उलूखल बन्धन-लीला-3

     राजा परीक्षित यह लीला सुनते-सुनते मृत्यु की विभीषिका और मोक्ष की अभीप्सा से मुक्त हो गये। उन्होंने अपने हृदय की लालसा प्रकट की- ‘यह सुख-सौभाग्य  जो देवकी-वसुदेव के लिए भी अलभ्य है, इन्हें कैसे मिला ? मुझे कैसे मिलेगा ?’ शुकदेव मुनि मुस्कराये- ‘बस, इतने में ही आश्चर्यचकित हो गये ? यशोदा माता ने इस शिशु-ब्रह्म को गाय बांधने की रस्सी से ऊखल में बाँध दिया था। इतने भक्तवत्सल, भक्तों के इतने अपने। वस्तुतः प्रेम भक्त के हृदय में नहीं होता, वह ईश्वरके हृदय में होता है। ईश्वर जब भक्त के परवश होकर विवशता की माधुरी का आस्वादन करता है तो उसे आत्मसुख से भी कुछ अधिक अनुभूति होती है। जहाँ विवशता में भी मिठास का अनुभव हो वहाँ प्रेमरस छलकता है। ईश्वर का यह बन्धन भक्त-वात्सल्य का अनुपम उदाहरण है।’

     इसकी उपलब्धि कैसे होती है ? जो साधन से मिलता है वह सीमित पारिश्रमिक होता है। जो स्वामी की कृपा से मिलता है वह कब मिले; कब न मिले, यह निश्चित नहीं रहता। तब भगवद्रस का आस्वादन कैसे हो ? न साधन, न कृपा। एक तीसरा मार्ग है। वह है महापुरुष का प्रसाद। यह ठीक है कि ईश्वर के अधीन है सबकुछ, परन्तु वह ईश्वर प्रेम के अधीन है। प्रेम का धनी है। महापुरुष और प्रेम का प्रेप्सु है ईश्वर। महापुरुष भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के हृदय में प्रेमरस का संचार करके उसके द्वारा ईश्वर की रस-पिपासा को तृप्त करते हैं। अतएव महापुरुष जब ईश्वर से कह देते हैं कि तुम इस भक्त के साथ ऐसी लीला करो, ईश्वर को वैसा ही करना पड़ता है और इस विवशता में ईश्वर का प्रेम उच्छलित होने लगता है। महापुरुष के प्रसाद से यह रस केवल भक्त को ही नहीं, अभक्त को भी मिल सकता है। उदाहरणार्थ, कुबेर के उद्दण्ड एवं जड़भावापन्न यमलार्जुन। 

(क्रमशः )

 

new sg

उलूखल बन्धन-लीला-2

     आईये, मेरे साथ गोकुल में चलिये। भले ही आप अन्तर्देश के निभृततम प्रदेश में प्रवेश करके नितान्त शांत स्थिति में विराजमान हों।  आइये, एकबार एकान्तकान्तार का शून्यप्रदेश छोड़कर, जहाँ गौएँ-इन्द्रियाँ  घूम-फिरकर विषय-सेवन करती हैं वहीं उन्हीं के बीच में उन्हीं विषयों में, निराकार नहीं साकार, अचल नहीं चञ्चल, कारण नहीं कार्य, विराट् नहीं शिशु, गंभीर नहीं स्मितसुन्दर, जगन्नियन्ता नहीं यशोदोत्सङ्गलालित, साक्षात्परब्रह्म का दर्शन करें। यह ब्रह्म का प्रतीक नहीं है, साधन करके ब्रह्म नहीं हुआ है, अविद्यानिवृत्ति करके ब्रह्मानुभूति नहीं प्राप्त की है, यह ब्रह्म का अवतार नहीं है, यह आचूल-आपादमूल शिशु-ब्रह्म है- इसके दर्शन कीजिये।

