पत्रोत्तर

1.

परमप्रिय …………

सप्रेम श्रीकृष्ण-स्मरण !

तुम्हें जैसा अनुभव होता है हुआ है और आगे भी होता रहेगा। प्रभु की प्राप्ति से भी बड़ी है – प्रभु की प्राप्ति के लिए व्याकुलता। व्याकुलता जितनी सच्ची और गहरी होगी, उतना ही अंतःकरण निर्मल होगा। निर्मल मन को प्रभु की प्राप्ति होती है।

शेष भगवत्कृपा !

2.

परम प्रेमास्पद …….……..

सप्रेम नारायण-समरण !

दलीय राजनीति का सबसे बड़ा दोष यह है कि अपनी पार्टियों के दुष्ट व्यक्तियों और गलत नीतियों का भी समर्थन करना पड़ता है। दूसरी पार्टी के शिष्ट-व्यक्तियों और अच्छाइयों का भी विरोध करना पड़ता है। यह भी एक प्रकार का भाई-भतीजावाद ही है। यही कारण है कि विश्व में कोई भी पार्टी टिकाऊ नहीं होती, बदलती रहती है।

आप सच्चे हृदय से जनता-जनार्दन की सेवा करते रहेंगे, तो आपकी विमुखता भी ऐसी होगी जैसे कोई बालक अपने पिता की गोद में बैठकर उसकी ओर पीठ किये हुए हो उसकी ओर मुँह न किये हो।

आपकी यह बात समझ में नहीं आयी कि आपको अपना नित्य नियम करने का पूरा समय नहीं मिलता। आप कठोरता से कह दीजिये- हम इस समय से इस समय तक एक घण्टेतक किसीसे नहीं मिलेंगे। जब लोग लौटने लगेंगे, प्रसिद्ध हो जायेगा तो उस समय आना बन्द कर देंगे। अपने घर के बाहर एक पट लगा दीजिये। कोई बैठा रहे तो उसके बैठने की व्यवस्था कर दीजिये। मन्त्र-पूजा प्रार्थना के समयपर यह निश्चय कर लीजिये कि –

सत हरि भजन, जगत सब सपना। ।

कहीं भी रहो, लोगों में सच्चरित्रता, सदाचार, पवित्रता एवं सद्भाव भरता रहे, ऐसा जीवन रखो।

भगवान् तुम्हें भक्ति-शक्ति और पवित्र अभिव्यक्ति देगा। सबको शुभाशीर्वाद।

शेष भगवत्कृपा !

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श्रीवृन्दावन-2

वृन्दा माने श्री राधा। उनका वन-वृन्दावन ! वृन्दावन श्रीराधारानी का व्यक्तिगत उद्यान है ! वह चिन्मय है ! जड़ तत्त्वों से बना हुआ नहीं है ! उसमें काल की दाल नहीं गलती। अनादि-अनन्त है ! आवश्यकता के अनुसार स्थान का संकोच-विस्तार प्रकट होता है। उसमें लौकिक देश का प्रवेश नहीं है ! वहाँ स्त्री जाति का जो कुछ है – वह सब राधा है ! वहाँ पुरुष जाति का जो कुछ है, वह कृष्ण है। लता-वृक्ष, पशु-पक्षी, कण-कण राधा कृष्ण स्वरुप हैं। एक प्यास है दूसरी तृप्ति। एक तृप्ति है – दूसरी प्यास। प्यास और तृप्ति के तरंगों का नाम ही वन है ! यह रस का वन है। ब्रह्म वन है ! रसिक संत इसी में निवास करते हैं ! वेदों में वन के नाम से ब्रह्म का वर्णन है ! उपनिषदों में ब्रह्म को ही वन कहा गया है। वन अर्थात् अनेकता में एकता ! सबमें वही सच्चिदानन्द भरपूर है, नाम, रूप चाहे कुछ भी क्यों ना हो। भू देवी का प्रेमोल्लास, हास-विलास, हार्द-विकास वृन्दावन है।

