उलूखल बन्धन लीला-13

     श्री कृष्ण ने मन ही मन कहा- ‘जब मनुष्य यशोदयाविहीन होता है अर्थात् यशोदा एवं यश-दया से रहित होता है, तब उसके ऐसे ही कृत्य होते हैं। मानो, श्रीकृष्ण ने यहीं से शिक्षा लेकर गीता में कहा हो – ‘कामी दीन हो जाता है, लोभी पुत्रके प्रति भी निर्दय होता है, क्रोधी का विवेक नष्ट हो जाता है, अतः इन तीनों का परित्याग करना चाहिए। इस प्रसङ्ग में विस्तार से समझाने की आवश्यकता नहीं है।

     परन्तु यह क्रोध और आँसू मिथ्या हैं। इसका क्या प्रमाण है ? तत्काल एक व्यवहित स्थान पर जाकर नवनीत का आस्वादन करने लगते हैं। क्रोध और आँसू के साथ भोजन का मेल नहीं है। सच्चे आँसू आ रहे हों तो उदानवायु की प्रबलता के कारण निगलने की क्रिया नहीं हो सकती। वे अपना विनोद प्रकट कर रहे हैं। बालकों को भोजन दे रहे हैं और माता को उलाहना दे रहे हैं। 

    माता ने शान्ति से दूध को परिपक्व करके भगवद्भोग्य बना दिया। उसे अग्निताप से मुक्त करके उतार दिया- पार कर दिया। भागवत का काम पूरा हुआ। लौट कर आयी, देखा मटका फूटा हुआ है, अपने पुत्र का कर्म। हँसी आ गयी। जलते हुए दूध को तारा माता ने। मटके रहित दधि को तारा भगवान् ने। दैवगति से हानि देख कर माता को हँसी आ गयी। भला, होनी को कौन टाल सकता है। कहा भी है –

पीयूषेण सुराः श्रिया मुररिपुर्मर्यादया मेदिनी शक्रः कल्परुहा शशाङ्ककलया श्रीशंकरस्तोषितः। 

मैनाकादिनगा निजोदरगृहे यत्नेन संरक्षितास्तच्चूलीकरणे घटोद्भवमुनिः  केनापि नो वारित।।     

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-12

  माता के चले जाने पर श्रीकृष्ण के मन में कोप का संचार हुआ। प्रलय के समय ईश्वर के कोप से ही संहार-क्रिया होती है। अतः ईश्वर के साथ कोप का मेल नहीं है- यह सोचना असंगत है।  माता छोड़ कर चली जाय और बालक असंग-उदासीन रहे, उपेक्षा कर दे तो उसके हृदय में माता के प्रति प्रेम की न्यूनता है। शिशु अपना है तो माता भी अपनी है, वह क्यों चली जाय ? आचार्य वल्लभ का कहना है कि श्रीकृष्ण के हृदय में बहुत से बालक विद्यमान हैं। उनकी रक्षा एवं संवर्धन के लिए वे उन्हें पुष्टि दे रहे थे। भक्ति-मार्ग के अनुसार माता के द्वारा उसमें बाधा डाली गयी। अतएव कोप का उदय हुआ। कोप के अनुभाव प्रकट हुए। होठ लाल-लाल होकर फड़कने लगे। लाल-लाल होना रजोगुण है और फड़कना कुछ बोलने के लिए उद्वेग है। कोप और यशोदा के बीच में भगवान् के अधर में स्थित लोभ प्रकट हो गया। मानो,कह रहा हो, दोष माता का नहीं, मेरा है। आप में अतृप्ति=लोभ है और माता में दूध की रक्षा का लोभ है। आप मुझे दण्ड दीजिये, माता को नहीं। कृष्ण ने दोनों के लिए दण्ड-विधान किया। रक्तवर्ण रजोगुण को श्वेतवर्ण सत्त्वगुण-रूप दाँतों से दबा दिया। श्वेतिमा सात्त्विक ब्राह्मण है। रक्तिमा राजस क्षत्रिय है। दाँत द्विज हैं। सत्त्वगुण के द्वारा रजोगुण को अथवा ब्राह्मण के द्वारा क्षत्रिय को शिक्षा दी गयी। माता के लिए भी दण्ड-विधान हुआ । शैशव में ऐसा होता है। दूध के लोभ से मुझे छोड़ कर गयी तो दूध-दही की और भी हानि उठानी पड़ी। यज्ञायुध (दृषदशमा ) लोढ़े से भागवत-यज्ञ में बाधक भाण्डासुर को भग्न कर दिया।  

