‘धर्म-नियंत्रित जीवन’

     कोई मनुष्य चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो अपनी सब इच्छाओं को पूर्ण नहीं कर सकता। 

  1. भोग की इच्छाएँ 
  2. संग्रह की इच्छाएँ 
  3. कर्म की इच्छाएँ 

    ऐसी स्थिति में आवश्यक है, कि इनमें छाँट की जाय। 

  1. कौन-कौन पूरी की जायँ। 
  2. कौन-कौन छोड़ दी जायँ। 
  3. किन्हें प्राथमिकता दी जाय। 
  4. किस एक के पूर्ण होने से और सब पूर्ण हो जाती हैं या मिट जाती हैं ?

     इस विवेक से धर्म  का प्रारम्भ होता है, बिना इच्छाओं में काट-छाँट या नियंत्रण से मनुष्य जीवन चल नहीं सकता,इसलिए संग्रह, भोग एवं कर्म पर विवेकानुसारी धर्म का नियंत्रण होना आवश्यक है। 

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     कर्म, भोग और संग्रह की इच्छाओं की मूल प्रेरणा एवं उद्देश्य के सम्बन्ध में विचार करने पर ज्ञात होता है कि उन्हें भी साधारण रूप से तीन भागों में बाँट सकते हैं। 

  1. जीवन सम्बन्धी– मृत्यु, रोग, भूख, ठंड, निर्बलता आदि से बचने के लिए सामग्रियों की आवश्यकता। 
  2. ज्ञान सम्बन्धी– कहीं मूर्ख न बनना पड़े, इसके लिए ग्रन्थ, पाठशाला, पर्यटन, चिन्तन, सत्संग आदि ज्ञान-रक्षक एवं वर्धक सामग्री। 
  3. आनन्द सम्बन्धी– इन्द्रिय और मन को अभाव, दुःख, चिन्ता आदि से बचा कर प्रफुल्ल-प्रसन्न करने के लिए सामग्री।    

 

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‘शान्ति का उपाय’

       कच ने सम्पूर्ण शास्त्रों के स्वाध्याय एवं मीमांसा के अनन्तर पिता के सामने निवेदन किया- ‘पिता जी, सब जान लिया, परन्तु शान्ति नहीं मिली।’

       बृहस्पति ने कहा- ‘बेटा, त्याग के बिना शान्ति नहीं मिलती।’

     और उसने सब कुछ त्याग दिया। केवल कौपीन-कमण्डलु रख कर वर्षों व्यतीत हुए। एक वर्ष, दो वर्ष, तीन वर्ष- त्याग का संकेत मिलने पर कौपीन-कमण्डलु भी छोड़ दिया। फिर भी शान्ति नहीं मिली। पिता के संकेत पर चिता जला कर शरीर भस्म करने के लिए उद्यत हुआ । पिता ने हाथ पकड़ लिया, बोले- ‘बेटा, जब तक वासनाओं से भरा चित्त है, उसके प्रति अहंता-ममता है, तब तक देह भस्म करने से कुछ न होगा। वासना के अनुसार देह पर देह मिलते जायेंगे। वस्तुतः देह का त्याग त्याग नहीं है, चित्त का त्याग ही त्याग है। चित्त-त्याग ही शान्ति है, चित्त-त्याग ही मुक्ति है।’

     कच- ‘चित्त त्याग की युक्ति क्या है,  पिताजी ?’

    बृहस्पति- ‘अपने आत्मा को ब्रह्म जान लेने से चित्त, चेत्य और चित्ति अर्थात् त्रिपुटी का बाध हो जाना ही चित्त का सच्चा त्याग है। फिर तो फुरता हुआ चित्त भी अकिंचित्कर है।’ 

 

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विचारणीय :

      जिनका धर्म से प्रेम है, वे कैसी भी परिस्थिति में पड़ जायें, धर्म उनका साथ नहीं छोड़ सकता। वे स्वयं आश्रयहीन होने पर भी दूसरों के आश्रय होंगे। वे स्वयं उपकार के पात्र होने पर भी दूसरों का उपकार करेंगे। जो सर्वदा दूसरों को देते चले आए हैं, वे अपने पास कुछ न रहने पर भी दूसरों को कुछ-न-कुछ देंगे ही। इसके ठीक विपरीत जो अधर्म से प्रेम करते हैं, अन्याय को आश्रय देते हैं, परपीड़न में ही उत्साह रखते हैं, वे चाहे कितनी भी अच्छी परिस्थिति में पहुँचा दिये जायें, अपनी दुष्टता नहीं छोड़ेंगे। यह बात कौरव और पाण्डवों के चरित्र में बहुत स्पष्ट रूप से दीखती है। 

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        सज्जन पुरुषों में यह स्वाभाविक गुण होता है कि यदि दूसरा कोई उनका अनिष्ट करना चाहे तो वे यथाशक्ति अनिष्ट से अपने को बचाने की चेष्टा करते हैं, परन्तु अनिष्ट करनेवाले का अनिष्ट नहीं करना चाहते। वे स्वभाव से ही सबका हित चाहते हैं और हित चाहने में यह भेदभाव नहीं रखते कि कौन मेरा शत्रु है कौन मेरा मित्र है। वे दुःखी को देख कर दयार्द्र हो जाते हैं, अनिष्ट करने वालों को देखकर उसके अन्दर सद्-बुद्धि का संचार करने लिये तड़पने लगते हैं और पुण्यात्मा को देखकर उसके पुण्य की अभिवृद्धि के लिए सचेष्ट हो जाते हैं। उनके जीवन का यही नियम है।  

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