महात्माओं के सङ्ग

     आज तक जीवन में कई बड़े-बड़े महात्माओं के दर्शन मुझे हुए। मैंने संन्यास वेश ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य से लिया। संन्यास के पहले भी कभी मेरे मन में  यह भाव न था कि मैं ब्राह्मण हूँ, मैं गृहस्थ या वर्णाश्रम वाला हूँ और बाद में भी मेरे मन में कभी यह बात नहीं आती कि मैं मानव या दानव, ईश्वर या देवता हूँ। इसलिए जीवन में एक क्षण भी कभी नहीं आया जब मेरे मन में बात जमी हो कि मैं संन्यासी हूँ। ‘मैं ब्रह्म हूँ’ ऐसी कल्पना पुरे वेग के साथ एक बार आयी थी किन्तु उसके बाद ‘मैं मनुष्य हूँ’ ऐसी भ्रान्ति मुझे कभी नहीं हुई। 

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     एक महात्मा थे,उन्होंने हमसे भागवत सुना। फिर बोले कि ‘बैठो, मैं दक्षिणा देता हूँ।’ मैंने कहा, ‘दक्षिणा मैं दूँगा।’ दक्षिणा माने क्या ? भागवत में कहा है कि ज्ञान का सन्देश दक्षिणा है। शिष्य दक्षिणा नहीं देता, गुरु शिष्य को दक्षिणा देते हैं जिससे चेले में ब्रह्मज्ञान की योग्यता आ जाय। 

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     मैंने एक महात्मा से पूछा : ‘हमें और कोई अच्छा महात्मा बताओ जिनका मैं दर्शन करने जाऊँ।’ ऐसा कहना तो उनका अपमान है किन्तु मैं तब बालक था। उन्होंने कहा : ‘तुम्हें विरक्त महात्मा चाहिए न ? आओ, बैठो, नारायण, तुम कल्याण स्वरुप हो। मैं दुःखी हूँ ऐसा अभिमान कभी मत करो।’ हम जब बाहर से हमारा सम्बन्ध जोड़ते हैं तब दुःखी होते हैं। पागल को कभी ऐसा अभिमान नहीं होता। 

 

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धर्म-प्रेरणा के स्रोत-(7)

     अब किस नियम, व्रत, दान, आदान, स्नान कर्म को धर्म कहा जाये – यह बात वासनानुसार नहीं, शासनानुसार ही निश्चित करनी पड़ेगी। उस शासन का जो शाश्वत, सार्वभौम, मौलिकरूप  है उसे ‘शास्त्र’ कहते हैं। वह देश काल वस्तु, क्रिया, पुरुष, अंतःकरण आदि की उत्पत्तिके पूर्व से ही बीज रूप में रहता है और रूप-व्याकृति के साथ ही उसकी नाम-व्याकृति भी होती है। जो ईश्वर सृष्टि का निर्माता है पूर्व कल्पनानुसार, वही शास्त्र का भी निर्माता है। दोनों का ही प्रकाशक-मात्र है। करण-निबंधन-कर्तृत्व उसमें नहीं है। क्या आप किसी ऐसे शास्त्र को मान्यता देते हैं ? उसके विज्ञान को समझने का प्रयत्न करते हैं ? यदि नहीं, तो आप अपने को तत्त्वज्ञान  और धर्म के मार्ग से कहीं विमुख तो नहीं कर रहे हैं ? ज्ञानात्मा के शुद्ध स्वरुप को संकेतित करने वाली यह शास्त्र-प्रक्रिया आपकी धर्म-प्रेरणा का स्रोत क्यों नहीं बनती ?जहाँ वासनानुसारिणी बुद्धि आपको बहिर्मुख बनाती है  वहाँ शासनानुसारिणी बुद्धि  अंतर्मुख करेगी। धर्मानुष्ठान करना तो अलग, इस धर्मानुशासन को हृदयंगम करने का प्रयत्न भी आपको धर्मात्मा होने की प्रेरणा देगा।  

