सी की ओर देखा तो वह भी मुक्त हो गयी उसमें बन्धन की योग्यता नहीं रही।

यस्मिन् कृपानुग्रहवीक्षणं विभोर्भवत्यसौ वेत्ति न बन्धनसम्भवम्।

युक्तं तदा तद्धरिणा तथेक्षितं मुक्तं स्वयं दाम न बन्धभागभूत।।

     रज्जुगुण  की न्यूनता निरन्तर यह सूचना दे रही है कि संसार के सारे गुण भी उसकी पूर्ति में समर्थ नहीं हैं।

     एक अन्धा जिसको नहीं देख सकता, उसको सौ अन्धे भी मिलकर नहीं देख सकते। सभी दाम (रज्जु) समान हैं। व्यर्थ परिश्रम से कोई लाभ नहीं। इसी अभिप्राय को रज्जु की न्यूनता प्रकट करती है।

     बन्धन-रज्जु दो ही अंगुल कम क्यों हुई ? इसपर श्रीहरिसूरि की उत्प्रेक्षाएँ सुनिये –

     जब मैं शुद्धान्तःकरण योगियों को प्राप्त होता हूँ तब केवल एकमात्र सत्त्वगुण से ही मुझमें सम्बन्ध की स्फूर्ति होती है। रजोगुण और तमोगुण का सम्बन्ध नहीं होता। रस्सी में दो अंगुल की न्यूनता प्रकट होना इसी सत्य को प्रकट करता है।

यदाहं प्राप्यः स्यामिह सुमनसां युक्तमनसां

तदानीं सम्बन्धः स्फुरति मयि सत्त्वैकगुणतः। 

द्वयोर्नेति प्रायः प्रकटितमिहेशेन स तदा

यतो द्वाभ्यामूनात्तदुचितगुणाद् बन्धयुगभूत्।।

     जहाँ नाम-रूप होते हैं वही बन्धन का औचित्य है। मुझ ब्रह्म में ये दोनों नहीं हैं। दो अंगुल की न्यूनता से यही बोधन किया गया है।

यत्र स्यातां नामरूपे सरूपे बंधस्तस्यैवोचितो नोचितोऽत्र। 

द्वाभ्यामूने ब्रह्मगीति व्यबोधि दाम्ना तेन द्वय्ङ्गुलोनेन मन्ये।।    

     रज्जु ने दो अंगुल न्यून होकर यह सूचना दी कि इन दोनों वृक्षों (नलकूबर-मणिग्रीव) का उद्धार करके इन्हें मुक्त कीजिये।

     भगवत्कृपा से द्वैतानुरागी गोकुल भी मुक्त हो जाता है और प्रेम से भगवान् भी बद्ध हो जाते हैं। इन दो रहस्यों को दो अंगुल की न्यूनता सूचित करती है।  

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-26

     सारार्थदर्शिनीकार चक्रवर्ती विश्वनाथ यह भाव विशद करते हैं – परमेश्वर का प्रेम-परवश होकर बँध जाना दूषण नहीं, भूषण है। आत्माराम की भूख-प्यास, पूर्णकाम की अतृप्ति-तृष्णा, शुद्धसत्त्व का कोप, स्वाराज्य-लक्ष्मी के अधिपति का चौर्य-कर्म, महाकाल के काल का भय-पलायन, मन के अग्रगामी का पकड़ा जाना, आनन्दमय का दुःखरोदन और सर्वव्यापी का बन्धन- यह सब स्वाभाविक भक्त-पराधीनता का प्रदर्शन है। अज्ञानियों के प्रति इसका उपयोग न होने पर भी ब्रह्मा,शंकर, सनत्कुमारादि विज्ञानियों को भी चमत्कृत करके इसका प्रदर्शन किया गया। इसको केवल अनुकरण-मात्र समझना भूल है;क्योंकि आगे ‘तद्विदाम्’ कहा गया है।

