Anand Prabodh

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28nov2016

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Anand Prabodh

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Anand Prabodh

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      इस संसार वृक्षको “अश्वत्थ वृक्ष “क्यों कहते हैं ? अश्वत्थ -वृक्ष की एक बड़ी विशेषता है -इसके बीज़ धरतीमें गिरकर ख़ुद नहीं उगते। जब इसके बीज़ को चिड़िया खाती है और कहीं भी जाकर बीट कर देती है और जब चिड़ियाके पेट मेंसे पीपलका बीज़ निकलता है तो उग आता है। इसीसे आप देखते हैं कि कहीं छत पर उग रहा है ,कहीं दीवार में उग रहा है। मतलब यह है कि यह चेतनके संयोगसे पैदा होता है और बढ़ता है और इसमें जो फल लगते हैं ,वे खानेके काम आते हैं। 
         ” अश्वत्थ ” शब्द की दो व्युत्पत्ति तो वैदिकी हुई है और एक रूढ़ि है। रूढ़िके अनुसार पीपल वृक्षका नाम “अश्वत्थ “है। वैदिक रीति से एक व्युत्पत्ति है “न श्वस्थाता “माने यह कलतक नहीं रहेगा ,बदल जायेगा। तो यह संसार कैसा है ?जो कलतक न रहे। क़ुछ ठीक है कि कलतक क्या होगा ?
          सुनते हैं कि एक शहर के लोग खा -पीकर ,नाच -गाकर ,शराब पीकर आनन्दसे सोये और रातको एक ज्वालामुखी फूटा और सवेरे शहर लापता। अरे बाबा ,शामको सोते हो ,सुबह उठने पर तुमको यह दुनिया ज्यों -की -त्यों मिलेगी कि नहीं ,इसमें शङ्का है। 
            दूसरी वैदिकी व्युत्पत्ति है ,”अश्व इव तिष्ठति ” ; अश्व माने घोड़ा। जो घोड़े की तरह हर समय गतिशील ही रहे ,बहता ही रहे ,उसका नाम अश्वत्थ। इसीसे संसारको “अश्वत्थ ” बोलते हैं।  
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Anand Prabodh

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मानसिक स्वास्थ्य कितना आवश्यक ?
                                   एक बार मेरे दोनों हाथ उठते नहीं थे। पूरे सीधे नहीं होते थे। एक डॉक्टर के पास हमको लोग ले गये। इस विषयका वह बहुत अच्छा डॉक्टर है। उसने कहा -‘स्वामीजी !माफ़ करना ,मैं एक सच्ची बात आपको कहता हूँ। ‘ ‘क्या ?कहो। ‘उसने पूछा -‘आप कभी किसी को साष्टांग दण्डवत् करते हैं ?मैंने कहा -‘नहीं। मैं कभी साष्टांग  दण्डवत् नहीं करता हूँ। ‘वे बोले कि यदि आप साष्टांग  दण्डवत् रोज़ करते होते ,तो हाथ में कोई भी कसर होती तो तुरन्त मालूम पड़ जाती। अब यह रोग कितने दिनों से है ,यह तो मालूम पड़ता नहीं कि इसने कितनी जड़ जमा ली है। यदि आप साष्टांग  दण्डवत् करते होते तो आपको पता चलता कि आपकी कमर में क्या है ?घुटने में क्या है ?छाती में क्या है ,कन्धे में क्या है ;सब -का -सब जाहिर हो जाता है। आपको ही पता चल जायेगा कि आपके शरीर में क्या रोग है। ‘
                                  आप अपने मनका थोड़ा नियन्त्रण कीजिये। आपको औषधि के रूप में मैं यह बात बता रहा हूँ कि यदि आपको दुनिया में कोई सुन्दर लगता हो और वह आपको आकर्षित करता हो ,तो आप भगवान् की आरती करके ज़रा एक -एक रेखा उनके शरीर की देखा कीजिये। आँख कैसी बनी है ,तिलक कैसा है ,ललाट कैसा है ,कपोल कैसे हैं ,नासिका कैसी है ,ओंठ कैसे हैं ?नारायण ,एक दिन ऐसा सौन्दर्य भगवान् का आपको चमक जायेगा ,झलक जायेगा कि फिर उसके सामने दुनिया की सुन्दरता फ़ीकी पड़ जायेगी। हम और आप कहेंगे ,अब इससे बढ़िया सुन्दर दुनिया में हमको और कोई नहीं मिलेगा। यदि आपके मनमें काम आ रहा हो और एकबार नृसिंह भगवान् का नाम लीजिये -वे नृसिंह जो प्रह्लाद की रक्षा केलिये हिरण्यकशिपु पर झपट रहे हैं। नृसिंहका स्मरण होते ही काम भाग जायेगा। 
                            अस्वस्थता यह है कि जब काम आता है तब हम अपने घर में नहीं रहते हैं ,दूसरे के घर में चले जाते हैं। क्रोध जब आता है तो हमारे घर में आग लगाता है। क्रोध आया तो वाणी गड़बड़ हो गई ,हाथ -पाँव काँपने लगे ,मुँह काला हो गया। यही तो रोग है। रोग और क्या होता है ?बुख़ार आने का नाम रोग नहीं है। ज़ुकाम होने का नाम रोग नहीं है। वह रोग भी इस कारण से है कि अपने अन्दर जो गन्दगी है वह गन्दगी बाहर आकर हमको तकलीफ़ देती है। हमारे मनकी जो गन्दगी है ,वह भी हमको तकलीफ़ देती है। आप उसके लिये सजग क्यों नहीं रहते ?
                                    हमें दुःख किस बातका है ?वह यही है कि हम दूसरेको अपने मनके अनुसार चलाना चाहते हैं। हम अपने अहं की पूजा करनेके लिये ,हम अपने मनकी बात रखने की जो जिद्द रखते हैं ,वह हमारे जीवन में रोग पैदा कर देती है और अस्वस्थ कर देती है। नारायण ,आपके दिलमें जो ईश्वर बैठा हुआ है ,यदि उसकी ओर आप नहीं देखेंगे तो दुनियाँ की चीज़ें आ -आ करके आपको अस्वस्थ करती रहेंगी। तो आप अपने जीवन में थोड़ा नियम रखिये। इसलिए प्रातःकाल क्रिया -कलापों में आप चार चने ईश्वर केलिये रखिये और पाँच मिनट ईश्वरके लिये रखिये। पाँच शब्द ईश्वरके लिये रखिये ,पाँच क़दम ईश्वरके लिये रखिये। ईश्वरके लिये हाथ जोड़नेको रखिये ,सिर झुकानेके लिये रखिये। आप देखेंगे कि स्वस्थता प्रातःकाल ही पॉँव तोड़कर आपके जीवनमें बैठ जायेगी।  
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