‘साधना के सूत्र’

     जहाँ अपना प्रियतम सम्मुख होता है वहाँ साधना का रस प्रत्यक्ष मिलता है। अपना प्रियतम सातवें आसमान में नहीं, यहीं धरती पर है। उसीके लिए यह जीवन-ज्योति जल रही है। वह देख कर केवल एक बार मुस्करा भर दे जीवन सफल हो जाय। 

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भक्त के लिए यह आवश्यक है :-

(1) भगवान् को कभी दुर्लभ न समझना। 

(2) अपने मन को अपने ही दोषों, सम्बन्धियों और सुहृदों के पास न भटकाना। 

(3) भगवान् अपनी कृपा से ही मिलते हैं। किसी मूल्य से नहीं, यह विश्वास। 

(4) भगवान् अन्तर्यामी हैं, सर्वज्ञ हैं। 

(5) हमारे दिल की बातों को वे पूरी कर सकते हैं, सर्वशक्तिमान् हैं। 

(6) दयालु इतने हैं कि उन्हें पूर्ण किये बिना रह नहीं सकते। 

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     सोने से दो-मिनट पूर्व यह भावना करो कि भगवान् के दोनों चरण पकड़ कर मैं सो रहा हूँ और उठने के बाद दो मिनट तक सोचो कि मैं भगवान् के चरण पकड़ कर ही सोया था। छः महीने के अभ्यास के बाद तुम्हें आनन्द ही आनन्द आयेगा और तुम्हारी छः घण्टे की सुषुप्ति समाधि हो जायेगी। 

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     संसार के सारे सुख मिलकर भी भगवान् के सुख-सिन्धु के एक बिन्दु के तुल्य भी नहीं हैं-ऐसा ख्याल करने से भगवान् को प्राप्त करने की इच्छा होती है। क्योंकि मनुष्य सुख ही सुख चाहता है और वह सत्य-सुख केवल ईश्वर में ही मिल सकता है, अन्यत्र नहीं। 

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     अपने हृदय में इतनी प्रसन्नता हो कि भगवान् प्रेम के अधीन होकर हमारे हृदय में आ विराजें और फिर कभी जाएँ ही नहीं। 

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     सबको सुख देते चलो, किसी न किसी रूप में भगवान् मिल ही जायँगे। सबको भगवान् मानकर सेवा करते जाओ- देखो, वे मिलते हैं या नहीं। 

रहिमन या जग आइकै सबसे मिलिये धाय।  ना जाने किहि वेष में नारायण मिलि जाय।।  

 

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‘भगवान् ने क्या किसी विशेष रूप का ठेका लिया है?’

   एक भक्त को रात्रि में स्वप्न में भगवान् ने कहा – ‘कल मैं तुम्हारे घर आऊँगा।’

     भक्त ने दूसरे दिन बड़े उत्साह से घर की सफाई करवाई और प्रतीक्षा करने लगे भगवान् के पधारने की। 

     एक भूखा-प्यासा फटे चीथड़ों में लिपटा भिखारी सामने आया। चिढ़कर बोले – ‘हटो, हटो ! आज मेरे घर में भगवान् आने वाले हैं।’

     एक वृद्धा आयी काँपती, खाँसती लाठी टेकती हुई- ‘बाबा, बड़ा बुखार है ! कुछ पहनने को दे दो।’ भक्त जी ने नौकर से कहकर उसे भी हटा दिया। एक छोटा सा नंग-धड़ंग बालक साँवला -सा मैला-कुचैला आया, पैसा माँगने लगा। भक्त जी दुत्कार कर बोले-‘सबेरे से ही परेशान कर रखा है इन लोगों ने। जानते नहीं, हमारे यहाँ भगवान् पधारने वाले हैं। अरे, है कोई ? हटाओ इसे यहाँ से।’ भक्त जी दिन भर  भगवान् के शुभागमन की प्रतीक्षा करते-करते थक गए। रात्रि में पुनः स्वप्न हुआ। भगवान् ने कहा – ‘भक्त जी’ मैं दीन – दुःखी, दरिद्र, भूखे और आर्त्त के रूप में तुम्हारे सामने आया, तुम पहचान न सके। मैंने कब कहा था कि छत्र  मुकुट लगा कर ही आऊँगा ! क्या किसी विशेष रूप में तुम्हें दर्शन देने का मैंने कोई ठेका लिया था ?’ 

