जहाँ भक्ति,वहाँ दुःख कहाँ ?

22may2017

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आनन्द जयन्ती पर –

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     हमारे रोम-रोम में अगर कोई चीज़  है तो संतों की कृपा, संतों का अनुग्रह- इसके सिवाय और कोई दूसरी चीज़ नहीं है। हमारे ऊपर यदि भगवान् की कृपा है, भगवान् का अनुग्रह है और हमारी वाणी से भगवान् के गुणानुवाद का वर्णन होता है, हम जो वेदान्त-उपनिषद् की बात करते हैं; तो उसमें हम पर ग्रन्थों की कृपा बाद में हुई, भगवान् की कृपा भी बाद में हुई, पहले तो हमारे ऊपर सन्तों की ही कृपा हुई। ये सब संत-महात्मा ही हमारे आदि-गुरु हैं। एक संत की बात आपको सुनाते हैं। उन्होंने बताया था कि ऐसा कोई प्रान्त नहीं होता जहाँ कोई-न-कोई उच्चकोटि का संत न हो। फिर बोले कि ऐसा कोई जिला भी नहीं होता, ऐसा कोई गाँव नहीं होता जहाँ कोई सन्त न हों। फिर उन्होंने बताया कि कोई ऐसा परिवार नहीं होता जहाँ सन्त न हों। यदि प्रत्येक परिवार में कोई सन्त नहीं होगा तो पाँच आदमी जिनका मन अलग-अलग है, रुचि अलग-अलग है, काम अलग-अलग है, शरीर अलग-अलग है- वे एक साथ मिलकर कैसे रहेंगे ? अपने परिवार में उन पाँचों को मिला कर रखने वाला जो व्यक्ति है, वह सज्जन न हो, सन्त न हो तो सबको समेट कर कैसे रखेगा ? उन्होंने बताया कि वैसे सन्त सबके भीतर रहता है। आप सब सन्त हैं भला ! वह कभी-कभी आपके भीतर रहने वाला सन्तपना भी चला जाता है, तब आपको पता नहीं लगता। जब गुस्सा आता है, जब कोई कामना उभरती है, जब चोरी-चमारी का मन होता है, जब बेईमानी का मन होता है, उस समय सन्त रहता तो है, लेकिन वह भीतर चुप्पी लगा जाता है।

     हमने गाँव में देखा, किसान लोग कभी-कभी लड़ाई-झगड़ा बड़ी जल्दी कर लेते हैं। लाठी-वाठी भी चलती है। तो हमारे बाबा ने बताया कि देखो कहीं लाठी चलने लगे,मार होने लगे तो दौड़कर वहाँ जाना मत। क्योंकि उस समय सब अन्धे हो जाते हैं, तो तुमको भी चोट लग जायेगी। तो ऐसे ही महाराज, हमारी काम, क्रोध, लोभ आदि मनोवृत्तियाँ जब लड़ने लगती हैं तो हमारे भीतर बैठा हुआ जो सन्त है वह मुँह फेर कर खड़ा हो जाता है। वह भीतर लुप्त हो जाता है। लेकिन सन्त तो सबके भीतर है। उन एक सन्त ने हमको बताया कि जो सबके भीतर सन्त है, उसको तुम देखो तो तुम स्वयं सन्त हो जाओगे। जब सबके भीतर तुम सन्त देखोगे तब तो तुम सन्त हो जाओगे। और, किसी के भीतर देखोगे और किसी के भीतर नहीं देखोगे तो तुम्हारे भीतर वाला सन्त जागेगा नहीं। 

     अच्छा, एक सन्त ने हमको ऐसी बात सुनाई थी- बात गुप्त है ! हमको उन्होंने यह बताया था की २४ घंटे में एक बार सबके जीवन में सबसे बड़ी जो सिद्धि है कि जो उसके मुँह से निकलेगा, वह पूरा हो जायेगा – वह आती है। लेकिन मनुष्य उस क्षण को नहीं जानता है, उस वचन को नहीं पहचानता है, उस सत्य को नहीं जानता है। 

     तो देखो, भगवान् हैं ‘सत्’। और, ये सन्त ‘सत्’ शब्द का ही एक रूप है। तो नारायण, जहाँ सत् है, वहाँ सन्त है और जहाँ संत है, वहाँ  सद्भाव है। और, आप सबके हृदय में कहीं-न-कहीं सन्त बैठा हुआ है, कहीं-न-कहीं सद्भाव बैठा हुआ है। और सत् परमात्मा जो है वह तो प्रशिक्षण में, प्रत्येक स्थान में, प्रत्येक वस्तु में है। वह अजन्मा ही होकर न रह जाये, अब वह सन्त आपके जीवन में पैदा हो !

     आज के दिन आप लोग हमको जो आशीर्वाद देते हैं वह पूरा होगा। आप हमारे बारे में जो चिन्तन करते हैं वह पूरा होगा। आप जो सद्भाव हमारे बारे में करते हैं वह पूरा होगा। क्योंकि आप परमात्मा रूप कल्पवृक्ष के नीचे बैठे हैं नारायण !और, आपकी वाणी, आपका संकल्प, आपका विचार, आपका सद्भाव व्यर्थ जाने वाला नहीं है।     

 

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प्रेम की शक्ति

                            आपने सुना होगा ज़रूर -ईश्वर सबका नियन्ता है ,सबका हाक़िम है माने सब पर उसका हुकुम चलता है। अन्तर्यामी –‘अन्तःप्रविष्टः शास्ता जनानाम्’सबपर परमेश्वर की आज्ञा चलती है। तो परमेश्वर पर किसी की आज्ञा चलती है कि नहीं चलती है? सारा जगत् परमेश्वर के वशमें है –‘ईशस्येहि वशे लोकाः ‘यह सारा चराचर विश्व परमेश्वर के वशमें है। ब्रह्मा-विष्णु-महेश ईश्वरके वशमें हैं। परन्तु ईश्वर? ईश्वर प्रेमके वशमें है। सबका नियामक होने पर भी ईश्वर प्रेमका नियम्य होता है। प्रेम जैसा हुकुम दे, वैसा करेगा। बोले,’बच्चा बनकर आओ, हमारी गोद में बैठो; सखा बन जाओ, हम तुम्हारे कन्धे पर हाथ रखेंगे; तुम हमारे प्रिय बन जाओ, आओ हम तुमको अपने हृदय से लगावेंगे। प्रेम जो -जो कहता है, प्रेमकी आज्ञा, प्रेमका हुकुम परमेश्वर मानता है भला !

                             नारायण ,प्रेम बड़ा प्रबल होता है। वह ईश्वरको भी वशमें कर लेता है। वस्तुके स्वरूपको बदल डालने का सामर्थ्य प्रेममें होता है। प्रेम एक महती शक्ति है !वह दुराचारी को सदाचारी बना दे, दुर्गुणीको सद्गुणी बना दे ,दुःस्वभाव को सुस्वभाव बना दे! 

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गुरु क्यों बनाना ?

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स्वयं को सत्यानुभवी बनाइये !

15may2017

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