पत्रोत्तर

विश्वं दर्पण दृश्यमाननगरी तुल्यं निजान्तर्गतं,

पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया ।

यः साक्षात् कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं,

तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये । ।

इसमें कहा गया है कि श्रीदक्षिणामूर्ति भगवान् शंकर ही श्रीगुरुमूर्ति हैं। उन्हें मेरा यह प्रत्यक्ष नमस्कार है। जैसे वे सामने खड़े हों और देख रहे हों। वे अपने ब्रह्मात्मैक्य-बोध की मर्यादा में अपने आत्मा को ही अद्वितीय ब्रह्म के रूप में साक्षात् करते रहते हैं। उनकी दृष्टि क्या है ? उनकी दृष्टि यह है कि यह सम्पूर्ण विश्व दर्पण में दृश्यमान नगरी के समान है। वे इसे अपने आत्मा में ही देखते हैं। ‘निद्रा’ शब्द का अर्थ ‘स्वप्न’ है और ‘यथा’ शब्द का अर्थ ‘इव’ है। जैसे स्वप्न-दशा में भीतर उद्भूत सृष्टि ही बाहर के समान जान पड़ती है, वैसे ही यह विश्व-प्रपञ्च माया से अपने स्वरुप में प्रकट प्रतीत होने पर भी बाहर के समान ज्ञात होता है। अर्थात् वे अपने को अद्वितीय ब्रह्म और विश्व प्रपञ्च को स्वप्नवत् माया का विलास देखते रहते हैं। उन्हें है यह मेरा नमस्कार। इसमें कुछ भी अध्याहार करने की आवश्यकता नहीं है।

आपको दृष्टान्त की यह मर्यादा अवश्य ही ज्ञात होगी कि वक्ता का दृष्टान्त में जितना विवक्षित अर्थ होता है, उतना ही ग्रहण किया जाता है। यदि दृष्टान्त और दार्ष्टान्त सर्वथा समान हों, तो दृष्टान्त दृष्टान्त नहीं रह जाता, दोनों एक हो जाते हैं। मोहन के समान सोहन होने पर भी व्यक्ति दो होते हैं और उनकी अपनी-अपनी विशेषता भी होती है। निश्चय ही दर्पण में किसी बिम्ब का प्रतिबिम्ब पड़ता है, परन्तु यहाँ वक्ता बिम्ब-प्रतिबिम्ब भेद नहीं समझाना चाहता, दर्पण में दृश्यमान पदार्थ का मिथ्यात्व समझाना चाहता है। जिस दर्पण = ब्रह्मरूप अधिकरण या अधिष्ठान में यह विश्व-प्रपञ्च दीख रहा है उसमें सर्वथा नहीं है। नगर का वजन, लम्बाई-चौड़ाई, उसमें छोटे-बड़े, नीच-ऊँच, क्रम विस्तार,जो कुछ वस्तुओं का दीख रहा है, वह सब दर्पण में कुछ भी नहीं है। जो वस्तु जहाँ दीख रही हो, वहीं उसका अभाव भी हो, तो उसे मिथ्या कहते हैं। दर्पण दृश्यमान नगरी के अत्यन्ताभाव का अधिकरण है। अतएव वहाँ दृश्यमान नगरी मिथ्या है।

प्रतीति का अर्थ है मालूम पड़ना, होना नहीं। जैसे-आकाश में नीलिमा है नहीं, प्रतीत होती है। इस प्रतीति का कारण क्या है ? नेत्रके द्वारा आकाश का ग्रहण न होने के कारण यह अग्रहण ही अन्यथा ग्रहण के रूप में परिणत हो जाता है। जब हम पीतल को ठीक-ठीक नहीं देख पाते तब वह सोना मालूम पड़ता है। बालक भ्रमसिद्ध पदार्थ को भी सत्य मानता है। जब वस्तु का यथार्थ बोध हो जाता है तब सत्यत्व का भ्रम निवृत्त हो जाता है। अधिष्ठान ज्ञान के बिना अध्यस्त का मिथ्यात्व निश्चय नहीं होता।

