‘तुम्हारे पास खजाना है’

     एक युवक था उदास और निराश। विषण्ण एवं किंकर्त्तव्यविमूढ़। संयोगवश उसे एक दिन किसी महात्मा के दर्शन हुए। उसने ईश्वर को कोसते हुए कहा- ‘ईश्वर ने मुझे कुछ नहीं दिया। जो था, वह भी छीन लिया। न घर है न परिवार। न धन न सम्बन्धी। न खेत न रेत, मरने के सिवा और कोई चारा ही नहीं है।’

     महात्मा का कोमल हृदय करुणा से पिघल गया। उसके भोलेपन पर तरस खाकर बोले- ‘अभी तुम्हारे पास ईश्वर की दी हुई बहुत बड़ी सम्पत्ति है, खजानों का खजाना है। तुम उसे बेच दो तो सब काम बन जायेगा।’

     युवक- ‘मेरे पास तो कुछ भी नहीं है।’

     महात्मा- ‘तुम्हारे पास बहुत कुछ है।’

     उन्होंने उसे समझाया- ‘तुम कल आना। एक सेठ के हाथ तुम्हारी सब सम्पत्ति का क्रय-विक्रय कर देंगे।’

     दूसरे दिन समय पर युवक आया। महात्मा जी ने कहा- ‘तुम्हारे पैरों की कीमत दस हज़ार रुपये ! बोलो, देते  हो ?’

     युवक- ‘राम राम ! पाँव के बिना कैसे रहूँगा ?’

     महात्मा- ‘अच्छा, हाथ का मूल्य बीस हज़ार ! देते हो ?’

     युवक- ‘ना।’

     महात्मा- ‘आँख की पचास हज़ार। देते हो ?’

     युवक- ‘ना।’

     महात्मा- ‘अच्छा, सिर का मूल्य एक लाख रुपये ! बेचते हो ?’

     युवक- ‘महात्मा जी, आप भी अच्छी बात करते हैं। जब सिर  ही बिक जायेगा तब रुपये किस काम आयेंगे?’

     महात्मा- ‘मेरे भोले भाई ! जब तुम्हारे पास इतनी मूल्यवान् वस्तुएँ और यंत्र विद्यमान हैं जिन्हें तुम लाखों में भी नहीं बेच सकते हो, तब झूठ-मूठ ईश्वर को क्यों कोसते हो ? इन वस्तुओं और उपकरणों का यदि ठीक-ठीक उपयोग करो तो इस संसार में ऐसा कौन-सा काम है जो नहीं हो सकता ? ऐसी कौन-सी वस्तु है जो नहीं मिल सकती ? इनसे तो ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है, औरों की तो बात ही क्या ?’

     युवक पूरी शक्ति से अपने कर्त्तव्य के पालन में संलग्न हो गया।

 

 

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‘सुख की कुञ्जी’

     संसार सुख चार प्रकार के हैं- विषय सुख, अभिमान सुख, मनोरथ सुख और अभ्यास सुख। 

     यह सब सुख तीन-तीन प्रकार के हैं- लोकसुख, परलोक सुख और दिव्य सुख। 

    इनकी उपलब्धि के लिये शरीर, विषय, करण, भाव और जीवत्व की अपेक्षा है। व्यष्टि के लिये समष्टि का अनुग्रह अनिवार्य है। यही कारण है कि ये सब परतंत्र हैं। 

     जीव-सुख जन्य है, इसलिए अनित्य है। ब्रह्म-सुख सहज है, स्वतंत्र, निरपेक्ष है। इसलिए वह संसार सुख से सर्वथा विलक्षण है। 

     संसार-सुख परिणाम, ताप, संस्कारकृत, दुःख और गुणवृत्ति-विरोध से ग्रस्त है। ब्रह्म -सुख निरामय। 

      ब्रह्मसुख में पाँच बातें नहीं हैं- कारण, कार्य, द्वैत, विरोधी तथा अवान्तर भेद। 

 

       एक सच्ची घटना है। एक विद्वान् लेखक को कहीं से पाँच सौ रुपये मिले। उन्होंने अपनी पत्नी को दे दिये। पत्नी को उसकी पड़ोसिन ने समझाया ‘तुम्हारे पति उड़ा देने वाले हैं। घर में रुपया रहेगा तो वे उड़ा डालेंगे। अतः रुपया मेरे पास रख दो।’

     उस भोली स्री ने रुपया पड़ोसिन के पास रख दिया। उन सज्जन को कुछ दिनों बाद रुपयों की आवश्यकता हुई। पत्नी से माँगे तो उसने पहिले टाल दिया; किन्तु जब उसे समझाया गया कि रुपया ऐसे काम में लगाना है, जिसमें लाभ होना निश्चित है, तब वह पड़ोसिन से माँगने गयी। पड़ोसिन ने पहिले तो समझाना चाहा कि रुपया पति को मत दो; किन्तु जब स्री नहीं मानी, तब कह दिया कि मुझसे  वे खर्च हो गये। 

