‘इच्छा करने में सावधान’

      भगवान् कल्पवृक्ष स्वरुप हैं और हम सब उन्हीं की छत्र-छाया में उन्हीं के करकमलों के नीचे अथवा उन्हीं की गोद में हैं। हम लोग जीवन में जैसी-जैसी अभिलाषा करते हैं, वह हमारे जीवन के साथ जोड़ दी जाती है और हमारे जीवन में जब उसका उपयोग ठीक प्रतीत होता है, तब भगवान् उसे पूर्ण कर दिया करते हैं। इसलिए हमें सावधान रहना चाहिए कि जैसी इच्छा करने का निषेध है, हमारे जीवन में कहीं वैसी इच्छा न आ जाय। लोग स्वर्ग को बहुत महत्त्व देते हैं, परन्तु भगवद्-जन के सामने अथवा समत्व की तुलना में उसका कोई महत्त्व नहीं है। जब स्वर्ग के देवता और इंद्र के मन में भी मनुष्यों की अमरता से ईर्ष्या और जलन होने लगती है, तब एक बार बलात् हमारे मन में स्वर्ग की तुच्छता आ जाती है। कैसी विडंबना है कि स्वर्गीय देवताओं के मन में भी मनुष्यों के संहार की इच्छा जाग्रत् हो जाती है। इसलिए हमारे मन में स्वर्ग की इच्छा नहीं होनी चाहिए। 

      इस सम्बन्ध में एक बात और भी ध्यान देने योग्य है कि भगवान् की दयालुता भी अवर्णनीय है। जब वे देखते हैं कि जैसी इच्छा जीव में नहीं होनी चाहिए, वैसी इच्छा जीव कर रहा है, तब वे उसे ऐसे स्थान पर बैठा देते हैं कि उसकी इच्छा भी पूरी हो जाय और लोकहित में उसका सदुपयोग भी  हो जाय। 

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‘सब भगवान् का प्रसाद है !’

      ‘प्रभो ! स्वादवृत्ति के कारण कभी-कभी बड़ा विक्षेप होता है। कई वस्तुओं के तो स्मरण मात्र से ही जीभ पर पानी आ जाता है। कितना कमज़ोर मन है ! क्या करूँ ?

       ‘नारायण, इसी कमज़ोर मन से तो काम निकालना है, बलवान् मन कहाँ से लाओगे ? प्रसाद की भावना करो, प्रसाद का निश्चय करो, ऐसा न हो सके तो भगवान् को नैवेद्य लगाकर खाओ, भगवान् को ही खिलाओ। तुम्हारी यह जिह्वा-लोलुपता अथवा मन की कमज़ोरी साधन बन जायेगी और अधिकाधिक भगवान् का स्मरण होने लगेगा। फिर तो यह ‘भोजन’ का रस ‘भजन’ का रस बन जाएगा। 

      अच्छा, प्रसाद की भावना और निश्चय करो कि यह सारा जगत्, जगत् की सारी वस्तुएँ भगवान् का प्रसाद ही तो हैं। वही एकमात्र भोक्ता हैं और सब भोग्य भी । सबका रस- वास्तव में अपना रस- वे स्वयं अपने-आप ही ले रहे हैं। किसी भी वस्तु का रस भगवान् का रस है, ऐसा स्मरण ही साधन है। दूसरी वस्तु हो तब न ? वस्तु तो केवल भगवान् ही हैं। कहीं भी विक्षेप की संभावना नहीं है। 

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‘धर्मनिष्ठा का फल’