जब तक मनुष्य नेत्र के द्वारा आकाश की ओर देखेगा, तब तक उसे नीलिमा दीखेगी। आँख बंद कर लेने पर नहीं दीखेगी। आँख न होने पर भी नहीं दीखेगी। आँख की उपाधि से आकाश को देखने के कारण वह नीला भासता है। इसी प्रकार, अनादि संस्कार-प्रवाह से युक्त अंतःकरण के द्वारा देखने पर ब्रह्म प्रपञ्च रूप में भासता है ! ब्रह्म-बोध के द्वारा प्रपञ्च मिथ्यात्व का निश्चय तो हो जाता है किन्तु प्रतीति नहीं मिटती। ठीक वैसे ही जैसे नीलिमा को मिथ्या जानने वालों के प्रति भी नीलिमा की प्रतीति नहीं मिटती। जबतक अंतःकरण के द्वारा व्यवहार करते रहेंगे तबतक प्रपंच की प्रतीति होती रहेगी; परन्तु उसमें सत्यत्व की भ्रान्ति नहीं रहेगी। जब अंतःकरण काम करना बंद कर देगा या लिंगभंग हो जायेगा तब विश्व-प्रपंच की प्रतीति नहीं होगी, माया कहते ही उसे हैं कि जो अविद्यमान वस्तु को दिखा दे और विद्यमान वस्तु को ढक दे। यही जादू का खेल है। माया अज्ञान-काल में जान पड़ती है, ज्ञान-काल में नहीं। अतः अज्ञान-काल में उसे ‘ना’ नहीं बोल सकते और ज्ञान काल में ‘हाँ’ भी नहीं बोल सकते। ‘हाँ’-‘ना’ का व्यवहार इसी माया में चलता है।

ब्रह्मज्ञान होने पर अंतःकरण दर्पण, उसमें दृश्यमान प्रपञ्च सब मिथ्या रूप से निश्चित हो जाता है। मनुष्य को ब्रह्मज्ञान के लिए प्रयास करना चाहिए।

भगवान् दिनों-दिन आपकी भक्ति-भावना बढ़ायें। साथ ही अद्वैत श्रद्धा भी शिथिल न होने पाये। शेष शुभ !

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वैदिक धर्म का सार है हित

हमारे वैदिक धर्म का सार है हित। यदेव हिततमं- यह उपनिषद् बोलती है। किसी का ऑपरेशन न करना पड़े यह बहुत बढ़िया बात है, इस भावना में अहिंसा है। रोगी को ऐसी दवा दे दो कि उसे दर्द न मालूम पड़े, आराम मिले, यह करुणा है। किन्तु ऑपरेशन करने से दुःख दूर हो जाय तो ऑपरेशन करो, मीठा खिलाने से दुःख दूर हो जाय तो मीठा खिलाओ, कड़वा खिलाने से दुःख दूर हो तो कड़वा खिलाओ -यह वैदिक धर्म है सृष्टि के अनादि अनन्त शाश्वत इतिहास में अनेक बार युद्ध और शान्ति के प्रसङ्ग आते हैं। काल अनादि है और हमेशा चलता रहता है। इसमें भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रसङ्ग आते रहते हैं। इसमें सबके हितपर जो दृष्टि है वही वैदिक धर्म है। अहिंसा से सबका भला हो तो ठीक है,करुणा से सबका भला करो। सबकी भलाई के लिए आवश्यकता हो तो हिंसा, आवश्यक हो तो अहिंसा, आवश्यकता हो तो करुणा और आवश्यकता हो तो कठोरता करो। हित करुणा में भी है और कठोरता में भी। आप श्रीरामचन्द्र का चरित्र देख लें; वे हित प्रधान हैं। श्रीरामचन्द्र के चरित्र में आपको करुणा भी मिलेगी, गीध पर कितनी करुणा है उनकी। किन्तु आपको उनके चरित्र में करुणा के साथ कठोरता भी मिलेगी। बड़ी भारी कठोरता मिलेगी। श्रीरामचन्द्र स्वजननिष्ठुर हैं। उन्होंने भरत के प्रति, सीता के प्रति, लक्ष्मण के प्रति स्वयं अपने प्रति कुछ कम कठोरता नहीं की। परन्तु उनकी कठोरता में हित की दृष्टि है। इसी प्रकार उनकी कोमलता में भी हित की दृष्टि है। भवभूति ने कहा-

वज्रादपि कठोराणि मृदुनि कुसुमादपि।

लोकोत्तराणां चेतांसि को नु विज्ञातुमर्हति। ।

अर्थात् लोकोत्तर पुरुष का चित्त कठोर भी होता है और मृदु भी होता है, परन्तु उनमें हित का वियोग कभी नहीं होता। उनका मन सदा-सर्वदा से हित से संयुक्त रहता है।

