श्रीगुरु पूर्णिमापर –

     मनुष्य के मन में जो बात भरी रहती है उसी को वह प्रकट करता है। किसीकी प्रशंसा अपनी ही प्रशंसा है, ब्राह्मण के प्रति आदर, विद्वान् के प्रति श्रद्धा, त्यागी के प्रति आदर और श्रद्धा जब तुम व्यक्त करते हो तब जो अच्छाई तुम्हारे मन में है वही प्रकट होती है।

     आरती में जब तुम लोग “ब्रह्मानन्दं परम सुखदं ………………..” जैसे  अपने गुरु के लिए बोलते हो और वहाँ से आरती घुमाते हो,वैसे हम भी यहाँ से उस समय मन ही मन हमारे गुरु के लिए  ‘ब्रह्मानन्दं…..”  बोलते  हैं और आरती घुमाते हैं। तुम्हारे गुरु हैं तो क्या हमारे गुरु नहीं हैं ?

     बचपन में एक महात्मा ने मुझे बताया, यदि तुम्हें गुरु और शास्त्र के विरुद्ध कोई अनुभव हो, तो उसे झूठ मानना। वह कोई विघ्न है, तुम्हारे मन की दानव-भावना है। आज तो तुम्हें वह ठीक मालूम होगा; किन्तु आगे चलकर उससे तुम्हारी हानि होगी। 

     एक सज्जन भगवान् का भजन करते थे,सत्संग भी करते थे। और माला फेरते थे। उनको सपने में सट्टे के नंबर आते थे। मैंने उनसे कहा – ‘तुम इसे सच्चा मत मानो। कभी न कभी तुमको यह धोखा देगा। मुझसे ‘हाँ’ कहकर भी वे नंबर वाली बात छोड़ते न थे। एक बार तो मैंने प्रतिज्ञा भी करवायी, किन्तु उन्होंने प्रतिज्ञा तोड़कर भी सपने के नंबर पर सट्टा किया। कई बार उन्हें इसमें फायदा हुआ; किन्तु एक बार उनकी सारी सम्पत्ति चली गई, पाँच-सात मकान निकल गये। जो लोग अपने सपने पर, मनोराज्य पर ज्यादा विश्वास करते हैं वे धोखे में पड़ जाते हैं। 

     एक महात्मा ने हमें जो तीन बातें बतायी थी, उनमें एक यह थी। उन्होंने मुझे बताया कि “गुरु और शास्त्र के विपरीत जो सपना दीखे, मनोराज्य हो – ध्यान में मालूम पड़े उसका आदर न करो।” सपने में ठाकुरजी कहें ‘ब्याह करो’ तो मत मानना कि वह ठाकुरजी का हुकुम है, वह तो तुम्हारे मन में वासना है; वह ठाकुरजी बनकर आयी है। वैराग्य, त्याग, निर्वासनता के अनुकूल जो आदेश मिलते हैं वे ईश्वर के आदेश होते हैं। ईश्वर के आदेश संसार में फंसाने वाले नहीं होते। ईश्वर हमें अपनी ओर बुलाता है, उल्टी दिशा में नहीं भेजता।  

 

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जीवनोपयोगी सूत्र

     दूसरे की जानकारी ही दुःख है। हम अंग्रेजी नहीं पहचानते। A, B अभीतक जानने की कोशिश नहीं की, प्रयत्न करता तो जान लेता। गिनती में भी वही बात है। 6 और 9 में गलती होती है। मैं छोटा था तब अंग्रेजी बोलने वालों की बस्ती में जाता था। वहाँ के लड़के हमें देखकर अंग्रेजी में गालियाँ देते थे; किन्तु हम तो कुछ समझते न थे ! एक अंग्रेज अफ़सर ने कहा : ‘ये लड़के तो बड़े असभ्य हैं, वे तुम्हें गाली देते हैं। यह जाना; तब दुःख हुआ। जीवन में दुःख बाहर से नहीं आता, भीतर से निकलता है। दूसरे का दोष जानना दुःख है। अभिमान करना कि मैं बड़ा विद्वान् और दूसरों में दोष देखना; यह विद्वान् होकर दुःख निकलता है। एक व्यक्ति ने पाँच रुपया खोया और दुःखी हुआ। मैंने कहा : ‘चला गया? कुछ आया तो नहीं ? अब दुःख बुलाना क्यों ? जो गया उसे जाने दो। रुपया गया तो गया, दुःख मन में क्यों आये? डाकू पैसा ले जाय और उस डाकू को क्यों घर में बुलाना ? दुःख मेहमान है। 

