जीवन-निर्माण की शैली

    जो सुख-दुःख का भोक्ता है उसको बोलते हैं जीव। जो सुख-दुःख का निमित्त है उसको बोलते हैं भोग्य संसार और जो सुख-दुःख का दाता है उसका नाम है ईश्वर। यह सारा-का-सारा प्रपञ्च सुख-दुःख से ही विस्तृत हुआ है। हमारे मन में जो सुख के प्रति राग और दुःख के प्रति द्वेष है, उसी से हमने यह सारी दुनिया बनायी है।

    यहाँ एक प्रश्न अवश्य उठता है ! वह यह कि क्यों न हम सुख की प्राप्ति  और दुःख को दूर करने के लिए अपनी वासना पूरी करें ? लेकिन क्या इसके लिए जहाँ-जहाँ सुख मालूम पड़ेगा, वहाँ-वहाँ आप टूट पड़ेंगे ? यहीं मनुष्य-शरीर की विशेषता सामने आती है। वह क्या है ? मनुष्य के शरीर में एक मर्यादा की आवश्यकता है। यह नहीं कि जो मन में आया सो खा लिया, जो मन में आया सो कर लिया, जो मन में आया सो बोल दिया  और जो मन में आया सो ले लिया। इसके लिए एक मर्यादा होनी चाहिए। नहीं तो तुम द्वेष से मरोगे, राग से मरोगे और दूसरों को भी राग और द्वेष से मारोगे। यहाँ शास्त्र की आवश्यकता होती है, जिससे यह ज्ञात होता है कि हम किससे राग करें और किससे द्वेष करें? राग-द्वेष को व्यवस्थित करने के लिए ही विधि-निषेध के रूप में शास्त्र की आवश्यकता होती है।

    राग-द्वेष मूलक देह को इधर-उधर जाने से रोकने के लिए, उससे ऊपर उठाने के लिए ही हमारे शास्त्रकारों ने स्वर्ग,नरक तथा पुनर्जन्म का वर्णन किया है। वे कहते हैं कि तुम देह-मात्र नहीं हो। तुम तो जब देह नहीं था तब भी थे। अनादिकाल से वासनाओं के अनुसार तुमको यह देह प्राप्त होता रहा है और इस देह के पश्चात् भी तुम्हें दूसरा देह प्राप्त होगा। ईश्वर भी जो देता है, वह कर्म-सापेक्ष होकर ही देता है। तो नारायण, हमको कर्म के अनुसार ही शरीर की प्राप्ति होती है और शरीर में ‘मैं ‘ होने से ही संसार में राग-द्वेष होता है। इस स्थिति से मुक्त होने के लिए हमारे राग का जो विषय है, जिसको हम चाहते हैं और जहाँ हमको पहुँचना है, वह ऐसी चीज़ होनी चाहिए जो अविनाशी हो। उपनिषद् का कहना है कि दुनिया में जिससे तुम प्रेम करोगे, वह तुम्हे रुलायेगा – प्रियं रोत्स्यति’ (बृहदारण्यक 1.4.8) जहाँ कहीं संसार में बाहर का प्रेम होगा – वह एक-न-एक दिन तुम्हें रुलायेगा अथवा एक-न-एक दिन तुम्हें बाँधेगा। 

