पत्रोत्तर

परम प्रिय ………..

सप्रेम नारायणस्मरण !

मोह के संस्कार जन्म-जन्म के और इस जन्म में भी बाल्यावस्था से अब तक के हैं उनका उदय होना कोई आश्चर्य नहीं। उनमें फँस जाना या राग-द्वेष के वशीभूत हो जाना दोष है। आयें तो आयें, जायें तो जायें। जैसे सड़क पर भीड़ चलती है, उसमें अच्छे-बुरे सब चलते हैं, वैसे ही मन में सब चलते-फिरते रहते हैं। जैसे सड़क से बुलाकर आदमी को घर पर नहीं रखा जा सकता, वैसे ही अपने मनमें उनको टिकने नहीं देना चाहिए। उपेक्षा ही उनकी औषध है। उनके हटने-सटने की अपेक्षा करने से उनका बल बढ़ जाता है। अवज्ञा की दृष्टि से देखने पर वे अपने आप ही निर्बल हो जाते हैं। क्रिया में पक्षपात और क्रूरता नहीं आनी चाहिए।

स्वप्नकाल में पुराने संस्कार व्यवस्थितरूप से नहीं आते हैं। संस्कार तो आदमी और घोड़ा दोनों का होता है, परन्तु स्वप्न में, घोड़े की धड़ और आदमी का सिर जुड़ जाता है, यही स्वप्नस्थान का चमत्कार है। उसमें मोटर बैलगाड़ी हो जाती है और सड़क खन्दक बन जाती है,नाव सूखे में चलने लगती है। यह न कोई सगुन है, न सूचना। इसमें कुछ अच्छाई-बुराई नहीं होती, जितनी देर देखता है, उतनी ही देर का तमाशा है। जाग्रतावस्था आने पर उसका ख्याल छोड़ देता है। सपने को बदलने की कोशिश भी मत कीजिये। बदलने की कोशिश में उसके बार-बार आने की सम्भावना हो जाती है।

आप मन का चिन्तन मत कीजिये। आपका स्वरुप नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्त है। इसका न जन्म है, न मरण है। बेटी-बेटे की ओर ध्यान जाना,देहाभिमान ही परिणामरूप है। आप यह देह नहीं हैं। आपका न जन्म है, न मरण है। आपको मरने के बाद कहीं आना-जाना या कुछ होना नहीं है। आप ज्यों-के-त्यों ब्रह्म हैं अपने स्वरूप का अनुसन्धान कीजिये। मोह और स्वप्न दोनों को एक कक्षा की कुक्षि में निक्षिप्त करके स्वस्थ रहिये।

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परम प्रिय

सप्रेम नारायणस्मरण !

यदि देहगत व्यष्टि पञ्चभूत हो, समष्टि पञ्चभूत से एक करके देखा जाय तो एक जीववाद की प्रक्रिया स्पष्ट हो जाती है। ‘माण्डूक्योपनिषद्’ में जागृत स्थान में जो विश्व या वैश्वानर आत्मा है वह सप्ताङ्ग है। सप्ताङ्ग का अर्थ होता है – पृथिवी,जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्रमा और सूर्य। तुम वैश्वानर हो और पूर्वोक्त सात पदार्थ तुम्हारे शरीर में। यह जो एक देह है, जिसको तुम ‘मैं’ ‘मैं’ करते फिरते हो, यह तो देहाभास है। यह भिन्न-भिन्न शरीर न पञ्चभूत हैं, न उनके कार्य। ये न परिणाम हैं, न विकार हैं, न आरम्भ हैं। पञ्चभूत में कल्पित आकृतियाँ हैं। कल्पना-दशा में ही इनका भान होता है और कल्पनारहित दशा में इनका भान नहीं होता। अतः यह शरीर आत्मा नहीं है। सात अङ्गों वाला ही जाग्रतावस्था में आत्मा है। मैं देह नहीं हूँ, विश्वात्मा हूँ, वैश्वानर हूँ। यह अलग-अलग दीख पड़ने वाले शरीर मुझमें आभासमात्र हैं। इस निश्चय में देहगत भेद को कार्य नहीं माना जाता।