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जीवन में दो वस्तु आवश्यक है

जीवन में दो वस्तु आवश्यक है -एक बुद्धि और दूसरा कर्म।

कभी-कभी दोष कर्म में भी आ जाता है और बुद्धि में भी आ जाता है। दोनों में समरसता आवश्यक है। बुद्धि से संगत कर्म करें और कर्म से संगत बुद्धि रखें। बुद्धि और कर्म में वैसी ही मित्रता होनी चाहिए, जैसी मित्रता श्रीकृष्ण और अर्जुन में है। श्रीकृष्ण और बलराम में मतभेद है परन्तु श्रीकृष्ण और अर्जुन में मतभेद नहीं। महाभारत तथा भागवत में बलराम जी का जो अन्तिम जीवन है, वह श्रीकृष्ण से किञ्चित् पृथक् हो गया है। परन्तु अर्जुन का जीवन निरन्तर श्रीकृष्ण के साथ मिला हुआ है। आप कोई काम करते समय सीधी-सी बात देखिए। उसमें आपकी बुद्धि का विरोध तो नहीं ? यदि है तो उसको अनुकूल बनाइये। यह देखिये कि आप जो कुछ सोचते हैं उसमें कर्त्तव्यपालन का विरोध तो नहीं ?बुद्धि और कर्म दोनों का एक साथ मिलकर काम करना अनिवार्य है, उनमें मतभेद नहीं होना चाहिए।समझ श्रीकृष्ण की और कर्म अर्जुन का। दोनों के समुच्चय-दोनों के सामञ्जस्य से ही सफलता मिलती है। उनमें किञ्चित् भी अटपटापन नहीं होना चाहिए।

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अपना अध्यात्मशास्त्र भी चिकित्साशास्त्र है

हमारे आयुर्वेद के अनुसार जो चिकित्सा होती है उसमें एक होती है व्याधिप्रत्यनीक चिकित्सा और दूसरी होती है हेतुप्रत्यनीक चिकित्सा। जैसे किसी को जल्दी सर्दी हो जाती है। उसे एक दवा खिला दी, इंजेक्शन दे दिया, सेंक कर दिया और सर्दी मिट गयी तो यह व्याधिप्रत्यनीक चिकित्सा हुई। हेतुप्रत्यनीक चिकित्सा वह होती है, जो हमेशा के लिए दोष को मिटाने का प्रयास करे। अपना अध्यात्मशास्त्र भी चिकित्साशास्त्र है। इसके भी चिकित्सा के समान ही चार भेद होते हैं। यदि आप हिंसा मिटाना चाहते हैं तो क्रोध कम कीजिये। क्रोध कम करना चाहते हैं तो किसी व्यक्ति से, जाति से; सम्प्रदाय अथवा राष्ट्र से द्वेष मत कीजिये।

अब आगे आपको बताते हैं कि किसी कर्म से भी द्वेष मत कीजिये। नहीं तो वह कर्म जिसके अन्दर दिखेगा उसीसे आपका द्वेष हो जायेगा। गीता में है –

‘न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुसज्जते।’

तात्पर्य यह कि किसी भोग से द्वेष मत कीजिये। किसी वस्तु से द्वेष मत कीजिये। किसी चीज को देखकर आपके हृदय में आग न जले। हमारे कर्म में चोरी-बईमानी होती है वह क्यों होती है ? लोभ की अधिकता से होती है। काम की पूर्ति और दूसरी अपूर्ति। कामना की पूर्ति होने पर लोभ होता है और अपूर्ति होने पर क्षोभ होता है- कामात् क्रोधोऽभिजायते। काम के दो बेटे हैं-लोभ और क्रोध। पूरा हुआ तो लोभ और पूरा न हुआ तो क्रोध। भगवान् कहते हैं कि यदि तुम फल पर ही दृष्टि रखोगे तो पराधीन हो जाओगे। फल पराधीन है, कर्म स्वाधीन है। जो तुम कर सकते हो वह करो। कोई बीमार है। वह मरे नहीं, यह आपके हाथ में नहीं है। परन्तु अपनी शक्ति के अनुसार उसकी सेवा आपके हाथ में है। यदि आप यह चाहते हैं कि वह कभी नहीं मरे तो शास्त्र के विपरीत इच्छा करते हैं। वह एक-न-एक दिन मरेगा। तो कर्म कीजिये। कर्म करना, कर्त्तव्यपालन करना आपका धर्म है; परन्तु उसका फल समाज के हाथ में छोड़िये।

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आनन्द प्रबोध

भगवान् को क्यों चाहते हो ?

