उलूखल बन्धन लीला-22

     अब बन्धन – साधनस्वरूप पर विचार कीजिये। रज्जु आदि के पूर्वापर भाग में यही विद्यमान हैं। स्वयं यशोदा इस सम्बन्ध में प्रमाण हैं कि उन्होंने भगवान् के मुख में सम्पूर्ण विश्व देख लिया था। वे सबके बाहर और भीतर हैं। न केवल वे जगत् हैं, जगच्चय (जगतां चयः) हैं। जहाँ तक जगत् की गति है भगवान् उतने ही नहीं हैं। क्या जगत् जगदात्मा को बाँध सकता है। स्वयं स्व को नहीं बाँधता। किसी भी प्रकार से भगवान् में बन्धन नहीं है, यह सोचकर भक्त निश्चिन्त रहते हैं। परन्तु इस रूप में लोग भगवान् को नहीं जानते। यदि वह अपने को सर्वथा गुप्त ही रखे तो उसका स्वरुप किसी को ज्ञात नहीं होगा। अतः भगवान् स्वयं अपने परस्पर-विरुद्ध धर्मों का बोधन कराते हैं ; क्योंकि दूसरों के समझाने पर भी सन्देह की पूर्ण निवृत्ति नहीं होती। मर्मज्ञ पुरुष अन्याभिनय-परायण नट के वास्तविक स्वरुप को पहचान लेते हैं। परन्तु यह अधोक्षज (अधः अक्षजं ज्ञानं यस्मात्) प्रत्यक्षादि-जन्य ज्ञान जिसका स्पर्श नहीं कर सकते हैं। जबतक यह स्वयं अपनी पहचान स्वयं न करावें, क्या हो सकता है ? अतः बद्ध-मुक्त सब यही हैं – यह प्रकट करने के लिए बन्धन-लीला है।

     यशोदा माता ने ऊखल में क्यों बाँधा ? इसपर हरिसूरि की उत्प्रेक्षा सुनिए- नामैकदेशग्रहण-न्याय से उलूखल खल है। खल-संग छुड़ाने के लिए उसका अति संग  ही कारण बन जाता है। अत्यन्त सान्निध्य से अवज्ञा का उदय होता है। इस नीति के अनुसार ही यशोदा ने उलूखल में बाँधा।

परिहातुं खलसङ्गममतितरखलसङ्ग  एव हेतुरिति।

अतिसन्निकर्षशास्त्राज्ज्ञानत्येषा बबन्ध किमु तस्मिन्।।

     यशोदा मैया ने सोचा कि उलूखल भी चोर है; क्योंकि माखनचोरी करते समय इसने कृष्ण की सहायता की थी। चोर का साथी चोर। इसलिए दोनों बन्धन के योग्य हैं।

अयं चौरश्चौर्यकर्मण्येतत्साहाय्यभागभूत्।

इति वीक्ष्य द्वयोर्बन्धार्हतां तत्र बबन्ध तम्।।

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-21

    श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ने यह आशय प्रकट किया है कि यद्यपि भगवान् वैसे ही हैं फिर भी उन्हें अनन्त प्रेम का, असाधारण वात्सल्य का विषय बना कर माता ने उन्हें बाँध दिया। बात यह है कि ईश्वर के अधीन सब है परन्तु ईश्वर प्रेम के अधीन है। भक्ति में जो बाँधने की शक्ति है वह भी प्रभु की ही शक्ति है। वे किसी और से नहीं, अपनी शक्ति से ही बँधते हैं। प्रेम उनके ऐश्वर्य को आच्छादित कर देता है। वे प्राकृत नहीं हैं, चित्पुञ्ज हैं। फिर भी प्राकृत के समान बाँध दिये गये। यही प्रेम की शक्ति है।