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पत्रोत्तर

परम प्रिय,

सत् माने अजर अमर एकरस परमात्मा। चित् माने स्वयंप्रकाश ज्ञान, जो बिना किसी आधार के, बिना किसी माध्यम के बिना किसी विषय के, हर हालत में जगमग-जगमग झिलमिलाता रहे। सत् और चित् में न मौत है, न बेवकूफी है, न वियोग है, न बेवफाई है। फिर दुःख काहेका? जो सत् व चित् में संतुष्ट नहीं है, उसे कुछ असत् चाहिए; उसे कुछ जड़ता चाहिए; वह कभी रोयेगा, कभी हंसेगा; कभी मुहब्बत में मुब्तिला, कभी नफरत से बेचैन। उसे वस्तु चाहिए, भोग चाहिए, हलचल चाहिए, परिवर्तन चाहिए। वह अपने में संतुष्ट नहीं है। उसे आनन्द का एकाध खण्ड, टुकड़ा कभी-कभी मिल जाता है। सच पूछो तो अखण्ड आनन्द मैं ही हूँ। वह तो तुम्हें मिला मिलाया ही है। ‘मुझको क्या तू ढूंढ़े बन्दे, मैं तो तेरे पास हूँ।’

शेष भगवत्स्मरण

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परम प्रेमास्पद

सप्रेम श्रीकृष्णस्मरण

शरणागति धर्म बहुत कठिन है। जिसको संसार की वस्तु का सहारा न हो और किसी दूसरे से किसी प्रकार की आशा-आकांक्षा न हो वह शरणागत होता है। अकिंचन और अनन्यगति होना शरणागत की पात्रता है।

शरणागति आत्मबोध है। पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, दिशा-काल, चन्द्र-सूर्य आदि जिसके द्वारा नियंत्रित हैं, वही हमारे इस जीवन का भी नियन्ता है। सब कुछ जिसके अधीन है, मैं भी उसी के अधीन हूँ। यह केवल विश्वास नहीं है, सत्य है, बोध है, अनुभव है। मैं शरणागत नहीं, स्वतंत्र हूँ- यह असत्य है, भ्रम है, कल्पना मात्र है। आप अपनी शरणागति को पहचानिये, उसका अनुभव कीजिये। आप पहले से ही शरणागत हैं। प्रभु के हाथों के खिलौना हैं। वह यंत्री हैं। आप यंत्र हैं।

आपके जीवन-क्रम में अध्ययन है। अधिवक्ता का काम है। साथ ही परिवार भी है। कर्त्तव्य-पालन भी भगवान् के भजन का ही एक अंग है। आप अपने जीवन को व्यवस्थित कीजिये। जो लोग विधि-विधान को नहीं जानते, उनकी बात सुनने-समझने और परामर्श देने के लिए एक निश्चित समय रखिये। न्यायालय में उन्हें ठीक-ठीक न्याय मिल सके,इसके लिए प्रयत्न कीजिये। कोई अज्ञान के कारण न्याय से वञ्चित न रह जाये यह प्रभु के सद्भाव व चिद्भाव की सेवा है।

आपको प्रभु का दिया हुआ युवा शरीर और तत्सम्बन्धी परिवार प्राप्त है। प्रभु के इस दान की उपेक्षा मत कीजिये। शरीर ठीक रखिये। परिवार का भरण-पोषण कीजिये। सम्बन्धियों के प्रति जो कर्त्तव्य है, उसका उचित निर्वाह कीजिये। अपने सोने-जागने का समय निश्चित कीजिये। जीवन में प्रमाद-आलस्य को स्थान मत दीजिये। युवा अवस्था का सहज धर्म है- उत्साह। उत्साह वीर रस का स्थायी भाव है। इससे शरीर और मन में सुषुप्त शक्तियों का जागरण होता है। सफलता आकाश से नहीं टपकती। वह सेना, सामग्री से भी प्राप्त नहीं होती। भीख माँगने से भी नहीं मिलती। आशावान् होकर दृढ़ता से अपने पथ पर चलते रहिये। पहुँचना सिद्धि नहीं है, चलना ही सिद्धि है। चरैवेति। जीवन में जो मिलता है, वह सपना है। सपने बदलते रहते हैं, जीवन चलता रहता है।