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     हमारे गुरु, परम गुरु, परात्पर गुरु किस मार्ग पर चले हैं, वे किस प्रकार साधक को धीरे-धीरे ऊपर उठाकर मार्ग पर चलाते हैं, यह समझ कर हमें भी वैसे ही करना चाहिए। 

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     मैं अट्ठारह-उन्नीस वर्ष की वय में ही संतों के चक्कर में पड़ गया था। मुझे सत्सङ्ग – कुसङ्ग दोनों मिले। अच्छाई-बुराई,ईमानदारी-बेईमानी दोनों हम जानते हैं। ऐसे ही जीवन की धारा बहती रहती है, चक्रवत् घूमती रहती है। हमारे साधन, आचरण पवित्र होने चाहिए। 

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विवर्त काअर्थ

     देश, काल और देशकाल में दिखने वाली पदार्थ-समष्टि- सबका-सब परमात्मा के असल स्वरूप में जादू का खेल है- माया है- विवर्त है।  “वि” माने विपरीत-विरुद्ध और “वर्त” माने वर्तन, विपरीत वर्ताव- विरुद्ध वर्ताव। एक को अनेक देखना विरुद्ध वर्ताव है, चेतन को जड़-देखना विरुद्ध वर्ताव है, द्रष्टा को दृश्य देखना विरुद्ध वर्ताव है, अपने को अनेक रूप में देखना- अन्य रूप में देखना विरुद्ध वर्ताव है। विपरीतं वर्तनं विवर्तः विरुद्धं वर्तनं वा विवर्तः। जो वस्तु जैसी है उसके विरुद्ध उसको देखना- केवल मन के सम्बन्ध से- विरुद्ध वर्तन है। जितने भी पदार्थ हैं, सब के सब अपृथग्-भाव हैं। अपृथग्भाव अर्थात् परमात्मा से पृथक् इनकी कोई सत्ता नहीं। ये सब के सब सत्ता-शून्य होकर ही परमात्मा में दिखाई पड़ते हैं। जो इस बात को ठीक-ठीक जनता है- जो जानता है कि जितनी भी चीजें घड़ा, कपड़ा, स्त्री, पुरुष, पशु, पक्षी, मनुष्य  आदि अलग-अलग मालूम पड़ने वाली वस्तुएँ असल में एक अखण्ड, अद्वय तत्त्व में ही मालूम पड़ती है। जिसे यह ज्ञात हो गया कि एक में ही अनेक की कल्पना हो रही है। यह जो इदं सर्व के रूप में दिखाई पड़ रहा है, यह आत्मा ही है-ब्रह्म ही है, जो अलग-अलग रूपों में दिखाई पड़ रहा है इस बात को जिसने जान लिया उसकी तो छुट्टी है। जो यह जान गया कि ब्रह्म के अतिरिक्त न स्वर्ग है, न नरक, न गोलोक है, न कैलाश, न वैकुण्ठ है, न धरती, सात पाताल, सात स्वर्ग ये कोई ब्रह्म से भिन्न नहीं है। एक परमात्मा से अलग कोई नहीं है। यह तत्त्व ज्ञान जिसको हो गया वह तत्त्वविद् है।   

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साधु सावधान!

