‘क्रोध क्यों ?’

    सब आत्मा है- क्रोध किस पर ?

     क्या स्थाणु में प्रतीयमान चोर पर भी लाठी-प्रहार ?

     सब भगवान् या उनकी लीला है। प्रत्येक घटना ही प्रेमपूर्ण है। 

     सब प्रकृति का खेल है। इसमें अच्छा-बुरा क्या ?

     अपने स्वभाव से विवश लोगों की चेष्टा पर ध्यान ही क्या ?

     हमारा अंतःकरण इन विचारों को आत्मसात् कर चुका है। अब उसमें क्रोध असम्भव है। 

     मैं जीवन भर अब कभी क्रोध नहीं करूँगा – ऐसा दृढ़ निश्चय है। 

     अनुकूलता-प्रतिकूलता के भाव अज्ञानमूलक हैं- यह क्रोध की नींव है। 

     जो मेरे मन और शरीर के प्रतिकूल क्रिया करता है, वह मुझे उनसे ऊपर उठने की प्रेरणा देता है। जहाँ कोई निशाना लगायेगा, मैं उससे ऊपर हूँ। 

     क्या यह घटना इतनी महत्त्वपूर्ण है कि मैं अपने चित्त का प्रसाद खो दूँ ?

     मुझे कोई कामना नहीं है, फिर किस कामना की पूर्ति में बाधा होने पर क्रोध करूँ ? new sg

जिज्ञासा और समाधान

प्रश्न- भगवान् किसे मिलते हैं ?

उत्तर- अपने में कशिश हो भगवान् से मिलने की और प्रयत्न हो। वे खींचें और हम उन्हें मदद दें खींचने में, जैसे कुएँ में गिरा हुआ व्यक्ति खींचनेवाले को, ऊपर लाने-वाले को रस्सी आदि में बँधकर और शान्त बैठ कर ऊपर आने में सहायता दे। 

प्रश्न- गुरु और शिष्य का सम्बन्ध कैसा हो ?

उत्तर – पारमार्थिक सत्ता में गुरु और शिष्य की आत्मा का और व्यावहारिक सत्ता में गुरु और शिष्य के मन का एकीकरण। 

प्रश्न- भाग्यवान् कौन ?

उत्तर – संसार की समृद्धि से सम्पन्न। 

प्रश्न – महाभाग्यवान् कौन ?

उत्तर – संसार के स्वामी प्रभु से सम्पन्न। 

प्रश्न- भगवान् प्रसन्न हैं, यह कैसे जानें ?

उत्तर- जब वह अपने और जीव के बीच में पड़े हुए अविद्या और माया के आवरण को हटा ले। इतनी निकटता में भी दर्शनका न होना अप्रसन्नता का सूचक है। 

प्रश्न – महात्मन् ! क्या कभी आप मेरा भी स्मरण करते हैं ?

उत्तर – हाँ, सेठ ! तभी जब ईश्वर को भूल जाता हूँ।   

 

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‘इच्छा आनन्द की अनुभूति में प्रतिबन्ध है।’

     बात कुछ वर्षों की ही है। गर्मी के दिन थे। मैं स्वर्गाश्रम में था। नित्य की भाँति सत्संग-गोष्ठी उठने पर मैं सायंकाल गंगातट पर चला जाया करता था। एक दिन वालुका-पुलिन पर बैठा था। एक सज्जन आये। बड़ी नम्रता से उन्होंने प्रणाम किया और उदास-से पास में ही बैठ गये। मैंने उनसे कुशल क्षेम और साधन सम्बन्धी चर्चा की तो वह बोले- ‘भगवन् ! दस वर्ष हो गये भजन करते हुये; परन्तु जीवन में किसी प्रकार की उन्नति नहीं हुई। कोई सफलता नहीं मिली। मुझे कोई लौकिक सुख भी नहीं चाहिए। मैं शपथ खाकर कहता हूँ कि ईश्वर के अतिरिक्त मुझे कुछ नहीं चाहिए।’

     मैंने पूछा- ‘तुम कैसा ईश्वर चाहते हो ?’

     ‘केवल आनन्दस्वरूप परमात्मा।’

     ‘मैं जो कहूँगा, वह करोगे ?’

     ‘जी हाँ !’