आपके शरीर में रोग की अधिकता है, वह भोजन-पान आदि की अनियमितता के कारण है। मन कहीं, तन कहीं, दोनों में सामञ्जस्य नहीं है। जिसके मन में कर्त्तव्य-पालन के समय भी ग्लानि भर रही हो, वह स्वस्थ कैसे रह सकेगा ? आपका मन जीवन की मुख्य धारा से अलग हो गया है। आप क्यों नहीं अपने जीवन में भगवान् के भजन के लिए घण्टे -दो-घण्टे का एक या दो समय निश्चित कर देते। उतनी देर तक जप-पूजा कीजिये। बाकी समय सामाजिक, पारिवारिक और शारीरिक कर्म कीजिये। निरन्तर भजन करने की जिद्द अज्ञानमूलक है। कोई भी व्यष्टि सृष्टि में ऐसा नहीं है जो निरन्तर एक ही वृत्ति रख सके। एक अशक्य अनुष्ठान का संकल्प करके पूरा न होने पर मनुष्य दुःखी होता है।

जब शरीर की स्थिति और मन के भजन में समन्वय नहीं हो पाता तब नाना प्रकार की व्याधि उत्पन्न होते हैं। आपके कष्ट का अधिकांश मानसिक है। क्योंकि भजन छोड़ते ही आपका आधा कष्ट दूर हो जाता है। मानसिक कष्ट अधिक दिनों तक रहने पर शारीरिक बन जाता है। आप अपनी जीवनचर्या की एक समय-सारिणी बनाइये। उसमें घण्टे या दो घण्टे से अधिक नामस्मरण के लिए मत रखिये। शुद्ध आहार-विहार कीजिये। वह अधिक या न्यून नहीं होना चाहिए। नियमित होना चाहिए। प्रातःकाल ही एक कार्यक्रम बना लीजिये कि आज दिन में इतने काम करने हैं। रोग के चार कारण हैं। मन के अनुकूल परिस्थिति न बनना; बार-बार विपरीत परिस्थितियों का आना; अधिक श्रम करना; और शरीर में धातुओं का विषम हो जाना। आप निश्चय कर लीजिये कि समाज का, परिवार का, शरीर का ठीक-ठीक व्यवहार निर्वाह करना मुख्य है और बीच में या आदि-अन्त में भगवान् का स्मरण कर लेना आवश्यक है। बैटरी में बिजली भर लेने के बराबर मन को भगवान् के साथ जोड़ना आवश्यक है। यदि एक क्षण भी ठीक-ठीक मन की कड़ी भगवान् के साथ जुड़ जाये तो सारा दिन आनन्दमय हो जाता है। आप निराश न हों, उदास न हों। अपने जीवन को कर्त्तव्य-पथपर अग्रसर करें और अपने प्रत्येक कर्म के द्वारा सर्वात्मा प्रभु की आरधना करें।

शेष भगवत्कृपा !

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परम प्रेमास्पद

सप्रेम नारायणस्मरण

जो स्वप्न का द्रष्टा आत्मा है समग्र स्वप्न ही उसका शरीर है। वह भी सप्ताङ्ग है। स्वप्न में भी जो सूर्य, चन्द्रमा, आकाश आदि हैं, वे स्वप्नद्रष्टा के शरीर ही हैं। देश, काल, वस्तुएँ सब दृष्टि में कल्पित आकृतियाँ हैं। स्वप्न में मैं कुम्भ मेला देखने गया। प्रयाग की विशाल भूमि दृश्य है। वहाँ दिन-रात काल भी दृश्य है। सूर्य-चन्द्रमा भी दृश्य है। देश-काल और वस्तु का इतना लम्बा-चौड़ा विस्तार,उसमें जो स्नानार्थी यात्री हैं, सब स्वप्न पुरुष हैं। उन्हीं में एक मैं भी धक्का खा रहा हूँ, स्नान कर रहा हूँ। मैं- सहित सब यात्री स्वप्न पुरुष हैं मैं तो वह हूँ जो यह स्वप्न देख रहा है। स्वप्न के पूर्वोक्त सातों पदार्थ स्वप्न देखनेवाले के मन के ही रूप हैं। वहाँ दीखने वाला कोई भी पूर्व-जन्म का पापी या पुण्यात्मा जीव नहीं है। स्वप्न में जो जीव दीखते हैं, उनका पूर्व जन्म या उत्तर जन्म नहीं होता। वे तो उसी समय दीखते हैं। वहाँ के पति-पत्नी पहले के ब्याहे हुए नहीं हैं। वहाँ के पिता-पुत्र की उम्र छोटी-बड़ी नहीं है। उन स्नान करने वालों को स्वर्ग भी नहीं मिलेगा। वह सब स्वप्न द्रष्टा की दृष्टि है। जीवाभास, द्रव्याभास, देशाभास और कालाभास चमक रहे हैं। वहाँ कोई वस्तु है तो स्वप्न देखने वाला। वह एक है, उसमें अनेकता नहीं है। जरा दृश्य से अलग करके उसके स्वरुप को समझो। स्वप्न दृश्य का निर्माता,स्वप्नपुरुषो का स्वामी, स्वप्न के बदलने और मिटने का साक्षी, कोटि-कोटि स्वप्नों में एक है। परमात्मा से अलग-अलग होने पर उसका कोई स्वरुप सिद्ध नहीं हो सकता। परमात्मा से एक होना ही उसका सत्-चित् आनन्दरूप है। यदि उसकी दृष्टि का विपरिलोप हो जाय तो विपरिलोप को कौन देखेगा ?

