श्रीराधा-अष्टमी पर

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         श्रीराधा के प्रेम में यही विलक्षणता है कि राधा कृष्ण के प्रति अनन्य हैं तो कृष्ण राधा के प्रति अनन्य। यह दोनों में रहने वाली समरस अनन्यता ही उनके प्रेम की विशेषता है। एकाङ्गी प्रेम अधूरा है। उसमें प्रेमी का महत्त्व अधिक होने पर भी रस की पूर्णता नहीं है। 

       राधा कृष्ण की प्रेम-तपस्या का मूर्त फल है तो कृष्ण राधा की प्रेम-तपस्या का मूर्त फल है। कौन तप है,कौन फल है- इसका निर्णय नहीं हो सकता। दोनों ही एक दूसरे केलिये फल हैं। दोनों ही सामने वाले केलिये तपते हैं,दोनों ही सामने वाले को रस देते हैं। 

      प्रेम रसका एक अगाध अनन्त समुद्र है। दो ओर से रस की दो लहरें उठीं,आमने-सामने चलीं,आलिङ्गन-पाश में बँध गयीं,रस एक-मेक हो गया; अब फ़िर दो उठीं, दायें का जल-रस बायें,बायें का जल-रस दायें। अब कौन बताये,किसमें कितना रस किसका है? दोनों एक ही हैं न? निश्चित रूप से!  

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नियम-निष्ठा का महत्त्व

 

      लोग चाहते तो यही हैं कि हमारे जीवन में किसी प्रकार का बन्धन न रहे, हम सब प्रकार के बन्धनों से मुक्त रहें; परन्तु ऐसी स्थिति प्राप्त करने का साधन लोगों की समझ में सुगमता से नहीं आता। सब प्रकार के बंधनों से मुक्ति का कारण एक के साथ बँध जाना है। जीवन को सब बंधनों से छुड़ा लेने का साधन उसे किसी नियम में बाँध देना है। जीवन को नियम के अधीन कर देना आलस्य पर विजय पाना है। जीवन को नियम के अधीन कर देना प्रमाद को सदा के लिए विदा कर देना है। नियमित हो जाना प्रपञ्च  के अनेकों झंझटों से छूट जाना है। नियम जीवन की सब बुराइयों को पीस कर- गलाकर ऐसे साँचे में ढाल देता है कि वे आमूल परिवर्तन होकर भलाईयों के रूप में बन जायें। जिसके जीवन में नियम नहीं, उसका जीवन शृंखलाहीन है। वह कोई भी बड़ा काम नहीं कर सकता। वह घबरा जाता है, चिन्तित रहता है। अपने कर्म की सफलता में संदिग्ध रहता है। जीवन को, परिवार को, जाति को, समाज को और राष्ट्र को नियंत्रित, नियमित रखने से ही सच्चे सुख और शान्ति के दर्शन होते हैं। इसी से संसार के सभी महापुरुष जीवन के नियमन का आदर करते हैं और अपने आपको शास्त्रानुसार अपने ही बनाये नियमों से नियंत्रित रखते हैं।  

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“श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष”

    बड़े सौभाग्य की बात है कि भगवान् श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी हमलोग मनाते हैं। हृदय में तो हमेशा अष्टमी मनती है भला ! हर समय वृत्ति में आरूढ़ होकर चेतन अविद्या को दूर करता है। अच्छा, तत्त्वमस्यादि महावाक्य जन्य वृत्ति अज्ञान को दूर करती है कि वृत्त्यारूढ़ चेतन अज्ञान को दूर करता है ? अज्ञान निवर्तकत्व वृत्ति में तब तक आवेगा ही नहीं जब तक वृत्ति में चेतन आरूढ़ होगा नहीं। जैसे हाथ के द्वारा क्रिया कब होती है ? जब आरूढ़ चेतन हाथ में होता है। अधिष्ठान-चेतन, प्रकाशक चेतन,सामान्य चेतन  तो मुर्दे के हाथ में भी होता है। परन्तु, वहाँ हाथ में क्रिया करने की शक्ति नहीं होती है। इसी प्रकार अधिष्ठान चेतन , स्वयं प्रकाश चेतन में अविद्या की निवृत्ति का सामर्थ्य नहीं होता है। अविद्या की निवृत्ति का सामर्थ्य  तब होता है, जब वृत्ति में चेतन आरूढ़ होता है। इसलिए वृत्ति की उपाधि से चेतन में ही अविद्या का निवर्तकत्व है, वृत्ति में अविद्या का निवर्तकत्व नहीं है। वृत्ति तो स्वयं अविद्या का कार्य है। इसलिए वह अपने कारण को निवृत्त करने में समर्थ नहीं होती है। 