     ‘अच्छा, तो बैठो ! तुम आनन्द की इच्छा भी छोड़ दो।’

     ‘जो आज्ञा ! छोड़ दी।’

     इसके पश्चात् वह शान्त हो गये। समाधिस्थ घंटों बैठे रह गये। उनके मुख पर दिव्य आभा छा गई। आनन्द मानों रोम-रोम से फूटा पड़ रहा था। 

     उठने पर उन्होंने बताया कि ‘जैसा सुख, जैसा अनिर्वचनीय आनन्द आपकी कृपा से मुझे आज आया है वैसा अब तक कभी नहीं आया। इस सुख के आगे मैं संसार के किसी भी सुख को कुछ नहीं गिनता।’

     किसी वस्तु की इच्छा और अनुभूति-दोनों एक काल में नहीं होते। इच्छा ही आनन्द की न्यूनता या अभाव का सूचक है। उसके त्याग से ही आनन्द की अनुभूति होती है।  

 

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‘व्यवहार और परमार्थ का ऐक्य’

प्राणिमात्र की सेवा को परमार्थ न मानना तुम्हारे मन का दोष है या क्रिया का ?

     कोई भी क्रिया वस्तुरूप से परमार्थ ही है या नहीं ?

     वस्तुसत्य में, चिद् धातु में द्रष्टा-दृश्य का भेद सम्भव है अथवा नहीं ?

    द्रष्टा और दृश्य में कोई सन्धि (विभाजक रेखा ) है या नहीं ?

     है,तो वह भी दृश्य होने के कारण सन्धि कैसे ?

     नहीं है, तो द्रष्टा-दृश्य में भेद कैसे ?

     भेद नहीं, तो जैसे दृश्य को परमार्थ मानना मान्यता मात्र है, वैसे ही द्रष्टा को परमार्थ मानना भी मान्यतामात्र  है  कि नहीं ? 

     यदि दोनों मान्यता है तो संसार के सभी कर्म-भक्ति-ज्ञान सम हैं या नहीं ?

     तत्त्व में, साधना में, क्रिया में, द्रव्य में, गुण में, भाव में, जो भेद है वह मान्यता मात्र ही है, तत्त्वगत नहीं-यह जाने बिना निर्द्वन्द्वता, जीवन्मुक्ति अथवा वर्तमान जीवन के आनन्द में मस्ती आ सकती है या नहीं ?

     न भी आवे तो तत्त्वतः कुछ अन्तर हो गया क्या ?

     क्या जड़- चेतन दो हैं ?

     इनकी सन्धि क्या है ?

     सन्धि नहीं है तो सम्पूर्ण एकत्व ही है न ?

     फिर व्यवहार और परमार्थ अलग-अलग क्यों ?

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देह के विरोधी या अंतर्भूत होने का भाव मिटाये बिना परमार्थ और व्यवहार भेद भी नहीं जाता। यह भेद भी अन्य भेदों की भाँति दुःखद है; क्योंकि जो परमार्थ सर्व देश, सर्व काल, सर्व रूप और सर्व अनुभवरूप नहीं है,वह अपने अभाव में दुःख देगा ही, इसमें सन्देह नहीं। 

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प्रेमी आराधक के गुण

आनन्दमुकुन्द के प्रेमी आराधक के जीवन में यह बातें सर्वदा रहती हैं-

१. सम्मान– अपने इष्टदेव प्रियतम के प्रति सर्वदा सम्मान का भाव। अर्जुन किसी भी अवस्था में हों, कृष्ण को देखते ही खड़े हो जाया करते थे।

२. बहुमान– अपने प्राणाराम को स्मरण करानेवाली वस्तुओं को देखते ही तन्मयता। नृसिंह पुराण में कथा है कि राजा इक्ष्वाकु कृष्णसार मृग को देखते ही ‘कृष्णसार- कृष्ण कृष्ण’, कमल सामने आते ही ‘कमलनयन’ और श्याम मेघ देख कर ‘मेघश्याम श्यामसुन्दर’ पुकारते हुए तन्मय हो जाते थे।

३. प्रीति– अपने हृदय में आनन्दात्मक राग का उल्लास फुदकना। अक्रूर के घर पर कृष्ण के आने पर उनका हृदय बल्लियों उछलने लगा था।

४.विरह– एक गोपी कहती है- ‘अपने बड़ों के सामने कैसे बोलूँ ? हृदय फट रहा है।’

दूसरी कहती है- ‘जब हम विरह की आग में जल ही मरेंगी, तब यह निगोड़ी लाज किस काम आयेगी।