जो है, हो रहा है, दीख रहा है, बदल रहा है, मर रहा है- बस, यही सहज समाधि है।

शेष भगवत्कृपा

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परम प्रेमास्पद

शुभाशीर्वाद

तुम अपने मन भावों को भाषा देने में निपुण हो। प्रश्न यह है कि मन में कई आकृतियाँ चल-चित्र-सी उभरती-मिटती हैं, कोई अभिव्यक्ति स्थिरता ग्रहण नहीं करती। यह ठीक है। ऐसा ही होता है।

गङ्गा बह रही थी। तरङ्ग के बाद तरङ्ग। हर-हर-हर-हर। मैं तटस्थ था। मैं केवल देख रहा था। तरङ्गों के बहने-बदलने से, उनकी तीव्र एवं मधुर ध्वनि से, द्रुत तथा विलम्बित गति से मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। मैं तटस्थ, कूटस्थ, मैं केवल द्रष्टा; साक्षी, निष्पन्द, निःसंग, निस्तरंग देख रहा था, और केवल देख रहा था। स्थिरता आकृतियों को नहीं देना है। उन्हें कितनी भी स्थिरता दी जाये, थोड़ी देर के बाद टूट जायेगी। वैसे न भी टूटे, तो भी नींद मन की सभी आकृतियों को तोड़ देती है। ऐसी अवस्था में इसे अन्तर्यामी की ही एक लीला समझनी चाहिए कि आकृतियाँ टूटती-छूटती-फूटती रहती हैं। अन्तर्यामी खेल रचता रहता है। साक्षी पहले खेल देखता है और उन आकृतियों से अन्तरङ्ग, किन्तु स्वयं से बहिरङ्ग अंतर्यामी को देखता रहता है। तुम स्थिर साक्षी हो यह सत्य है। अन्तर्यामी को अपनी दृष्टि से स्थिर बना सकते हो यह भी सत्य है, परन्तु चलचित्र को स्थिर बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है उसकी उपेक्षा कर दो अथवा उसके खेल और खिलाड़ी का आनन्द लो !सटाओ मत, हटाओ मत। दोनों अवस्थाओं को अपने साथ पटालो। जीवन कड़वे से शत्रुता और मीठे से मित्रता करने के लिए नहीं है। दोनों का स्वाद लेने के लिए है। वे दोनों ही एक दूसरे के स्वाद के पूरक हैं।

यदि तुम्हें यही ठीक लगता हो कि कोई आकृति स्थिर कर दी जाय तो उसका नाम रखो- कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण। यह नाम तुम्हारे अन्तरतम में गुप्त-लुप्त-सुप्त प्रियता को मूर्ति देकर अभिव्यक्त कर देगा और तुम देखोगी कि उस मूर्ति की चलता भी तुम्हें प्रिय लगेगी। जिससे प्रेम होता है उसकी चञ्चलता-छेड़छाड़ भी प्रिय लगती है। चितवन चञ्चल, मुस्कान चञ्चल, अंग-प्रत्यंग तरंगायित।जैसे सिनेमा का चित्र चंचल होने पर भी एक लगता है, वैसे ही अन्तर्देश के सूक्ष्मतम प्रदेश में वह मधुर मूर्ति भी हँसकर, नाचकर, गाकर स्पंदित रहेगी; परन्तु तुम्हें एक और ज्यों-की-त्यों जान पड़ेगी। इस अवस्था में अन्तर और बाहर का भेद मिट जाता है। आह्लाद के चरम प्रकाश में बाहर-भीतर और अपने पराये का भेद नहीं होता। वह तुम्हारी आत्मा ही है जो प्रियता की अभिव्यक्ति में मुस्करा रही है और वह भी तुम्हीं हो जो उसको देख-देखकर तृप्त हो रहे हो।