     सिद्धान्तप्रदीपकार श्रीशुकदेव का अभिप्राय है कि यह ठीक है, भगवान् में अंतर्बाह्य, पूर्वापर आदि का व्यवहार न होने पर भी उन व्यवहारों का औचित्य भी है। वे अणु-से-अणु और महान्-से-महान् हैं। वे स्वयं अपने संकल्प से बद्ध भी हो सकते हैं। 

     अब श्री हरिसूरि कृत भक्ति-रसायनम् के कुछ भावों का सप्रेम समास्वादन कीजिए। यशोदा ने अपने गुणों= रस्सी एवं सद्गुणों से जितना-जितना उद्योग किया विभु के उदर की पूर्ति के लिए, श्रीकृष्ण ने भी उतने ही उतने अपने गुण असंगता, नित्यमुक्ति आदि को प्रकट किया। अतएव कन्हैया मैया के साथ यह परमानन्द जनक क्रीड़ा  सम्पन्न हो गयी। 

     रज आदि प्राकृत गुण जिनका स्पर्श भी नहीं कर सकते, उन्हें यह छोटा-सा गुण (रस्सी) कैसे बाँध सकेगा? अतएव गुणों का पूरा न पड़ना उचित ही है। 

     इन्द्रियों का बन्धन होता है उनके अधिष्ठाताओं का नहीं। श्रीकृष्ण गोपति-इन्द्रियाधिपति हैं। गोबंधक रज्जु उन्हें नहीं बाँध सकती। 

     यह प्रसिद्ध है कि अध्यस्त ही बद्ध होता है, अधिष्ठान नहीं। इस श्रुत्यर्थ को स्पष्ट करने के लिए विश्वावभासक परमात्मा में बन्धन न लग सका। 

अध्यस्तस्याश्रावि बन्धो जगत्यां नाधिष्ठानस्यांशतोऽपीति कोके।

श्रुत्यर्थस्य ख्यातये नोदरेऽभूद् बन्धस्तस्मिन् विश्वविश्वप्रकाशे।।    

(क्रमशः )

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उलूखल बन्धन लीला-25

     श्री जीवगोस्वामी ने यह प्रश्न उठाया है कि पहले तो श्रीकृष्ण को पूर्ण और परमेश्वर सिद्ध करते हो। फिर उनमें भूख, प्यास, अतृप्ति, चोरी, भय, पलायन, पकड़ा जाना, रोदन और बन्धन का वर्णन करते हो। इसका कोई न कोई रहस्य अवश्य होना चाहिए और रसिकों के लिए आस्वाद का हेतु भी, अतः वह क्या है ?इसका समाधान करते हैं। यह सर्वथा सत्य है कि श्रीकृष्ण परिपूर्णतम परमेश्वर हैं तथापि उनमें भक्तों के प्रति अनुग्रह भी अवश्य स्वीकार करना चाहिए। यदि अनुग्रह न होगा तो भगवान् के गुण किसी के प्रति सुखकारी नहीं होंगे। कठोर हृदय पुरुषका कुछ भी रुचिकर नहीं होता। फिर वे गुण भी नहीं रहेंगे। जन-सुखकारी धर्म निर्दयता-रूप दोष में परिणत हो जायेंगे। अपहतपाप्मा परमेश्वर के साथ उनकी कोई संगति नहीं लगेगी। अतएव सभी गुणों को गुण बनाने वाला दोषांतर विरोधी भक्ति के अनुरूप कृपा गुण ही भगवान् में स्वीकार करना चाहिए। भक्ति भगवान् को वश में करती है। यह ठीक है तो भगवान् भी भक्ति के वश में होते हैं। इससे उनके ऐश्वर्य में कोई त्रुटि नहीं आती; क्योंकि वे बद्ध दशा में भी नल-कूबर, मणिग्रीव का उद्धार ही करते हैं। इससे सर्वाकर्षण और ऐश्वर्य की वृद्धि होती है। वे स्वयं ही बार-बार कहते हैं – मैं भक्त-पराधीन हूँ। भक्त निष्कपट हैं, मैं भी निष्कपट हूँ। अतः भक्तों के आनन्द के लिये उन-उन भावों का प्रकट होना तात्त्विक ही है। यही देख कर कुन्ती देवी मुग्ध हो गयी थीं। यह भक्तों का मन हरण करने की लीला है। जो अपने भक्त से इतनी ममता कर सकता है कि उसके हाथों बँध जाये तो उसकी भक्ति कोई क्यों नहीं करेगा ?