    आचार्य वल्लभ बंधन-प्रसंग पर प्रसन्न-गम्भीर विवेचन करते हैं। उनका कहना है – भगवान् में दोनों प्रकार से बन्धन का अभाव सिद्ध होता है। पहला भगवत्स्वरूप का विचार और दूसरा बन्धन के साधनस्वरूप का विचार। देखिये, बन्धन दो काम करता है – बाहर से निरोध और भीतर से ताप। ये दोनों उसीको हो सकते हैं  जिसमें अन्तर-बाह्य का भाव हो। भगवान् पूर्ण हैं। सबमें व्याप्त हैं। वे किसी के भीतर नहीं हैं। वे निरवयव हैं। अतः उनका कोई परिच्छेदक नहीं है। ‘अन्तः’ शब्द का अर्थ है – शब्द – सहित आकाश। उसकी प्रवृत्ति भगवान् में नहीं है। अर्थात् न भगवान् आकाश के अन्तर्गत हैं, न तो शब्द के विषय हैं। अन्तर्यामी ब्राह्मण के अनुसार वे ही सर्वान्तर हैं। फिर वे किसके अन्तर्गत होंगे जिससे वे उसमें बाँधे जाँये? आधार होने पर तो किसी में  अंतर्भाव हो ही नहीं सकता। दूसरी बात यह है कि बन्धन वेष्टनात्मक होता है। वह देश-परिच्छिन्न में ही सम्भव है। निरवयव, अनिरुक्त, स्वयंप्रकाश, ज्ञातृ-ज्ञेय भाव के द्वैत से रहित परमात्मा में पूर्वापर या उत्तर-दक्षिण सम्भव ही नहीं है। अतः स्वरूपकृत,देशकृत, कालकृत या अन्यकृत बन्धन भगवत्स्वरूप में सम्भव नहीं है।  

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-20

     माता के मन में भगवान् श्रीकृष्ण को बाँधने की इच्छा उदित हुई। ऐसा क्यों हुआ ? भगवान् के स्वरुप में बन्धन नहीं है। क्या यशोदा भगवान् के इस सामर्थ्य से अपरिचित है ? शुकदेवजी कहते हैं  कि ‘हाँ अपरिचित है।’ तब क्या पूतना, तृणावर्त आदि के वध का ऐश्वर्य, वीर्य देखकर भी न पहचान सकी ? यही प्रेम का सामर्थ्य है।’ वह प्रियतम के माधुर्य को पहचानता है,ऐश्वर्य को नहीं। मूल में कहा है कि भगवान् में भीतर-बाहर, पूर्वापरका भेद नहीं है। वही बाह्याभ्यन्तर, पूर्वापर एवं जगत् भी हैं। वे अजन्मा और अव्यक्त हैं। इन्द्रियातीत हैं। फिर भी मनुष्यरूप में प्रकट कृष्ण को गोपी ने रस्सी से ऊखल में बाँध दिया मानो, कोई प्राकृत शिशु हो।

     श्रीधर स्वामी ने कहा है- बन्धन तो तब हो जिसको बाहर से चारों ओर से लपेटा जा सके और वह रस्सी के घेरे में आ जाये। एक ओर से रस्सी पकड़े और दूसरी ओर से मिला दें। यहाँ भगवान् सर्वथा उसके विपरीत हैं। व्याप्य व्यापक को बाँध नहीं सकता और फिर दूसरा कोई हो तो बाँधे। जब भगवान् के अतिरक्त और कुछ है ही नहीं तो कौन किसको बाँधे ? फिर भी यशोदा ने मनुष्य-रूप में प्रकाशमान इन्द्रियातीत को अपना पुत्र मानकर बाँध लिया।

     श्री जीवगोस्वामी का अभिप्राय है कि श्रीकृष्ण व्यापक हैं इसलिए उनके बाहर कुछ नहीं है। बाहर के प्रतियोगी के रूप में प्रतीयमान अन्तर भी नहीं है। पूर्वापर की भी यही दशा है। वही जगत् है अर्थात् कारण से अतिरिक्त कार्य नहीं होता। देश-काल-वस्तु वही हैं। उनकी शक्ति से ही जगत् की शक्ति है। ऐसी अवस्था में उनकी शक्ति का एक क्षुद्र अंश रस्सी उन्हें कैसे बाँध सकती है ?क्या स्फुल्लिंग (चिनगारी) अग्नि को जला सकते हैं ? परन्तु यशोदा माता ने कृष्ण को बाँध लिया। वे अधोक्षज (इन्द्रियातीत ) होने के साथ-ही-साथ  मनुष्य-वेषधारी भी हैं। ‘नारायणाध्यात्मम्’ में कहा गया है कि ‘अव्यक्त भगवान् अपनी शक्ति से ही दर्शन के विषय होते हैं। उन्हें दूसरा कोई अपनी शक्ति से नहीं देख सकता।’ श्रुति में कहा है – देवता और इन्द्रिय उसके बनाये हुए उत्पन्न हैं। वे अपने  पूर्ववर्ती अनुत्पन्न कारण को नहीं जान सकते।’ मध्वाचार्य भगवान् को अस्थूल-स्थूल, अनणु-अणु एवं अवर्ण-श्यामवर्ण कहा है। अर्थात् उनमें परस्पर विरोधी धर्म हैं। श्री नृसिंहतापिनी श्रुति कण्ठतः घोषणा करती है-