५. इतर विचिकित्सा – ‘दूसरे पर दृष्टि न डालना। भक्त उपमन्यु पर शिव जी प्रसन्न हुए। ऐरावत पर चढ़कर वज्रधारी इन्द्र के वेश में आये वरदान देने। उसने मुँह फेर लिया, बोला- ‘शंकर जी कीड़ा बना दें, नरक में डाल दें, स्वीकार है। आप त्रिलोकी का राज्य भी दें तो नहीं चाहिए। 

६. महिमख्याति – जहाँ-तहाँ, मौके-बेमौके अपने स्वामी की महिमा प्रकट करना। यमराज ने नरक में पड़े जीवों से कहा- ‘तुमने पहले कृष्ण भक्ति क्यों नहीं की ?’ दूतों से बोले – ‘भगवद्भक्तों के पास कभी न जाना।’ उपदेश के अच्छे पात्र मिले; परन्तु मन की बात जो ठहरी। 

७. तदर्थ प्राणधारण – केवल उसी के लिए जीना। खाये-पिये, सोये, पहने बिना शरीर ठीक नहीं रहेगा, तो उसे कैसे सुखी करेंगे। मुझे दुःखी देख कर वह भी दुःखी हो जायेगा। जीते हैं तो उसीके लिए, मरेंगे तो उसीके लिए। 

८. तदीयता– अपनी सब वस्तुओं को उसीका समझना। 

९. सर्वत्र तद्भाव – सबमें उसीका दर्शन। 

१०. अप्रतिकूल्य – कभी प्रतिकूल भाव न आना।  

 

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‘बन्धन कहाँ ?’

     आवरण लक्ष्य पर नहीं है। अपना आत्मा ही अविचारित-अज्ञात होकर आवृत- सा प्रतीत हो रहा है। अज्ञातरूप से आत्मा ही अन्य-सा, अप्राप्त-सा भासता है। न केवल लक्ष्य स्वतः प्राप्त है, वस्तुतः साधन भी स्वतः प्राप्त ही है। अनन्तता अपना स्वयंसिद्ध स्वरुप है, तो ज्ञान क्या अपना स्वयंसिद्ध स्वरुप नहीं है ? अनित्यता हमें छू नहीं सकती- हम विविक्त हैं। अद्वितीय असङ्ग में राग कहाँ ? हम विरक्त हैं। मन, इन्द्रिय, कर्म, शरीर, अभिमान, मनोराज्य- इनका विषय या आश्रय आत्मा नहीं है। फिर षट्सम्पत्ति की न्यूनता अपने स्वरुप में कहाँ ? बन्धन, किसका, किसको और क्या ?

    निश्चय, निर्णय एवं स्थिति को श्रवण, मनन और निदिध्यासन कहते हैं। पिछले दो पहले की अदृढ़ता या प्रतिबन्ध को मिटाते हैं। निश्चय अन्य विषयक हो तो प्रवर्तक होता है। स्व विषयक निश्चय साध्य का नहीं, सिद्ध का ही होता है। सिद्ध वस्तु का अनिश्चय से कुछ बिगड़ता नहीं, निश्चय से बनता नहीं। वह तो ज्यों का त्यों रहता है, केवल सत् हो तो। चित् तो निश्चय अनिश्चय का प्रकाशक है। उसे उनकी आवश्यकता नहीं। आनन्द हो और स्व हो तो निश्चय का कोई प्रयोजन ही न रहा। क्या अपना होना, जानना और प्रियता अपरोक्ष निश्चित नहीं है !    

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प्रसङ्गों में सूक्तियां

     एक बार श्रीमहाराजजी श्रीसाईं साहब के साथ बैठे थे। तभी महाराजजी के पास एक पागल प्रेमी आया और उनके पास ही तख्त पर बैठ कर और उनके कन्धे पर हाथ रख कर उनको प्यार करने लगा। सेवकों ने ऐसा करने से रोक दिया। श्री साईं साहब ने (उनके जाने पर ) कहा – ‘ऐसे आदमी से भय रखना चाहिए। इनकी मनोवृत्ति का क्या ठिकाना ?’ श्रीमहाराजजी ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘मुझे प्रसन्नता हो रही थी कि कोई तो हमारा आशिक हुआ।’

