उलूखल बन्धन लीला-14

     समुद्र ने अमृत के द्वारा देवताओं की, लक्ष्मी के द्वारा भगवान् विष्णु की, मर्यादा स्थापन के द्वारा पृथिवी की, कल्पवृक्ष से इन्द्र की, चन्द्रकला से शंकर की सेवा की, उन्हें सन्तुष्ट किया। अपने उदर-गृह में बसाकर यत्नपूर्वक मैनाकादि पर्वतों को संरक्षण दिया। परन्तु जब अगस्त्य मुनि उसको पीने लगे तब किसी ने उसको रोका नहीं, रक्षा नहीं की। 

     माता को हँसी क्यों आयी ? भाण्डासुर मर चुका था। क्रोध आने का कोई कारण नहीं था। थोड़े की रक्षा के लिए गयी और बड़ी हानि हुई, क्या आश्चर्य है ? पुत्र माता की सम्पत्ति की रक्षा करता है और हमारे घर में ऐसा लाल आया जो अपने हाथों सम्पदा को बिगड़ता है। हँसने का अर्थ यह है कि श्रीकृष्ण डरकर कहीं भाग न जाय।  

     ऊखल उलटा करके रखा हुआ था। वह अग्नि-नाभि है। सुपर्ण-चयन में यज्ञपुरुष के समान भगवान् उसपर बैठ गये। मर्कटों को बासी मक्खन देने लगे। अतिरिक्त वस्तु अतिरिक्त को देने से अतिरिक्त की शान्ति हो जाती है। दान में भी यथेष्टता थी। इस चोरी के कर्म में नेत्र विशंकित हैं। यशोदा धीरे-धीरे पीछे से आ रही है। पीछे से आने के कारण श्री कृष्ण के पृष्ठ में स्थित अधर्म का दर्शन होता है। श्रीसुदर्शन सूरि एवं श्री वीरराघवाचार्य ने यहाँ ‘मर्क’ शब्द का अर्थ मर्कट, मार्जार एवं ब्रज के सखा, ऐसा लिखा है। किसी-किसी ने मर्क अर्थात् माखन के लिए आये हुए सखा। 

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-13

     श्री कृष्ण ने मन ही मन कहा- ‘जब मनुष्य यशोदयाविहीन होता है अर्थात् यशोदा एवं यश-दया से रहित होता है, तब उसके ऐसे ही कृत्य होते हैं। मानो, श्रीकृष्ण ने यहीं से शिक्षा लेकर गीता में कहा हो – ‘कामी दीन हो जाता है, लोभी पुत्रके प्रति भी निर्दय होता है, क्रोधी का विवेक नष्ट हो जाता है, अतः इन तीनों का परित्याग करना चाहिए। इस प्रसङ्ग में विस्तार से समझाने की आवश्यकता नहीं है।

     परन्तु यह क्रोध और आँसू मिथ्या हैं। इसका क्या प्रमाण है ? तत्काल एक व्यवहित स्थान पर जाकर नवनीत का आस्वादन करने लगते हैं। क्रोध और आँसू के साथ भोजन का मेल नहीं है। सच्चे आँसू आ रहे हों तो उदानवायु की प्रबलता के कारण निगलने की क्रिया नहीं हो सकती। वे अपना विनोद प्रकट कर रहे हैं। बालकों को भोजन दे रहे हैं और माता को उलाहना दे रहे हैं। 

    माता ने शान्ति से दूध को परिपक्व करके भगवद्भोग्य बना दिया। उसे अग्निताप से मुक्त करके उतार दिया- पार कर दिया। भागवत का काम पूरा हुआ। लौट कर आयी, देखा मटका फूटा हुआ है, अपने पुत्र का कर्म। हँसी आ गयी। जलते हुए दूध को तारा माता ने। मटके रहित दधि को तारा भगवान् ने। दैवगति से हानि देख कर माता को हँसी आ गयी। भला, होनी को कौन टाल सकता है। कहा भी है –

पीयूषेण सुराः श्रिया मुररिपुर्मर्यादया मेदिनी शक्रः कल्परुहा शशाङ्ककलया श्रीशंकरस्तोषितः। 

मैनाकादिनगा निजोदरगृहे यत्नेन संरक्षितास्तच्चूलीकरणे घटोद्भवमुनिः  केनापि नो वारित।।     