     इसका तात्पर्य यह है कि अपना सुख यदि तुम दूसरे के घर रखोगे- संसार के वस्तु, व्यक्ति में तुम्हारा सुख होगा, तो वहाँ से उड़ा दिया जायेगा। सुखी तुम तभी रहोगे, जब तुम्हारा सुख तुम्हारे पास रहे। 

 

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‘भगवद्-राग’

   राग की धारा को बदल देना, यह उपासना है। जो सौ – सौ झरने राग के बहते जा रहे थे, उनको रोककर केवल एक झरना बहे। 

        नारायण, ये रागी लोगों से पूछो कि तुम्हारा किस एक वस्तु से राग है ?खाये बिना रह न सकें, पहनें बिना रह न सकें, सोसाइटी के बिना रह न सकें, सिनेमा देखे बिना रह न सकें, चौपाटी पर जाए बिना रह न सकें ! थोड़ा बच्चे से, थोड़ा पत्नी से, थोड़ा पति से, थोड़ा माता से, थोड़ा बाप से- दुनिया में तो राग को बिखेर कर रखना पड़ता है। इस राग की विकीर्णता को ईश्वर की ओर उन्मुख कर देना, इसका नाम उपासना है, भक्ति है। उसमें एक तारीफ़ की बात और है। भक्ति में जो राग है, वह अनमिले और अनदेखे साजन से है। आप यह न समझना कि राग को पूर्ण करने के लिए यह उपाय महात्माओं ने बताया है। यह तो अंग-संग की वासना पूरी होकर थोड़े-ही मिटेगी ! अंग-संग की वासना का सत्यानाश ही होगा न !क्योँकि, जब अनदेखा, अनमिला साजन और अपने राग की ललित-वृत्ति, प्रिय-वृत्ति उसके साथ जोड़ दी; तो क्या उस अनमिले, अनदेखे साजन से अंग-संग होगा ? क्या उससे बच्चे पैदा होंगे ? क्या वह धन कमाकर लाकर देगा ? नारायण, वैराग्य नहीं होगा तो भक्ति होगी ही नहीं और भक्ति नहीं होगी तो सालम्बन वैराग्य नहीं होगा ! यह आपको इसलिए बताया कि यह महात्माओं ने भक्ति के रूप में निर्मली-बूटी ही डाली है। जैसे पानी में जो गन्दगी होती है, उसको साफ़ करने के लिए फिटकरी हाथ में लेकर घुमा देते हैं या निर्मली-बूटी का चूरा डाल देते हैं। अब वह निर्मलीबूटी का चूरा स्वयं चूरा है। लेकिन पानी की गन्दगी को हटा कर वह स्वयं भी बैठ जायेगा। तो यह भगवद्-राग देह-संग की वासना का पोषक नहीं है, निवारक है। देहासक्ति को मिटाने वाला है। भोगवासना को क्षीण करने वाला है।     

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‘चित्रशाला की महिमा’

  1. यह संसार एक चित्रशाला है, आर्ट गैलरी।
  2. अनेक प्रकार के चित्र हैं इसमें – शान्त, करुण, अद्-भुत वीर, शृङ्गाररस प्रधान। 
  3. चित्र बड़े सुन्दर हैं; परन्तु नाम और रूप के अतिरिक्त कुछ नहीं। 
  4. चित्र-भेद के अनुसार मन में भिन्न-भिन्न भाव और रस का उद्दीपन भी होता है, फलतः हम उन्हें देखकर सुखी या दुःखी होते हैं। 
  5. चित्रशाला के चित्रोंका स्पर्श वर्जित है; हम छूना चाहें तो भले छू लें; परन्तु नाम रूप के सिवा वहाँ कुछ है नहीं। उन्हें छूने पर मन की शान्त, करुण आदि स्थितियाँ होकर हम विषाद या आनन्द में भर सकते हैं। 
  6. चित्रशाला से बाहर आने पर, चित्र के सौन्दर्य पर उसके कलाकौशल पर उसके निर्माता पर दृष्टि जाती है उसकी हम प्रशंसा करते हैं। वस्तुतः आनन्द चित्र में नहीं, उसके कलाकौशल से हुआ और यह कौशल उसके चितेरे का है। 
  7. इस सृष्टि का चितेरा- चित्रकार- कारीगर परमात्मा है। उसके द्वारा सृष्ट हम प्रत्येक रस का उसकी पूर्णता का अनुभव करते हैं, और उसकी प्रशंसा करते हैं, करनी ही चाहिये। 
  8. वस्तु-तस्तु वह चित्रकार मैं ही हूँ, परमानन्द का समुद्र। 
  9. चित्र भी मैं ही हूँ, चित्रकार भी मैं ही हूँ और उसके भिन्न-भिन्न रस (शान्त आदि ) भी मैं ही हूँ। रस, रस्य और रसिक भी मैं ही हूँ। अन्य की सत्ता ही नहीं है। तब त्रिपुटी मिट गयी, समाधि लग गई। वस्तुतः समाधि भी आत्मा का विलास-मात्र है। अपने अतिरिक्त कोई चीज़ न थी, न है और न कल्पना की जा सकती है।  सच्चिदानन्द  घन। 

 

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‘पसन्द का संसार’

प्रश्न- अनादिकाल से इस संसार को सँवारने सुधारने का प्रयास चल रहा है। यह कितना सुधर जायेगा, तब तुम इसे पसन्द करोगे ?

