‘पसन्द का संसार’

प्रश्न- अनादिकाल से इस संसार को सँवारने सुधारने का प्रयास चल रहा है। यह कितना सुधर जायेगा, तब तुम इसे पसन्द करोगे ?

उत्तर- संसार का स्वभाव ही सड़ना है, बिगड़ना है। इसे राम, कृष्ण, शङ्कर, रामानुज, बुद्ध, महावीर, गाँधी- सबने सुधारने का प्रयत्न किया; परन्तु यह अपनी गति से बहता जा रहा है। किसी के रोके न रुका, किसी के सँवारे न सँवरा। योगी अरविन्द के अथक प्रयत्न के बाद भी धरती पर स्वर्ग नहीं उतरा। इसलिए कोई भी मुमुक्षु इसकी दिव्यता पर विश्वास नहीं कर सकता। वह तो दृश्य से मुक्त होकर अपने द्रष्टा स्वरुप में, बन्धन से छूट कर अपने मुक्त स्वरुप में स्थित होने के लिए ज्ञान सम्पादन करेगा। सुधारने की चेष्टा सब अपनी-अपनी वासना के अनुसार करते हैं। काम पूरा नहीं होता, समय पूरा होता है। परमात्मा उसको मिलता है  जो इसकी ओर से आँख बंद करके उसको पाने के लिए चल पड़ता है। चिन्मात्र ब्रह्म में गोलोक भी स्फुरण है और धरती भी। स्फुरणमात्र में बनाने-बिगाड़ने की क्या आवश्यकता ?

 

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‘दोष अपना’

     एक सेठ को नौकर की आवश्यकता थी। समाचार पत्रों में विज्ञापन छापा। लोग मिलने के लिए आने लगे। एक से सेठ ने कहा- ‘एक गिलास पानी लाओ।’ वह ले आया। सेठ ने कहा- ‘फेंक दो।’ उसने फेंक दिया। सेठ- ‘क्यों फेंक दिया ?’

     आगन्तुक- ‘आपने कहा, इसलिए फेंक दिया।’

     सेठ ने उसे विदा कर दिया। 

     बहुत आये बहुत गये- सबके साथ यही बर्ताव हुआ। अन्तिम व्यक्ति से जब सेठ ने कहा- ‘क्यों फेंक दिया’, तो उसने कहा – ‘मालिक, मुझसे भूल हुई।’  सेठ ने उसे रख लिया। 

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      जो गुणों के अन्दर ईश्वर का हाथ और दोषों में अपनी गलती देखता है, वही ईश्वर का प्यारा होता है।  

 

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‘आसक्ति मत करो, आगे बढ़ो’!

     वैराग्य के लिए परमात्मा को जानने की ज़रूरत नहीं है। वैराग्य के लिए तो संसार को जानने की ज़रूरत है। जो लोग संसार में फँसे हुए हैं – ये संसार के रहस्य को नहीं जानते हैं। जहाँ फँसे हुए हैं, उसीके रहस्य को नहीं जानते हैं। न धन का रहस्य जानें, न भोग का रहस्य जानें, न सोना आवे और न ही खाना आवे। यद्यपि विद्वान् पुरुष की बुद्धि भी रजोगुण और तमोगुण से विक्षिप्त हो जाती है; परन्तु विषयों के प्रति दोष-दृष्टि होने से वह उनमें फँसता नहीं। यह मत समझना कि विद्वान् पुरुष के मन में काम नहीं आता, क्रोध नहीं आता, लोभ नहीं आता।  यह तो सैकड़ों जगहों के संस्कार मनुष्य में आये हुए होते हैं – इसलिए, यदि मन में कोई विकार आ जाए तो पागल नहीं हो जाना कि हाय-हाय,  हमारे मन में तो यह आ गया, वह आ गया। इसके लिए डरना नहीं। कभी ऐसा मत समझना कि कोई ऐसी बात कभी मन में आ गयी तो हमारा नाश ही हो गया। यह तो बड़े-बड़े विद्वानों के मन में भी, साधुओं के मन में भी विकार आ जाते हैं;व्यास-वशिष्ठ के मन में भी आते हैं- ऐसा वर्णन शास्त्रों में है। लेकिन आ गए तो आ गए – उनके वश में मत हो जाओ। गिरे तो गिरे, फिर उठो। तन्द्रा मत करो। जहाँ गिरे हो, वहाँ दोष-दृष्टि करो और फिर से मन को पकड़ कर अच्छी जगह लगाओ। वहाँ आसक्ति मत करो, आगे बढ़ो। संसार में दोष-दृष्टि करो और आनन्द से परमात्मा की ओर चलो।       

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जीवनोपयोगी सूत्र

चार बात पर किसी का कन्ट्रोल हो जाए तो समझ लो कि वह सत्पुरुष हो गया-

     एक, हम इकट्ठा क्या करते हैं ? जो कायदे से हो, उसको इकट्ठा करें और बेकायदे हो तो इकट्ठा न करें। 

     दूसरी, हम भोगते क्या हैं ?