यह वृन्दावन स्थूल, सूक्ष्म और कारण की कल्पना से युक्त है ! व्रज सत् है ! लता-वृक्ष, पशु-पक्षी, ग्वाल-बाल चित् हैं ! गोप-गोपी,सखा-सखी आनन्द हैं ! श्री राधा-कृष्ण परमानन्द- रस सर्वस्व-सार हैं। भू-देवी का विलास होने के कारण ही रस के घनीभाव में तारतम्य होता है ! वन, कुञ्ज, निकुञ्ज ! निकुञ्ज में भी लीला-निकुञ्ज, नित्य-निकुञ्ज, निभृत-निकुञ्ज, निभृत-निकुञ्ज में सखा सखी किसी का प्रवेश नहीं है। वहाँ केवल आह्लाद आह्लादिनी युग्म की रसमयी क्रीड़ा है, मुस्कान है, चितवन है, परस्पर स्पर्श है। वहाँ न मान है, न भ्रम है, न विरह है ! पस्पर मिलन की तीव्र लालसा एक को दूसरे का रूप बना देती है। राधा कृष्ण से मिलने के लिए राधा हैं। कृष्ण राधा से मिलने के लिए कृष्ण हैं। दोनों लालसा रूप हैं ! परस्पर बदलते हैं। परस्पर नवीन मिलन होता है ! नया रस, नयी पहचान। नया मिलन। नये -नये राधा-कृष्ण। भेद है प्रेम का विलास, प्रेम का उल्लास ! दोनों ही प्रेम के द्वारा संचालित होते हैं। सबके नियन्ता को भी प्रेम-नियंत्रित करता है ! वैकुण्ठ लक्ष्मी का विलास है ! वहाँ ऐश्वर्य की प्रधानता है ! वृन्दावन भू-देवी का विलास है, यहाँ माधुर्य की प्रधानता है !श्री और भू दोनों ही राधारानी के अङ्ग हैं, अङ्गी राधा हैं। कृष्ण अङ्ग हैं- राधा अङ्गी हैं ! राधा अङ्ग हैं कृष्ण अङ्गी हैं ! विलास के लिए नाम दो हैं, वस्तु एक ही है।

सत् एक है, आकार दो हैं ! जैसे स्वर्ण और आभूषण ! चित् एक है, वृत्तियाँ दो हैं ! जैसे नेत्रेन्द्रिय एक गोलक दो ! आनन्द एक है, रस तरङ्ग दो हैं ! श्रीराधा-कृष्ण में कोई विभाजक रेखा नहीं है ! जहाँ दो होते हैं वहीं मिलन में देरी, दूरी या दूसरापन होता है ! एक में इनकी गति नहीं है। विपरीत ज्ञान भ्रम है, दूसरे से विरह है ! अपनेपन में मान है। रस-लीला में ये तीनों ही विवर्त हैं, वास्तविक नहीं। अतएव नित्य-निभृत-निकुञ्ज में इन भावों का प्रवेश नहीं है। ये लीला के बहिरंग भाव हैं, अंतरंग नहीं ! “एक स्वरुप सदा द्वै नाम, आनन्द की आह्लादिनी श्यामा, आह्लादिनी के आनन्द श्याम।” यहाँ आराधिका, आराधना एवं आराध्य का विभाग नहीं है। वे न द्वैत हैं, न त्रैत हैं ! न एकत्व है, न बहुत्व है !सच्चिदानंद वाग्वृत्ति, क्रियावृत्ति, अथवा भोगवृत्ति में आरूढ़ नहीं है ! स्पन्द एवं निःस्पन्द दोनों हित हैं, प्रेम-रस बोध है।

