ऐसे जीओ कि ईश्वर अपने में ही दिखाई दे !

     आदरणीय सत्पुरुषों के प्रति आदर-भक्ति और पूज्यभाव जरूर रखो। किन्तु उनके समक्ष ‘तुम कुछ भी नहीं हो’, ऐसी आत्मग्लानि न महसूस करो। 

    ईश्वर तो सर्वत्र बैठा है। इसलिए सामनेवाले में ही ईश्वर बैठा है और हममें नहीं, यह बात ठीक नहीं है। सर्वव्यापक परमात्मा तो सामने बैठे हुए व्यक्ति में भी बैठा है और हममें भी बैठा है। 

     हमें इस तरह से व्यवहार करना चाहिए कि अपने में बैठा हुआ ईश्वर हमारे सद्वर्तन से, हमारे सद्भाव से और हमारे उच्च जीवन से हममें ही अनेकको दर्शन दे। 

     एक महात्मा से किसी ने पूछा : ‘ईश्वर कैसा ?

     महात्मा ने कहा : ‘तेरे जैसा।’

     उसने फिर पूछा : ‘और मैं  कैसा ?’

     महात्मा हँसकर बोले :  ‘अरे भाई, तू अपने को ही नहीं जानता तो फिर जगत् के प्रकाशक को कैसे जानेगा ?’

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“तमसो मा ज्योतिर्गमय”

  •  कुल्हाड़ी चन्दन को काटती है, परन्तु चन्दन कटकर भी उसे सुगन्ध देता है। इसी प्रकार अपकार करनेवाले के प्रति भी महात्मा दयालु ही रहते हैं। पूतना ने मारना चाहा, परन्तु भगवान् ने उसे माता की गति दी। तब वात्सल्यमयी माता का क्या कहना।
  • विष किसे व्यापता है ? जिसमें विषमता है। विषमता अर्थात् पक्षपात। विष का फल है – दुःख। पक्षपात का फल भी दुःख है। जिसके हृदय में वह है, सबसे पहले उसे ही दुःख होगा।
  • ब्रिटेन के दार्शनिक विद्वान् एकदिन अपने बछड़े को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए प्रयत्न कर रहे थे। नौकर उस समय नहीं था। वे कितनी भी पूँछ ऐंठे, रस्सी खींचे, बछड़ा टस-से-मस न होता था। वह तो पैर अड़ा कर खड़ा हो गया  था। नौकर आया और कहा- सर ! आप कष्ट न करें, मैं उसे ले चलता हूँ। उसने थोड़ी-सी  हरी-हरी घास लेकर बछड़े के मुँह के सम्मुख कर दी। घास के लालच में, जहाँ ले जाना था, बछड़ा अपने आप बढ़ता चला गया। कोई शक्ति-प्रयोग नहीं करना पड़ा।

          हमारा मन भी ऐसा ही हठी बछड़ा है, जिसे शक्ति के द्वारा, शासन के द्वारा, दण्ड के द्वारा वश में नहीं          किया जा सकता। उसे तो भगवल्लीला का मधुर भोजन दिखाकर, प्रेम से अनुकूल बनाया जा सकता              है।