    तो नारायण, जो लोग यह मानते हैं कि  वृत्त्यारूढ़ होकर चेतन अविद्या को निवृत्त करता है, उनको  यह बात जाननी चाहिए कि हृदयारूढ़ होकर परमात्मा अभिनिवेश को निवृत्त करता है, हृदयारूढ़ होकर परमात्मा राग-द्वेष को निवृत्त करता है, हृदयारूढ़ होकर परमात्मा अस्मिता को निवृत्त करता है और वृत्यारूढ़ होकर अविद्या को निवृत्त करता है। यही तो उपासना का रहस्य है। 

    तो जो आज हम लोग जन्माष्टमी मना रहे हैं हम सब लोगों के हृदय में श्री कृष्ण का अवतार होवे।  हमारे जीवन में जो दुश्चरित्रता है, वह दूर होवे।  जो देह की मृत्यु का भय है, वह दूर होवे। जो हमारे अन्दर ज्ञानी-अज्ञानी पने का अभिमान है, सो भी दूर होवे। जब हृदय में श्रीकृष्णावतार होता है तब यह दूर होता है। मानने की बात जुदा है और समझने की बात जुदा है। अगर आप श्रीकृष्णावतार को समझना चाहते हैं तो आज जन्माष्टमी है, अपने हृदय को श्रद्धा से  थोड़ा झुकाकर, अभिमान से थोड़ा मुक्त करके श्रीकृष्णतत्त्व को समझने की चेष्टा कीजिये। और, इसीमें जब आप चेष्टा करेंगे तो आपके हृदय में सच्चिदानंद रूप कृष्णावतार होगा और सम्पूर्ण दोष-दुर्गुणों को मिटावेगा।      

 

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‘इच्छा करने में सावधान’

      भगवान् कल्पवृक्ष स्वरुप हैं और हम सब उन्हीं की छत्र-छाया में उन्हीं के करकमलों के नीचे अथवा उन्हीं की गोद में हैं। हम लोग जीवन में जैसी-जैसी अभिलाषा करते हैं, वह हमारे जीवन के साथ जोड़ दी जाती है और हमारे जीवन में जब उसका उपयोग ठीक प्रतीत होता है, तब भगवान् उसे पूर्ण कर दिया करते हैं। इसलिए हमें सावधान रहना चाहिए कि जैसी इच्छा करने का निषेध है, हमारे जीवन में कहीं वैसी इच्छा न आ जाय। लोग स्वर्ग को बहुत महत्त्व देते हैं, परन्तु भगवद्-जन के सामने अथवा समत्व की तुलना में उसका कोई महत्त्व नहीं है। जब स्वर्ग के देवता और इंद्र के मन में भी मनुष्यों की अमरता से ईर्ष्या और जलन होने लगती है, तब एक बार बलात् हमारे मन में स्वर्ग की तुच्छता आ जाती है। कैसी विडंबना है कि स्वर्गीय देवताओं के मन में भी मनुष्यों के संहार की इच्छा जाग्रत् हो जाती है। इसलिए हमारे मन में स्वर्ग की इच्छा नहीं होनी चाहिए। 

      इस सम्बन्ध में एक बात और भी ध्यान देने योग्य है कि भगवान् की दयालुता भी अवर्णनीय है। जब वे देखते हैं कि जैसी इच्छा जीव में नहीं होनी चाहिए, वैसी इच्छा जीव कर रहा है, तब वे उसे ऐसे स्थान पर बैठा देते हैं कि उसकी इच्छा भी पूरी हो जाय और लोकहित में उसका सदुपयोग भी  हो जाय। 

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‘सब भगवान् का प्रसाद है !’