     खाना, पीना, औरत, मर्द- इस पर हमारा कन्ट्रोल है कि नहीं ?

     तीसरी, हम बोलते क्या हैं ?

    यह दुनिया का जो व्यवहार है, अगर आपको सीखना हो तो इतना सीख लीजिये कि यदि आपको बोलना आता है तो आप दुनिया के व्यवहार में हमेशा सफल होंगे। जितना बोलना जरूरी हो उतना ही बोलिये। जहाँ तक हो सके झूठ बोलने का मौका आवे तो उसको बोले बिना टाल दीजिये। बोलिये तो प्रिय बोलिये ! जिससे बोलिये, उसकी भलाई की बात हो तब बोलिये। मौके से बोलिये। भोजन करने बैठे और होने लगी जुलाब की चर्चा कि आज हमने जुलाब लिया था तो ऐसी-ऐसी टट्टी हुई ! ब्याह में इकट्ठे हुए तो चर्चा करने लगे कि उनके घर में जब मौत हो गई थी। तो ब्याह में मातमपुर्सी  की चर्चा करने लगे। तो बोलने का भी कोई मौका होता है। ज़रूरत हो तब बोलना चाहिए। बिना ज़रूरत नहीं बोलना चाहिए। 

    चौथी, जब हम अकेले में बैठते हैं, तब हमारे मन में क्या आता है ? दुश्मन की बात आती है कि दोस्त की बात आती है कि चोरी-बेईमानी की बात आती है। 

     ये चार बातें जिसके जीवन में बिलकुल ठीक हैं, उसका जीवन पक्का हो जाता है। 

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‘उपलब्धि ही सुख है’

प्रश्न- सुख इष्ट है या सुख की उपलब्धि (ज्ञान) ?

उत्तर- उपलब्धि के अतिरिक्त सुख कुछ नहीं है। उपलब्धि न हो तो सुख क्या ?

प्रश्न- ठीक है, परन्तु उपलब्धि का विशेष आकार सुख है।

उत्तर- फिर तो वह नाशवान् और दुःखपरिणामी होगा; क्योंकि आकार एक-से नहीं रहते, बदलते रहते हैं।

प्रश्न- ऐसा क्यों ?

उत्तर- तत्त्व नित्य होता है, आकार नहीं। अनुपलब्ध सुख की सत्ता नहीं है। उपलब्धिमात्र ही सुख है।

प्रश्न-  सुख की क्षणिकता से उपलब्धि भी क्षणिक क्यों नहीं ?

उत्तर- क्षणिकता उपलब्धि का विषय है। इसलिए उपलब्धि अकाल है। आकारगत क्षणिकता उपलब्धि में आरोपित। उपलब्धि ही सुख है। अकाल ही सत्य है। 

प्रश्न- उपलब्धि मात्र ही सुख है, क्या अभिप्राय ?

उत्तर- चाहे जिस आकार की उपलब्धि हो, वह उपलब्धि का परिणाम नहीं, विवर्त्त ही है। इसलिए कोई भी आकार प्रतीत हो अर्थात् सभी आकार तत्त्वतः उपलब्धि  स्वरुप ही हैं। उपलब्धि ही सुख है, उसका आकार चाहे सुख हो, दुःख हो या और कुछ। जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वही तो सुख है। यह भावना नहीं, सत्य है। 

 

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‘स्वरुप को जानो’

     पाप करो अथवा आत्महत्या, दण्ड तो मिलेगा ही।  सरकार शायद फांसी न भी दे; किन्तु पाप से कैसे छूटोगे ? सूक्ष्म उपाधियों के संस्कार जो तुम्हारे साथ हैं सदा-सदा से ! परमात्मा की प्राप्ति बिना आवागमन का चक्र चलता रहेगा संस्कार, कर्म, भोग के अनुसार। 

     पुनर्जन्म नहीं मानने से भी काम नहीं चलेगा। ऐसा कोई धर्म, मजहब नहीं जो मृत्यु के अनन्तर जीवात्मा का अस्तित्व न मानता हो। जन्म से पूर्व जीव का अस्तित्व न मानें ऐसे पंथ तो हैं, मरने के पश्चात् भी जीव रहता है- यह सब मानते हैं। 

     जीव का पुनर्जन्म न होता तो वेदान्त का अध्ययन व्यर्थ था। क्योंकि इसी जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्त करने के लिए ही तो वेदान्त की आवश्यकता है। व्यक्तिगत जीवन भोग, उपासना, कर्मकाण्ड आदि से भी सुधरेगा ! परन्तु हमेशा-हमेशा का बन्धन छुड़ायेगा वेदान्त – ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः। 