शेष भगवत्स्मरण

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पत्रोत्तर

परम प्रिय

आनन्द में मस्त रहा करो।

अलमस्त फकीरा रहम अल्ला। अल्ला की रहम से फकीर अलमस्त हो गया है। सचमुच गुरु, दीक्षा के साथ ही शिष्य के हृदयदेश में प्रवेश करता है। यदि हृदय में पहले से कोई रह रहा हो या बहुत कुछ रह रहा हो, तो उनका असर खत्म करने में या उन्हें बाहर निकालने में देर लगती है। रोग प्रबल हो तो पहले इंजेक्शन से कोई फायदा दीखने में नहीं आता। वैसे कुछ-न-कुछ फायदा तो होता ही है। जब गुरु रोम-रोम में प्रवेश कर जाता है, तब मौत का डर, मूर्खता और दुःख भाग जाते हैं। गुरु जब अपने आत्मा से एक हो जाते हैं तब वही मन्त्र परमेश्वर के प्रेम के रूप में प्रकट होता है। जो भीतर प्यारा लगता है उसको बाहर देखने का भी मन होता है। जिससे हृदय में प्रेम है,उसको बाहर भी देखना चाहते हैं। ठाकुरजी की एक मूर्ति मंदिर में अचल बैठी रहती है, दूसरी उत्सव-मूर्ति रथ पर बैठाकर बाहर घुमाई जाती है। क्यों ठीक है न ? जो भीतर अच्छा लगता है, वह बाहर भी मिलता रहे, तो कितना अच्छा है ? क्या आँख बन्द करने पर दोस्त दीखे और खोलने पर दुश्मन, तो अच्छा लगेगा? सेवा तो प्रेम का अनुभाव है। प्रेम अन्तरङ्ग है, सेवा उसका जाहिर रूप है। सेवा के बिना प्रेम कैदी है। प्रेम के बिना सेवा केवल बटन दबाकर मिलनेवाली मिठाई है।

शेष भगवत्कृपा

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पत्रोत्तर

1.

परमप्रिय …………

सप्रेम श्रीकृष्ण-स्मरण !

तुम्हें जैसा अनुभव होता है हुआ है और आगे भी होता रहेगा। प्रभु की प्राप्ति से भी बड़ी है – प्रभु की प्राप्ति के लिए व्याकुलता। व्याकुलता जितनी सच्ची और गहरी होगी, उतना ही अंतःकरण निर्मल होगा। निर्मल मन को प्रभु की प्राप्ति होती है।

शेष भगवत्कृपा !

2.

परम प्रेमास्पद …….……..

सप्रेम नारायण-समरण !

दलीय राजनीति का सबसे बड़ा दोष यह है कि अपनी पार्टियों के दुष्ट व्यक्तियों और गलत नीतियों का भी समर्थन करना पड़ता है। दूसरी पार्टी के शिष्ट-व्यक्तियों और अच्छाइयों का भी विरोध करना पड़ता है। यह भी एक प्रकार का भाई-भतीजावाद ही है। यही कारण है कि विश्व में कोई भी पार्टी टिकाऊ नहीं होती, बदलती रहती है।

आप सच्चे हृदय से जनता-जनार्दन की सेवा करते रहेंगे, तो आपकी विमुखता भी ऐसी होगी जैसे कोई बालक अपने पिता की गोद में बैठकर उसकी ओर पीठ किये हुए हो उसकी ओर मुँह न किये हो।

आपकी यह बात समझ में नहीं आयी कि आपको अपना नित्य नियम करने का पूरा समय नहीं मिलता। आप कठोरता से कह दीजिये- हम इस समय से इस समय तक एक घण्टेतक किसीसे नहीं मिलेंगे। जब लोग लौटने लगेंगे, प्रसिद्ध हो जायेगा तो उस समय आना बन्द कर देंगे। अपने घर के बाहर एक पट लगा दीजिये। कोई बैठा रहे तो उसके बैठने की व्यवस्था कर दीजिये। मन्त्र-पूजा प्रार्थना के समयपर यह निश्चय कर लीजिये कि –

सत हरि भजन, जगत सब सपना। ।

कहीं भी रहो, लोगों में सच्चरित्रता, सदाचार, पवित्रता एवं सद्भाव भरता रहे, ऐसा जीवन रखो।

भगवान् तुम्हें भक्ति-शक्ति और पवित्र अभिव्यक्ति देगा। सबको शुभाशीर्वाद।

शेष भगवत्कृपा !