तुरीयमतुरीयमात्मानमनात्मान मुग्रमनुग्रं वीरमवीरं महान्तम-

महान्तं विष्णुमविष्णुं ज्वलन्तमज्वलन्तं सर्वतोमुखम सर्वतोमुखम्

     तुरीय-अतुरीय, आत्मा-अनात्मा, उग्र-अनुग्र, वीर-अवीर, महान्-अल्प, विष्णु-अविष्णु, प्रदीप्त-शान्त, व्यापक-अव्यापक सब भगवान् ही हैं। गीता में ‘मत्स्थानि’ एवं ‘न च मत्स्थानि’ एक साथ ही हैं। वे विरुद्ध-अविरुद्ध अनन्त शक्तियों के निधान हैं और उनकी प्रत्येक शक्ति अचिन्त्य है। अतः बन्धन की असम्भावना और सम्भावना दोनों ही उनमें युक्ति-युक्त हैं। दोनों एक साथ ही संगत हैं।

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-19

     माँ के हृदय में वात्सल्य का उदय हुआ श्रीकृष्ण को भयभीत देखकर। जैसे गैया-मैया जब अपने सद्योजात शिशु को मूत्रादि से लथपथ एवं जरायुपरिवेष्टित देखती है तो वह उसे चाटने लगती है, वत्सला हो जाती है, उसका हृदय वात्सल्य-स्नेह से भरपूर होकर छलकने लगता है, वैसे ही यशोदा माता का हृदय वात्सल्य से उल्लसित हो गया। उसने अपने हाथ से बछड़े को डराने वाली छड़ी फेंक दी। ‘ठीक ही है, तभी तक हृदय में जड़ता और हाथ में छड़ी रहती है जबतक चेतन की प्राप्ति न हो- पवित्र चेतनाका जागरण न हो। श्रीकृष्ण का हाथ पकड़ना और अपने हाथ में जड़ छड़ी को रखना एक साथ शक्य नहीं है।

तावज्जडाश्रयो युक्तो न यावच्चेतना गम: ।

     युक्तं श्रीशङ्करं धृत्वा सा जहौ यष्टिकां जडाम्।।

     देखिए, श्रीकृष्ण का हृदय। ‘मुझे अपने हृदय की गोद में लेकर स्नेह-मोद देकर यदि कोई पुनः क्षुद्र कर्म में लग जाये तो अवश्य ही उसकी अर्थ-क्षति और मेरी दूर-स्थिति हो जायगी। परन्तु यदि वह फिर  मेरे पास लौट आवे तो मैं उसे सुलभ हो जाता हूँ।

मदीयं संतोषं सुफलदमसम्पाद्य मनुजो

यदि क्षुद्रे किञ्चित्फलिनि दिनकर्मण्यभिरतः।

भवित्री तस्यार्थक्षतिरपि च दूरस्थितिरहं

पुनर्मद्गामी चेत् प्रतिपदमहं तस्य सुकमः।। 

     ‘यद्यपि मैं बुद्धि के पेट में अँटने वाला नहीं हूँ तथापि जो दूसरे काम छोड़कर मेरा अनुगत होता है, मेरे पीछे-पीछे दौड़ता है उसे मैं सुलभ हो जाता हूँ।’

बुध्द्यग्राह्योऽप्यहमिह सुलभस्तस्यास्मि यस्तु मदनुगतः।

उज्झितकर्मेत्याशयमबोधयन् मातृहस्तगो हि हरिः।।

     यशोदा माता ने विचार किया – ‘गर्गाचार्य ने अनामी को नाम के घेरे में ले लिया। श्रुति के अनुसार नाम और दाम  (रस्सी) एक ही हैं। अतः अब इसको बांध लेना – दामोदर बना देना सुगम है।

गर्गोक्तनामबद्धेऽस्मिन् सुकरं दामबन्धनम्।

इत्यैषीत् सा नामदामपर्यायैकार्थदर्शिनी।।   

 

(क्रमशः )