(क्रमशः) 

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संन्यास -जयन्तीपर –

     एक सज्जन अपने व्याह की वर्षगांठ पर हमें प्रणाम करने आये थे, ईश्वर करे उनका जीवन सफल हो। एक बालक अपनी वर्षगांठ पर मुझे प्रणाम करने को आया था। हमारे तो संन्यास की वर्षगांठ मनाने का ख्याल ही नहीं था। यहाँ ये जागीरदार बैठे हैं उन्होंने एक बार कहा कि ‘हम तो आपके नाम पर कुछ मनायेंगे।’ हमारा जन्मदिन तो आषाढ़ में आता है और वे कहने लगे कि ‘हम तो माघ में ही मनायेंगे। तब सर्वप्रथम गाँव में हमारी संन्यास जयन्ती मनायी गयी और फिर तो उसकी परम्परा बन गयी। 

     यदि हमसे कोई पूछे कि संन्यास-जयन्ती कैसे मनाई जाय तो हम बताते हैं कि “कमरा बंद कर हम बैठ जाएँ और लोगों को कह दें कि कोई हमारे पास मत आओ।” लाल कपड़े का नाम संन्यास नहीं है। लाल रंग तो अग्नि का प्रतीक है। ज्ञानाग्नि में प्रपंच भस्म हो जाता है, जैसे आग में लकड़ी। किसी को स्वर्ग जाना हो तो यज्ञाग्नि चाहिए। चोटी हिन्दू धर्म की प्रज्वलित शिखा है। मूर्धा में जो अग्नि है उसकी वह शिखा है। शिखा का अर्थ है – ‘शरीर मन्दिर है और शिखा शिखर है।’  ईसाई या मुसलमान धर्म में यह बात नहीं मिलती। हिन्दू  धर्म में प्रत्येक व्यक्ति के लिए वर्ण और आश्रम के अनुरूप कोई न कोई विधान है। एक ब्राह्मण को यज्ञोपवीत धारण करना चाहिए, रोज होम और त्रिकालसंध्या करनी चाहिए। यज्ञोपवीत में प्रत्येक में तीन-तीन सूत होते हैं, उनमें तीन गांठे होती हैं ; तीन-तीन सूत वाले डोरों की गिनती नव होती है। तीन त्रिगुण का प्रतीक है। 

     पुरोहिताई वाला धर्म संन्यास नहीं है। संप्रदाय का प्रचार संन्यास नहीं है। गृहस्थों के लिए जो वैदिक धर्म है, उसमें पुरोहित चाहिए। संन्यास तो प्रदीप्त अंतर्दृष्टि है। असल में ज्ञान का ही नाम संन्यास है।  अर्थात् संन्यास में द्वैत नहीं है।  

 

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उलूखल बन्धन-लीला-11

     एक जिज्ञासा का उदय होता है। श्रीकृष्ण हार्द-स्नेह रस का पान कर रहे हैं और यशोदा दर्शन-रस का। फिर वे उन्हें छोड़कर क्यों चली गयी ? इसके समाधान में श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती का कहना है कि आप यह शंका सर्वथा मत कीजिये कि यशोदा की श्रीकृष्ण पर जितनी ममता है उससे अधिक दूध पर है; क्योंकि प्रेम की परिपाटी ही ऐसी है।