एक मनुष्य हमारे पास आता है तो हम सोचते हैं कि इसका हमारे पास आना-जाना ठीक है या नहीं। हम देखते हैं कि यह हमारी बात मानता है अथवा हमसे अपनी बात मनवाना चाहता है। यदि हम देखते हैं कि यह हठी है,अपनी बात हमसे मनवायेगा तो सोचते हैं कि इसके कारण हमारा एक बन्धन बढ़ेगा। उसके प्रति मन में उपेक्षा आती है। यदि हम देखते हैं कि यह हमारी बात मानने वाला है तब लगता है कि इससे कोई भय नहीं है, यह समीप रह सकता है। किन्तु जो हठी स्वभाव का है उसे देखकर लगता है-‘आज इसने मेरी छोटी बात नहीं मानी तो हानि नहीं किन्तु कभी कोई महत्त्वपूर्ण बात नहीं मानेगा तो हानि होगी।’

ईश्वर भी देखता है कि यह मेरी इच्छानुसार चलनेवाला है या मुझे अपनी इच्छानुसार चलाने की हठ करने वाला। जो अपने मन के वश में है वह साथ करने योग्य नहीं है। जब अपनी वासना घट जाय तब पुरुष महापुरुष के समीप जाने योग्य होता है। तुम भगवान् को क्यों चाहते हो ?उनको अपनी इच्छानुसार नचाने के लिए अथवा स्वयं उनकी इच्छा के अनुसार नचाने के लिए ? मीराबाई ने कहा है-

मैं गिरधर आगे नाचूँगी।

नाच नाच पिय रसिक रिझाऊँ प्रेमी जनको जाचूँगी। ।

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पत्रोत्तर

परम प्रिय

सप्रेम नारायण स्मरण !

आपके अन्तर्देश के सूक्ष्मतम प्रदेश में एक महापुरुष विराजमान है। आप उसको प्रकट होने का अवसर दीजिये। आप उस महत्ता में प्रतिष्ठित हो जाइये जो वस्तुतः आपका स्वरूप है। जब आप बाह्य क्षुल्लक पदार्थों के सम्बन्ध में आग्रह नहीं रखेंगे, तो उस महिमामय प्रकाश की चमक उसकी छवि-छटा सम्पूर्ण विश्व में बिखर जायेगी। लोग कहेंगे-यह हमारे स्वस्थ, पवित्र, प्रसन्न जीवन का, ज्ञान का और आनन्द का उद्गम स्थान है।

शेष भगवत्कृपा !

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श्री श्रीउड़ियाबाबाजी महाराज के संस्मरण

     श्रीमहाराजजी जिन लोगों के साथ वेदान्त चर्चा करते थे उनके ब्रह्माभ्यास की बात प्रायः कहा करते थे। उनका कथन था कि तत्त्वज्ञान हो जाने पर भी निरन्तर ब्रह्माभ्यास में तत्पर रहना चाहिए। परन्तु मेरी बुद्धि इस बात को स्वीकार नहीं करती थी। भला, जो कर्ता, कार्य, कारण सभी से अतीत सर्वाधिष्ठानभूत स्वयंप्रकाश प्रत्यक्चैतन्य में परिनिष्ठित है उस तत्त्ववेत्ता के लिए किसी भी प्रकार के साध्य-साधन की बात कैसे कही जा सकती है ? जिसमें कर्तृत्व ही नहीं उसके लिए किस कर्त्तव्य का विधान किया जा सकता है ? अतः एक दिन मैंने एकान्त में पूछा, – ‘महाराजजी ! तत्त्वज्ञ के लिए तो शास्त्र किसी भी कर्त्तव्य का विधान नहीं करता। फिर आप ब्रह्माभ्यास का प्रतिपादन किस दृष्टि से करते हैं ?’ आप बोले, ‘भैया ! ये लोग कुछ जानते तो हैं नहीं। अभ्यास भी छोड़ देंगे तो साधनहीन हो जायेंगे। मैं इसीलिए ब्रह्माभ्यास पर जोर देता हूँ, जिससे साधन में लगे रहने से इनकी निरंतर अपने लक्ष्य की ओर प्रगति होती रहे।’ मैंने पूछा,- ‘ब्रह्माभ्यास का स्वरुप क्या है ?’ आप बोले,- ‘ब्रह्म क्या अभ्यास की वस्तु है ? अरे ! सब प्रकार के अभ्यासों का निषेध ही अभ्यास है।  मैं किसी भावनात्मक अभ्यास की बात थोड़े ही कहता हूँ।’ 