     अभी-अभी यशोदा माता इस शिशु के मुख में विश्व-दर्शन करके चकित-विस्मित हो चुकी हैं। श्याम-ब्रह्म ने सोचा- कहीं मेरी माँ सिंहासन पर बैठा कर चंदनमाल्य अर्पित न करने लगे, आरती न उतारने लगे इसलिए ‘मैया-मैया’ कहकर गले में दोनों हाथ डाल दिये, हृदय से मुख लगा दिया। माता सबकुछ भूलकर दुग्धाकार-परिणत हार्दस्नेह-रस का पान कराने लगी। पहले का विश्वरूपविस्मृति के गर्भ में लीन हो गया। ऐश्वर्य अन्तर्धान हो गया। शैशव-माधुरी अभिव्यक्त हुई। इसमें प्रपञ्च का विस्मरण और शिशु-ब्रह्म में परमासक्ति अनिवार्य है। यह सुख स्वर्ग के समान परोक्ष नहीं है, ब्रह्मानुभूति के समान शान्त नहीं है, विषय-संसर्ग के समान आपातरमणीय एवं विनाशी नहीं है। इस रस में देश,काल एवं वस्तु का लोप हो जाता है। ऐसा ही हुआ। माँ सबकुछ भूल कर इसी रस में डूब गयी।    

(क्रमशः )

 

new sg

उलूखल बन्धन-लीला-1

     

     प्रपंच का विस्मरण और भगवान् में तन्मयता यही लीला का प्रयोजन है। यह प्रपंच का लय करती है और भगवान् में लीन करती है। जहाँ स्वयं भगवान् ही लीलानायक हों, उस लीला की पूर्णता में कोई संदेह नहीं हो सकता। वहाँ प्रपञ्च का विस्मरण हो जाय, भगवान् की भगवत्ता भी भूल जाय, हम उनकी लीला में तन्मय हो जायें, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। यहाँ हम इतना स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि भगवान् की लीला के प्रतीकार्थ निकाले जा सकते हैं परन्तु वस्तुतः भगवान् की लीला प्रतीक नहीं होती। निराकार का साकार प्रतीक होता है। परोक्ष का प्रत्यक्ष प्रतीक होता है। अज्ञात का ज्ञात प्रतीक होता है। परन्तु जो सर्वात्मा, सर्व-स्वरुप है वह लीलाधारी और लीला भी है। अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है। सुनार भी वही, सोना भी वही। अतएव भगवान् की लीला भगवत्स्वरूप ही होती है और उसमें तन्मयता भगवत्स्वरूपापत्ति ही होती है। उस रस-कल्लोल में उन्मज्जन-निमज्जन के अतिरिक्त उसका कोई अन्य प्रयोजन या फल नहीं होता। भगवान् स्वयं सब फलों के फल हैं। उनकी लीला भी वैसी ही है। वह गौण हो और उसका फलितार्थ मुख्य- यह कल्पना ठीक नहीं है। उल्लसित रस का ही नाम लीला है। यह भगवन्मय-भगवद्विलास है। अविद्या मूलक बंधन की निवृत्ति के अनन्तर ही इसका यथार्थ अनुभव होता है।  

(क्रमशः)

 

 

 

new sg

महात्माओं के सङ्ग

     आज तक जीवन में कई बड़े-बड़े महात्माओं के दर्शन मुझे हुए। मैंने संन्यास वेश ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य से लिया। संन्यास के पहले भी कभी मेरे मन में  यह भाव न था कि मैं ब्राह्मण हूँ, मैं गृहस्थ या वर्णाश्रम वाला हूँ और बाद में भी मेरे मन में कभी यह बात नहीं आती कि मैं मानव या दानव, ईश्वर या देवता हूँ। इसलिए जीवन में एक क्षण भी कभी नहीं आया जब मेरे मन में बात जमी हो कि मैं संन्यासी हूँ। ‘मैं ब्रह्म हूँ’ ऐसी कल्पना पुरे वेग के साथ एक बार आयी थी किन्तु उसके बाद ‘मैं मनुष्य हूँ’ ऐसी भ्रान्ति मुझे कभी नहीं हुई। 