  • तत्त्व का गुण यही है कि वह सबके लिए सम है, किसी के लिए कोई रोक-टोक नहीं। पृथिवी, जल, तेज वायु और आकाश भले-बुरे का पापी-पुण्यात्मा का- किसी का भेद नहीं करते। सभी को धारण करते हैं। निष्पक्ष और सम रहकर सबको सत्ता-स्फूर्ति देते हैं। वैसे ही अपना जीवन हो अर्थात् पृथिवी का गुण क्षमा, सहिष्णुता; जल का गुण जीवन देना, रस देना, तृप्ति देना; वायु का प्राण दान करना; अग्नि का उज्ज्वलता-प्रकाश तथा दबाव में आकर बुराई न करना; आकाश का सबको अवकाश देना- असंगता ये गुण अपने जीवन में खरे-खरे उतरें। यही तात्त्विक जीवन, पूर्ण जीवन का अर्थ है। 
  • बन्धन क्या है ? भ्रान्तिका – बेवकूफी का विलास। 
  • शरणागति फलप्रद होती है, अनन्यता में। किसी अन्य का आश्रय लिया कि शरणागति टूटी। 
  • तुम्हारा चित्त, तुम्हारा चेतन फिल्म की तरह दृश्य को, घटना को पकड़कर न रखे। वह शीशे की तरह हो। जैसे कार में लगा शीशा पीछे आने वाली कार को, सड़क पर हुई दुर्घटना को या कहीं लगी हुई आग को केवल दिखा देता है, अपनेमें  उसको ग्रहण करके चिपका नहीं लेता। इसी प्रकार यह संसार दर्पण में दीखने वाले प्रतिबिम्ब की भाँति ही तुम्हारे चित्त में आये। संसार की उथल-पुथल तुमको प्रतीत हो पर प्रभावित न कर सके। कान, आँख, नाक, जीभ आदि अपने-अपने गुण असंग होकर ग्रहण करें। व्यक्ति रहने पर भी जीवन तात्त्विक हो। 

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अपने भीतर का खजाना बाहर निकालियेऔर बाँटिये!

     तुममें शान्ति का खजाना भरा है। तुममें आनन्द का सागर लहरा रहा है। तुम्हारे हृदय में समाधि की शान्ति भरी है। तुम्हारे हृदय में प्रेम का स्रोत बहता है। तुम तो सौंदर्य और माधुर्य के निधि हो। उसको बाहर निकालो और अपनी आँख द्वारा, स्पर्श द्वारा, व्यवहार द्वारा सबमें बाँटो। नहीं तो वह बेकार जायेगा। 

     भक्त की हरेक प्रक्रिया प्रभु के अनन्त माधुर्य, सौंदर्य, ऐश्वर्य, रस, सुकुमारता और आनन्दस्वरुप को बाहर लाकर सम्पूर्ण जगत् को बाँटने के लिए ही है। 

     भक्ति तो भीतर में सोये हुए परमात्मा को जगाकर कण-कण में नचाने के लिए और क्षण-क्षण में हँसाने के लिए है। जीवन में भक्ति भरने के बाद वैकुण्ठ में जाने के लिए नहीं किन्तु इसी जीवन में वैकुण्ठ का माधुर्य पाने के लिए है। 

  आपका कोई-न-कोई प्रेमी होगा ही। उसको आपमें कितना प्यार, सुख और आनन्द काअनुभव होता होगा ! उसकी प्यार भरी आँखों से आप अपने को ही देखिये। और, तब आप अपने आनन्द को जगत् में बिखेरिये। 

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अपनी प्रियता को पहचानिये तो !

     आपके घर में कुत्ता होगा तो आप जब बाहर से आयेंगे तब तुरन्त ही आपका स्वागत करने के लिए पूँछ हिला-हिलाकर सामने दौड़कर आयेगा और आपको अनोखे प्यार से चाहने लगेगा, चाटने लगेगा। आपकी मिठास और आपकी प्रियता को वह पहचानता है इसलिए ही वह ऐसा करता है। आप अपनी मिठास और प्रियता नहीं पहचानते इसलिए ही आप अपने को चाहते नहीं। 

     मच्छर को, कुत्ते को, मक्खी को, आप में जो स्वाद दिखाई देता है, उसे आप देखेंगे तो आपको भी मस्ती आ जायेगी। 

     आपके भीतर सोयी हुई प्रियता को जगाने के लिए ही ‘हरे राम हरे राम’ आदि भगवान् की धुन है। 

    जैसे किसी बालक को मिठाई दी जाय, जो उसको बहुत ही पसन्द आये, और जिसके खतम होने पर वह उसी मिठाई की रट लगाता रहे, जैसे कोई प्यासा रेगिस्तान में खो जाये और निरन्तर ‘पानी-पानी’ ही करता रहे।

     उसी रीति से, नाम-जप भी हृदय के रस को व्यक्त करने की अनोखी प्रक्रिया है। हृदय के रस को बाहर निकाल कर हड्डी,मांस और चाम में भर देती है।

    और, ऐसा मनुष्य जिसको देखता है, जिसको स्पर्श करता है, जिसको बुलाता है, उसके जीवन में आनन्द बरसने लगता है।

     जैसे कई लोग आटा लेकर चींटियों के बिलों में डालते हैं और श्रीमान् लोग रुपयों को गरीबों में बाँटते हैं वैसे ही आप भी अपने भीतर के आनन्द के खजाने को सर्वत्र बाँटने के लिए तत्पर रहिये।  

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आइये, ईश्वर का दर्शन कीजिये !