उत्तर- संसार का स्वभाव ही सड़ना है, बिगड़ना है। इसे राम, कृष्ण, शङ्कर, रामानुज, बुद्ध, महावीर, गाँधी- सबने सुधारने का प्रयत्न किया; परन्तु यह अपनी गति से बहता जा रहा है। किसी के रोके न रुका, किसी के सँवारे न सँवरा। योगी अरविन्द के अथक प्रयत्न के बाद भी धरती पर स्वर्ग नहीं उतरा। इसलिए कोई भी मुमुक्षु इसकी दिव्यता पर विश्वास नहीं कर सकता। वह तो दृश्य से मुक्त होकर अपने द्रष्टा स्वरुप में, बन्धन से छूट कर अपने मुक्त स्वरुप में स्थित होने के लिए ज्ञान सम्पादन करेगा। सुधारने की चेष्टा सब अपनी-अपनी वासना के अनुसार करते हैं। काम पूरा नहीं होता, समय पूरा होता है। परमात्मा उसको मिलता है  जो इसकी ओर से आँख बंद करके उसको पाने के लिए चल पड़ता है। चिन्मात्र ब्रह्म में गोलोक भी स्फुरण है और धरती भी। स्फुरणमात्र में बनाने-बिगाड़ने की क्या आवश्यकता ?

 

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‘उपलब्धि ही सुख है’

प्रश्न- सुख इष्ट है या सुख की उपलब्धि (ज्ञान) ?

उत्तर- उपलब्धि के अतिरिक्त सुख कुछ नहीं है। उपलब्धि न हो तो सुख क्या ?

प्रश्न- ठीक है, परन्तु उपलब्धि का विशेष आकार सुख है।

उत्तर- फिर तो वह नाशवान् और दुःखपरिणामी होगा; क्योंकि आकार एक-से नहीं रहते, बदलते रहते हैं।

प्रश्न- ऐसा क्यों ?

उत्तर- तत्त्व नित्य होता है, आकार नहीं। अनुपलब्ध सुख की सत्ता नहीं है। उपलब्धिमात्र ही सुख है।

प्रश्न-  सुख की क्षणिकता से उपलब्धि भी क्षणिक क्यों नहीं ?

उत्तर- क्षणिकता उपलब्धि का विषय है। इसलिए उपलब्धि अकाल है। आकारगत क्षणिकता उपलब्धि में आरोपित। उपलब्धि ही सुख है। अकाल ही सत्य है। 

प्रश्न- उपलब्धि मात्र ही सुख है, क्या अभिप्राय ?

उत्तर- चाहे जिस आकार की उपलब्धि हो, वह उपलब्धि का परिणाम नहीं, विवर्त्त ही है। इसलिए कोई भी आकार प्रतीत हो अर्थात् सभी आकार तत्त्वतः उपलब्धि  स्वरुप ही हैं। उपलब्धि ही सुख है, उसका आकार चाहे सुख हो, दुःख हो या और कुछ। जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वही तो सुख है। यह भावना नहीं, सत्य है। 

 

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प्रसङ्गों में सूक्तियां

     एक बार श्रीमहाराजजी से बात हो रही थी, तभी किसी व्यक्ति ने कहा – ‘आम जनता मन्दिरों के उत्सव की भीड़भाड़ में बहुत जाती है, पर मुझे भीड़ में जाना नहीं रुचता। मैं तो एकान्त में बैठ कर भजन करना अधिक श्रेष्ठ मानता हूँ।’

     श्रीमहाराजजी ने कहा- ‘भैया ! तुम तो केवल दो तोले की जीभ को ही प्रभु सेवा में लगाते हो और वे दो मन के शरीर को ले जा कर प्रभु की सेवा में उपस्थित होते हैं।’

     यह सुनकर वह बिलकुल नम्र हो गया। 

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     एक बार हम श्रीमहाराजजी के पास बैठे थे। उसी समय किसी ने उनके हाथ में एक पुस्तक दी और उसकी भूलें शुद्ध कर देने की प्रार्थना की। श्रीमहाराजजी ने कहा- ‘मुझे किसी की गलती नज़र नहीं आती; क्योंकि ईश्वर की बनाई सृष्टि में कहीं दुःख व दोष नहीं है।’

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     एक बार सत्सङ्ग हो रहा था। एक व्यक्ति के बारे में किसी ने महाराजश्री से कहा- ‘उसे तो उच्छिष्ट-अनुच्छिष्ट का कोई विचार ही नहीं है।’ महाराजश्री ने उत्तर दिया – ‘वह अपने भाव में मग्न हमेशा जगन्नाथपुरी में रहता है और वहाँ इस बात का कोई विचार नहीं माना जाता। 

 

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