************************************

     एक महात्मा थे,उन्होंने हमसे भागवत सुना। फिर बोले कि ‘बैठो, मैं दक्षिणा देता हूँ।’ मैंने कहा, ‘दक्षिणा मैं दूँगा।’ दक्षिणा माने क्या ? भागवत में कहा है कि ज्ञान का सन्देश दक्षिणा है। शिष्य दक्षिणा नहीं देता, गुरु शिष्य को दक्षिणा देते हैं जिससे चेले में ब्रह्मज्ञान की योग्यता आ जाय। 

************************************

     मैंने एक महात्मा से पूछा : ‘हमें और कोई अच्छा महात्मा बताओ जिनका मैं दर्शन करने जाऊँ।’ ऐसा कहना तो उनका अपमान है किन्तु मैं तब बालक था। उन्होंने कहा : ‘तुम्हें विरक्त महात्मा चाहिए न ? आओ, बैठो, नारायण, तुम कल्याण स्वरुप हो। मैं दुःखी हूँ ऐसा अभिमान कभी मत करो।’ हम जब बाहर से हमारा सम्बन्ध जोड़ते हैं तब दुःखी होते हैं। पागल को कभी ऐसा अभिमान नहीं होता। 

 

new sg

 

धर्म-प्रेरणा के स्रोत-(7)

     अब किस नियम, व्रत, दान, आदान, स्नान कर्म को धर्म कहा जाये – यह बात वासनानुसार नहीं, शासनानुसार ही निश्चित करनी पड़ेगी। उस शासन का जो शाश्वत, सार्वभौम, मौलिकरूप  है उसे ‘शास्त्र’ कहते हैं। वह देश काल वस्तु, क्रिया, पुरुष, अंतःकरण आदि की उत्पत्तिके पूर्व से ही बीज रूप में रहता है और रूप-व्याकृति के साथ ही उसकी नाम-व्याकृति भी होती है। जो ईश्वर सृष्टि का निर्माता है पूर्व कल्पनानुसार, वही शास्त्र का भी निर्माता है। दोनों का ही प्रकाशक-मात्र है। करण-निबंधन-कर्तृत्व उसमें नहीं है। क्या आप किसी ऐसे शास्त्र को मान्यता देते हैं ? उसके विज्ञान को समझने का प्रयत्न करते हैं ? यदि नहीं, तो आप अपने को तत्त्वज्ञान  और धर्म के मार्ग से कहीं विमुख तो नहीं कर रहे हैं ? ज्ञानात्मा के शुद्ध स्वरुप को संकेतित करने वाली यह शास्त्र-प्रक्रिया आपकी धर्म-प्रेरणा का स्रोत क्यों नहीं बनती ?जहाँ वासनानुसारिणी बुद्धि आपको बहिर्मुख बनाती है  वहाँ शासनानुसारिणी बुद्धि  अंतर्मुख करेगी। धर्मानुष्ठान करना तो अलग, इस धर्मानुशासन को हृदयंगम करने का प्रयत्न भी आपको धर्मात्मा होने की प्रेरणा देगा।  

                                                                                                                                   

new sg

धर्म-प्रेरणा के स्रोत-(6)

