पत्रोत्तर

परम प्रिय

सप्रेम नारायण स्मरण !

आपके अन्तर्देश के सूक्ष्मतम प्रदेश में एक महापुरुष विराजमान है। आप उसको प्रकट होने का अवसर दीजिये। आप उस महत्ता में प्रतिष्ठित हो जाइये जो वस्तुतः आपका स्वरूप है। जब आप बाह्य क्षुल्लक पदार्थों के सम्बन्ध में आग्रह नहीं रखेंगे, तो उस महिमामय प्रकाश की चमक उसकी छवि-छटा सम्पूर्ण विश्व में बिखर जायेगी। लोग कहेंगे-यह हमारे स्वस्थ, पवित्र, प्रसन्न जीवन का, ज्ञान का और आनन्द का उद्गम स्थान है।

शेष भगवत्कृपा !

new sg

श्री श्रीउड़ियाबाबाजी महाराज के संस्मरण

     श्रीमहाराजजी जिन लोगों के साथ वेदान्त चर्चा करते थे उनके ब्रह्माभ्यास की बात प्रायः कहा करते थे। उनका कथन था कि तत्त्वज्ञान हो जाने पर भी निरन्तर ब्रह्माभ्यास में तत्पर रहना चाहिए। परन्तु मेरी बुद्धि इस बात को स्वीकार नहीं करती थी। भला, जो कर्ता, कार्य, कारण सभी से अतीत सर्वाधिष्ठानभूत स्वयंप्रकाश प्रत्यक्चैतन्य में परिनिष्ठित है उस तत्त्ववेत्ता के लिए किसी भी प्रकार के साध्य-साधन की बात कैसे कही जा सकती है ? जिसमें कर्तृत्व ही नहीं उसके लिए किस कर्त्तव्य का विधान किया जा सकता है ? अतः एक दिन मैंने एकान्त में पूछा, – ‘महाराजजी ! तत्त्वज्ञ के लिए तो शास्त्र किसी भी कर्त्तव्य का विधान नहीं करता। फिर आप ब्रह्माभ्यास का प्रतिपादन किस दृष्टि से करते हैं ?’ आप बोले, ‘भैया ! ये लोग कुछ जानते तो हैं नहीं। अभ्यास भी छोड़ देंगे तो साधनहीन हो जायेंगे। मैं इसीलिए ब्रह्माभ्यास पर जोर देता हूँ, जिससे साधन में लगे रहने से इनकी निरंतर अपने लक्ष्य की ओर प्रगति होती रहे।’ मैंने पूछा,- ‘ब्रह्माभ्यास का स्वरुप क्या है ?’ आप बोले,- ‘ब्रह्म क्या अभ्यास की वस्तु है ? अरे ! सब प्रकार के अभ्यासों का निषेध ही अभ्यास है।  मैं किसी भावनात्मक अभ्यास की बात थोड़े ही कहता हूँ।’ 

new sg

श्री श्रीउड़ियाबाबाजी महाराज के संस्मरण

     महाराजश्री के सामने मैंने उनके आश्रम में बहुत दिनों तक श्रीमद्भागवत आदि सद्ग्रन्थों की कथा कही है। एक दिन किसी प्रसङ्गवश मैंने कहा,- ‘जीव अपने को भगवान् का भोग्य समझने लगे-इसी का नाम भक्ति है। भक्त की दृष्टि अपने सुख पर कभी नहीं होती, वह तो सर्वदा अपने प्रियतम को ही सुख प्रदान करना चाहता है।’ कथा समाप्त होने पर सायंकाल जब मैं आश्रम की छत पर आपके सत्सङ्ग में गया तो इसी प्रसङ्ग को लेकर चर्चा चली। आप बोले, ‘भैया! जीव का परम प्रेमास्पद तो अपना आत्मा ही है। वह भ्रम से भले ही किसी अन्य को अपना प्रियतम माने। जीव चेतन है, अतः वह किसी का भोग्य या दृश्य नहीं हो सकता। वस्तुतः वही सबका भोक्ता या द्रष्टा है। जो जीव विषय का भोक्ता होता है उसे ‘संसारी’ कहते हैं और जो भगवान् का भोक्ता होता है वह ‘भक्त’ कहलाता है। इसी प्रकार समाधि का भोक्ता ‘योगी’ कहा जाता है और जो भोक्ता एवं भोग्य का बाध कर देता है वह ‘ज्ञानी’ है। ‘मैं भगवान् का भोग्य हूँ’ इस भावना में जो दिव्य एवं आलौकिक रस है भक्त उसका भोक्ता ही है। ‘मैं भोग्य हूँ’ यह भावना तो उसकी भोग्य ही है। अतः ‘आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति'(बृ० उ० 2/4/5) यह श्रुति समान रूप से सभी जीवों के स्वभाव का निर्देश करती है।

new sg

श्री श्रीउड़ियाबाबाजी महाराज के संस्मरण

     