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श्रीवृन्दावन-2

वृन्दा माने श्री राधा। उनका वन-वृन्दावन ! वृन्दावन श्रीराधारानी का व्यक्तिगत उद्यान है ! वह चिन्मय है ! जड़ तत्त्वों से बना हुआ नहीं है ! उसमें काल की दाल नहीं गलती। अनादि-अनन्त है ! आवश्यकता के अनुसार स्थान का संकोच-विस्तार प्रकट होता है। उसमें लौकिक देश का प्रवेश नहीं है ! वहाँ स्त्री जाति का जो कुछ है – वह सब राधा है ! वहाँ पुरुष जाति का जो कुछ है, वह कृष्ण है। लता-वृक्ष, पशु-पक्षी, कण-कण राधा कृष्ण स्वरुप हैं। एक प्यास है दूसरी तृप्ति। एक तृप्ति है – दूसरी प्यास। प्यास और तृप्ति के तरंगों का नाम ही वन है ! यह रस का वन है। ब्रह्म वन है ! रसिक संत इसी में निवास करते हैं ! वेदों में वन के नाम से ब्रह्म का वर्णन है ! उपनिषदों में ब्रह्म को ही वन कहा गया है। वन अर्थात् अनेकता में एकता ! सबमें वही सच्चिदानन्द भरपूर है, नाम, रूप चाहे कुछ भी क्यों ना हो। भू देवी का प्रेमोल्लास, हास-विलास, हार्द-विकास वृन्दावन है।

यह वृन्दावन स्थूल, सूक्ष्म और कारण की कल्पना से युक्त है ! व्रज सत् है ! लता-वृक्ष, पशु-पक्षी, ग्वाल-बाल चित् हैं ! गोप-गोपी,सखा-सखी आनन्द हैं ! श्री राधा-कृष्ण परमानन्द- रस सर्वस्व-सार हैं। भू-देवी का विलास होने के कारण ही रस के घनीभाव में तारतम्य होता है ! वन, कुञ्ज, निकुञ्ज ! निकुञ्ज में भी लीला-निकुञ्ज, नित्य-निकुञ्ज, निभृत-निकुञ्ज, निभृत-निकुञ्ज में सखा सखी किसी का प्रवेश नहीं है। वहाँ केवल आह्लाद आह्लादिनी युग्म की रसमयी क्रीड़ा है, मुस्कान है, चितवन है, परस्पर स्पर्श है। वहाँ न मान है, न भ्रम है, न विरह है ! पस्पर मिलन की तीव्र लालसा एक को दूसरे का रूप बना देती है। राधा कृष्ण से मिलने के लिए राधा हैं। कृष्ण राधा से मिलने के लिए कृष्ण हैं। दोनों लालसा रूप हैं ! परस्पर बदलते हैं। परस्पर नवीन मिलन होता है ! नया रस, नयी पहचान। नया मिलन। नये -नये राधा-कृष्ण। भेद है प्रेम का विलास, प्रेम का उल्लास ! दोनों ही प्रेम के द्वारा संचालित होते हैं। सबके नियन्ता को भी प्रेम-नियंत्रित करता है ! वैकुण्ठ लक्ष्मी का विलास है ! वहाँ ऐश्वर्य की प्रधानता है ! वृन्दावन भू-देवी का विलास है, यहाँ माधुर्य की प्रधानता है !श्री और भू दोनों ही राधारानी के अङ्ग हैं, अङ्गी राधा हैं। कृष्ण अङ्ग हैं- राधा अङ्गी हैं ! राधा अङ्ग हैं कृष्ण अङ्गी हैं ! विलास के लिए नाम दो हैं, वस्तु एक ही है।