                                                                                                                                   

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धर्म-प्रेरणा के स्रोत-(6)

    प्राकृत वस्तुओं के अनुकरण-कौशल के उत्कर्ष से कला का विकास होता है, उनपर आधिपत्य प्राप्त करके उपयोगी बनाने की प्रक्रिया से विज्ञान का। बाह्य पदार्थों के परिवर्तन, प्रवर्तन अथवा संशोधन के लिए श्रम की अपेक्षा होती है, परन्तु धर्म वह काम करता है जो इनमें किसी के द्वारा सम्पन्न नहीं होता। उसका काम है- अंतःकरण की शुद्धि द्वारा ज्ञाता के प्रकाशित होने के मार्ग में जो प्रतिबन्ध हैं, उनको दूर करना। विशेष करके अंतःकरण से मलिन वासनाओं को निकाल देना और उसको एक विशेष आकार में पहुँचाना धर्म का काम है। ऐसी स्थिति में धर्म की प्रेरणा के लिए अज्ञात ज्ञापक, शासनात्मक, वासना-प्रतिरोधी, बाह्य-क्रियात्मक स्रोत की अपेक्षा है। फल मिलने पर धर्म का पता चलने से केवल आगे के लिए अनुभव संग्रह किया जा सकता है या अमुक प्रकार की वृत्ति से  जो उत्पन्न अदृष्ट या अपूर्व होगा, पता नहीं  वह कब हमारे काम आयेगा ? वस्तुतः धर्म ऐसा होना चाहिए  कि हम अपनी क्रिया और भाव के द्वारा इसी समय, इसी स्थान में, किसी वस्तु का ठीक-ठीक सदुपयोग कर सकें। जैसे, अकाल के समय दुर्भिक्ष-पीड़ित स्थान में  क्षुधा-पीड़ित जनता को अपने हाथ से उठा कर हम कुछ अन्न-धन दे सकें। यदि धर्म का ऐसा रूप नहीं होगा तो वह किसी मनुष्य के द्वारा कैसे अनुष्ठित होगा ? और यदि अनुष्ठित नहीं हो सकेगा तो धर्म का अर्थ ही क्या ? इसको प्राचीन भाषा में यों कहा जा सकता है कि पुण्यकाल में यज्ञशाला के अन्दर यज्ञ करानेवाले ऋत्विज को जब दक्षिणा दी जायेगी, तब धर्म होगा। धर्म का रूप सर्वथा दृष्ट होना चाहिए, उससे अदृष्ट की उत्पत्ति हो या दृष्ट का फल मिले। उसके लिए चाहिए – अधिकारी, श्रद्धा, विधान, क्रिया, सम्पत्ति, सहायक और समग्रता आदि।    

                                                                                                                              (क्रमशः)

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धर्म-प्रेरणा के स्रोत-(4)

        क्या आप वस्तु के गुणावगुण और क्रिया कलाप के द्वारा  निष्पन्न होने वाले परिणामों पर अन्वय-व्यतिरेक की दृष्टि से विवेक  करके धर्माधर्म का निर्णय करते हैं ? द्रव्य के गुणावगुण विवेक केवल साधारण दृष्टि से रासायनिक प्रक्रिया के द्वारा नहीं किया जा सकता। उसके लिए देश,काल, जाति, व्यक्ति, मान्यता, अवस्था, स्थिति, शक्ति, वय आदि का सम्पूर्ण ज्ञान अपेक्षित होता है। कब, कहाँ, किसके लिए, किस परिस्थिति में क्या हितकारी है ? यह सर्वज्ञ ईश्वर के अतिरिक्त और कौन जान सकता है ? रही बात क्रिया-कलापकी, सो समग्र मानव-जाति के लिए सर्वकालिक एवं सार्वभौम उदार दृष्टि से विचार करने का दावा कौन कर सकता है ? अनुदीर्ण और संकीर्ण  दृष्टि होनेपर अपने ग्रन्थ और पन्थ  का बोल-बाला  हो जाता है और अपनी डफली और अपना राग बजने लगता है। द्रव्य के गुणानुवाद और क्रिया-कलाप के परिणामों का लौकिक सम्बन्ध यथाकथंचित् ज्ञात भी हो जाये तो पारलौकिक सम्बन्ध ज्ञात करनेका कोई उपाय नहीं है। इसलिए यदि आप केवल अपनी बुद्धि और विवेक के द्वारा धर्म की प्रेरणा प्राप्त करते हैं तो आप पुनर्विचार कीजिये – आपका युक्तिवाद भुक्ति का हेतु हो सकता है, मुक्ति का नहीं। क्या बालक, वृद्ध और मूर्खजन भी इस युक्तिसे धर्म-प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं ? यदि नहीं, तो  धर्म के उद्गम-स्थान को और भी गहराई में ढूँढना आवश्यक है। धर्म के प्रेरक तत्त्व इतने उथले स्तर पर नहीं रहा करते।  