तद्भक्ष्यपेयादिषु काप्यपेक्षता  ययापुनःसोपि समेत्युपेक्ष्यताम्।

प्रम्णो विचित्रा परिपाट् युदीरिता बोध्या तथा प्रेमवतीभिरेव या।।

    अपने प्रियतम के भक्ष्य, पेय आदि उपयोग की वस्तुओं में कोई ऐसी अपेक्षा होती है जिसके कारण कभी-कभी प्रियतम भी उपेक्षा का पात्र हो जाता है। यह प्रेम की विचित्र परिपाटी है। इसे कोई-कोई प्रेमवती ही समझ सकती है। 

     दूसरी बात यह है कि यशोदा माता परम भागवत हैं। उनकी करुणापूर्ण दृष्टि से ही दूध भगवदद्भोग्य एवं भगवद्-तादात्म्याप हो सकता है। ऐसे अवसरों पर भगवान् को एक ओर रखकर भी भक्त की ओर देखना पड़ता है। यशोदामाता यदि एक-दो बार दूध को गर्म-ठण्डा न करती तो वह भगवत्प्राप्ति के योग्य नहीं हो सकता था। 

     किसी-किसी ने ऐसी उत्प्रेक्षा की है कि जब यशोदा माता की दृष्टि अपने उत्संग में अभंग क्रीड़ा करते हुए श्यामसुंदर से हट गयी और दूध पर चली गयी तो वहाँ आसक्ति होना युक्ति-युक्त ही है। भगवद्विमुखता के परिणाम का यह निदर्शन है। इसमें संसारासक्त स्त्रियों के स्वभाव का भी स्फुटीकार है। श्रीहरिसूरि का भक्तिरसायन में कहना है कि महान् सत्पुरुष का तिरस्कार करके क्षुद्र वस्तु के प्रति आदरभाव का होना स्वाभाविक है। कृष्ण को छोड़ कर दुग्ध को सम्भालना यही सूचित करता है।

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन-लीला-10

     वह अधिक तपस्या करके अपने पूर्ण परिपाक की प्रतीक्षा करने लगा। भगवान् के सम्मुख या भागवत का दृष्टिपात होने पर प्रतीक्षा की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। भगवान् किसी की परीक्षा नहीं लेते: क्योंकि वे सर्वज्ञ हैं। जो न जानता हो वह परीक्षा करके जाने। वे जैसे अपने को अभिव्यक्ति देकर भक्तों में प्रकट होते हैं, वैसे ही भक्तों के भाव को अभिव्यक्ति देकर साधकों के लिए आदर्श व्यञ्जना करते हैं। अब भगवान् के मन में विचार-परम्परा का समुदय हुआ। माँ भक्त को बचाने के लिए दौड़ी, यह ठीक है परन्तु मुझे छोड़कर क्यों गयी ? बड़े=बड़े ऋषि-मुनि सोऽहं भावना के द्वारा भी मुझे प्राप्त नहीं कर सकते। वही मैं इसका भाव देखकर शिशु बना। यह दूध के लिए मुझे छोड़ कर जाती है। अवश्य क्रोध करना चाहिए। अभिप्राय यह है कि यशोदा श्रीकृष्ण को छोड़ कर चली जायँ और श्रीकृष्ण चुपचाप पड़े रहें तो मातृ-स्नेह की अभिव्यक्ति नहीं हुई और यदि श्री कृष्ण कुछ उपद्रव करें तथा माता उसके लिए शिक्षा-दण्ड का प्रयोग न करे तो पुत्र-स्नेह की अभिव्यक्ति नहीं हुई। स्नेह एक भाव है  और वह वस्तु, क्रिया अथवा शब्द के वाहन पर आरूढ़ होकर व्यवहार में उतरता है। निष्क्रियता में केवल असङ्गता ही अभिव्यञ्जित होती है। वह लीला-रस नहीं है। स्नेह के प्रवाह में बाधा पड़ने पर कोप का जन्म हुआ। 

     यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि सबसे प्रथम श्रीकृष्ण के मन में स्तन्यपान की कामना अवतीर्ण हुई। कामना के बाद स्तन्य का भोग हुआ। भोग में अतृप्ति हुई – यह लोभ है। लोभ के प्रतिहत होने पर कोप का उदय हुआ। भांड-भञ्जन की क्रिया=हिंसा आयी। झूठे आँसू = दम्भ का आना रोदनात्मक रुद्र के आगमन की सूचना है। बासी माखनकी चोरी तृष्णाधिक्य है। भय, पलायन और बन्धन उसके उत्तर भावी परिणाम हैं। कामना से बन्धन-पर्यन्त ईश्वर की लीला है। जीव के लिए सावधान रहने की प्रेरणा है। भगवान् सर्वात्मक हैं। वे स्तेनों और तस्करों के भी पति हैं। स्त्री-पुरुष, कुमारी-कुमार, युवा-वृद्ध सब उनका स्वरुप है। जो उनको पहचान लेता है वह सब भावों में सब रूपों में उनका दर्शन करता है। अच्छा, तो अब इस लीला में प्रवेश किया जाय।  

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन-लीला-9

    सब कुछ भगवदात्मक ही है। भगवद्धाम के जड़वत् प्रतीयमान पदार्थ भी चेतन ही होते हैं। भूमि, लता, वृक्ष, सब भावरूप से अभिव्यक्त सद्ब्रह्म है। पशु-पक्षी गाय-गोपाल के रूप में चिद्ब्रह्म है। आलम्बनविभाव यशोदा-कृष्ण, श्रीदामादि  सखा एवं कृष्ण, गोपी-कृष्ण आनन्दब्रह्म हैं। अग्नि पर संतप्त होता हुआ दुग्ध भी भाव-संवृत चेतन है।  वह अनेक जन्मों में तप करता हुआ भगवद्भोग्य दूध के रूप में परिणत हुआ है। अब भी तप कर रहा है। उसके मन में तीब्र अनुताप की ज्वाला प्रदीप्त हो उठी – हाय ! हाय ! सामने मेरे स्वामी हैं। उनके नाम स्मरण से भी जीवों का पाप-ताप भस्म हो जाता है परन्तु मैं अभागा उन्हीं के सामने संतप्त हो रहा हूँ। मुझे धिक्कार है। अब मैं आग में कूदकर आत्महत्या कर लूँगा। दूध के इस सङ्कल्प को जान कर भगवान् श्रीकृष्ण ने ही यशोदा को उस पर दृष्टिपात करने की प्रेरणा दी। संस्कृत में यशोदयेक्षितम् है। इसका अर्थ यह भी है कि अपने यश और दया को आज्ञा दे दी कि इनको सम्भालो। भक्तरक्षण के बिना मेरा यश अधूरा, दया निकम्मी। अन्यथा यशोदा श्रीकृष्ण-मुखारविन्द का पान छोड़ कर दूध के लिए क्यों दौड़ती ?

यन्नामस्मृतिरप्यलं विधुनुते संतापमस्य प्रभो –

रग्रे तापमुपैमि तद्धिगिति मां मत्वाग्नियाने पयः।।

उद्यउक्तं  भवतीत्यवेक्ष्य हरिणा सर्वेश्वरेणैव तत्। 

सत्यानन्दयशोदयेक्षितमिहाकारीति मन्यामहे।।

     दूध को अपनी भूल ज्ञात हुई। यशोदा का भगवद्-रस छूट गया। भगवान् के स्तन्य-पान में बाधा पड़ी। दूध है तो तपस्वी परन्तु प्रियतम को सुख पहुँचाने के उल्लासातिशय में इतना तन्मय हो गया कि इससे उन्हीं के सुख में बाधा पहुँच जाएगी – इसका ध्यान नहीं रखा। उसे अपने मर्यादातिक्रमण का ज्ञान हुआ। अपने को धिक्कारा। लज्जा-सङ्कोच का उदय हुआ। मुँह लटक गया अर्थात् पात्र में वह अपने स्थान पर बैठ गया।  

