भगवान् की गोद-1

     हमारे प्रभु की लीला का रहस्य,उनकी क्रीड़ा का उद्देश्य इतना गम्भीर और साथ ही सरल होता है कि कभी सोचते-सोचते, तो कभी सरलता का आस्वादन करते-करते  हम तन्मय, आत्मविस्मृत, आनन्दविभोर हो जाते हैं। न जाने अन्तर्देश के किस प्रदेश में लुक-छिपकर बैठे रहते हैं, और हमारी प्रत्येक अभिलाषाओं की निगरानी करते हैं  रोम-रोम की, पल-पल सारी लालसाओं को जानते हैं, किन्तु सम्भवतः अति लज्जाशील ही बनाये रखने की इच्छा है, घूँघट-पट के अन्दर ही रखने की मौज है, अतृप्ति की विरहाग्नि में तपाने का ही निश्चय है। अन्यथा हमारी माता प्रकृति और हम सब नन्हें-नन्हें शिशु अनादिकाल से जिन्हें पाने के लिए जिनकी चारु-चितवन मन्द-मुसकान  और माधुरी मूर्ति के दर्शन के लिए, एक घूँट बस एक घूँट अधरामृत- अधर  सिंधु पीने के लिए लालायित हैं, व्याकुल हैं, अशान्त हैं, अहर्निश दौड़ लगा रहे हैं, यहाँ से वहाँ भटक रहे हैं और सो भी जन्म-जन्मान्तरोंसे, उन परमानन्द प्रभु की एक बिन्दु भी नसीब नहीं हुई होती ? अवश्य-अवश्य हम उनकी रहस्य लीला के आनन्द पारावार में उन्मज्जन-निमज्जन करते डूबते-उतराते होते यदि हमारे प्रभु की महती कृपा का एक कण भी हमें प्राप्त हुआ होता। आज वे अनन्त अजन्मा और निराकार प्रभु हमारे सन्मुख खड़े होते, हमारे सिर पर हाथ रखे होते; हमें पुचकारते, दुलारते, बोलने को कहते, और हम अपनी आनन्दाश्रुधारा से उन मुरली-मनोहर श्यामसुन्दर के चरणारविन्दों को भिगोते होते, वाणी न निकलती, कण्ठ गद्गद  होता, शरीर पुलकित होता।

     इसके बाद, इसके बाद वे बलात् हमें अपने कर-कमलों से खींच कर अपनी छाती से चिपका लेते- गाढ़ आलिङ्गन देते, और, और क्या करते ? जिसके लिए गोपियाँ तरसती रहती थीं, प्रार्थना करती रहती थीं –

‘सुरतवर्द्धनं शोकनाशनं स्वरित वेणुना सुष्ठुचुम्बितम्।

इतररागविस्मारणं नृणां, वितर वीर न स्तेऽधरामृतम्।।

अधरसीधुनाऽऽप्याययस्व नः ।।

     बस फिर क्या था हम कृतार्थ,धन्य-धन्य हो गये होते। पर हम बड़े ही मन्दभागी हैं। हमारे भाग्य में तो दूसरा ही कुछ बदा है।

(क्रमशः)

 

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भगवान् और धर्म से बातचीत

     एक दिन मैं एक मन्दिर में गया। पुजारी जी सामने खड़े थे। भगवान् उनके पीछे खड़े थे। मैंने देखा कि भगवान् कुछ उदास हैं। मैंने पूछा : ‘प्रभु ! क्या बात है? चार छः बार आपको भोग लगता है।आरती होती है ?’ भगवान् बोले : ‘देखो स्वामीजी ! इस पुजारी ने हमको मन्दिर में कैद कर रखा है। हमको बाहर नहीं जाने देता। स्वयं हमारी ओर पीठ करके खड़ा है। पैसेवालों की ओर देखता है।’ मैंने पूछा : ‘महाराज !आपके खुश होने की कोई तरकीब है ?’ भगवान् बोले : ‘हाँ ! हमारे खुश होने की एक तरकीब है कि हम सिर्फ मन्दिर में कैद न रहें। हमको बाहर ले चलो और एक-एक आदमी के दिल में हमको देखो। हर पुरुष, स्त्री, पशु-पक्षी तथा हर जड़-चेतन में मुझे देखो।  सच बात यह है कि जब आप मुझे सबमें देखोगे तो मैं प्रसन्न हो जाऊँगा। किसी से द्वेष और किसी के साथ नफरत नहीं करोगे तो मैं प्रसन्न हो जाऊँगा।’