    एक महात्मा ने बताया, ‘कपड़ा चाहे सफेद हो या गेरुआ, घर में रहो या वन में, अपने को परिच्छिन्न जीव मत मानो। यह बात समझ में न आये तो गुरु से मिलकर समझो और यह निश्चय कर लो कि संसार के इन झगड़ों का हमारे मन से कोई सम्बन्ध नहीं है।’ मेरे मन में यह बात चमकी कब ? जब मैं श्री उड़ियाबाबा के सम्पर्क में आया। उनकी एक-एक बात अज्ञान को जड़मूल से उखाड़ने वाली थी। मैं अपने अनुभव की एक बात सुनाता हूँ – ‘मेरे पास एक आदमी आया। उसने मुझसे पूछा कि ‘मैं परमात्मा की  प्राप्ति के लिए क्या करुँ?’ मैंने उसे समझाया कि ‘परमात्मा की प्राप्ति के लिए कर्म, ध्यान, योगाभ्यास, भक्ति कुछ भी करने की जरुरत नहीं है।’ वह दूसरे दिन मेरे पास आया और बोला : ‘मैंने सब छोड़ दिया, ज्ञान योग भक्ति। ज्ञान ऐसे ही हो जाता है तो इस लफड़े में क्यों पड़ें ?’ मैंने पूछा : ‘तुमने क्या-क्या छोड़ा?’ उसने कहा : ‘सब छोड़ा’ फिर मैंने पूछा : ‘क्या दुकानदारी छोड़ी ?’ वह बोला : ‘नहीं, दुकान छोड़ेंगे तो खायेंगे क्या ? ‘मैंने पूछा, ‘अच्छा, दुकान भले रहे; व्यापार तुम ईमानदारी से करते हो ?’ उसने कहा : ‘ईमानदारी से व्यापार कैसे चलेगा ? बेइमानी तो करनी ही पड़ती है।’ फिर मैंने कहा : ‘तुम ब्लैक तो नहीं करते होगे ! उसने बताया: ‘अरे, इस  जमाने में इसके बिना तो चल ही नहीं सकता !’ उसने न दुकान छोड़ी, न बेइमानी छोड़ी, न ब्लैक करना छोड़ा  और सारे साधन छोड़ दिए ! मैंने मन में सोचा कि मैंने इस आदमी का कल्याण किया या अकल्याण ? तब मेरे मन में निश्चय हुआ कि जीवन में जितने ‘कु’ अर्थात् धर्मदृष्टि से निषेध है; उनको छोड़ना चाहिए। शास्त्र में बुराइयों का निषेध है, भक्ति योगाभ्यास आदि का निषेध नहीं है। शास्त्र में जो साधन बताये गए हैं; उनका कभी विरोध नहीं करना चाहिए, साधन में जो बाधक हैं उनका विरोध करना चाहिए। साधन करते-करते जब बुराइयाँ शिथिल पड़ जाएँगी, तब केवल अच्छाइयाँ रह जाएँगी। अज्ञान का पर्दा हल्का है।  ज्ञान होने पर अच्छाई-बुराई का भेद मिट जायेगा। 

     निषेध बुराई का किया जाता है, अच्छाई का नहीं। जब हम लोगों के बीच में वेदान्त का ज्ञान करवाते हैं  तब अधिकारी, अनधिकारी सबके बीच में बोलते हैं। एक बात निश्चित है कि जो लोग वेदान्त के नाम पर सदाचार का, भक्ति का, योगाभ्यास का, सत्शास्त्र का खंडन करते हैं; वे लोगों को ठीक रास्ते पर नहीं चलाते हैं। वे उनको ऐसे मार्ग पर डाल देते हैं जहाँ से उठने का उपाय ही नहीं है। वे लोग सदाचार की नींव को ही खण्डित कर रहे हैं। 

     तत्त्वज्ञान के लिए पहले दुर्वासना का, ईश्वर पर अविश्वास का, विक्षेप का, बुराई का खण्डन करो। इतनी बुराइयों के रहते साधन का खण्डन करना वेदान्त का मार्ग नहीं है।  

     इसलिए साधन का हम प्रारम्भ से ही समर्थन करते हैं। एक यज्ञोपवीत धारी ब्राह्मण को अपने विवेक को जागृत कर उसे बढ़ाना चाहिए। आजकल वेदान्त के नाम पर उच्छृंखलता और बुराइयों का जो पोषण हो रहा है; वह ज्ञान का मार्ग नहीं है। ऐसे कभी किसी को आत्मसाक्षात्कार हुआ नहीं है और होगा नहीं।  

 

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सर्व और केवल

सर्व कहना और केवल कहना इसमें फर्क है। एक कहना और अद्वय कहना इसमें फर्क है। इस बात को समझना चाहिए।

     सम्पूर्ण संख्याओं की जो समष्टि होगी उस समष्टि को सर्व बोलेंगे बहुतों के जोड़ को सब कहते हैं और जिसमें बहुत्व नहीं हो उसको केवल कहते हैं। परमात्मा केवल है-अकेला है। जिसमें एक बटे दो न हो, अकेला हो। जिसमें एक-एक दो नहीं, वह अकेला, अर्थात् अद्वय ब्रह्मतत्त्व।

     जैसे एक-एक दिन, एक-एक रात गिनते चले जाओ तो सम्पूर्ण दिन और रातों की जो समष्टि होगी उसको सर्वकाल कहेंगे। लेकिन जिसमें यह काल नहीं है वह अकाल है।

     एक-एक इंच, फिर एक-एक फुट, फिर एक-एक गज, एक-एक मील इस प्रकार जोड़ते-जोड़ते जो देश की समष्टि होगी, जिसके बाद देश का नाप नहीं हो सकता। छोटे – से छोटा देश  और बड़े-से-बड़ा देश- यह देश विस्तारक का सूचक है और इस देश समष्टि को सर्व देश कहते हैं। यह सर्व देश जिसमें कल्पित है, जिससे यह सर्व देश नहीं है उसे परिपूर्ण अद्वय कहते हैं।