उन्मार्गवर्तनेन हि पररसभङ्गो मयाऽधुनाऽकारि। 

                                   धिङ् मामिति किं त्रपया पयस्तदासीदधो मुखं सद्यः।। (भक्तिरसायनम् )      

(क्रमशः )

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उलूखल बन्धन-लीला-8

     श्री जीवगोस्वामी के मत में उलूखल बन्धन-लीला पूर्वलीला एवं उत्तरलीला से विलक्षण है। मृद्भक्षण एवं ग्वालिनों की ताली के साथ नृत्य से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। परन्तु श्रीधर स्वामी ने इस लीला की यह संगति लगाई है कि मुख में विश्वदर्शन से माता के मन में जो विस्मय का उदय हुआ था, उसकी शान्ति के लिए प्रत्येक रस्सी दो अंगुल न्यून है, यह दिखा कर अपनी पूर्णता अभिव्यक्त कर दी गयी। श्री भक्त रसायनकार भक्त कवि श्री हरिसूरि ने यह कहा है कि मुख में नामरूपात्मक प्रपञ्च का दर्शन हो जाने पर भगवत्सेवा के कार्य में भक्त की प्रवृत्ति स्वाभाविक है। जो कर्मानुष्ठान के समय भी भगवत्स्मरण करता है उसे भगवान् सुलभ होते हैं। माता के वस्त्राभूषण के वर्णन से यह सिद्ध होता है कि जो भगवान् का श्रवण-वर्णन, ध्यान-गान सेवा-स्नेह में संलग्न है उसको संसार त्याग की आवश्यकता नहीं है। वह अपने विहित सांसारिक विषय-भोगों के साथ भी भगवान् को प्राप्त कर सकता है। भगवान् हृदय के स्तन द्वारा छलकते हुए रस को देखते हैं और उसका पान करना चाहते हैं। बाह्य नैवेद्य- नवनीत की ओर नहीं देखते। भक्ति की पूर्णता में कर्मत्याग का प्रत्यवाय नहीं है। जब अमृतस्वरूप ‘मैं’ प्राप्त हो गया तो भूसी कूटने से क्या लाभ ? यशोदा ने सारे कर्म छोड़ दिये। वे स्मित-सुन्दर मुख का पान करने लगीं और श्रीकृष्ण दूध का।

     शिशु का नैसर्गिक पेय है माता का स्तन्य। वह भगवद्भोग्य श्रीकृष्ण पेय-पय  हो चुका है। अब प्रश्न है- दूसरों के पय को भगवद्भोग्य बनाने का। यह भी महापुरुष ही कर सकते हैं। अतएव मन्थस्थान के बाह्य देश में परिपक्व होने के लिए अग्नि पर गाय का दूध चढ़ाया गया है। अग्निताप से उसमें उत्सेक (उफान)आया। भागवत हृदय का स्वभाव यह है कि आत्मसुख का सङ्कोच अथवा परित्याग करके भी अन्यसुख को समृद्ध करें। इस प्रसङ्ग में माता ने आत्मसुख का ही नहीं, भगवत्सुख में भी बाधा डाली। वह श्री कृष्ण को छोड़ कर वेग से जलते दूध को सम्भालने के लिए दौड़ पड़ी। दूध में उफान क्यों आया ? मन्थनानुरोध का परित्याग करके भगवद् अनुरोध के अनुसार दुग्धाप्यायन में प्रवृत्त यशोदा उसकी उपेक्षा करके दुग्ध-रक्षण में क्यों प्रवृत्त हुई ? 

(क्रमशः)

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