     एक दिन बहुत आग्रह करके भक्तजन हमको यज्ञशाला में ले गये। यज्ञशाला बहुत सुन्दर बनी हुई थी। ऊँची वेदी, सजे-धजे ब्राह्मण ! देवताओं की पूजा और हवन हो रहा था। परन्तु जब मेरी धर्म पर नजर गयी तो उनका शरीर धुएँ से काला पड़ गया था और उनकी आँखों से  आँसू  बह रहे थे। मैंने पूछा :’धर्म जी महाराज ! क्यों रो रहे हैं ? शरीर आपका काला पड़ गया है। आखिर क्यों ? खूब आहूतियाँ पड़ रही हैं और ब्राह्मणों को दक्षिणाएँ मिल रही है।’ धर्म बोले : ‘महाराज, यज्ञशाला में रहते-रहते अब मैं ऊब गया हूँ। अब मैं चाहता हूँ कि लोगों के आफिसों में जाऊँ, मिलों और दुकानों पर जाऊँ गृहस्थों के घरों में घूमूँ। वहाँ का भी थोड़ा आनन्द लूँ। क्योंकि यदि मैं (धर्म) आफिसों,मिलों, दुकानों और घरों में नहीं जाऊँगा तो यज्ञशाला के अन्दर रहनेवाला धर्म मनुष्य का भला कहाँतक कर सकेगा। मनुष्य का भला करने के लिए धर्म यज्ञशाला से निकल कर हमारे घरमें, हमारी दुकान में, हमारी मिलों और दफ्तरों में आना चाहिए। आज हम धर्म इसीलिए करते हैं कि उससे स्वर्ग मिलेगा। लेकिन धर्म यदि इस दृष्टि से हमारा भला करे कि मरने के बाद उससे हमको लाभ होगा तो वह धर्म हमारे आज के जीवन में टिक नहीं सकता। आज हमको वह धर्म चाहिए जो हमारे जीवन की समस्याओं को यहीं हल करें। यदि आज धर्म गरीबी को दूर करने में मददगार नहीं होगा, यदि आज  धर्म पिछड़े लोगों को साथ नहीं मिलायेगा, यदि आज धर्म मूर्ख को पण्डित नहीं बनायेगा, यदि आज धर्म नंगे को कपड़ा और भूखों को अन्न नहीं देगा, यदि आज धर्म हमारे हित की वर्तमान समस्याओं को हल नहीं करेगा तो भले ही आप आज के लोगों को कहो कि ये लोग धर्मभ्रष्ट हो गये हैं। हमारे बच्चे बिगड़ रहे हैं, ‘संस्कृति’ का नाश हो रहा है, तो भी धर्म उन्नति नहीं करेगा। धर्म की उन्नति के लिए आपको उसे यज्ञशाला से बाहर लाना होगा, ताकि वह आज की समस्याओं को हल करे जिन्हें हल करने की उसमें पूरी सामर्थ्य है।  

     यह भगवान् और धर्म के साथ हुआ हमारा संवाद आपको बहुत बड़ा संदेश देता है। हमारा भगवान् अब हमें मंदिरों में दीखना चाहिए और साथ ही हर प्राणी के रूप में भी, ताकि हमको विश्व के हर प्राणी से प्रेम हो जाय :

सिया राममय सब जग जानी। 

करहुँ प्रणाम जोरि जग पानी।।

     केवल धर्म-धर्म की दुहाई से अब काम नहीं चलेगा। अब तो धर्म हमारे जीवन में आना चाहिए। हमारे घरों, दूकानों, दफ्तरों और मिलों में  उसकी स्थापना होनी चाहिए, तभी यह दुराचार, बेईमानी, रिश्वतखोरी, काम-चोरी और एक दूसरे के साथ घृणा का अन्त हो सकेगा।