                                                                                                                                        (क्रमशः)

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धर्म-प्रेरणा के स्रोत-(5)

     क्या आप ऐन्द्रियक ज्ञान एवं मानसिक संवेदनोंसे अपने चित्त में जो अनुभव-संस्कार एकत्र करते हैं और उनके आधार पर जो अनुमानाभास  और उनके बच्चे-कच्चे वंश-वृद्धि करते हैं, वे धर्म का साक्षात्कार करने के लिए पर्याप्त प्रामाणिक हैं ? यदि धर्म का लौकिक प्रत्यक्ष हो जाता और उसके आधार पर होनेवाले अनुमान, उपमान, अर्थापत्ति  अथवा अनुपलब्धि के द्वारा हम उसको देख पाते तो क्या सृष्टि में धर्म के सम्बन्ध में इतने मतभेद और संघर्षों की सृष्टि हो पाती ? श्रम वस्तुशोधन के लिए होता है। धर्म अधिकारी शोधन के लिए होता है। जड़ता की प्रधानता से श्रम और चैतन्य की ओर उन्मुखता से धर्म। प्रत्यक्षादि प्रमाण बाह्यदर्शी होते हैं। धर्म अन्तरंग वस्तु है। वह अंतःकरण को दोषमुक्त  और अंतर्मुख करता है। आत्मा अथवा परमात्मा में स्थित करानेवाला परमधर्म है- योग अथवा भक्ति। परन्तु आत्मा-परमात्मा के ऐक्य का बोध किसी धर्म का परिणाम नहीं है। धर्म-संस्कार के द्वारा केवल  विकार की निवृत्ति-मात्र होती है। ऐक्य का बोध तो चरम एवं परम प्रमाण का विषय है। ऐसी स्थिति में यदि आप ऐन्द्रियक अथवा मानसिक संवेदनों को प्रेरक मानकर धर्म का निर्णय करते हैं  तो क्या आप सच्चे धर्मका निर्णय कर सकेंगे ? क्या आपके इन्द्रिय और मन प्राकृत विकार एवं संकीर्ण संस्कार से मुक्त हैं ?

                                                                                                                                 (क्रमशः)

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धर्म-प्रेरणा के स्रोत-(3)