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श्री श्रीउड़ियाबाबाजी महाराज के संस्मरण

     महाराजश्री के सामने मैंने उनके आश्रम में बहुत दिनों तक श्रीमद्भागवत आदि सद्ग्रन्थों की कथा कही है। एक दिन किसी प्रसङ्गवश मैंने कहा,- ‘जीव अपने को भगवान् का भोग्य समझने लगे-इसी का नाम भक्ति है। भक्त की दृष्टि अपने सुख पर कभी नहीं होती, वह तो सर्वदा अपने प्रियतम को ही सुख प्रदान करना चाहता है।’ कथा समाप्त होने पर सायंकाल जब मैं आश्रम की छत पर आपके सत्सङ्ग में गया तो इसी प्रसङ्ग को लेकर चर्चा चली। आप बोले, ‘भैया! जीव का परम प्रेमास्पद तो अपना आत्मा ही है। वह भ्रम से भले ही किसी अन्य को अपना प्रियतम माने। जीव चेतन है, अतः वह किसी का भोग्य या दृश्य नहीं हो सकता। वस्तुतः वही सबका भोक्ता या द्रष्टा है। जो जीव विषय का भोक्ता होता है उसे ‘संसारी’ कहते हैं और जो भगवान् का भोक्ता होता है वह ‘भक्त’ कहलाता है। इसी प्रकार समाधि का भोक्ता ‘योगी’ कहा जाता है और जो भोक्ता एवं भोग्य का बाध कर देता है वह ‘ज्ञानी’ है। ‘मैं भगवान् का भोग्य हूँ’ इस भावना में जो दिव्य एवं आलौकिक रस है भक्त उसका भोक्ता ही है। ‘मैं भोग्य हूँ’ यह भावना तो उसकी भोग्य ही है। अतः ‘आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति'(बृ० उ० 2/4/5) यह श्रुति समान रूप से सभी जीवों के स्वभाव का निर्देश करती है।

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श्री श्रीउड़ियाबाबाजी महाराज के संस्मरण

     

     श्रीमुनिलाल जी आदि कुछ भक्त आपकी जीवनी लिखना चाहते थे। परन्तु आपके आलौकिक चरित्र का चित्रण कैसे किया जाय -यह उनकी समझ में नहीं आता था। एक दिन किसी ने आपसे पूछा,’प्रभो ! संतों की जीवनी कैसे लिखनी चाहिए?’ आप बोले, ‘संतों की जीवनी कागज पर नहीं, दिल पर लिखनी चाहिए।’ सचमुच संतों की जीवनी कागज पर लिखने की वस्तु है ही नहीं। संतका जीवन तो सत्तत्त्व का जीवन है। वह अमर और एकरस है। उसका आविर्भाव हृदय में ही होता है। जो संत के जीवन की एक हल्की-सी झाँकी पा लेता है वह स्वयं संत हो जाता है।

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श्री श्रीउड़ियाबाबाजी महाराज के संस्मरण

     एक बार मैंने पूछा, – महाराजश्री ! ध्यान किसका करना चाहिए ?’

     आप बोले, ‘अपना।’

     मैं- ‘अपना’ से क्या आशय ? क्या अपने आत्मा का ?12

     आप – आत्मा क्या किसी का ध्येय हो सकता है ? मेरा आशय है – अपने शरीर का।

     मैं- शरीर का ध्यान करने से क्या लाभ होगा ? ध्याता जिसका ध्यान करता है अंत में उससे उसका तादात्म्य हो जाता है। अतः शरीर का ध्यान करने से ही तादात्म्य होगा। 

     आप- तादात्म्य तो तब होता है जब ध्येय में उपादेयबुद्धि होती है। मैं उपादेयबुद्धि रखकर शरीर का ध्यान करने की बात नहीं कहता। यदि उपादेयबुद्धि न रखकर शरीर का ध्यान किया जायेगा तो वह उसी प्रकार अपने से पृथक् भासेगा  जैसे घटद्रष्टा से घट। इस प्रकार अपने से शरीर का पार्थक्य अनुभव होने से तो सत्संग ही बढ़ेगा।  

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