     ईश्वर सर्वत्र और सर्वदा विराजमान ही है। ईश्वर यदि यहाँ नहीं तो कहीं भी नहीं। ईश्वर जो अभी नहीं तो भविष्य में कभी भी नहीं। इसलिए  ईश्वर नहीं है, और ढूँढना बाकी है ऐसा भी नहीं कह सकते। ईश्वर तो सर्वव्यापक और सर्वातीत है। 

     इन्द्रियाँ जिसको देखती हैं, वही ईश्वर की आधारभूत सत्ता है। इसलिए ईश्वर यहीं है, अभी है और कोई नहीं किन्तु यही है। 

     ईश्वर दर्शक भी है और द्रष्टा भी। 

     दृश्य भी है और दर्शन भी। 

     इसलिए आइए, अभी यहीं ही अनेकविध रूपमें हम ईश्वर का दर्शन करें !

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ईश्वर नहीं दिखाई देगा

     तुम अपने व्यक्तित्व के घेरे में ही बैठकर चारों ओर ढूँढोगे तबतक ईश्वर तुम्हें नहीं दिखाई देगा। परमेश्वर को देखने और पाने के लिए तुम्हें भी कालातीत, देशातीत और द्रव्यातीत होना पड़ेगा। 

     हमारी सभी खोजें द्रव्य में, दृश्य में और काम में ही पूरी होती हैं। इसलिए ही हमें ईश्वर नहीं प्राप्त होता। 

     ईश्वर का दर्शन आत्मा के रूप में, पूर्ण विचार रूप में या शान्ति के रूप में ही हो सकता है। 

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“श्रद्धाधन”

     एक विद्यार्थी काशी में पढ़ने गया। 

     वह गुरुकुल में ही था कि एक दिन गुरुदेव उसके घर पहुँच गये। 

     उसके पिता ने पूछा : ‘मेरा पुत्र  क्या करता है ?’

     गुरूजी ने कहा : ‘उसकी बहुत चिन्ता रहती है।  क्योंकि वह स्वयं तो कुछ भी नहीं जानता और जो  मैं समझाता हूँ उसे वह मानता नहीं है।’

     हम भी उस शिष्य की तरह हैं। …… आत्मा में विराजमान परमात्मा का हम अनुभव नहीं कर सकते और अनुभव करके कोई इस विज्ञान को बताये तो श्रद्धापूर्वक मान भी नहीं सकते। इसलिए हमारी हालत ‘अतो भ्रष्ट ततो भ्रष्ट’ जैसी हो गयी है। इसलिए या तो अनुभव करो या अनुभव न होने पर श्रद्धापूर्वक अनुसरण करो। 

     अविद्वान्, स्त्री, बालक के लिए तो श्रद्धा ही बड़ा धन है। 

     श्रद्धा लेकर आप जहाँ भी जायेंगे वहाँ अवश्य सफल होंगे। 

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आप अपने में ही स्थित रहिये!

     सुख भी अपने हृदय में है। 

     दुःख भी अपने हृदय में है। 

     जब आपका हृदय कथामृत के भगवद्-रस में सराबोर रहता है तब बताइये, आपको दुकान, दुश्मन, रोग, कुछ भी याद आता है ? उन सब प्रपंचों का विस्मरण तब हो ही गया न ?