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श्रम या धर्म

     वस्तु-शिक्षा और धर्मशिक्षा में कुछ अन्तर होता है। पहली, विज्ञान की प्रधानता से होती है और वह यांत्रिक विज्ञान की कसौटी पर निरीक्षण करके प्रत्यक्ष प्रमाणित की जा सकती है। बाह्य वस्तु में परिवर्तन करना या उस पर आधिपत्य प्राप्त करके उसे लोकोपयोगी बनाना विज्ञान का काम है। वह श्रम को सफल करता है और दिशा भी देता है। धर्म का क्षेत्र इससे भिन्न है। वह हृदय में शोधन, परिवर्तन अथवा विशेष का आधान करने के लिए है। धर्म में इतनी सामर्थ्य है कि वह अंतःकरण को निर्वासन बना दे, ईश्वराकार बना दे, समाधि लगा दे अथवा परम सत्य से अभिन्न स्थिति प्राप्त करा दे। श्रम बाह्य-वस्तु प्रधान होता है तो धर्म आन्तर-वस्तुप्रधान। इसलिए धर्म-शिक्षा में केवल बाह्य-वस्तु-विज्ञान, यांत्रिक परीक्षण-निरीक्षण की प्रधानता अथवा प्रबल तर्कयुक्तियों का बल काम नहीं दे सकते; क्योंकि धर्म की रासायनिक परिणति यंत्र के द्वारा नहीं दिखाई जा सकती, कम-से-कम तत्काल। अतः धर्म की शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रारंभ में थोड़ी-सी श्रद्धा की अपेक्षा होती है। श्रद्धा से धर्म-रस की उत्पत्ति होती है। यह रस ही कर्तव्य के प्रति उत्साह, लगन, निष्ठा और लक्ष्य की प्राप्ति में प्रेरणा का उद्गम होता है।

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हृदयाकाश के हीरे

  • एकबार विश्वास के साथ भगवन्नाम लेना प्रारम्भ कर दो। उसका ऐसा संस्कार पड़ेगा कि कभी किसी आपत्ति-विपत्ति में वही नाम आशा की किरण, शान्ति की किरण बनकर उस दुःख को हल्का कर देगा।  
  • मूर्तिपूजा का अभिप्राय है- लौकिक में अलौकिक की स्थापना। प्रतीकरूप से परोक्ष ईश्वर को प्रत्यक्ष करना।  शालिग्राम बाहर परन्तु हृदय में चतुर्भुज विष्णु।
  • ईश्वर की प्राप्ति का उपाय है- निराश्रय, अर्थात् दुनियाँ में कहीं भी, कभी भी, किसी भी वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, भाव में आबद्ध न होना, ईश्वर के अतिरिक्त तृण का भी सहारा न हो।
  • भगवान् का गोकुल में आना अर्थात् जीव के दैहिक व्यवहार में आना। आँख से देखें तो भगवान् दीखें, जीभ से बोलें तो भगवान् के विषय में, स्पर्श करें तो ऐसा अनुभव हो कि भगवान् का ही स्पर्श कर रहे हैं, चलने में भी भगवान्, दाता-ग्रहीता भी वही इत्यादि। भगवान् का देहस्थ हो जाना ही उनका गोकुल में आना है। 
  • ब्रजरज चाहना अथवा चरण रज की याचना करना अथवा रज बन जाने की कामना निष्कामता की पराकाष्ठा है। रज किसी भी इन्द्रिय के सुख का विषय नहीं है। रज बनना अर्थात् विषय सुख से विरत होना।
  • नित्य परोक्ष तथा नित्य अपरोक्ष वस्तु की अज्ञातता शब्द प्रमाण से ही निवृत्त होती है।
  • अविचार ही तत्त्वज्ञान में प्रतिबन्ध है और उस तत्त्वज्ञान का अधिकारी है-जिज्ञासु।
  • कौशल क्या है ?काजल की कोठरी में ऐसे रहो कि न देह में, न वस्त्रों में कालिख लगे। कुश ऐसे ढंग से उखाड़ो कि न जड़ टूटे, न जीव-हिंसा हो और न अपना हाथ कटे। इसी प्रकार न दुनियाँ का कुछ बिगड़े, न देह का  और अपने को उससे अलग कर लो- यही कौशल है ।  

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