     श्रीमुनिलाल जी आदि कुछ भक्त आपकी जीवनी लिखना चाहते थे। परन्तु आपके आलौकिक चरित्र का चित्रण कैसे किया जाय -यह उनकी समझ में नहीं आता था। एक दिन किसी ने आपसे पूछा,’प्रभो ! संतों की जीवनी कैसे लिखनी चाहिए?’ आप बोले, ‘संतों की जीवनी कागज पर नहीं, दिल पर लिखनी चाहिए।’ सचमुच संतों की जीवनी कागज पर लिखने की वस्तु है ही नहीं। संतका जीवन तो सत्तत्त्व का जीवन है। वह अमर और एकरस है। उसका आविर्भाव हृदय में ही होता है। जो संत के जीवन की एक हल्की-सी झाँकी पा लेता है वह स्वयं संत हो जाता है।

new sg

श्री श्रीउड़ियाबाबाजी महाराज के संस्मरण

     एक बार मैंने पूछा, – महाराजश्री ! ध्यान किसका करना चाहिए ?’

     आप बोले, ‘अपना।’

     मैं- ‘अपना’ से क्या आशय ? क्या अपने आत्मा का ?12

     आप – आत्मा क्या किसी का ध्येय हो सकता है ? मेरा आशय है – अपने शरीर का।

     मैं- शरीर का ध्यान करने से क्या लाभ होगा ? ध्याता जिसका ध्यान करता है अंत में उससे उसका तादात्म्य हो जाता है। अतः शरीर का ध्यान करने से ही तादात्म्य होगा। 

     आप- तादात्म्य तो तब होता है जब ध्येय में उपादेयबुद्धि होती है। मैं उपादेयबुद्धि रखकर शरीर का ध्यान करने की बात नहीं कहता। यदि उपादेयबुद्धि न रखकर शरीर का ध्यान किया जायेगा तो वह उसी प्रकार अपने से पृथक् भासेगा  जैसे घटद्रष्टा से घट। इस प्रकार अपने से शरीर का पार्थक्य अनुभव होने से तो सत्संग ही बढ़ेगा।  

new sg

श्री श्रीउड़ियाबाबाजी महाराज के संस्मरण

     मैं पूर्वाश्रम में और संन्यास लेने के पश्चात् भी अनेकों वर्ष श्रीमहाराजश्री की सन्निधि में रहा हूँ। वे मुझे नित्य नये ही जान पड़ते थे। उनका अनुग्रह क्षण-क्षण में प्रकट होता रहता था। वर्षों बीत जाने पर भी उनकी गूढ़ोक्तियों को सुनकर आश्चर्य होता था।  हम ज्यों-ज्यों उनके निकट सम्पर्क में आते थे त्यों-त्यों उनका स्वरुप और भी आश्चर्यमय प्रतीत होता था। श्रीमद्भगवद्गीता में आत्मतत्त्व के विषय में जो आश्चर्यरूपता की बात कही है वह उनके तो व्यक्तित्व के विषय में ही चरितार्थ होती थी-

‘आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।

              आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्।।’ (2/29)

कारण कि वे अपने व्यक्तित्व को सर्वथा मिटा चुके थे। अब जो चरम और परमतत्त्व निषेधावधिरूप से अवशिष्ट था वही  भक्तों की भावना से व्यक्तित्त्व के रूप में भासता था। स्वयं अपनी दृष्टि  में तो वे सर्वातीत अथवा सर्वरूप ही थे।

     किसी जिज्ञासु ने पूछा,- ‘भगवान् ! आप ब्रह्म है ?’

     श्री महाराजजी- क्या तू ब्रह्म को आँखों से देखकर पूछ रहा है ?

     जिज्ञासु- तब क्या आप ज्ञानी हैं ?