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उलूखल बन्धन लीला-18

     श्री हरिसूरि ने भक्तिरसायनम् में, माता अपने बल का प्रयोग कर रही है स्नेह की अधिकता से, तो मैं भी अपना बल, स्नेह की अधिकता दिखाऊँ, स्नेह पर स्नेह ही सफल होता है, रोदन ही शिशु का बल है, ऐसी उत्प्रेक्षा की है। मेरे नेत्र में स्थित हैं सूर्य और चन्द्रमा। वे हमारे वंश के आदि भी हैं। उनके साथ कज्जल-कलंक-कालिमा का सम्बन्ध उचित नहीं है अतएव स्वच्छ करते हैं। उन्हें उकसाते हैं- ‘तुम साक्षी हो। किसी कर्म के कर्ता नहीं हो। तुम लोग मेरी माँ को यह बात समझा दो।’

      श्रीभक्तिरसायनम् में श्री हरिसूरि ने इस प्रसंग में  एक बड़ा ही सुन्दर भाव प्रकट किया है- मनुष्य चाहे जितना साधन-सम्पन्न हो, ओजस्वी हो परन्तु अपनी मलिनता मिटाने के लिए उसे दूसरे की आवश्यकता होती है। प्रकाशमान सूर्य और चन्द्रमा सहस्रकर हैं। साथ ही, भगवान् के नेत्र के रूप में अथवा नेता के रूप में स्थित हैं तथापि भगवद्-हस्तावलम्ब के बिना उनके कलंक-कज्जल का मार्जन नहीं हुआ।

नानासाधनशालिनोsपि पुरुषस्यौजस्विनः स्वात्मनो

माकिन्यापहृताववश्य-मपरापेक्षेति युक्तं यतः।

भास्वच्चन्द्रमसो:सहस्रकरयोरप्यत्र नेत्रात्मनो-

रासीदञ्जनमार्जनं न भगवद्धस्तावलम्बं  विना।।

श्रीकृष्ण ने विचार किया कि संतों ने मेरी नाम-महिमा का संगीत गाया है कि ‘श्रीकृष्ण’ नाम षड्-रिपुओं का नाशक है। क्रोध का अवरोधक मैं सम्मुख खड़ा हूँ और माँ के हृदय में रोष का संचार हो रहा है। यह मेरी नाम-कीर्ति के विपरीत है।’ इसीसे  श्री कृष्ण के नेत्र भय-विह्वल हो गये।

तवामिधानं  षडरिप्रञ्जकं  भुवीति  सद्भिर्यदहं  प्रकीर्तित: ।

मई स्थिते द्वेषिणि रोषसंभव: कथं जनन्यामिति तादृशेक्षण:।।

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-17

    माँ ने पकड़ लिया। जगत् का स्वामी जिसे कभी कोई अपराध छू नहीं सकता, आज अपराधी के कटघरे में खड़ा है। फफक-फफक कर रो रहा है। एक हाथ से बार-बार नेत्रों के कज्जलमिश्र अश्रु पोंछ रहा है। भय-विह्वल नेत्र ऊर्ध्वमुख हो गये हैं। हाथ पकड़कर माँ ने धमकाया। यह सब भगवान् के रूप हैं – अपराधी, रोनेवाला, भय-विह्वल। जो उन्हें पहचानते हैं वे सब रूपों में पहचानते हैं। भगवत्स्पर्शी अपराध, रोदन और भय भी धन्य है। माँ ने पीटा नहीं, धमकाया- ‘मनचले ! क्रोधी ! लोभी ! चंचल ! चोर !’ नये नाम रख दिये। ‘ऐसा बाँध कर रख दूँगी कि बाहर जा न सकोगे, माखन खा न सकोगे, सखाओं से मिल न सकोगे।’ कृष्ण ने कहा – ‘मैं तुम्हारा लगाया हुआ काजल भी पोंछ दूँगा। मैं तुम्हारे हाथ से आँसू नहीं पोंछवाऊँगा, स्वयं पोंछ लूँगा। वे अपने नेत्र स्वयं स्वच्छ करते हैं और उनकी क्रिया से यशोदा के नेत्र तथा उनमें भगवत्प्रतिबिम्ब स्वच्छ होता है। यही भक्ति की विशेषता है। रजोगुण-तमोगुण नष्ट हो गये।