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-12

  माता के चले जाने पर श्रीकृष्ण के मन में कोप का संचार हुआ। प्रलय के समय ईश्वर के कोप से ही संहार-क्रिया होती है। अतः ईश्वर के साथ कोप का मेल नहीं है- यह सोचना असंगत है।  माता छोड़ कर चली जाय और बालक असंग-उदासीन रहे, उपेक्षा कर दे तो उसके हृदय में माता के प्रति प्रेम की न्यूनता है। शिशु अपना है तो माता भी अपनी है, वह क्यों चली जाय ? आचार्य वल्लभ का कहना है कि श्रीकृष्ण के हृदय में बहुत से बालक विद्यमान हैं। उनकी रक्षा एवं संवर्धन के लिए वे उन्हें पुष्टि दे रहे थे। भक्ति-मार्ग के अनुसार माता के द्वारा उसमें बाधा डाली गयी। अतएव कोप का उदय हुआ। कोप के अनुभाव प्रकट हुए। होठ लाल-लाल होकर फड़कने लगे। लाल-लाल होना रजोगुण है और फड़कना कुछ बोलने के लिए उद्वेग है। कोप और यशोदा के बीच में भगवान् के अधर में स्थित लोभ प्रकट हो गया। मानो,कह रहा हो, दोष माता का नहीं, मेरा है। आप में अतृप्ति=लोभ है और माता में दूध की रक्षा का लोभ है। आप मुझे दण्ड दीजिये, माता को नहीं। कृष्ण ने दोनों के लिए दण्ड-विधान किया। रक्तवर्ण रजोगुण को श्वेतवर्ण सत्त्वगुण-रूप दाँतों से दबा दिया। श्वेतिमा सात्त्विक ब्राह्मण है। रक्तिमा राजस क्षत्रिय है। दाँत द्विज हैं। सत्त्वगुण के द्वारा रजोगुण को अथवा ब्राह्मण के द्वारा क्षत्रिय को शिक्षा दी गयी। माता के लिए भी दण्ड-विधान हुआ । शैशव में ऐसा होता है। दूध के लोभ से मुझे छोड़ कर गयी तो दूध-दही की और भी हानि उठानी पड़ी। यज्ञायुध (दृषदशमा ) लोढ़े से भागवत-यज्ञ में बाधक भाण्डासुर को भग्न कर दिया।  

(क्रमशः) 

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संन्यास -जयन्तीपर –

     एक सज्जन अपने व्याह की वर्षगांठ पर हमें प्रणाम करने आये थे, ईश्वर करे उनका जीवन सफल हो। एक बालक अपनी वर्षगांठ पर मुझे प्रणाम करने को आया था। हमारे तो संन्यास की वर्षगांठ मनाने का ख्याल ही नहीं था। यहाँ ये जागीरदार बैठे हैं उन्होंने एक बार कहा कि ‘हम तो आपके नाम पर कुछ मनायेंगे।’ हमारा जन्मदिन तो आषाढ़ में आता है और वे कहने लगे कि ‘हम तो माघ में ही मनायेंगे। तब सर्वप्रथम गाँव में हमारी संन्यास जयन्ती मनायी गयी और फिर तो उसकी परम्परा बन गयी। 

     यदि हमसे कोई पूछे कि संन्यास-जयन्ती कैसे मनाई जाय तो हम बताते हैं कि “कमरा बंद कर हम बैठ जाएँ और लोगों को कह दें कि कोई हमारे पास मत आओ।” लाल कपड़े का नाम संन्यास नहीं है। लाल रंग तो अग्नि का प्रतीक है। ज्ञानाग्नि में प्रपंच भस्म हो जाता है, जैसे आग में लकड़ी। किसी को स्वर्ग जाना हो तो यज्ञाग्नि चाहिए। चोटी हिन्दू धर्म की प्रज्वलित शिखा है। मूर्धा में जो अग्नि है उसकी वह शिखा है। शिखा का अर्थ है – ‘शरीर मन्दिर है और शिखा शिखर है।’  ईसाई या मुसलमान धर्म में यह बात नहीं मिलती। हिन्दू  धर्म में प्रत्येक व्यक्ति के लिए वर्ण और आश्रम के अनुरूप कोई न कोई विधान है। एक ब्राह्मण को यज्ञोपवीत धारण करना चाहिए, रोज होम और त्रिकालसंध्या करनी चाहिए। यज्ञोपवीत में प्रत्येक में तीन-तीन सूत होते हैं, उनमें तीन गांठे होती हैं ; तीन-तीन सूत वाले डोरों की गिनती नव होती है। तीन त्रिगुण का प्रतीक है। 

     पुरोहिताई वाला धर्म संन्यास नहीं है। संप्रदाय का प्रचार संन्यास नहीं है। गृहस्थों के लिए जो वैदिक धर्म है, उसमें पुरोहित चाहिए। संन्यास तो प्रदीप्त अंतर्दृष्टि है। असल में ज्ञान का ही नाम संन्यास है।  अर्थात् संन्यास में द्वैत नहीं है।  

 

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