     श्री वीरराघवाचार्य कहते हैं कि इस भक्तकृत बन्धन से भगवान् की स्वतंत्रता में कोई बाधा  नहीं पड़ती है। ब्रह्मा-शंकर आदि श्रीकृष्ण के वश में हैं। सम्पूर्ण जगत् उनके वश में है।  उन्होंने स्वयं ही यह प्रकट किया कि मैं भक्तों के वश में हूँ। सर्वत्र स्वतंत्र, भक्तों के परतंत्र। श्रीवत्सांक मिश्र ने कहा है – अनन्याधीनत्वं तव किल जगुर्वैदिकगिरः पराधीनं त्वां तु प्रणतपरतंत्रं मनुमहे। वेदवाणी आपको अनन्याधीन=किसी के आधीन नहीं कहती है परन्तु हम तो प्रणत- परतंत्र आपको पराधीन ही मानते हैं। अनन्य भक्तों के अधीन – वेदवाणी का ऐसा अभिप्राय है।

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-24

     आचार्य वल्लभ का कथन है कि भगवान् ने अपने में दो दोष दिखाये- पहला उसका पुत्र होना और दूसरा अपराधी होना। दो अंगुल न्यून होकर रस्सी कहती है कि ये दोनों दोष श्रीकृष्ण में नहीं हैं। माता को आश्चर्य भी होता है परन्तु श्रीकृष्ण की इच्छा अपनी व्यापकता के प्रदर्शन की भी है। पेट बढ़ता नहीं है, कमर मोटी होती नहीं है, रस्सी पर रस्सी जोड़ने पर भी दो ही अंगुल कम होती है। देवता तीन बार अपना सत्य प्रकट करता है। अतएव तीन बार न्यूनता हुई। गोपियाँ हँसती थीं। उन्हें लीला-दर्शन का आनन्द आता था। गोपियों ने यशोदा माता से कहा – ‘अरी, यशोदा !पतली-सी कमर में रुन-झुन-रुन-झुन करके छोटी-सी करधनी बँधी हुई है और घर की सारी रस्सियों से यह नटखट बँधता नहीं है। यह बड़े मंगल की सूचना है कि विधाता ने इसके ललाट में बन्धन योग नहीं लिखा है। अब तू छोड़ दे यह उद्योग।’ परन्तु यशोदा माता ने कहा – ‘भले ही बाँधते-बाँधते संध्या हो जाय, गाँव की सारी रस्सियाँ लग जायँ, मैं आज बाँधे बिना नहीं मानूँगी।’ कृष्ण का हठ है- मैं नहीं बंधूँगा। माता का हठ है मैं बाँधूंगी। यह निश्चय है कि भक्त का हठ विजयी होगा। भगवान् ने अपना आग्रह छोड़ दिया। बात यह है कि भगवान् में असंगता, विभुता आदि अनेक शक्तियाँ हैं परन्तु परम भास्वती भगवती कृपाशक्ति ही सर्वशक्ति चक्रवर्तिनी हैं। वे भगवान् के मनको नवनीत के समान पिघला देती हैं और असंगता, सत्य-संकल्पता, विभुता को छिपा देती हैं। दो अंगुल की न्यूनता का अभिप्राय यह है कि जब तक  भक्त में भजनजन्य श्रान्ति का उदय नहीं होता तब तक वे भक्त के वश में नहीं होते। जब दोनों एकत्र हो गये तब भगवान् बँध गये यह श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती का भाव है।

