‘जिज्ञासा और समाधान’

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चिन्तन की महिमा

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‘सद्-गुण सबमें है’

     यह अपना अहंकार ही है कि हम कहीं किसी में दोष देखते हैं। इसी प्रकार गुण देखना भी अहंकार ही है। किसी के भी गुण का क्या भरोसा ?क्या पता है कि किसमें कब वासना जाग पड़ेगी ? और जब सबमें सर्वत्र ईश्वर है तो किसीमें भी सद्-गुण कभी भी व्यक्त हो सकते हैं। 

     एक सज्जन नदी के किनारे-किनारे कहीं जा रहे थे। उन्होंने देखा- कगार की आड़ में बैठ कर दो स्री-पुरुष सुरा पान कर रहे हैं और वासना से सनी गन्दी चेष्टाएँ। वे सोचने लगे – ‘ये कितने घृणित हैं, नीच हैं। मैं तो इनसे सौ गुना अच्छा हूँ।’ इतने में ही क्या देखते हैं कि सामने  ही नदी में एक नाव उलट गयी। नदी की वेगवती धारा में बहुत से स्री-पुरुष उभ-चुभ गोते खाने लगे। ‘बचाओ-बचाओ’ के चीत्कार से वातावरण मुखरित हो गया। शराबी बोतल फेंक कर, स्री को एक ओर हटा कर नदी में कूद पड़ा और डूबते लोगों को पकड़-पकड़ कर किनारे पहुँचाने लगा। वह स्री भी उसकी सहायता में लग गयी। शराबी ने तट पर खड़े किंकर्त्तव्यविमूढ़ सज्जन से कहा- ‘हम घृणित हैं, नीच हैं, ठीक है; परन्तु हमारा यह काम तो ठीक है न ? आइये, आप भी हमारे साथ डूबते लोगों को बचाइये।’ वे सज्जन भी जुट गये। उन्होंने अपने मन में निश्चय किया  कि किसी की कोई क्रिया देखकर हमेशा के लिए यह निश्चय कर बैठना कि यह नीच है, एक गलत निश्चय है। सबके अन्दर सत्यं शिवं सुन्दरं छिपा है। पता नहीं, कब प्रकट हो जाये।  

 

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जीवनोपयोगी सूत्र

चार बात पर किसी का कन्ट्रोल हो जाए तो समझ लो कि वह सत्पुरुष हो गया-

     एक, हम इकट्ठा क्या करते हैं ? जो कायदे से हो, उसको इकट्ठा करें और बेकायदे हो तो इकट्ठा न करें। 

     दूसरी, हम भोगते क्या हैं ?

     खाना, पीना, औरत, मर्द- इस पर हमारा कन्ट्रोल है कि नहीं ?

     तीसरी, हम बोलते क्या हैं ?

    यह दुनिया का जो व्यवहार है, अगर आपको सीखना हो तो इतना सीख लीजिये कि यदि आपको बोलना आता है तो आप दुनिया के व्यवहार में हमेशा सफल होंगे। जितना बोलना जरूरी हो उतना ही बोलिये। जहाँ तक हो सके झूठ बोलने का मौका आवे तो उसको बोले बिना टाल दीजिये। बोलिये तो प्रिय बोलिये ! जिससे बोलिये, उसकी भलाई की बात हो तब बोलिये। मौके से बोलिये। भोजन करने बैठे और होने लगी जुलाब की चर्चा कि आज हमने जुलाब लिया था तो ऐसी-ऐसी टट्टी हुई ! ब्याह में इकट्ठे हुए तो चर्चा करने लगे कि उनके घर में जब मौत हो गई थी। तो ब्याह में मातमपुर्सी  की चर्चा करने लगे। तो बोलने का भी कोई मौका होता है। ज़रूरत हो तब बोलना चाहिए। बिना ज़रूरत नहीं बोलना चाहिए। 

    चौथी, जब हम अकेले में बैठते हैं, तब हमारे मन में क्या आता है ? दुश्मन की बात आती है कि दोस्त की बात आती है कि चोरी-बेईमानी की बात आती है। 

     ये चार बातें जिसके जीवन में बिलकुल ठीक हैं, उसका जीवन पक्का हो जाता है। 

नव-वर्ष मंगलमय हो !

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‘क्रोध क्यों ?’

    सब आत्मा है- क्रोध किस पर ?

     क्या स्थाणु में प्रतीयमान चोर पर भी लाठी-प्रहार ?

     सब भगवान् या उनकी लीला है। प्रत्येक घटना ही प्रेमपूर्ण है। 

     सब प्रकृति का खेल है। इसमें अच्छा-बुरा क्या ?

     अपने स्वभाव से विवश लोगों की चेष्टा पर ध्यान ही क्या ?