      अतः जीव के रूप पर विचार करके स्वरुप को जानो। 

 

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‘संसार की विविधता’

1. किसी पदार्थ को परमात्मा से भिन्न समझना संसार है। समझ का नाम संसार है- ईंट-पत्थर का नहीं। 

2.साधारण जन समझते हैं- देश, काल, वस्तु, शक्ति आदि से समझ बनती है। व्यवहार-दृष्टि से यह सत्य भी है; परन्तु सर्वथा सच्ची यह बात है कि समझ ही उनका निर्माण करती है। 

3. अपने को भोक्ता, दूसरे को भोग्य और दूसरे को भोक्ता, स्वयं को भोग्य समझना संसार है। दरअसल एक परमात्मा है, उसमें भोक्ता-भोग्य का भेद नहीं है। पुरुष भोक्ता है, स्री भोग्य- यह भ्रम है। स्री भोक्ता और पुरुष भोग्य- यह भी भ्रम है। विषय शरीर को खाये जा रहे हैं या शरीर विषयों को इसका निर्णय जज बनकर करो। 

4. जैसे बेवकूफ आदमी  दाद खुजलाने को ही सुख मानता है, वैसे ही त्वचा को त्वचा से, जीभ को मिर्च-मसाले से- इन्द्रियों को विषयों से घिसने को ही सुख कहा जाता है। यह तो केवल आवेग की शान्ति है। सुख कहाँ है ? जिसे लोग सुख कहते हैं, वह तो इच्छा उदय होने के पूर्व भी था। फिर मिला क्या ? भोग्य क्षणभंगुर है। इन्द्रियों में संतोषजनक शक्ति नहीं। भोक्ता भिन्न-भिन्न कर्मों के अनुसार न्यूनाधिक भोग करने के लिए विवश है। ऐसी स्थिति में संसार में क्या सुख है ?

तुम जज होकर निर्णय करो, भोगी सुखी है या त्यागी ? कहीं दोनों के निर्णायक जज साहब ! आप साक्षी ही तो सुखी नहीं ? 

 

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‘भेद कहाँ’

     मैं उनके लिए रो रहा था, उनकी प्यारी-प्यारी स्मृति में अपने को खो कर। वे आये मन्द-मन्द मुस्कराते हुए। हृदय की भेंट उनके सामने रखते हुए मैंने कहा- ‘मैं तुम्हारे लिए।’

     वे बोले- ‘और मैं, मैं तुम्हारे लिए !’

     दोनों ने एक-से ही शब्दों का प्रयोग किया। तब क्या अर्थ में भेद है ? ऐसा कैसे सम्भव है ? मेरे शब्दों की गम्भीरता में भेद सम्भव है- उनकी सत्यता तो असन्दिग्ध है।

     ऐसी अवस्था में शेष और शेषी का, भोक्ता और भोग्य का विभाजन कितना निराधार होगा ?

     इसका अर्थ यह हुआ कि तुम्हारा ‘मैं’ और मेरा ‘मैं’- ऐसा कुछ अलगाव नहीं है। दोनों का ‘मैं’ एक ही है। तुम्हारे लिए ‘मैं’ और मेरे लिए ‘तुम’ यह दोनों विकल्प मात्र हैं- अर्थशून्य वाग्व्यवहार-मात्र।

 

तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। 

   दिवीव चक्षुराततम् ।।  (विष्णु सूक्त -५ )

      ‘जैसे नेत्र आकाश में फैल कर सब कुछ देख लेता है अथवा जैसे आकाश में सूर्य का विस्तृत प्रकाश देखा जाता है, वैसे ही श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष भगवान् विष्णु के उस परम पद अर्थात् प्रत्यक्चैतन्याभिन्न ब्रह्म स्वरुप का सदा-सर्वदा अपरोक्ष अनुभव करते हैं।’  

 

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शरणागति :विभिन्न सम्प्रदाय

 

                  नारायण ,शरणागति जैन -सम्प्रदाय में भी है। जैन भाषा में इसे ‘आत्त -शरणो -भव ‘ बोलते हैं। आत्त माने आत्मा। यानी आत्मा की शरण में रहो। उनका कहना है कि यह सृष्टि पुद्गलों से बनी हुई है और इसमें अनादिकाल से संस्कारों की धारा बह रही है और जीव जन्मसे मृत्यु और मृत्युसे जन्ममें प्रभावित हो रहा है। अतः इनका आश्रय छोड़कर अपनी उस आत्माकी शरण लो ,जिसमें न राग है ,न द्वेष है ,न जन्म है और न मृत्यु है। इसको ‘आत्त शरणो भव ‘बोलते हैं। जैन -धर्ममें महावीरकी ,ऋषभदेवकी ,पार्श्वनाथकी शरण मुख्य नहीं है। वहाँ आत्म -शरण होना ही मुख्य है।   जो भी आत्म -शरण ,आत्म -निष्ठ हो गया ,वह निर्भार होनेके  कारण, सिद्ध-शिला पर बैठकर अलोकाकाश जानेका अधिकारी हो गया। 