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श्रीवृन्दावन -1

वृन्दावन शब्द का अर्थ है – तुलसी का वन। तुलसी प्रेम की देवी है। उसे भगवान् ने आत्मीयरूप से स्वीकार किया है। उसे सर्वदा अपने सिर पर धारण करते हैं !आपने देखा होगा – शालग्राम पर तुलसीदल। बिना तुलसी के भगवान् को भोग नहीं लगता। तुलसी का भगवान् से प्रेम है। वह उनके स्पर्श के बिना नहीं रहती। भगवान् का तुलसी से प्रेम है, वे उसके बिना भोजन नहीं करते ! वृन्दावन अर्थात् परस्पर-समरस प्रेम का स्थान।

वृन्दावन : वृन्दा तुलसी के समान छोटे-छोटे पौधों का वन। बड़े-बड़े और पुराने वृक्षों के वन में हिंसक पशु निवास करते हैं। शेर, चीता, सांप अजगर- परन्तु वृन्दावन में हिंसक पशुओं का निवास नहीं है !भागवत शास्त्र के अनुसार वहाँ नैसर्गिक मित्रता का विलास है ! इसलिए वह भजन करने का पावन धाम है ! वैर, विरोध के स्थान में भजन नहीं होता। वहाँ शत्रु-मित्र चिन्तन होने लगता है ! वन शब्द का प्रकृतिगत अर्थ है- सम्यक् भक्ति ! संसार को अलग रखकर भगवत्प्रेम का रसास्वादन करना। सचमुच वृन्दावन ऐसा ही वन है :

वृन्दा श्रीराधारानी की एक सखी का नाम है ! सखी-शब्द का अर्थ है – जिसकी ख्याति समान हो !जहाँ वृन्दा वहाँ राधा – जहाँ राधा वहाँ वृन्दा ! जिस वन की व्यवस्था पर स्वामिनी वृन्दा हो – उसका नाम वृन्दावन ! वृन्दा सखी राधा-माधव की लीला सेवा के लिए सामग्री का सम्पादन करती है। शयन के समय शीतलता, मिलने के समय सायं काल, वियोग-लीला के समय प्रातः काल। स्नान के समय पद्यपरागमण्डित सरोवर, शयन के समय पुष्पों की सुख-शय्या, रास के समय कोमल-भूमिका विस्तार, सुगन्ध, माधुर्य, सुख-स्पर्श वायु, चन्द्रिका-चर्चित-आह्लाद-दायक प्रकाश, कोयल की कूक, पपीहा की पी-कहाँ, वस्त्र,अङ्ग-राग, वाद्य-संगीत- सबकी व्यवस्था वृंदा सखी करती है ! लीला में किसी वस्तु की न्यूनता न हो, इसलिए लीला की समग्रता सम्पादन करना इनका काम है! इनकी आज्ञा के बिना वृन्दावन में कोई प्रवेश नहीं कर सकता। वृन्दा का वन ही वृन्दावन है

(क्रमशः)

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जिज्ञासा और समाधान

प्रश्न : हिन्दू पद्धति में अनेक महिलाओं को विधवा जीवन बिताना पड़ता है। उनका जीवन सुखी कैसे हो ?

उत्तर : भारतीय संस्कृति संयम प्रधान है, इसलिए इसमें जितने उपदेश, आदेश दिये जाते हैं, सब संयम की प्रधानता से। स्वाभाविक विकारों को नियंत्रित करने से ही संस्कृति की रक्षा हो सकती है। वैसे, कुछ द्विजातियों को छोड़ कर अन्यत्र विधवा-विवाह प्रचलित है और वह शास्त्र के विरुद्ध नहीं है। अनेक पुरुषों से सम्बन्ध एवं भ्रूणहत्या आदि पापों की अपेक्षा तो किसी एक से विवाह होना ही श्रेष्ठ है। कन्यादान दुबारा नहीं हो सकता। विषयभोग में ही सुख है, यह विचार एकांगी है। इसलिए समाज-सुधारकों को इन बातों को ध्यान में रख कर ही लोगों की मनोवृत्ति में सुधार करने का प्रयास करना चाहिए।