    प्राकृत वस्तुओं के अनुकरण-कौशल के उत्कर्ष से कला का विकास होता है, उनपर आधिपत्य प्राप्त करके उपयोगी बनाने की प्रक्रिया से विज्ञान का। बाह्य पदार्थों के परिवर्तन, प्रवर्तन अथवा संशोधन के लिए श्रम की अपेक्षा होती है, परन्तु धर्म वह काम करता है जो इनमें किसी के द्वारा सम्पन्न नहीं होता। उसका काम है- अंतःकरण की शुद्धि द्वारा ज्ञाता के प्रकाशित होने के मार्ग में जो प्रतिबन्ध हैं, उनको दूर करना। विशेष करके अंतःकरण से मलिन वासनाओं को निकाल देना और उसको एक विशेष आकार में पहुँचाना धर्म का काम है। ऐसी स्थिति में धर्म की प्रेरणा के लिए अज्ञात ज्ञापक, शासनात्मक, वासना-प्रतिरोधी, बाह्य-क्रियात्मक स्रोत की अपेक्षा है। फल मिलने पर धर्म का पता चलने से केवल आगे के लिए अनुभव संग्रह किया जा सकता है या अमुक प्रकार की वृत्ति से  जो उत्पन्न अदृष्ट या अपूर्व होगा, पता नहीं  वह कब हमारे काम आयेगा ? वस्तुतः धर्म ऐसा होना चाहिए  कि हम अपनी क्रिया और भाव के द्वारा इसी समय, इसी स्थान में, किसी वस्तु का ठीक-ठीक सदुपयोग कर सकें। जैसे, अकाल के समय दुर्भिक्ष-पीड़ित स्थान में  क्षुधा-पीड़ित जनता को अपने हाथ से उठा कर हम कुछ अन्न-धन दे सकें। यदि धर्म का ऐसा रूप नहीं होगा तो वह किसी मनुष्य के द्वारा कैसे अनुष्ठित होगा ? और यदि अनुष्ठित नहीं हो सकेगा तो धर्म का अर्थ ही क्या ? इसको प्राचीन भाषा में यों कहा जा सकता है कि पुण्यकाल में यज्ञशाला के अन्दर यज्ञ करानेवाले ऋत्विज को जब दक्षिणा दी जायेगी, तब धर्म होगा। धर्म का रूप सर्वथा दृष्ट होना चाहिए, उससे अदृष्ट की उत्पत्ति हो या दृष्ट का फल मिले। उसके लिए चाहिए – अधिकारी, श्रद्धा, विधान, क्रिया, सम्पत्ति, सहायक और समग्रता आदि।    

                                                                                                                              (क्रमशः)

new sg

 

धर्म-प्रेरणा के स्रोत-(4)

        क्या आप वस्तु के गुणावगुण और क्रिया कलाप के द्वारा  निष्पन्न होने वाले परिणामों पर अन्वय-व्यतिरेक की दृष्टि से विवेक  करके धर्माधर्म का निर्णय करते हैं ? द्रव्य के गुणावगुण विवेक केवल साधारण दृष्टि से रासायनिक प्रक्रिया के द्वारा नहीं किया जा सकता। उसके लिए देश,काल, जाति, व्यक्ति, मान्यता, अवस्था, स्थिति, शक्ति, वय आदि का सम्पूर्ण ज्ञान अपेक्षित होता है। कब, कहाँ, किसके लिए, किस परिस्थिति में क्या हितकारी है ? यह सर्वज्ञ ईश्वर के अतिरिक्त और कौन जान सकता है ? रही बात क्रिया-कलापकी, सो समग्र मानव-जाति के लिए सर्वकालिक एवं सार्वभौम उदार दृष्टि से विचार करने का दावा कौन कर सकता है ? अनुदीर्ण और संकीर्ण  दृष्टि होनेपर अपने ग्रन्थ और पन्थ  का बोल-बाला  हो जाता है और अपनी डफली और अपना राग बजने लगता है। द्रव्य के गुणानुवाद और क्रिया-कलाप के परिणामों का लौकिक सम्बन्ध यथाकथंचित् ज्ञात भी हो जाये तो पारलौकिक सम्बन्ध ज्ञात करनेका कोई उपाय नहीं है। इसलिए यदि आप केवल अपनी बुद्धि और विवेक के द्वारा धर्म की प्रेरणा प्राप्त करते हैं तो आप पुनर्विचार कीजिये – आपका युक्तिवाद भुक्ति का हेतु हो सकता है, मुक्ति का नहीं। क्या बालक, वृद्ध और मूर्खजन भी इस युक्तिसे धर्म-प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं ? यदि नहीं, तो  धर्म के उद्गम-स्थान को और भी गहराई में ढूँढना आवश्यक है। धर्म के प्रेरक तत्त्व इतने उथले स्तर पर नहीं रहा करते।  

                                                                                                                                        (क्रमशः)

new sg

Previous Older Entries