     श्रीमहाराजजी – ज्ञान होने पर भी क्या ज्ञान का अभिमानी कोई धर्मी रहता है ?

     जिज्ञासु-तब क्या अज्ञानी हैं ?

     श्रीमहाराजजी-बावले हो। क्या अज्ञान कभी दृष्टि में आया है ?

     जिज्ञासु- तब आप कौन हैं ?

    श्रीमहाराजजी- तुम जितना देख रहे हो उसी के विषय में पूछो। तुम मुझे काम करते देखते हो। बस, मैं चराचर का सेवक हूँ। 

    हम लोगों को ऐसे उत्तर का अनुमान नहीं था। जिज्ञासु का मन श्रद्धा से झुक गया। उसने मन ही मन कहा, चराचर के सेवक तो भगवान् ही हैं, अथवा वे संत हैं जो उनसे एक हो चुके हैं। 

new sg

श्री श्रीउड़ियाबाबाजी महाराज के संस्मरण

     हमारे महाराज श्री तत्त्व नहीं, स्वयं तत्त्व ही थे।  उनकी वाणी तत्त्वज्ञ की, स्वयं तत्त्व की ही वाणी होती थी। वे उसी की भाषा में बोलते थे। उन्हीं दिनों की बात है। ‘कल्याण’ का वेदांताङ्क प्रकाशित होने वाला था। उसके लिए आपके उपदेशों का संग्रह करने के उद्देश्य से कल्याण-परिवार के कुछ सदस्य आये हुए थे। उनके तथा अन्यान्य जिज्ञासुओं के साथ आपका वेदान्तविषयक सत्सङ्ग चलता था। उसमें मैं भी सम्म्मिलित होता था। एक दिन मैंने पूछा, ‘महाराज जी !आत्मा तो अपना स्वरुप ही है। अतः वह अपने से कभी परोक्ष हो ही नहीं सकता। फिर आत्मा का परोक्ष ज्ञान कैसे?’

     मैं तो समझता था कि आप कहेंगे, ‘ज्ञान सर्वदा अपरोक्ष ही होता है।’ परन्तु आपने बड़ा ही चमत्कार पूर्ण उत्तर दिया। बोले, ‘ज्ञान अपरोक्ष भी नहीं है रे ! जो स्वयं है उसका क्या परोक्ष और क्या अपरोक्ष। केवल जिज्ञासुओं का भ्रम मिटाने के लिए ही परोक्ष और अपरोक्ष ज्ञान की कल्पना की जाती है।’ मैं सुनकर चकित रह गया। मैंने इस प्रकार का खुला उत्तर पहले कभी नहीं सुना था। यद्यपि उस समय मुझे दृढ़ निश्चय था कि मैं तत्त्वज्ञानी हूँ। इसी प्रकार एक बार जब मैंने- पूछा, ‘महाराज ! जीवन्मुक्ति श्रेष्ठ है या विदेहमुक्ति ?’ तो आप बोले, ‘भैया! इनका संकल्प ही अमङ्गल है। ऐसी थी आपकी तत्त्वदृष्टि।    

new sg 

श्री श्रीउड़ियाबाबाजी महाराज के संस्मरण

     उन्हीं दिनों की बात है, झूसी के सुप्रसिद्ध सन्त ब्रह्मचारी प्रभुदत्त जी के यहाँ एक वर्षीय नाम यज्ञ की पूर्णाहुति का समारोह था। मैं भी साधक के रूप में इस यज्ञ में था। महाराजश्री के तत्त्वावधान में इस महोत्सव का आयोजन हुआ था। अंत में प्रयाग पञ्चकोसी की परिक्रमा हुई। बाबा के एक निजजन थे ब्रह्मचारी श्री कृष्णानन्द जी। निजजन क्या, भक्तों की भावना के अनुसार तो वे बाबा के पुत्र ही थे। बाबा में भक्तों का शंकरभाव था और ब्रह्मचारी जी को वे साक्षात् गणेश ही मानते थे। आकृति-प्रकृति से भी वे गणेश जी ही जान पड़ते थे। अधिकतर इसी नाम से उनकी प्रसिद्धि भी थी। एकदिन उनसे कुछ परमार्थ चर्चा होने लगी। गणेश जी ने पूछा, “भगवान् कृष्ण के उपासक विविध रूपों में उनकी उपासना करते हैं। कोई बाल रूप में, कोई किशोर रूप में, कोई गोपीवल्लभ रूप में और कोई पार्थसारथी के रूप में। इन सबको क्या एक ही कृष्ण दर्शन होते हैं ?”