 

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जिज्ञासा और समाधान

      ‘भगवन् ! जब प्रलोभन सामने आता है तब एकाएक मैं पराजय के  स्थान पर पहुँच जाता हूँ। पता ही नहीं चलता कि मैं कब कैसे कहाँ आ गया ?

       ‘नारायण, विचार करो कि उन प्रलोभनों की सृष्टि कौन करता है ? उन्हें सामने कौन लाता है ? लोभ उन प्रलोभक वस्तुओं में है या तुम्हारे अन्दर ? वे जड़ वस्तुएँ तुम्हें पराजित करने की शक्ति कहाँ से प्राप्त करती है?

       वास्तव में दृश्य पदार्थों में सुन्दरता और रमणीयता का आरोप मन ही करता है। भावना ही उन्हें आकर्षक बनाती है। सौन्दर्य की कल्पना देश,समय, व्यक्ति और रुचि के भेद से भिन्न-भिन्न प्रकार की होती रहती है। तुम्हारे मन ने ऐसी वस्तुओं को सुन्दर मान रखा है जो जीवन को परमात्मा से विमुख बनाने वाली हैं। इच्छा से ही उन वस्तुओं के सान्निध्य की अनुभति होती है। लोभ मन में ही रहता है, उन वस्तुओं में नहीं। जिन वस्तुओं को देख बालक, वृद्ध, ज्ञानी, दूसरी जाति और देश के लोग आकृष्ट नहीं होते, उन्हीं को देख कर तुम्हारा मन आकृष्ट हो जाता है। इसलिए उनमें आकर्षण नहीं, तुम्हारे मन में ही उन्हें पाने की ललक है। मन का अंधापन ही पराजित करता है। वही विवश  और अज्ञान बन जाता है। वही तन्मय होकर उन्हें प्रलोभक भी बनाता है। 

       अब करना क्या है ? न विषयों-प्रलोभनों को नष्ट करना है और न तो मन को ही। विषय रहेंगे ही और मन भी रहेगा ही। केवल भावना का परिवर्तन करना है। किसी भी सुन्दर वस्तु को देखकर उसमें भोग्य-भावना न हो। सब सुन्दर और मधुर वस्तुएँ इसलिए सामने आती हैं कि उनको देखकर सुन्दरतम एवं मधुरतम भगवान् की स्मृति हो। केवल उतने से ही संतुष्ट हो जाना, उनमें ही रम जाना तो महान् हानि है। उन्हें देखते ही अनन्त सौंदर्य एवं अनन्त माधुर्य की स्मृति में मस्त हो जाओ। उन वस्तुओं का सामने आना विक्षेप नहीं प्रसाद है। प्रसाद भी ऐसा, जो साधारण नहीं, अनन्त शांति  और अनन्त आनन्द का उद्गम है। तुम अपने मन को उस महात्मा के मन सा बना लो जो एक वेश्या के आने पर मातृस्नेह से मुग्ध और समाधिमग्न हो गया था।  

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प्रसङ्गो में सूक्तियां

     एक दिन किसी स्त्री ने श्रीमहाराजजी से प्रार्थना कर कहा- ‘आशीर्वाद दीजिये कि भगवान् श्री कृष्ण में मेरी दृढ़ भक्ति हो।’  श्रीमहाराजजी ने कहा – ‘बस ! तुम इसी तरह, जड़-चेतन जो भी तुम्हारे सामने आये, उसे प्रणाम कर श्रीकृष्ण-भक्ति की याचना करती रहो, तुम्हें शीघ्र ही उसकी प्राप्ति हो जायेगी।’ फिर मुझसे कहा- ‘इस लालसा का दृढ़ होना ही तो भक्ति है।’

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     किसी भक्त ने श्रीमहाराजजी से प्रश्न किया- ‘अनन्य भक्त कौन ?’ श्रीमहाराजजी ने उत्तर दिया – ‘जो आठों पहर अन्तर्मुख रहता हो।’ इस पर श्री साईं साहब ने कहा – ‘ऐसा भजन तो आप ही करते हैं।’ श्रीमहाराजजी ने कहा- ‘मैं भजन नहीं करता, बल्कि भगवान् ही मेरा भजन करते हैं। उनका अनुग्रह देख कर ही मेरा हृदय आनन्द से गद्गद रहता है। बात असल में यह है कि जीव में तो उनके  भजन करने की शक्ति ही नहीं है। जो कुछ होता है, उनकी दया से ही होता है। 

 

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