पत्रोत्तर

परम प्रिय ………..

सप्रेम नारायणस्मरण !

मोह के संस्कार जन्म-जन्म के और इस जन्म में भी बाल्यावस्था से अब तक के हैं उनका उदय होना कोई आश्चर्य नहीं। उनमें फँस जाना या राग-द्वेष के वशीभूत हो जाना दोष है। आयें तो आयें, जायें तो जायें। जैसे सड़क पर भीड़ चलती है, उसमें अच्छे-बुरे सब चलते हैं, वैसे ही मन में सब चलते-फिरते रहते हैं। जैसे सड़क से बुलाकर आदमी को घर पर नहीं रखा जा सकता, वैसे ही अपने मनमें उनको टिकने नहीं देना चाहिए। उपेक्षा ही उनकी औषध है। उनके हटने-सटने की अपेक्षा करने से उनका बल बढ़ जाता है। अवज्ञा की दृष्टि से देखने पर वे अपने आप ही निर्बल हो जाते हैं। क्रिया में पक्षपात और क्रूरता नहीं आनी चाहिए।

स्वप्नकाल में पुराने संस्कार व्यवस्थितरूप से नहीं आते हैं। संस्कार तो आदमी और घोड़ा दोनों का होता है, परन्तु स्वप्न में, घोड़े की धड़ और आदमी का सिर जुड़ जाता है, यही स्वप्नस्थान का चमत्कार है। उसमें मोटर बैलगाड़ी हो जाती है और सड़क खन्दक बन जाती है,नाव सूखे में चलने लगती है। यह न कोई सगुन है, न सूचना। इसमें कुछ अच्छाई-बुराई नहीं होती, जितनी देर देखता है, उतनी ही देर का तमाशा है। जाग्रतावस्था आने पर उसका ख्याल छोड़ देता है। सपने को बदलने की कोशिश भी मत कीजिये। बदलने की कोशिश में उसके बार-बार आने की सम्भावना हो जाती है।

आप मन का चिन्तन मत कीजिये। आपका स्वरुप नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्त है। इसका न जन्म है, न मरण है। बेटी-बेटे की ओर ध्यान जाना,देहाभिमान ही परिणामरूप है। आप यह देह नहीं हैं। आपका न जन्म है, न मरण है। आपको मरने के बाद कहीं आना-जाना या कुछ होना नहीं है। आप ज्यों-के-त्यों ब्रह्म हैं अपने स्वरूप का अनुसन्धान कीजिये। मोह और स्वप्न दोनों को एक कक्षा की कुक्षि में निक्षिप्त करके स्वस्थ रहिये।

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परम प्रिय

सप्रेम नारायणस्मरण !

यदि देहगत व्यष्टि पञ्चभूत हो, समष्टि पञ्चभूत से एक करके देखा जाय तो एक जीववाद की प्रक्रिया स्पष्ट हो जाती है। ‘माण्डूक्योपनिषद्’ में जागृत स्थान में जो विश्व या वैश्वानर आत्मा है वह सप्ताङ्ग है। सप्ताङ्ग का अर्थ होता है – पृथिवी,जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्रमा और सूर्य। तुम वैश्वानर हो और पूर्वोक्त सात पदार्थ तुम्हारे शरीर में। यह जो एक देह है, जिसको तुम ‘मैं’ ‘मैं’ करते फिरते हो, यह तो देहाभास है। यह भिन्न-भिन्न शरीर न पञ्चभूत हैं, न उनके कार्य। ये न परिणाम हैं, न विकार हैं, न आरम्भ हैं। पञ्चभूत में कल्पित आकृतियाँ हैं। कल्पना-दशा में ही इनका भान होता है और कल्पनारहित दशा में इनका भान नहीं होता। अतः यह शरीर आत्मा नहीं है। सात अङ्गों वाला ही जाग्रतावस्था में आत्मा है। मैं देह नहीं हूँ, विश्वात्मा हूँ, वैश्वानर हूँ। यह अलग-अलग दीख पड़ने वाले शरीर मुझमें आभासमात्र हैं। इस निश्चय में देहगत भेद को कार्य नहीं माना जाता।

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पत्रोत्तर

परम प्रिय,

सत् माने अजर अमर एकरस परमात्मा। चित् माने स्वयंप्रकाश ज्ञान, जो बिना किसी आधार के, बिना किसी माध्यम के बिना किसी विषय के, हर हालत में जगमग-जगमग झिलमिलाता रहे। सत् और चित् में न मौत है, न बेवकूफी है, न वियोग है, न बेवफाई है। फिर दुःख काहेका? जो सत् व चित् में संतुष्ट नहीं है, उसे कुछ असत् चाहिए; उसे कुछ जड़ता चाहिए; वह कभी रोयेगा, कभी हंसेगा; कभी मुहब्बत में मुब्तिला, कभी नफरत से बेचैन। उसे वस्तु चाहिए, भोग चाहिए, हलचल चाहिए, परिवर्तन चाहिए। वह अपने में संतुष्ट नहीं है। उसे आनन्द का एकाध खण्ड, टुकड़ा कभी-कभी मिल जाता है। सच पूछो तो अखण्ड आनन्द मैं ही हूँ। वह तो तुम्हें मिला मिलाया ही है। ‘मुझको क्या तू ढूंढ़े बन्दे, मैं तो तेरे पास हूँ।’

शेष भगवत्स्मरण

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