     मैं- एक ही कृष्ण के दर्शन क्यों होंगे ? भक्त के भाव भेद के अनुसार कृष्ण भी अनेक होंगे।

     गणेश जी – ऐसा कैसे हो सकता है ? इस प्रकार तो अनेक ईश्वर सिद्ध होंगे।

     मैं – ईश्वर तो एक ही है। परन्तु भगवान् का साकार विग्रह तो भक्त की भावना के अधीन है। वे भक्त के भगवान् हैं। इसीलिए तो भावुक भक्त वृन्दावनबिहारी, मथुरानाथ और द्वारिकाधीश को अलग-अलग मानते हैं। 

     इस प्रकार कुछ देर हम दोनों का परस्पर-विनिमय होता रहा। गणेश जी का कथन था कि एक ही कृष्ण भक्तों की भावना के अनुसार विभिन्न रूपों में दर्शन देते हैं और मैं कहता था कि परमार्थतत्त्वमें ईश्वरता तो आरोपित ही है और ईश्वर का व्यक्तित्व तो भक्त की भावना के अधीन है। अतः भक्तों के भाव-भेद के अनुसार वे अलग-अलग हैं। फिर यही प्रश्न हमने श्री महाराजश्री से किया। उन्होंने कहा, “अरे! प्रत्येक भक्त के कृष्ण अलग-अलग हैं – यही नहीं, प्रत्युत प्रत्येक भक्त भी जब-जब दर्शन करता है उसे नवीन कृष्ण का ही साक्षात्कार होता है, क्योंकि दृष्टि ही सृष्टि है। प्रत्येक दृश्य हमारी वृत्ति का ही तो विलास है। भगवद्दर्शन भी क्या बिना वृत्ति के ही होता है। अतः भक्त जब-जब भगवदाकार वृत्ति करता है उसे नवीन भगवन्मूर्ति का ही दर्शन होता है। भगवान् तो एक भी हैं और अनेक भी। स्वरूपतः वे एक हैं और भक्तों के लिए अनेक।” 

new sg  

जिज्ञासा और समाधान

प्रश्न -आपने कृपा करके बतलाया था कि इष्टमंत्र चौबीसों घण्टे वैखरी वाणी से जप करना शास्त्र-विहित है। इसका आपने प्रमाण के रूप में श्लोक भी कहा था। क्या मैं अपने इष्ट गोपाल-मन्त्र का भी इसी प्रकार जप कर सकता हूँ ?

उत्तर – तन्त्रसार में यह श्लोक है –

मन्त्रैकशरणो विद्वान्

मंत्रमेव सदाभ्यसेत्।’

तथा योगशिखामणि उपनिषत् में –

अशुचिर्वा शुचिर्वापि

प्रणवं यः स्मरेत् सदा।’

यहाँ ‘प्रणव’ शब्द का अर्थ इष्टमन्त्र है। आप अपने इष्टमंत्र का जप चौबीसों घण्टे कर सकते हैं। वैसे, गोपाल-मन्त्र का जप चाहे जब करें, परन्तु एक तो दूसरे मन्त्र का जप न करें और दूसरे अपना नित्य नियम पवित्र आसन पर बैठकर पूरा कर लें। चौबीस घण्टे की छुट्टी के नाम पर अपना नित्य नियम न तोड़ें।

“ध्रुव को बाल्यावस्था में यह ज्ञात नहीं था कि मैंने पूर्वजन्मों में कितने साधन किये हैं। वह तो अपमान की असहिष्णुता से ही घर से निकले थे। वैराग्य भी नहीं था; फिर भी वे भगवत्कृपापात्र हो गये। आपको ज्ञात न हो मेरा विश्वास है कि आपने भी अपने पूर्व जन्मों में बहुत से साधन अभ्यास किये हैं; अन्यथा इतने पवित्र विचार आपके मन में कहाँ से उठते ? अतः आप अगले जन्म में क्या होंगे, इसका विचार छोड़कर, ‘मैं मनुष्य बनूँ’, इस वासना का भी परित्याग करके इसी जन्म में भगवत्प्राप्ति के लिए साधन कीजिये। क्या ‘आनन्दवाणी’ में यह पढ़ने को नहीं मिला कि जिसको अगणित जन्मों से भगवत्प्राप्ति होने वाली थी, उसको एक ही जन्म में हो गयी।”