     श्री वल्लभाचार्य कहते हैं कि माता का शरीर स्वेद से भींग गया। उसकी केशों में लगी मालाएँ बिखर गयीं। वह थक गयी। पुत्र का कर्तव्य है कि माता का परितोष करे। श्रुति है – ‘मातृदेवो भव।’ स्मृति है – ‘माता सबसे बड़ी है।’ अतः उसको थकाना उचित नहीं है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि ‘इसके कोई दूसरा पुत्र भी नहीं है जो इसका दुःख दूर करे। मैंने ही इसे अपनी माता बनाया है। मैं गोकुल का दुःख दूर करने के लिए प्रकट हुआ और माता का दुःख दूर न करूँ, तो क्या ठीक होगा ? सौभाग्य-दान के लिए आया और इसके अलंकारों का तिरस्कार कर दूँ ?’ जो भक्तों के दूरस्थ दुःख को भी नहीं देख सकते, वे अपने सम्मुख माता के दुःख को कैसे देख सकते हैं ? अतएव कृपानुग्रह से श्रीकृष्ण ने बन्धन स्वीकार कर लिया। कृपा सब धर्म और धर्मियों से बलवती है। भगवान् अपनी कृपा से ही सबसे बँधते हैं।  

    (क्रमशः) 

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उलूखल बन्धन लीला-23

     कवि की अंतर्भेदिनी दृष्टि क्या देख रही है ? ध्यान दीजिये। यशोदा माता ने श्रीकृष्ण को बाँध लिया, यह बात अलग रहे। मुझे तो ऐसा दीखता है कि श्रीकृष्ण ने ही यशोदा माता और ऊखल दोनों को ही बाँध लिया। यशोदा भगवत्स्नेह में बँध गयी और ऊखल कृष्ण के साथ बँध कर दूसरों के उद्धार में समर्थ हो गया।

सा बबन्ध  तमित्यास्तां मन्मतं तु बबन्ध सः।

गोपिकोलूखले  एव तमस्तन्तुगुणात् प्रभुः।।

     भगवत्स्वरूप बोध में शब्दनिष्ठ शक्ति, योग, लक्षणा और गौणी वृत्ति कारण होती है। ऐसा लगता है कि योगीन्द्र गर्ग और वेदों ने पहली वृत्तियों से बोध कराया और यशोदामाता गौणी वृत्ति (रस्सी) से जानना चाहती हैं।

शक्तिर्योगो लक्षणा गौण्यपीति बोधे हेतौ श्रीपतौ तत्र चोक्तम्।

तद्बोध्यत्वं गर्गयोगीन्द्र-वेदैर्मन्ये गौण्या गोपिका ज्ञातुमैच्छत्।।

    उपक्रम में ही यह अभिप्राय प्रकट कर दिया है कि महापुरुष की कृपा ही भगवत्प्राप्ति का हेतु है। यशोदा माता इस रज्जु-बन्धन द्वारा ऊखल (खल) का भी श्रीकृष्ण के साथ बन्धन-सम्बन्ध करने में समर्थ हैं। माता- महापुरुष  के द्वारा भगवान् के साथ बाँधा गया ऊखल भी जड़ नलकूबर का उद्धार करने में समर्थ हो जाता है। बन्धन कुछ नहीं है। वह किसके द्वारा किसके साथ किया गया है- इसीका महत्त्व है।

     अपना बालक है – इसलिए माता को बाँधने का अधिकार है। पराया बालक होता तो उपेक्षा की जा सकती थी। कृष्ण ने अपराध किया है इसलिए वे बन्धन के योग्य हैं। श्रीजीवगोस्वामी कहते हैं कि रस्सी जब पहली बार दो अंगुल कम पड़ी तो यशोदा ने सोचा कि यह दैववश हुआ। परन्तु जब बार-बार दो अंगुल न्यून होने लगी, तब विभुता-शक्ति का चमत्कार देखने में आया। प्रेम बहुत अधिक है। परन्तु परिश्रम की पूर्णता और कृपा-विशेष की उपेक्षा है। अतएव सभी रस्सियाँ दो-दो अंगुल न्यून होती गयीं। विभुता-शक्ति भी इसीलिए प्रकट हुई कि श्री कृष्ण के बाल्योचित हठ की लीला पूर्ण हो।  

 (क्रमशः)

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