     आपका धर्म आपके अस्तित्व, ज्ञान, आनन्द, नियंत्रण शक्ति और समन्वय भावना की रक्षा के लिए होना चाहिए। धारणा के अभिप्राय से ‘धर्म’ शब्द के  प्रयोग का यही अर्थ है। इसके लिए सामाजिक परिस्थिति से प्रेरणा लेने पर सुधार-भावना का जन्म होता है। भौगोलिक परिस्थिति से विचार करने पर राष्ट्रीयता परिपक्व होती है। ऐतहासिक दृष्टिकोण से देखने पर संस्कृति-प्रेम का जन्म होता है। आचार्य-परंपरा पर ध्यान देने से संप्रदाय-मर्यादा जुड़ती है। मूल पुरुष की प्रधानता से जातीयता आती है। श्रम और अर्थ की प्रधानता से विचार करने पर वर्ग-विशेष से तादात्म्य होता है। ऐसे अनेक बाह्य कारण हो सकते हैं, जिससे आप धर्म की प्रेरणा ग्रहण करते हों, परन्तु ये सब-की-सब  दृष्टियाँ अधूरी हैं और धर्म के केवल तात्कालिक एवं एकांगी रूप का परिचय देती हैं । कभी-कभी ये परस्पर संघर्ष करती हैं और धर्म के नाम पर अधर्म को ही अभिव्यक्ति देती हैं। दृष्टि-विशेष में आविष्ट पुरुष तमसावृत्त होकर अधर्म को ही धर्म मानने लगता है। उससे अपने ही प्रयोजन का गला घुट जाता है। इनमें से किसी एक में आपकी प्रियता आपको पक्षपाती और दूसरों के प्रति क्रूर बनाती है। क्या आप इनसे मुक्त रहकर धर्म का सच्चा ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं ?

                                                                                                                                       (क्रमशः )

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धर्म-प्रेरणा के स्रोत-(2)

        क्या आप  ईश्वर की प्रेरणा और पूर्व संस्कारों की प्रेरणा में भेद कर सकते हैं ? पूर्व संस्कार अच्छे-बुरे दोनों प्रकार के होते हैं। उनसे समय-समय पर दोनों प्रकार की प्रेरणा भी प्राप्त होती है। यदि आप पूर्वसंस्कारों के द्वारा ही अपने जीवन को संचालित करेंगे तो आपका अन्तर्द्वन्द्व कभी मिट नहीं सकेगा। अनादि कर्म-प्रवाह से उत्पन्न संस्कार और उनसे बना हुआ स्वभाव समुद्र के बाह्य-आभ्यंतर दबाव और उथल-पुथल के समान परस्पर संघर्षरत रहते हैं। इनपर अपने जीवन को छोड़ा नहीं जा सकता। हाँ, इनसे ईश्वर की प्रेरणा को पृथक् करना विशिष्ट अंतर्दृष्टि के बिना सम्भव नहीं है। 

       ईश्वर की तटस्थता एवं असंगता पर दृष्टि डाली जाय तो वह कोई स्वैच्छिक, स्वतंत्र एवं नवीन प्रेरणा नहीं दे सकता। वह आपकी अंतःकरण की उपाधि को अपने सान्निध्य मात्र से आभासित और संचालित करता है। ऐसी स्थिति में ईश्वर का नियमन भी पूर्व संस्कारानुसार ही मानना पड़ेगा। तब फिर हमें गंभीरता से यह देखना होगा कि जब हम पूर्व संस्कार अथवा उसकी उपाधि स्वीकार करके ईश्वर के द्वारा संचालित होते हैं तो हम सदा उनके द्वारा नियंत्रित कठपुतली ही बने रहेंगे; कर्म-चक्र से मुक्त नहीं हो सकते। हमें कुछ नवीन कर्म करने होंगे, जो अनादिकाल से अनवरत प्रवाहित कर्म-धारा को नया मोड़ दे और हमारी यात्रा को मुक्ति के लिए उन्मुख करे। कम-से-कम वह ऐसी तो होनी ही चाहिए जो स्थूल देह और उसके सम्बन्धों को शिथिल करके सूक्ष्म शरीर को प्रधानता दे। परलोक,आन्तर रसास्वादन,समाधि अथवा शुद्धिकी भावना जाग्रत् करके सत्य तत्त्व की जिज्ञासा की ओर ले जाय। इसके लिए नवीन क्रिया-कलापकी प्रेरणा क्या आप पूर्व संस्कारों पर छोड़ देते हैं। अथवा इसके लिए कोई नवीन स्रोत ढूंढते हैं ? 

                                                                                                                        (क्रमशः)

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