     माता ने छड़ी फेंक दी। बालक को भयभीत करना उचित नहीं। उसके प्रति भीषणता उचित नहीं है, वात्सल्य ही योग्य है। बाँध के रखने का निश्चय किया। कृष्ण ने कहा – ‘मुझे ताड़ना मत दो।’  माँ ने कहा – ‘यदि ताड़ना से डरते हो तो आज दादी-सास के समय का दधि-भाण्ड क्यों फोड़ दिया ?’ कृष्ण- ‘अच्छा, अब ऐसा कभी नहीं करूँगा।’ माँ – ‘ले, छड़ी फेंक दी।’ देखिए, श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती का श्लोक – 

ताडने यदि तवातिशया भीस्तत् किमद्यदधिभाण्डम भांक्षी:।

मातरेवमथ   नैव  करिष्ये  पातय   स्वकरतो  बत  यष्टिम्।। 

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-16

    श्रीकृष्णनिष्ठ स्नेह और मातृनिष्ठ स्नेह में स्पर्धा हो गयी। माँ ने मन में विचार किया कि मैं अपने शिशु की  सब बुराइयाँ सह सकती हूँ  परन्तु खलसंगति नहीं, इसलिए  गाय हाँकनेवाली छड़ी  लेकर दौड़ी। श्रीकृष्ण ने कहा – जिसके मन में क्रोध है उसकी बुद्धि चाहे कितनी अच्छी हो, मैं उससे मिल नहीं सकता। तमोगुणी-रजोगुणी से दूर रहना चाहिए। इसलिए मैं भागता हूँ।

अकृत्यमपि मे सर्वं सह्यमस्य परन्तु न।

उलूखलाङ्घ्रिभजनमित्यागात् सा सयष्टिका।।    

शिक्ष्यद्रोषं मनो यावत् तावदीशः पराङ्मुखः।

                  सूक्ष्मवेत्राश्रितस्यापि भवेदित्यभवत् स्फुटम्।।  (भ.रसा.)

     श्रीकृष्ण के पीछे-पीछे दौड़ने में भी माता की विशेष शोभा है। विजयध्वजतीर्थ ने ‘अन्वञ्चमाना’ पद का विवरण करते हुए कहा है कि यशोदा के दौड़ने में एक पूजनीय गति है। हँसी के समान चल रही है। ‘अञ्चु’ धातु का अर्थ गति और पूजा है। भगवान् के पीछे दौड़ने मात्र से ही केश के बंधन टूट गये; प्रसूना = हिंसा के भाव च्युत हो गये। अंतःकरण की शुद्धि हो गयी। संत की अनुगति से कल्याण होता है, भगवन्त की अनुगति से  तो कहना ही क्या ? अनुगति का फल है श्री कृष्ण का स्पर्श।   

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-15

     श्रीहरिसूरि  कहते हैं कि यह उलूखल नहीं, खल है। माता के द्वारा पुत्र की उपेक्षा होने पर खल-संगति स्वाभाविक है, खल भी अभिमानी के साथ टकराता है और विनयी के साथ मेलजोल कर लेता है। मानो, इसी दृष्टि से श्रीकृष्ण ऊखल के निचले भाग पर जो कि उलटा होने के कारण ऊपर हो गया था, बैठ गये। खलवशीकार के लिए उसका चरण-स्पर्श विहित है। और भी, ‘खल-संग प्राप्त होने पर भी उदार पुरुष के सौजन्य, शील, स्वभाव में अंतर नहीं पड़ता। ऊखल पर बैठे हुए श्री कृष्ण भी उदारता पूर्वक दान कर रहे हैं। श्री कृष्ण ने स्पंदमान रोष का स्पर्श किया था। उसके दोष का मोष (नाश) करने के लिए दान कर रहे हैं। दान ही दोष-शोषक है। 

न हीयते वदान्यस्य सच्छीलं खलसंगतः। 

उलूखल कृतावासोप्यौदापन्निच्युतोच्युतः।। 

दानमेव जने यावद्रोषदोषाघमोषकम्। 

भवतीत्यच्युतो युक्तं तद्दानं तत्कृतेकरोत् ।।       

   श्रीकृष्ण के मन में है कि मैं वानर को भी नवनीतामृत  सुलभ करने के लिए पृथिवीपर आया हूँ। भजन करो और अमृत लो। ये वानर हमारे रामावतार के सखा, सहायक एवं सेवक हैं। अमृत का वितरण हो रहा है। 

     हाथ में गाय हाँकने की छड़ी लेकर मैया दौड़ी। श्री कृष्ण ने भलीभाँति उसका भाव भाँप कर भीत के समान भागना प्रारम्भ किया। योगियों का तपःपूत अतएव प्रवेशक्षम मन भी जिनको प्राप्त नहीं कर सकता, पकड़ने के लिए माँ उन्हें खदेड़ रही हैं। 