     आपको राग-द्वेष और मोह के फंदे से मुक्त करने के लिए ही और आपको अपने हृदय में स्थिर रहने का प्रयोग कथा द्वारा होता है।

     आपका मन आपकी प्रकृति में स्थिर होगा तो राग-द्वेष आपको परेशान नहीं करेंगे !  फिर तो आपके हृदय में विराजमान प्रभु के प्रति प्रेम और सेवा का निर्झर बहने लगेगा। और, तब आपको विश्वास होगा कि सम्पूर्ण सुखों के स्रष्टा आप ही हैं, और सम्पूर्ण सुखों के अक्षयभण्डार आप ही हैं।  

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नाचो जी नाचो

     मैं छोटा था तब एक महापुरुष ने मुझे कहा था : ‘आनन्द का आस्वादन करना हो तो कमरे में बन्द होकर प्रभुप्रेम में मस्त होकर नाचो।’

     मैंने पूछा : ‘इससे क्या लाभ ?’

     तब उन्होंने बताया : ‘इससे दूसरे किसीकी भी सहायता के बिना तुम्हें अपने सुख के विषय में विचार करने की प्रक्रिया मिल जायेगी।’

     प्रेम की चाल का नाम है, नृत्य। 

     प्रेम की बोली का नाम है, संगीत। प्रेम माने तृप्ति। प्रेम माने रसानुभूति। 

     भौतिक रसानुभूति प्राप्त करने के लिए कोई मुँह में रसगुल्ले डालता है तो कोई गांठिया खाता है।  और उसके लिए तो पैसा, वस्तु और व्यक्ति चाहिए। 

     बिना वस्तु, व्यक्ति और पैसे की अपेक्षा के जीवन का अनन्त आनन्द प्राप्त करना हो तो प्रभु प्रेम में मस्त बन जाओ। फिर हृदय की गति के ताल पर नाचो। 

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बस,वर्तमान को सुधार लो !

     अबतक आपने अपने जीवन का उद्देश्य निश्चित न किया हो तो, आज ही, अभी कर लीजिए, क्योंकि उद्देश्यहीन जीवन व्यर्थ है। 

     जीवन की दिशा निश्चित  कर लीजिए। जीवन की प्रत्येक क्रिया और प्रत्येक संकल्प उसी दिशा में आगे बढ़ने के लिए होना चाहिए। 

     आपको परमात्मा की ओर आगे बढ़ना है किन्तु रास्ते में लुभाने वाले विश्राम-स्थान और आनन्द-प्रमोद के धाम आनेपर लुब्ध न हो जाइये। भयानक रास्ते आने पर घबराकर पीछे न हटिये। आपके पास एक महान् शक्ति है और वह आपकी सतत रक्षा करती है।

     अनुभव करें ! आपको एक महान् प्रकाश घेरे हुए है। वह अन्दर और बाहर, आगे और पीछे, ऊपर और नीचे, नस-नस में व्याप्त हो रहा है।

     अपना ज्ञान, शक्ति और सत्ता उसमें डुबा दो, डूबने दो।

    फिर, आप व्यवहार में रहकर भी अपने जीवन में एक नई स्फूर्ति और उल्लास का अनुभव करेंगे।

     आप देखोगे कि आपका जीवन प्रत्येक क्षण परमात्मा के समीप जा रहा है।

     आप चाहें किसी भी परिस्थिति में हों, परमात्मा आपके साथ ही है। और फिर आपकी सहिष्णुता और धैर्य को हँसते-हँसते देख रहा है।

     ऐसे आनन्द के सामने क्या आप क्षुब्ध रह सकेंगे ?

     उसमें  उनके सुकोमल करकमलों के स्पर्श का सतत अनुभव करें।

     देखें ! इस समय भी उनके करकमलों की छत्र-छाया आपके सिर पर है।

     जो बीत गया है उसे भूल जायँ। जो आनेवाला है वह आपके अधिकार के बाहर है।

     इसलिए भूतकाल और भविष्यकाल में मत भटकें और अपने वर्तमान् को ही सुधारें। कहीं यह क्षण भी व्यर्थ न बीत जाय इसके लिए सावधान रहें।

     अनुभव करें कि आपका आज का दिन सार्थक बीत रहा है और आप भगवान् की ओर जा रहे हैं।  

 

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