      प्राचीन समय में अङ्गिरा ऋषि के पुत्र सुधन्वा और प्रह्लाद के पुत्र विरोचन दोनों में एक सुन्दरी स्त्री के लिए यह विवाद चल पड़ा कि कौन श्रेष्ठ है ? दोनों ही अपने-अपने को श्रेष्ठ बतला रहे थे। प्राणों की बाज़ी लग गई – जो श्रेष्ठ हो, वह जीते; जो हार जाये, वह प्राण-त्याग करे। इस विवाद निर्णय के लिए वे प्रह्लाद के पास गये। दोनों की बात सुनकर प्रह्लाद बड़ी चिन्ता में पड़ गये; वे न तो अधर्म चाहते थे और न तो दोनों में से किसी की मृत्यु। उन्हें असमंजस में पड़े देखकर सुधन्वा ने कहा – ‘दैत्यराज ! यदि तुम पुत्र-स्नेह के कारण झूठ बोलोगे या कुछ उत्तर न दोगे तो इन्द्र वज्र के प्रहार से तुम्हारे सिर के सौ टुकड़े कर देंगे। प्रह्लाद महात्मा कश्यप के पास गये। उन्होंने महात्मा कश्यप से कहा- आप कृपा करके बताइये- जो कोई प्रश्न का ठीक-ठीक उत्तर नहीं देता या जान-बूझ कर झूठ बोलता है, उसे मरने पर कौन से लोक प्राप्त होते हैं ?’ कश्यप ने कहा- ‘जो क्रोध या भय के कारण जान-बूझ कर प्रश्नों का उत्तर नहीं देता अथवा झूठ बोलता है, उसे मृत्यु के पश्चात् वरुण की फाँसी में लटकना पड़ता है। जो साफ-साफ सत्य न कह कर गोलमटोल बोलकर दोनों पक्षों का जी रखना चाहता है, उसकी भी वही गति होती है। जिस सभा में अधर्म के द्वारा धर्म दबाया जाता है और सभ्य लोग धर्म  पक्ष न लेकर मौन ग्रहण कर लेते हैं, उस सभा के सभ्यों को भी अधर्म होता है। जहाँ निंदा करने योग्य कर्म की निंदा नहीं होती, वहाँ  पर सबसे श्रेष्ठ पुरुष को अधर्म का आधा पाप लगता है। आधे का आधा पाप कर्म करनेवाले को और बाकी  सभासदों को। जहाँ निंदनीय पापकर्म की निंदा की जाती है, वहाँ औरों को पाप नहीं लगता, केवल करनेवाले को ही लगता है। प्रश्न का अन्यथा उत्तर देने पर उसके पुण्य तो नष्ट हो ही जाते  हैं, साथ ही सात पीढ़ी आगे और सात पीढ़ी पीछे के लोग भी नरक में जाते हैं।’

      कश्यप के ये उपदेश सुनकर प्रह्लाद ने अपने पुत्र से कहा – ‘बेटा विरोचन ! तुम्हारी माता से सुधन्वा की माता श्रेष्ठ हैं, तुम्हारे पिता से अर्थात् मुझसे सुधन्वा के पिता श्रेष्ठ हैं। और,तुमसे सुधन्वा श्रेष्ठ है। अब ये सुधन्वा तुम्हारे प्राणों के  स्वामी हैं।’ प्रह्लाद की बात सुनकर  सुधन्वा बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा – ‘दैत्यराज ! तुमने अपने पुत्र के प्राणों की परवाह न कर के धर्म की रक्षा की है, इसलिए मैं तुम पर प्रसन्न हूँ और यह नहीं चाहता कि तुम्हारे पुत्र की मृत्यु हो। यह सौ वर्षों तक जीवित रहे और सुख भोगे।’

      इस प्रकार धर्म निष्ठा के फलस्वरूप प्रह्लाद ने अपने पुत्र की रक्षा कर ली। 

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प्रेरक-प्रसङ्ग

    एक बार महाराजश्री से बातचीत के दौरान एक सज्जन बोले कि ‘आम जनता मंदिरों के उत्सव की भीड़-भाड़ में बहुत जाती है, पर मुझे भीड़ में जाना नहीं रुचता। मैं तो एकान्त में बैठकर जपादि करना अधिक श्रेष्ठ मानता हूँ ‘।

    महाराजश्री ने कहा- ‘भैया ! तुम तो केवल दो तोले की जीभ को ही प्रभु की सेवा में लगाते हो और वे दो मन के शरीर को ले जाकर प्रभु की सेवा में उपस्थित होते हैं।’

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    एक बार सत्सङ्ग हो रहा था। एक व्यक्ति के बारे में किसी ने महाराजश्री से कहा- ‘उसे तो उच्छिष्ट-अनुच्छिष्ट का कोई विचार ही नहीं है।’ महाराजश्री ने उत्तर दिया- ‘नारायण, वह अपने भाव में मग्न हमेशा जगन्नाथपुरी में रहता है और वहाँ इस बात का कोई विचार नहीं माना जाता। 

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    एक बार महाराजश्री श्रीसाईं साहब के साथ बैठे थे। तभी महाराजश्री के पास एक पागल प्रेमी आया और उनके पास ही तख़्त पर बैठकर उनसे लिपट गया। सेवकों ने उसे रोका। उसके जाने पर श्रीसाईं साहब ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘ऐसे आदमी से तो भय रखना चाहिए। इनकी मनोवृत्ति का क्या ठिकाना ?’ महाराजश्री तुरन्त मुस्कुराते हुए बोले- ‘मुझे तो प्रसन्नता हो रही थी कि कोई तो हमारा आशिक हुआ।’

    किसी का भी दोष देखना असल में पूज्य महाराजश्री के स्वभाव ही नहीं था 

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