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-14

     समुद्र ने अमृत के द्वारा देवताओं की, लक्ष्मी के द्वारा भगवान् विष्णु की, मर्यादा स्थापन के द्वारा पृथिवी की, कल्पवृक्ष से इन्द्र की, चन्द्रकला से शंकर की सेवा की, उन्हें सन्तुष्ट किया। अपने उदर-गृह में बसाकर यत्नपूर्वक मैनाकादि पर्वतों को संरक्षण दिया। परन्तु जब अगस्त्य मुनि उसको पीने लगे तब किसी ने उसको रोका नहीं, रक्षा नहीं की। 

     माता को हँसी क्यों आयी ? भाण्डासुर मर चुका था। क्रोध आने का कोई कारण नहीं था। थोड़े की रक्षा के लिए गयी और बड़ी हानि हुई, क्या आश्चर्य है ? पुत्र माता की सम्पत्ति की रक्षा करता है और हमारे घर में ऐसा लाल आया जो अपने हाथों सम्पदा को बिगड़ता है। हँसने का अर्थ यह है कि श्रीकृष्ण डरकर कहीं भाग न जाय।  

     ऊखल उलटा करके रखा हुआ था। वह अग्नि-नाभि है। सुपर्ण-चयन में यज्ञपुरुष के समान भगवान् उसपर बैठ गये। मर्कटों को बासी मक्खन देने लगे। अतिरिक्त वस्तु अतिरिक्त को देने से अतिरिक्त की शान्ति हो जाती है। दान में भी यथेष्टता थी। इस चोरी के कर्म में नेत्र विशंकित हैं। यशोदा धीरे-धीरे पीछे से आ रही है। पीछे से आने के कारण श्री कृष्ण के पृष्ठ में स्थित अधर्म का दर्शन होता है। श्रीसुदर्शन सूरि एवं श्री वीरराघवाचार्य ने यहाँ ‘मर्क’ शब्द का अर्थ मर्कट, मार्जार एवं ब्रज के सखा, ऐसा लिखा है। किसी-किसी ने मर्क अर्थात् माखन के लिए आये हुए सखा। 

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-13

     श्री कृष्ण ने मन ही मन कहा- ‘जब मनुष्य यशोदयाविहीन होता है अर्थात् यशोदा एवं यश-दया से रहित होता है, तब उसके ऐसे ही कृत्य होते हैं। मानो, श्रीकृष्ण ने यहीं से शिक्षा लेकर गीता में कहा हो – ‘कामी दीन हो जाता है, लोभी पुत्रके प्रति भी निर्दय होता है, क्रोधी का विवेक नष्ट हो जाता है, अतः इन तीनों का परित्याग करना चाहिए। इस प्रसङ्ग में विस्तार से समझाने की आवश्यकता नहीं है।

     परन्तु यह क्रोध और आँसू मिथ्या हैं। इसका क्या प्रमाण है ? तत्काल एक व्यवहित स्थान पर जाकर नवनीत का आस्वादन करने लगते हैं। क्रोध और आँसू के साथ भोजन का मेल नहीं है। सच्चे आँसू आ रहे हों तो उदानवायु की प्रबलता के कारण निगलने की क्रिया नहीं हो सकती। वे अपना विनोद प्रकट कर रहे हैं। बालकों को भोजन दे रहे हैं और माता को उलाहना दे रहे हैं। 

    माता ने शान्ति से दूध को परिपक्व करके भगवद्भोग्य बना दिया। उसे अग्निताप से मुक्त करके उतार दिया- पार कर दिया। भागवत का काम पूरा हुआ। लौट कर आयी, देखा मटका फूटा हुआ है, अपने पुत्र का कर्म। हँसी आ गयी। जलते हुए दूध को तारा माता ने। मटके रहित दधि को तारा भगवान् ने। दैवगति से हानि देख कर माता को हँसी आ गयी। भला, होनी को कौन टाल सकता है। कहा भी है –

पीयूषेण सुराः श्रिया मुररिपुर्मर्यादया मेदिनी शक्रः कल्परुहा शशाङ्ककलया श्रीशंकरस्तोषितः। 

मैनाकादिनगा निजोदरगृहे यत्नेन संरक्षितास्तच्चूलीकरणे घटोद्भवमुनिः  केनापि नो वारित।।     

(क्रमशः)

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