     ये कण, कण, कण- सब कणों को जोड़ दिया ; एक-एक कण भी शेष नहीं रहा, भविष्यकाल में होने वाला कण भी बाकी नहीं रहा, वर्तमान में बिखरा हुआ कण भी बाकी नहीं रहा, इन कणों की जो समष्टि होगी वह होगी सर्व वस्तु। वह जिस प्रकाश में दिखाई पड़ रही है, उन सबका जो अधिष्ठान है, जिनमें ये वस्तुएँ नहीं हैं, उनके अत्यन्ताभाव का जो साक्षी-अधिष्ठान है उसको कहते हैं ब्रह्म। प्रत्यकचैतन्याभिन्न ब्रह्म तत्त्व में  यह जो काल सृष्टि है  कला,- काष्ठ, मुहूर्त, क्षण आदि  और उसमें जो यह देश सृष्टि  है इंच  फुट आदि और उसमें जो वस्तु सृष्टि है- अणु, परमाणु आदि ये सब जिसमें भास रहे हैं, जिसमें कल्पित हैं, जो इनका अधिष्ठान है, जो इनका प्रकाशक है, और जो इनके अत्यन्ताभाव का भी अधिष्ठान और प्रकाशक होने के कारण  इनसे सर्वथा रहित है; उस आत्मा को ब्रह्म कहते हैं, उस आत्मा का नाम ब्रह्म है और ऐसा यह अपना आत्म ब्रह्म है।  

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वेदान्त की सरलता

आपका ‘मैं’ क्या है ? क्या आपने समझ बूझ कर अपने को देह माना है ?

अच्छा, आइये, एकबार अपने ‘मैं’ को देह में से निकाल लीजिये। आपका यह  ‘मैं’ केवल ज्ञान है। न देह, न कर्मी। न भोगी, न योगी। न संसारी, न परिच्छिन्न। 

अपने ‘मैं’ को देश, काल, वस्तु से अपरिच्छिन्न  ब्रह्म समझ लीजिये,मान लीजिये। 

अब आप ब्रह्म हैं। आपकी उम्र, लम्बाई, चौड़ाई या तात्त्विक स्वरुप में यह प्रपञ्च क्या है ?

आपमें कुछ नहीं है या आप सब कुछ हैं। न कुछ टूटा, न फूटा, न बिगड़ा। उलटी बुद्धि सुलटी हो गयी। भ्रान्ति मिट गयी। सम्पूर्ण प्रपञ्च और उसमें भासमान देह भी आप ही हैं। परन्तु अब वह ‘अहं’ रहित जीवन्मुक्त है। 

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चिन्तन

     परमात्मा का यह संकल्प नहीं है कि सबका उद्धार हो जाये। उसका यह संकल्प है कि जो उसके द्वारा उपदिष्ट मार्गपर चले उसका उद्धार हो जाये ; अन्यथा ईश्वर की सृष्टिलीला का लोप हो जायेगा। 

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      सत्य पदार्थ का निरूपण करनेवाला ग्रन्थ ऐतहासिक, भौगोलिक अथवा कर्तृगत महत्त्व से महान् नहीं हुआ करता। उसके कागज, छपाई सफाईका भी उसपर प्रभाव नहीं पड़ता। वह जिस देश में, जिस काल में, जिस व्यक्ति के द्वारा, चाहे जैसे प्रकट होता है, अपने वर्ण्य पदार्थ के कारण महान् होता है। निश्चित रूप से  अध्यात्म रामायण आदि ग्रन्थ जनता के शाश्वत उपकारी हैं। हीरा किस समय, किस खान से, किसके द्वारा प्राप्त किया गया, यह मत देखो, उसका सच्चा मूल्याङ्कन करो। 

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      भुशुंडि – चरित्र अत्यन्त प्राचीन है। एक भुशुंडोपनिषत् भी है। योगवासिष्ठ में भुशुंडोपाख्यान है। वक्ता की आकृति, जाति आदि नहीं देखी जाती। उसके द्वारा वर्णित भगवद्गुणानुवाद से प्रेम करना चाहिए। पक्षिराज गरुड़ पक्षिचाण्डाल से भगवद्गुणश्रवण करते हैं। आवाज भी सुरीली नहीं। सुन्दर आकृति, उत्तम जाति सुरीली आवाज को छोड़ कर परमात्मा का श्रवण करो। 

 

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