आप अपने में ही स्थित रहिये!

     सुख भी अपने हृदय में है। 

     दुःख भी अपने हृदय में है। 

     जब आपका हृदय कथामृत के भगवद्-रस में सराबोर रहता है तब बताइये, आपको दुकान, दुश्मन, रोग, कुछ भी याद आता है ? उन सब प्रपंचों का विस्मरण तब हो ही गया न ?

     आपको राग-द्वेष और मोह के फंदे से मुक्त करने के लिए ही और आपको अपने हृदय में स्थिर रहने का प्रयोग कथा द्वारा होता है।

     आपका मन आपकी प्रकृति में स्थिर होगा तो राग-द्वेष आपको परेशान नहीं करेंगे !  फिर तो आपके हृदय में विराजमान प्रभु के प्रति प्रेम और सेवा का निर्झर बहने लगेगा। और, तब आपको विश्वास होगा कि सम्पूर्ण सुखों के स्रष्टा आप ही हैं, और सम्पूर्ण सुखों के अक्षयभण्डार आप ही हैं।  

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नाचो जी नाचो

     मैं छोटा था तब एक महापुरुष ने मुझे कहा था : ‘आनन्द का आस्वादन करना हो तो कमरे में बन्द होकर प्रभुप्रेम में मस्त होकर नाचो।’

     मैंने पूछा : ‘इससे क्या लाभ ?’

     तब उन्होंने बताया : ‘इससे दूसरे किसीकी भी सहायता के बिना तुम्हें अपने सुख के विषय में विचार करने की प्रक्रिया मिल जायेगी।’

     प्रेम की चाल का नाम है, नृत्य। 

     प्रेम की बोली का नाम है, संगीत। प्रेम माने तृप्ति। प्रेम माने रसानुभूति। 

     भौतिक रसानुभूति प्राप्त करने के लिए कोई मुँह में रसगुल्ले डालता है तो कोई गांठिया खाता है।  और उसके लिए तो पैसा, वस्तु और व्यक्ति चाहिए। 

     बिना वस्तु, व्यक्ति और पैसे की अपेक्षा के जीवन का अनन्त आनन्द प्राप्त करना हो तो प्रभु प्रेम में मस्त बन जाओ। फिर हृदय की गति के ताल पर नाचो। 

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बस,वर्तमान को सुधार लो !

     अबतक आपने अपने जीवन का उद्देश्य निश्चित न किया हो तो, आज ही, अभी कर लीजिए, क्योंकि उद्देश्यहीन जीवन व्यर्थ है। 

     जीवन की दिशा निश्चित  कर लीजिए। जीवन की प्रत्येक क्रिया और प्रत्येक संकल्प उसी दिशा में आगे बढ़ने के लिए होना चाहिए। 

     आपको परमात्मा की ओर आगे बढ़ना है किन्तु रास्ते में लुभाने वाले विश्राम-स्थान और आनन्द-प्रमोद के धाम आनेपर लुब्ध न हो जाइये। भयानक रास्ते आने पर घबराकर पीछे न हटिये। आपके पास एक महान् शक्ति है और वह आपकी सतत रक्षा करती है।

     अनुभव करें ! आपको एक महान् प्रकाश घेरे हुए है। वह अन्दर और बाहर, आगे और पीछे, ऊपर और नीचे, नस-नस में व्याप्त हो रहा है।

     अपना ज्ञान, शक्ति और सत्ता उसमें डुबा दो, डूबने दो।

    फिर, आप व्यवहार में रहकर भी अपने जीवन में एक नई स्फूर्ति और उल्लास का अनुभव करेंगे।

     आप देखोगे कि आपका जीवन प्रत्येक क्षण परमात्मा के समीप जा रहा है।

     आप चाहें किसी भी परिस्थिति में हों, परमात्मा आपके साथ ही है। और फिर आपकी सहिष्णुता और धैर्य को हँसते-हँसते देख रहा है।

     ऐसे आनन्द के सामने क्या आप क्षुब्ध रह सकेंगे ?

