विश्वास

    विश्वास करना ही पड़ता है- अपनी बुद्धि पर करो, चाहे परायी पर। विश्वास करने के लिए आत्मबल की आवश्यकता है। दुर्बल हृदय किसी पर विश्वास नहीं कर सकता। चरित्रभ्रष्ट पुरुष जितना जल्दी प्रभावित होता है, उतना ही जल्दी अविश्वास भी करता है। क्या तुम किसी पर विश्वास करते हो कि ये गला भी काट दें तो हमारा हित ही करते हैं ? परमात्मा पर ऐसा ही विश्वास करो। तुम निर्भय रहो। क्योंकि यदि तुम परमात्मा के प्रति हृदय से सच्चे रहे तो तुम्हारी हानि कभी हो ही नहीं सकती। जिसे संसारी लोग हानि समझते हैं, वह तो साधक के लिए परम लाभ है। भगवान् तुम्हारे चारों ओर और हृदय में रहकर तुम्हारी रक्षा कर रहे हैं। 

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    संसार में सुख-शांति से रहने के लिए ‘भगवान् का आशीर्वाद मेरे साथ है, इस विश्वास से बढ़कर कोई उपाय है ही नहीं। 

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जब अपना मन ही ईश्वर है,

जब अपना मन ही गुरुवर है,

तब बार-बार क्यों पूछ रहे,

विश्वास बिना सब पत्थर है 

जो होता है वह ईश्वर का 

करुणा से पूर्ण विधान भला,

यदि अपने मन को खलता है,

तो क्या पथ पर वह ठीक चला ?

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‘दुर्गुण और सद्-गुण’

    धन के लिए सेठ की पूजा, ईश्वर की नहीं, धन की पूजा है। स्त्री को ‘प्राणेश्वरी, हृदयेश्वरी’ कहना उसके रूप की, काम की पूजा है। किसी के दोष भी गुण दीखना, राग वश उसे ही पूर्ण मानना ईश्वर की नहीं, मोह की पूजा है। अपने को सर्व श्रेष्ठ मानकर दूसरों को हेय समझना, तिरस्कार करना अपने अहं की पूजा है। 

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    जीव के जीवन में चार सबसे बड़े बन्धन हैं-अज्ञान अनैश्वर्य, अवैराग्य और अधर्म। ये बन्धन ही उसके दुःख के कारण हैं। अज्ञान को ज्ञान से, शरणागति द्वारा अनैश्वर्य को, भक्ति से अवैराग्य को और धर्म से अधर्म रूप बन्धन को काटो और सुखी हो जाओ। 

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    जो जितना अधिक निर्वासन होगा, उसे भगवद्-भजन, भगवन्नाम का उतना ही अधिक रस, आनन्द आयेगा। संसार के पदार्थों में मन अटका रहे तो नाम-जप, कीर्तन आदि से संसार ही मिलेगा, भगवान् नहीं। भजन का नियम यह है कि निर्वासन होकर करने से भगवान् मिलते हैं। वासना युक्त भजन विलम्ब से चित्त शुद्ध करता है। 

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    निन्दा की परवाह न करना बहादुरी हो सकती है; परन्तु स्तुति का मीठा ज़हर पचा लेना उससे भी बड़ी बहादुरी है।  

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निष्काम कर्मयोग

इसकी चार भूमिकाएँ हैं :-

  1. फलासक्ति का त्याग 

  2. कर्तापन के अभिमान का त्याग 

  3. कर्मासक्ति का त्याग 

  4. अकर्तापन के अभिमान का त्याग 

    इनमें प्रथम दो तो समझ में तुरन्त आ जाती हैं और अभ्यास एवं प्रयत्न करने पर आचरण में भी उतर आती है। परन्तु फल की इच्छा तथा कर्तापन का अभिमान न होते हुए भी  हम उपस्थित कार्य पूरा करना अवश्य चाहते हैं। भला क्यों, किसलिए ? माना, हम श्रीहरि की प्रसन्नता के लिए कथा कर रहे हैं। श्लोकों की अर्धाली बोली, आरती का घंटा बज गया। क्या बता सकते हो, हम क्यों श्लोक का उच्चारण पूरा करना चाहते हैं ? जब हम कुछ फल नहीं चाहते, जब हम कर्ता नहीं, किस लक्ष्यार्थ से इच्छा करते हैं कि श्लोक का पाठ पूरा हो जाये ? घर-गृहस्थी के काम भी क्यों पूरे हों ? क्यों न हम इस क्षण, इसी स्थान से, सब व्यवस्था छोड़कर, विरक्त होकर चले जाएँ, अथवा विदेहमुक्त हो जाएँ।  क्या हमारे मन में अगले क्षण की कुछ आसक्ति बनी है? यदि है तो छोड़नी पड़ेगी। इतनी सब आसक्ति छोड़ने के बाद चित्त में अनासक्ति आती है; परन्तु अकर्तापन का एक अभिमान बना रहता है जो बड़ा सूक्ष्म होता है और कठिनता से कटता है। ;यदि वह कट जाये तो ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, क्योंकि इस प्रकार का निष्काम कर्मयोग साधन नहीं, तत्त्व है। 

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‘साधन-पथ’

कृपण कौन ?

भगवान् भले ही न मिलें, पर संसार न छूटने पाए- ऐसी चेष्टा वाला। 

बुद्धिमान् कौन ?

जो परमात्मा को पाने के लिए संसार छोड़ने को उद्यत है। 

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ध्यान के पॉँच विघ्न 

  1. लय – मन का सो जाना।
  2. विक्षेप- मन का चञ्चल होना। 
  3. रसास्वाद – मज़ा लेना, भोक्ता होना। 
  4. कषाय – रागास्पद या द्वेषास्पद का स्मरण। 
  5. अप्रतिपत्ति – ध्येय के स्वरूप को ठीक-ठीक ग्रहण न कर सकना। 

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    साधना का मार्ग प्राइवेट है। अकेले चलने का, अन्तरङ्ग मार्ग है। इसमें सगे-सम्बन्धी, स्वजन परिजन को साथ लेकर नहीं चला जा सकता। ये सब तो यहीं छूट जाते हैं। संसार के सब रास्ते, सब सम्बन्ध जहाँ समाप्त हो जाते हैं, साधन-पथ वहीं से प्रारम्भ होता है।  

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