     किसी का दोष देखना असल में आपके स्वभाव में ही नहीं है। 

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     एक बार श्रीमहाराजजी के सामने किसीने नास्तिकों की निन्दा की।  किसी की निन्दा सुनना इनके स्वभाव के विरुद्ध है। उन्होंने बीच में ही किन्तु बड़े प्रेम से कहा- ‘भैया, नास्तिक भी भगवान् के वैसे ही हितैषी होते हैं, जैसे किसी बड़े आदमी का सेवक अपने मालिक का। इसे यों समझना चाहिए की जैसे मालिक को विश्राम करते देख कर सेवक आगन्तुक से कह देता है कि मालिक घर में नहीं है, वैसे ही नास्तिक भी – ‘भगवान् नहीं है’, यह कह कर उनके नित्य-निकुञ्ज-विहार में बाधा नहीं पड़ने देता। और फिर नास्तिक भी तो भगवान् की सृष्टि में ही हैं। भला गर्भस्थ शिशु की किसी भी क्रिया से माँ नाराज़ होती है ? भगवान् भी किसी नास्तिक से नाराज़ नहीं होते।  

 

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‘तुम्हारे पास खजाना है’

     एक युवक था उदास और निराश। विषण्ण एवं किंकर्त्तव्यविमूढ़। संयोगवश उसे एक दिन किसी महात्मा के दर्शन हुए। उसने ईश्वर को कोसते हुए कहा- ‘ईश्वर ने मुझे कुछ नहीं दिया। जो था, वह भी छीन लिया। न घर है न परिवार। न धन न सम्बन्धी। न खेत न रेत, मरने के सिवा और कोई चारा ही नहीं है।’

     महात्मा का कोमल हृदय करुणा से पिघल गया। उसके भोलेपन पर तरस खाकर बोले- ‘अभी तुम्हारे पास ईश्वर की दी हुई बहुत बड़ी सम्पत्ति है, खजानों का खजाना है। तुम उसे बेच दो तो सब काम बन जायेगा।’

     युवक- ‘मेरे पास तो कुछ भी नहीं है।’

     महात्मा- ‘तुम्हारे पास बहुत कुछ है।’

     उन्होंने उसे समझाया- ‘तुम कल आना। एक सेठ के हाथ तुम्हारी सब सम्पत्ति का क्रय-विक्रय कर देंगे।’

     दूसरे दिन समय पर युवक आया। महात्मा जी ने कहा- ‘तुम्हारे पैरों की कीमत दस हज़ार रुपये ! बोलो, देते  हो ?’

     युवक- ‘राम राम ! पाँव के बिना कैसे रहूँगा ?’

     महात्मा- ‘अच्छा, हाथ का मूल्य बीस हज़ार ! देते हो ?’

     युवक- ‘ना।’

     महात्मा- ‘आँख की पचास हज़ार। देते हो ?’

     युवक- ‘ना।’

     महात्मा- ‘अच्छा, सिर का मूल्य एक लाख रुपये ! बेचते हो ?’

     युवक- ‘महात्मा जी, आप भी अच्छी बात करते हैं। जब सिर  ही बिक जायेगा तब रुपये किस काम आयेंगे?’

     महात्मा- ‘मेरे भोले भाई ! जब तुम्हारे पास इतनी मूल्यवान् वस्तुएँ और यंत्र विद्यमान हैं जिन्हें तुम लाखों में भी नहीं बेच सकते हो, तब झूठ-मूठ ईश्वर को क्यों कोसते हो ? इन वस्तुओं और उपकरणों का यदि ठीक-ठीक उपयोग करो तो इस संसार में ऐसा कौन-सा काम है जो नहीं हो सकता ? ऐसी कौन-सी वस्तु है जो नहीं मिल सकती ? इनसे तो ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है, औरों की तो बात ही क्या ?’

     युवक पूरी शक्ति से अपने कर्त्तव्य के पालन में संलग्न हो गया।

 

 

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‘सुख की कुञ्जी’

     संसार सुख चार प्रकार के हैं- विषय सुख, अभिमान सुख, मनोरथ सुख और अभ्यास सुख। 

     यह सब सुख तीन-तीन प्रकार के हैं- लोकसुख, परलोक सुख और दिव्य सुख। 

    इनकी उपलब्धि के लिये शरीर, विषय, करण, भाव और जीवत्व की अपेक्षा है। व्यष्टि के लिये समष्टि का अनुग्रह अनिवार्य है। यही कारण है कि ये सब परतंत्र हैं। 