     उसमें  उनके सुकोमल करकमलों के स्पर्श का सतत अनुभव करें।

     देखें ! इस समय भी उनके करकमलों की छत्र-छाया आपके सिर पर है।

     जो बीत गया है उसे भूल जायँ। जो आनेवाला है वह आपके अधिकार के बाहर है।

     इसलिए भूतकाल और भविष्यकाल में मत भटकें और अपने वर्तमान् को ही सुधारें। कहीं यह क्षण भी व्यर्थ न बीत जाय इसके लिए सावधान रहें।

     अनुभव करें कि आपका आज का दिन सार्थक बीत रहा है और आप भगवान् की ओर जा रहे हैं।  

 

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तमसो मा ज्योतिर्गमय

  • सत्य सर्वदा सरल होता है। उसमें दावपेंच नहीं होते। चेष्टा सत्य की प्राप्ति के लिए नहीं, असत्य के त्याग के लिए करनी चाहिए।
  • धर्म क्रिया प्रधान है इसलिए उसके लिए स्थूल शरीर की अपेक्षा है। धर्म अधर्म का निवर्तक है।

           उपासना भाव प्रधान है, इष्टाकार-वृत्ति है। इसमें सूक्ष्म शरीर की अपेक्षा है। यह अनेकाकारता को                  निवृत्त करती है। 

           योग निराकार स्थित्यात्मक है। अतः कारण शरीर प्रधान है। यह विकल्प का निवर्तक है।

  • हठयोग में क्रियालम्बन है। मंत्रयोग में शब्दालम्बन है। लययोग में इदंरूप प्रतीकालम्बन और राजयोग में अहंरूपालम्बन है।
  • सेवा में दुःख तब होता है जब वह ज्ञानशून्य हो, विवेकरहित  हो तथा संसार के पदार्थों में राग हो।
  • परमात्मा के साक्षात्कार के लिए ज्ञान अनिवार्य है। परन्तु अंतःकरण की शुद्धि के बिना ज्ञान नहीं हो सकता। अंतःकरण की शुद्धि के लिए सबसे बड़ी औषध भक्तिरूप रसायन है। अंतःकरण शुद्धि के लिए एक आलंबन की आवश्यकता है।
  • भक्ति का संयोग यदि भगवान् के साथ ठीक-ठीक होगा तो पुत्ररूप में ज्ञान का प्रकाश और वैराग्य की निर्मलता एक साथ प्राप्त होंगे। वैराग्य अर्थात्त् चित्त में राग-द्वेषका न होना। अंतःकरण के संकल्परूप मन की शुद्धि भगवान् के स्मरण से होती है। स्मरण से राग-द्वेष दोनों क्षीण होंगे।
  •   अज्ञान के चार विकास हैं –

        (1) स्वरूपज्ञान 

        (2) सत्य को असत्य और असत्य को सत्य समझना। 

        (3) सत्य से राग और असत्य से द्वेष। 

        (4) सत्य में चिपक जाना अर्थात् दुराग्रह। 

  • ज्ञान (विचार) तत्त्व शोधन के लिए प्रयोज्य है और भक्ति जीवन-शोधन के लिए। 
  • कोई भी संसार नहीं चाहता। वह चाहता है शाश्वत सुख। शाश्वत सुख संसार में नहीं है; वह तो ईश्वररूप है। इसलिए सर्वत्र, सर्वदा, सर्वथा और सब में परिपूर्ण सुख का अभिलाषी ईश्वर की ही उपासना करता है। 
  • भक्ति क्या है ? सर्वरूप में विराजमान परमात्मा की सेवा और इसकी पूर्णता है – सर्वत्र भगवद्भाव। 
  • पूतना का अंतःकरण शुद्ध है। वह भगवान् की ओर चलती है। स्तन में विष लगाकर- अपने दोषों को प्रकट करके  भगवान् के पास आती है। परन्तु उसके भीतर है अमृततुल्य दूध। भगवान् उसके दोषों को पचा लेते हैं और दूध पी जाते हैं। उसे माता की गति देते हैं। तात्पर्य यह है कि तुम जैसे हो, वैसे ही भगवान् की ओर चलो, उनसे मिलो। भगवान् भी जैसे हैं, वैसे ही तुमसे मिल जायेंगे। दोषों से डरो मत।
  •  एक महात्मा गये भिक्षा माँगने। बुढ़िया ने नाराज़ होकर घर लीपने-पोतने का पोतना फेंककर मारा। महात्मा उसे उठाकर कुटिया पर ले आये। धो-सुखाकर बत्ती बनायी और भगवान् के लिये दीपक में प्रयुक्त किया। भगवान् की कृपा हुई। बुढ़िया को पोता हुआ। 

           पूतना भी भगवान् को दूध पिलाने के लिए गयी, परन्तु बहार से लपेटा विष। भगवान् ने पोतने की                तरह उस जहर को भी स्वीकार कर लिया। भगवान् की कृपा से पूतना को मातृत्व मिला। महात्मा और             भगवान् की इस महिमा को स्वीकार कर उनकी ओर चलो। 

 

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