     हमारा अंतःकरण इन विचारों को आत्मसात् कर चुका है। अब उसमें क्रोध असम्भव है। 

     मैं जीवन भर अब कभी क्रोध नहीं करूँगा – ऐसा दृढ़ निश्चय है। 

     अनुकूलता-प्रतिकूलता के भाव अज्ञानमूलक हैं- यह क्रोध की नींव है। 

     जो मेरे मन और शरीर के प्रतिकूल क्रिया करता है, वह मुझे उनसे ऊपर उठने की प्रेरणा देता है। जहाँ कोई निशाना लगायेगा, मैं उससे ऊपर हूँ। 

     क्या यह घटना इतनी महत्त्वपूर्ण है कि मैं अपने चित्त का प्रसाद खो दूँ ?

     मुझे कोई कामना नहीं है, फिर किस कामना की पूर्ति में बाधा होने पर क्रोध करूँ ? new sg

जिज्ञासा और समाधान

प्रश्न- भगवान् किसे मिलते हैं ?

उत्तर- अपने में कशिश हो भगवान् से मिलने की और प्रयत्न हो। वे खींचें और हम उन्हें मदद दें खींचने में, जैसे कुएँ में गिरा हुआ व्यक्ति खींचनेवाले को, ऊपर लाने-वाले को रस्सी आदि में बँधकर और शान्त बैठ कर ऊपर आने में सहायता दे। 

प्रश्न- गुरु और शिष्य का सम्बन्ध कैसा हो ?

उत्तर – पारमार्थिक सत्ता में गुरु और शिष्य की आत्मा का और व्यावहारिक सत्ता में गुरु और शिष्य के मन का एकीकरण। 

प्रश्न- भाग्यवान् कौन ?

उत्तर – संसार की समृद्धि से सम्पन्न। 

प्रश्न – महाभाग्यवान् कौन ?

उत्तर – संसार के स्वामी प्रभु से सम्पन्न। 

प्रश्न- भगवान् प्रसन्न हैं, यह कैसे जानें ?

उत्तर- जब वह अपने और जीव के बीच में पड़े हुए अविद्या और माया के आवरण को हटा ले। इतनी निकटता में भी दर्शनका न होना अप्रसन्नता का सूचक है। 

प्रश्न – महात्मन् ! क्या कभी आप मेरा भी स्मरण करते हैं ?

उत्तर – हाँ, सेठ ! तभी जब ईश्वर को भूल जाता हूँ।   

 

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‘इच्छा आनन्द की अनुभूति में प्रतिबन्ध है।’

     बात कुछ वर्षों की ही है। गर्मी के दिन थे। मैं स्वर्गाश्रम में था। नित्य की भाँति सत्संग-गोष्ठी उठने पर मैं सायंकाल गंगातट पर चला जाया करता था। एक दिन वालुका-पुलिन पर बैठा था। एक सज्जन आये। बड़ी नम्रता से उन्होंने प्रणाम किया और उदास-से पास में ही बैठ गये। मैंने उनसे कुशल क्षेम और साधन सम्बन्धी चर्चा की तो वह बोले- ‘भगवन् ! दस वर्ष हो गये भजन करते हुये; परन्तु जीवन में किसी प्रकार की उन्नति नहीं हुई। कोई सफलता नहीं मिली। मुझे कोई लौकिक सुख भी नहीं चाहिए। मैं शपथ खाकर कहता हूँ कि ईश्वर के अतिरिक्त मुझे कुछ नहीं चाहिए।’

     मैंने पूछा- ‘तुम कैसा ईश्वर चाहते हो ?’

     ‘केवल आनन्दस्वरूप परमात्मा।’

     ‘मैं जो कहूँगा, वह करोगे ?’

     ‘जी हाँ !’

     ‘अच्छा, तो बैठो ! तुम आनन्द की इच्छा भी छोड़ दो।’

     ‘जो आज्ञा ! छोड़ दी।’

     इसके पश्चात् वह शान्त हो गये। समाधिस्थ घंटों बैठे रह गये। उनके मुख पर दिव्य आभा छा गई। आनन्द मानों रोम-रोम से फूटा पड़ रहा था। 

     उठने पर उन्होंने बताया कि ‘जैसा सुख, जैसा अनिर्वचनीय आनन्द आपकी कृपा से मुझे आज आया है वैसा अब तक कभी नहीं आया। इस सुख के आगे मैं संसार के किसी भी सुख को कुछ नहीं गिनता।’

     किसी वस्तु की इच्छा और अनुभूति-दोनों एक काल में नहीं होते। इच्छा ही आनन्द की न्यूनता या अभाव का सूचक है। उसके त्याग से ही आनन्द की अनुभूति होती है।  

 

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