     जीव-सुख जन्य है, इसलिए अनित्य है। ब्रह्म-सुख सहज है, स्वतंत्र, निरपेक्ष है। इसलिए वह संसार सुख से सर्वथा विलक्षण है। 

     संसार-सुख परिणाम, ताप, संस्कारकृत, दुःख और गुणवृत्ति-विरोध से ग्रस्त है। ब्रह्म -सुख निरामय। 

      ब्रह्मसुख में पाँच बातें नहीं हैं- कारण, कार्य, द्वैत, विरोधी तथा अवान्तर भेद। 

       एक सच्ची घटना है। एक विद्वान् लेखक को कहीं से पाँच सौ रुपये मिले। उन्होंने अपनी पत्नी को दे दिये। पत्नी को उसकी पड़ोसिन ने समझाया ‘तुम्हारे पति उड़ा देने वाले हैं। घर में रुपया रहेगा तो वे उड़ा डालेंगे। अतः रुपया मेरे पास रख दो।’

     उस भोली स्री ने रुपया पड़ोसिन के पास रख दिया। उन सज्जन को कुछ दिनों बाद रुपयों की आवश्यकता हुई। पत्नी से माँगे तो उसने पहिले टाल दिया; किन्तु जब उसे समझाया गया कि रुपया ऐसे काम में लगाना है, जिसमें लाभ होना निश्चित है, तब वह पड़ोसिन से माँगने गयी। पड़ोसिन ने पहिले तो समझाना चाहा कि रुपया पति को मत दो; किन्तु जब स्री नहीं मानी, तब कह दिया कि मुझसे  वे खर्च हो गये। 

     इसका तात्पर्य यह है कि अपना सुख यदि तुम दूसरे के घर रखोगे- संसार के वस्तु, व्यक्ति में तुम्हारा सुख होगा, तो वहाँ से उड़ा दिया जायेगा। सुखी तुम तभी रहोगे, जब तुम्हारा सुख तुम्हारे पास रहे। 

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‘भगवद्-राग’

   राग की धारा को बदल देना, यह उपासना है। जो सौ – सौ झरने राग के बहते जा रहे थे, उनको रोककर केवल एक झरना बहे। 

        नारायण, ये रागी लोगों से पूछो कि तुम्हारा किस एक वस्तु से राग है ?खाये बिना रह न सकें, पहनें बिना रह न सकें, सोसाइटी के बिना रह न सकें, सिनेमा देखे बिना रह न सकें, चौपाटी पर जाए बिना रह न सकें ! थोड़ा बच्चे से, थोड़ा पत्नी से, थोड़ा पति से, थोड़ा माता से, थोड़ा बाप से- दुनिया में तो राग को बिखेर कर रखना पड़ता है। इस राग की विकीर्णता को ईश्वर की ओर उन्मुख कर देना, इसका नाम उपासना है, भक्ति है। उसमें एक तारीफ़ की बात और है। भक्ति में जो राग है, वह अनमिले और अनदेखे साजन से है। आप यह न समझना कि राग को पूर्ण करने के लिए यह उपाय महात्माओं ने बताया है। यह तो अंग-संग की वासना पूरी होकर थोड़े-ही मिटेगी ! अंग-संग की वासना का सत्यानाश ही होगा न !क्योँकि, जब अनदेखा, अनमिला साजन और अपने राग की ललित-वृत्ति, प्रिय-वृत्ति उसके साथ जोड़ दी; तो क्या उस अनमिले, अनदेखे साजन से अंग-संग होगा ? क्या उससे बच्चे पैदा होंगे ? क्या वह धन कमाकर लाकर देगा ? नारायण, वैराग्य नहीं होगा तो भक्ति होगी ही नहीं और भक्ति नहीं होगी तो सालम्बन वैराग्य नहीं होगा ! यह आपको इसलिए बताया कि यह महात्माओं ने भक्ति के रूप में निर्मली-बूटी ही डाली है। जैसे पानी में जो गन्दगी होती है, उसको साफ़ करने के लिए फिटकरी हाथ में लेकर घुमा देते हैं या निर्मली-बूटी का चूरा डाल देते हैं। अब वह निर्मलीबूटी का चूरा स्वयं चूरा है। लेकिन पानी की गन्दगी को हटा कर वह स्वयं भी बैठ जायेगा। तो यह भगवद्-राग देह-संग की वासना का पोषक नहीं है, निवारक है। देहासक्ति को मिटाने वाला है। भोगवासना को क्षीण करने वाला है।     

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