      ‘प्रभो ! स्वादवृत्ति के कारण कभी-कभी बड़ा विक्षेप होता है। कई वस्तुओं के तो स्मरण मात्र से ही जीभ पर पानी आ जाता है। कितना कमज़ोर मन है ! क्या करूँ ?

       ‘नारायण, इसी कमज़ोर मन से तो काम निकालना है, बलवान् मन कहाँ से लाओगे ? प्रसाद की भावना करो, प्रसाद का निश्चय करो, ऐसा न हो सके तो भगवान् को नैवेद्य लगाकर खाओ, भगवान् को ही खिलाओ। तुम्हारी यह जिह्वा-लोलुपता अथवा मन की कमज़ोरी साधन बन जायेगी और अधिकाधिक भगवान् का स्मरण होने लगेगा। फिर तो यह ‘भोजन’ का रस ‘भजन’ का रस बन जाएगा। 

      अच्छा, प्रसाद की भावना और निश्चय करो कि यह सारा जगत्, जगत् की सारी वस्तुएँ भगवान् का प्रसाद ही तो हैं। वही एकमात्र भोक्ता हैं और सब भोग्य भी । सबका रस- वास्तव में अपना रस- वे स्वयं अपने-आप ही ले रहे हैं। किसी भी वस्तु का रस भगवान् का रस है, ऐसा स्मरण ही साधन है। दूसरी वस्तु हो तब न ? वस्तु तो केवल भगवान् ही हैं। कहीं भी विक्षेप की संभावना नहीं है। 

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‘धर्मनिष्ठा का फल’

      प्राचीन समय में अङ्गिरा ऋषि के पुत्र सुधन्वा और प्रह्लाद के पुत्र विरोचन दोनों में एक सुन्दरी स्त्री के लिए यह विवाद चल पड़ा कि कौन श्रेष्ठ है ? दोनों ही अपने-अपने को श्रेष्ठ बतला रहे थे। प्राणों की बाज़ी लग गई – जो श्रेष्ठ हो, वह जीते; जो हार जाये, वह प्राण-त्याग करे। इस विवाद निर्णय के लिए वे प्रह्लाद के पास गये। दोनों की बात सुनकर प्रह्लाद बड़ी चिन्ता में पड़ गये; वे न तो अधर्म चाहते थे और न तो दोनों में से किसी की मृत्यु। उन्हें असमंजस में पड़े देखकर सुधन्वा ने कहा – ‘दैत्यराज ! यदि तुम पुत्र-स्नेह के कारण झूठ बोलोगे या कुछ उत्तर न दोगे तो इन्द्र वज्र के प्रहार से तुम्हारे सिर के सौ टुकड़े कर देंगे। प्रह्लाद महात्मा कश्यप के पास गये। उन्होंने महात्मा कश्यप से कहा- आप कृपा करके बताइये- जो कोई प्रश्न का ठीक-ठीक उत्तर नहीं देता या जान-बूझ कर झूठ बोलता है, उसे मरने पर कौन से लोक प्राप्त होते हैं ?’ कश्यप ने कहा- ‘जो क्रोध या भय के कारण जान-बूझ कर प्रश्नों का उत्तर नहीं देता अथवा झूठ बोलता है, उसे मृत्यु के पश्चात् वरुण की फाँसी में लटकना पड़ता है। जो साफ-साफ सत्य न कह कर गोलमटोल बोलकर दोनों पक्षों का जी रखना चाहता है, उसकी भी वही गति होती है। जिस सभा में अधर्म के द्वारा धर्म दबाया जाता है और सभ्य लोग धर्म  पक्ष न लेकर मौन ग्रहण कर लेते हैं, उस सभा के सभ्यों को भी अधर्म होता है। जहाँ निंदा करने योग्य कर्म की निंदा नहीं होती, वहाँ  पर सबसे श्रेष्ठ पुरुष को अधर्म का आधा पाप लगता है। आधे का आधा पाप कर्म करनेवाले को और बाकी  सभासदों को। जहाँ निंदनीय पापकर्म की निंदा की जाती है, वहाँ औरों को पाप नहीं लगता, केवल करनेवाले को ही लगता है। प्रश्न का अन्यथा उत्तर देने पर उसके पुण्य तो नष्ट हो ही जाते  हैं, साथ ही सात पीढ़ी आगे और सात पीढ़ी पीछे के लोग भी नरक में जाते हैं।’