new sg

पत्रोत्तर

परम प्रेमास्पद

सप्रेम नारायण स्मरण

आपको प्रभु का दिया हुआ युवा शरीर और तत्सम्बन्धी परिवार प्राप्त है। प्रभु के इस दान की उपेक्षा मत कीजिये। शरीर ठीक रखिये। परिवार का भरण-पोषण कीजिये। सम्बन्धियों के प्रति जो कर्त्तव्य है,उनका उचित निर्वाह कीजिये। अपने सोने-जागने का समय निश्चित कीजिये। जीवन में प्रमाद-आलस्य को स्थान मत दीजिये। युवा अवस्था का सहज धर्म है -उत्साह। उत्साह वीर रस का स्थाई भाव है। इससे शरीर में और मन में सुषुप्त शक्तियों का जागरण होता है। सफलता आकाश से नहीं टपकती। वह सेना, सामग्री से भी प्राप्त नहीं होती। भीख माँगने से भी नहीं मिलती। आशावान् होकर दृढ़ता से अपने पथपर चलते रहिये। पहुँचना सिद्धि नहीं है, चलना ही सिद्धि है। चरैवेति। जीवन में जो मिलता है, वह सपना है। सपने बदलते रहते हैं, जीवन चलता रहता है।

आपके शरीर में रोग की अधिकता है, वह भोजन-पान आदि की अनियमितता के कारण है। मन कहीं, तन कहीं। दोनों में सामंजस्य नहीं है। जिसके मन में कर्त्तव्य-पालन के समय भी ग्लानि भर रही हो, वह स्वस्थ कैसे रह सकेगा ? आपका मन जीवन की मुख्य धारा से अलग हो गया है। आप क्यों नहीं अपने जीवन में भगवान् के भजन के लिए घण्टे-दो-घण्टे का एक या दो समय निश्चित कर देते। उतनी देर तक जप-पूजा कीजिये। बाकी समय में सामाजिक, पारिवारिक और शारीरिक कर्म कीजिये। निरन्तर भजन करने की जिद्द अज्ञानमूलक है। कोई भी व्यष्टि सृष्टि में ऐसा नहीं है जो निरन्तर एक ही वृत्ति रख सके। एक अशक्य अनुष्ठान का संकल्प करके पूरा न होने पर मनुष्य दुःखी होता है।

जब शरीर की स्थिति और मन के भजन में समन्वय नहीं हो पाता तब नाना प्रकार की व्याधि उत्पन्न होते हैं। आपके कष्ट का अधिकांश मानसिक है। क्योंकि भजन छोड़ते ही आपका आधा कष्ट दूर हो जाता है। मानसिक कष्ट अधिक दिनों तक रहने पर शारीरिक बन जाता है। आप अपने जीवनचर्या की एक समय-सारिणी बनाइये। उसमें घंटे या दो घंटे से अधिक नामस्मरण के लिए मत रखिये। शुद्ध आहार-बिहार कीजिये। वह अधिक या न्यून नहीं होना चाहिए। नियमित होना चाहिए। प्रातःकाल ही एक कार्यक्रम बना लीजिये कि आज दिन में इतने काम करने हैं। रोग के चार कारण हैं। मन के अनुकूल परिस्थिति न बनाना; बार-बार विपरीत परिस्थितियों का आना; अधिक श्रम करना;और शरीर में धातुओं का विषम हो जाना। आप निश्चय कर लीजिये कि समाज का, परिवार का, शरीर का ठीक-ठीक व्यवहार निर्वाह करना मुख्य है और बीच में या आदि-अन्त में भगवान् का स्मरण कर लेना आवश्यक है। बैटरी में बिजली भर लेने के बराबर मन को भगवान् के साथ जोड़ना आवश्यक है। यदि एक क्षण भी ठीक-ठीक मन की कड़ी भगवान् के साथ जुड़ जाय तो सारा दिन आनन्दमय हो जाता है। आप निराश न हों, उदास न हों। अपने जीवन को कर्त्तव्य-पथपर अग्रसर करें और अपने प्रत्येक कर्म के द्वारा सर्वात्मा प्रभु की आराधना करें।

शेष भगवत्कृपा !

new sg

Previous Older Entries