          शरणागति बुद्ध -धर्ममें भी है। पर ,वहाँ शरणागति जरा दूसरे ढंग की है। इसमें -बुद्धं शरणं गच्छामि ,धर्मं शरणं गच्छामि ,संघं शरणं गच्छामि है।  तत्त्व -दृष्टि से बुद्धकी शरणागति है ,साधन -दृष्टिसे धर्मकी शरणागति है और आचार -दृष्टिसे संघकी शरणागति है। 
      
              शरण शब्दका प्रयोग बौद्ध -धर्ममें भी है और जैन -धर्ममें भी है और वेदान्तमें भी है ही। पर विशेषता यह है कि बौद्ध -धर्ममें बुद्ध -शरण है और जैन -धर्ममें आत्म -शरण है। बुद्धकी शरणमें हो जाना बुद्धकी करुणाकी पराकाष्ठा है और अपनी शरणमें आप हो जाना पौरुषकी पराकाष्ठा है। करुणा -प्रधान बौद्ध -धर्म है और अहिंसा -प्रधान जैन -धर्म है। न्याय -वैशेषिकमें शरणागतिका कोई प्रसङ्ग ही नहीं है। उसमें तो सभी पदार्थ ऐसे हैं कि यदि साधर्म्य -वैधर्म्य के द्वारा उनका ज्ञान ठीक – ठीक हो जाये तो मुक्ति हो जाती है। उसमें कोई लोक नहीं है। सांख्य -योगमें साधनके रूपमें ईश्वरप्रणिधान एवं अन्ततः आत्म -स्थिति ही शरण है। पूर्व -मीमांसा और वेदान्तमें अन्तःकरणकी शुद्धिके द्वारा परमात्माका साक्षात्कार मानते हैं। अब भक्ति -दर्शन बड़ा विलक्षण है। उनका मानना है कि भगवान् का एक नाम शरण है और दूसरा जो शरण -भाव है सो अर्थात् एक ,शरण -रूप भगवान् और दूसरा शरणागतिका भाव -माने उपाय और उपेय ,साधन और साध्य दोनों प्रभु ही हैं। वही मिलनेवाले और वही मिलानेवाले। 
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“ईश्वरकी अप्राप्तिका कारण”

 

                  ईश्वर के सम्बन्ध में यह बात ध्यानमें रख लें कि वह इस कालमें, वर्तमानमें न हो तो किसी कालमें नहीं होगा; क्योंकि वह कालसे कट गया, परिच्छिन हो गया। वह इस स्थान, देशमें न हो तो किसी स्थान में नहीं होगा; क्योंकि तब वह देशसे कट गया, परिच्छिन हो गया। वह इन्हीं रूपों -विषयोंमें न हो तो किन्हीं रूपोंमें नहीं होगा; क्योंकि तब वह विषय परिच्छिन हो गया। हम लोगोंमें ईश्वर न हो तो फिर कहाँ हो सकता है ?ईश्वरका अभी ,यहीं और इन्हीं रूपोंमें होना आवश्यक है। ऐसी अवस्थामें ईश्वरकी अप्राप्तिका कारण क्या है ?उसको न पहचानना। 
                                       
                                       इसके लिये हमारे अन्तःकरणमें ,हमारी बुद्धिमें एक ऐसी ज्ञान -वृत्ति का उदय होना चाहिये ,जिससे हम परमात्माको पहचानें। हमारे चित्त में जो परमात्माके विषयमें अज्ञान है, वह दूर हो। नारायण ,ईश्वर है तो सभी के हृदय में, किन्तु वह सुप्त निष्क्रिय है। अतः अविद्याको निवृत्त करने वाला ,विक्षेपका निवर्तक ईश्वर हमारे हृदय में प्रकट हो ,इसकेलिये हमें कुछ करना पड़ेगा। तो देखो, अधिभूत रूपमें यह ईश्वर प्रकट ही है ,विराट् विश्व ईश्वर ही है और अधिदैव रूपमें भी ईश्वर ही इसका नियमन कर रहा है ,किन्तु अज्ञानकी निवृत्ति के लिये अध्यात्म रूपमें ईश्वरके प्रकट होनेकी आवश्यकता है। वृत्त्यारूढ़ हुये बिना ब्रह्म अविद्या निवर्तक होता नहीं। तो जब मनुष्यके जीवनमें अन्तःकरणकी शुद्धि तथा प्रकाशिका वृत्ति का उदय होता है ,जब दोनों एकत्र होते हैं ,तभी परमात्माका आविर्भाव होता है। 
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