      कश्यप के ये उपदेश सुनकर प्रह्लाद ने अपने पुत्र से कहा – ‘बेटा विरोचन ! तुम्हारी माता से सुधन्वा की माता श्रेष्ठ हैं, तुम्हारे पिता से अर्थात् मुझसे सुधन्वा के पिता श्रेष्ठ हैं। और,तुमसे सुधन्वा श्रेष्ठ है। अब ये सुधन्वा तुम्हारे प्राणों के  स्वामी हैं।’ प्रह्लाद की बात सुनकर  सुधन्वा बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा – ‘दैत्यराज ! तुमने अपने पुत्र के प्राणों की परवाह न कर के धर्म की रक्षा की है, इसलिए मैं तुम पर प्रसन्न हूँ और यह नहीं चाहता कि तुम्हारे पुत्र की मृत्यु हो। यह सौ वर्षों तक जीवित रहे और सुख भोगे।’

      इस प्रकार धर्म निष्ठा के फलस्वरूप प्रह्लाद ने अपने पुत्र की रक्षा कर ली। 

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प्रेरक-प्रसङ्ग

    एक बार महाराजश्री से बातचीत के दौरान एक सज्जन बोले कि ‘आम जनता मंदिरों के उत्सव की भीड़-भाड़ में बहुत जाती है, पर मुझे भीड़ में जाना नहीं रुचता। मैं तो एकान्त में बैठकर जपादि करना अधिक श्रेष्ठ मानता हूँ ‘।

    महाराजश्री ने कहा- ‘भैया ! तुम तो केवल दो तोले की जीभ को ही प्रभु की सेवा में लगाते हो और वे दो मन के शरीर को ले जाकर प्रभु की सेवा में उपस्थित होते हैं।’

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    एक बार सत्सङ्ग हो रहा था। एक व्यक्ति के बारे में किसी ने महाराजश्री से कहा- ‘उसे तो उच्छिष्ट-अनुच्छिष्ट का कोई विचार ही नहीं है।’ महाराजश्री ने उत्तर दिया- ‘नारायण, वह अपने भाव में मग्न हमेशा जगन्नाथपुरी में रहता है और वहाँ इस बात का कोई विचार नहीं माना जाता। 

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    एक बार महाराजश्री श्रीसाईं साहब के साथ बैठे थे। तभी महाराजश्री के पास एक पागल प्रेमी आया और उनके पास ही तख़्त पर बैठकर उनसे लिपट गया। सेवकों ने उसे रोका। उसके जाने पर श्रीसाईं साहब ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘ऐसे आदमी से तो भय रखना चाहिए। इनकी मनोवृत्ति का क्या ठिकाना ?’ महाराजश्री तुरन्त मुस्कुराते हुए बोले- ‘मुझे तो प्रसन्नता हो रही थी कि कोई तो हमारा आशिक हुआ।’

    किसी का भी दोष देखना असल में पूज्य महाराजश्री के स्वभाव ही नहीं था 

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