सत् एक है, आकार दो हैं ! जैसे स्वर्ण और आभूषण ! चित् एक है, वृत्तियाँ दो हैं ! जैसे नेत्रेन्द्रिय एक गोलक दो ! आनन्द एक है, रस तरङ्ग दो हैं ! श्रीराधा-कृष्ण में कोई विभाजक रेखा नहीं है ! जहाँ दो होते हैं वहीं मिलन में देरी, दूरी या दूसरापन होता है ! एक में इनकी गति नहीं है। विपरीत ज्ञान भ्रम है, दूसरे से विरह है ! अपनेपन में मान है। रस-लीला में ये तीनों ही विवर्त हैं, वास्तविक नहीं। अतएव नित्य-निभृत-निकुञ्ज में इन भावों का प्रवेश नहीं है। ये लीला के बहिरंग भाव हैं, अंतरंग नहीं ! “एक स्वरुप सदा द्वै नाम, आनन्द की आह्लादिनी श्यामा, आह्लादिनी के आनन्द श्याम।” यहाँ आराधिका, आराधना एवं आराध्य का विभाग नहीं है। वे न द्वैत हैं, न त्रैत हैं ! न एकत्व है, न बहुत्व है !सच्चिदानंद वाग्वृत्ति, क्रियावृत्ति, अथवा भोगवृत्ति में आरूढ़ नहीं है ! स्पन्द एवं निःस्पन्द दोनों हित हैं, प्रेम-रस बोध है।

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श्रीवृन्दावन -1

वृन्दावन शब्द का अर्थ है – तुलसी का वन। तुलसी प्रेम की देवी है। उसे भगवान् ने आत्मीयरूप से स्वीकार किया है। उसे सर्वदा अपने सिर पर धारण करते हैं !आपने देखा होगा – शालग्राम पर तुलसीदल। बिना तुलसी के भगवान् को भोग नहीं लगता। तुलसी का भगवान् से प्रेम है। वह उनके स्पर्श के बिना नहीं रहती। भगवान् का तुलसी से प्रेम है, वे उसके बिना भोजन नहीं करते ! वृन्दावन अर्थात् परस्पर-समरस प्रेम का स्थान।

वृन्दावन : वृन्दा तुलसी के समान छोटे-छोटे पौधों का वन। बड़े-बड़े और पुराने वृक्षों के वन में हिंसक पशु निवास करते हैं। शेर, चीता, सांप अजगर- परन्तु वृन्दावन में हिंसक पशुओं का निवास नहीं है !भागवत शास्त्र के अनुसार वहाँ नैसर्गिक मित्रता का विलास है ! इसलिए वह भजन करने का पावन धाम है ! वैर, विरोध के स्थान में भजन नहीं होता। वहाँ शत्रु-मित्र चिन्तन होने लगता है ! वन शब्द का प्रकृतिगत अर्थ है- सम्यक् भक्ति ! संसार को अलग रखकर भगवत्प्रेम का रसास्वादन करना। सचमुच वृन्दावन ऐसा ही वन है :

वृन्दा श्रीराधारानी की एक सखी का नाम है ! सखी-शब्द का अर्थ है – जिसकी ख्याति समान हो !जहाँ वृन्दा वहाँ राधा – जहाँ राधा वहाँ वृन्दा ! जिस वन की व्यवस्था पर स्वामिनी वृन्दा हो – उसका नाम वृन्दावन ! वृन्दा सखी राधा-माधव की लीला सेवा के लिए सामग्री का सम्पादन करती है। शयन के समय शीतलता, मिलने के समय सायं काल, वियोग-लीला के समय प्रातः काल। स्नान के समय पद्यपरागमण्डित सरोवर, शयन के समय पुष्पों की सुख-शय्या, रास के समय कोमल-भूमिका विस्तार, सुगन्ध, माधुर्य, सुख-स्पर्श वायु, चन्द्रिका-चर्चित-आह्लाद-दायक प्रकाश, कोयल की कूक, पपीहा की पी-कहाँ, वस्त्र,अङ्ग-राग, वाद्य-संगीत- सबकी व्यवस्था वृंदा सखी करती है ! लीला में किसी वस्तु की न्यूनता न हो, इसलिए लीला की समग्रता सम्पादन करना इनका काम है! इनकी आज्ञा के बिना वृन्दावन में कोई प्रवेश नहीं कर सकता। वृन्दा का वन ही वृन्दावन है

(क्रमशः)

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