    इसलिए भाई मेरे, तुम व्यवहार तो सबसे ठीक करो। तुम्हारा व्यवहार तो हो धर्म के अनुसार, किन्तु तुम्हारी प्रीति के विषय हों सबमें रहनेवाले भगवान्। क्योंकि प्रभु अविनाशी हैं, तुम्हें जन्म-मरण के चक्कर से छुड़ाएंगे। वे ज्ञानस्वरूप हैं, तुम्हें बेवकूफी, नासमझी, अविद्या, अज्ञान, भ्रम से छुड़ाएंगे। वे आनन्द-स्वरुप हैं, तुम्हें दुःख से छुड़ाएंगे। वे अद्वितीय हैं, तुम्हें द्वैत के चक्कर से, राग-द्वेष के चक्कर से छुड़ाएंगे, आत्यन्तिक निवृत्ति करेंगे। अतः भगवान् ही हमारे प्रेम के विषय हैं, भगवान् से ही हमें  प्रेम करना चाहिए। लेकिन भगवान् से हमारा प्रेम साधारण नहीं, असाधारण होना चाहिए। जितनी भेदक या भेद-रूप वस्तुएँ हैं, उन सबमें जो अभिन्न रूप से विद्यमान परमेश्वर है, उसके प्रति हमारे हृदय में भक्ति होनी चाहिए और हमारा हृदय भक्तिमय हो जाना चाहिए। निषिद्ध कर्मों में हमारी रुचि न रहे, निषिद्ध से हमारा प्रेम न हो और हम कभी भी नासमझी में, अज्ञान में स्थित न होने पायें- इन बातों का ध्यान हमें बराबर बनाये रखकर अपने जीवन का निर्माण करना चाहिए।     

new sg 

 

 

Advertisements

विश्वास

    विश्वास करना ही पड़ता है- अपनी बुद्धि पर करो, चाहे परायी पर। विश्वास करने के लिए आत्मबल की आवश्यकता है। दुर्बल हृदय किसी पर विश्वास नहीं कर सकता। चरित्रभ्रष्ट पुरुष जितना जल्दी प्रभावित होता है, उतना ही जल्दी अविश्वास भी करता है। क्या तुम किसी पर विश्वास करते हो कि ये गला भी काट दें तो हमारा हित ही करते हैं ? परमात्मा पर ऐसा ही विश्वास करो। तुम निर्भय रहो। क्योंकि यदि तुम परमात्मा के प्रति हृदय से सच्चे रहे तो तुम्हारी हानि कभी हो ही नहीं सकती। जिसे संसारी लोग हानि समझते हैं, वह तो साधक के लिए परम लाभ है। भगवान् तुम्हारे चारों ओर और हृदय में रहकर तुम्हारी रक्षा कर रहे हैं। 

****************************

    संसार में सुख-शांति से रहने के लिए ‘भगवान् का आशीर्वाद मेरे साथ है, इस विश्वास से बढ़कर कोई उपाय है ही नहीं। 

*****************************

जब अपना मन ही ईश्वर है,

जब अपना मन ही गुरुवर है,

तब बार-बार क्यों पूछ रहे,

विश्वास बिना सब पत्थर है 

जो होता है वह ईश्वर का 

करुणा से पूर्ण विधान भला,

यदि अपने मन को खलता है,

तो क्या पथ पर वह ठीक चला ?

new sg

‘दुर्गुण और सद्-गुण’

    धन के लिए सेठ की पूजा, ईश्वर की नहीं, धन की पूजा है। स्त्री को ‘प्राणेश्वरी, हृदयेश्वरी’ कहना उसके रूप की, काम की पूजा है। किसी के दोष भी गुण दीखना, राग वश उसे ही पूर्ण मानना ईश्वर की नहीं, मोह की पूजा है। अपने को सर्व श्रेष्ठ मानकर दूसरों को हेय समझना, तिरस्कार करना अपने अहं की पूजा है। 

**********************

    जीव के जीवन में चार सबसे बड़े बन्धन हैं-अज्ञान अनैश्वर्य, अवैराग्य और अधर्म। ये बन्धन ही उसके दुःख के कारण हैं। अज्ञान को ज्ञान से, शरणागति द्वारा अनैश्वर्य को, भक्ति से अवैराग्य को और धर्म से अधर्म रूप बन्धन को काटो और सुखी हो जाओ। 

***********************

    जो जितना अधिक निर्वासन होगा, उसे भगवद्-भजन, भगवन्नाम का उतना ही अधिक रस, आनन्द आयेगा। संसार के पदार्थों में मन अटका रहे तो नाम-जप, कीर्तन आदि से संसार ही मिलेगा, भगवान् नहीं। भजन का नियम यह है कि निर्वासन होकर करने से भगवान् मिलते हैं। वासना युक्त भजन विलम्ब से चित्त शुद्ध करता है। 

***********************

    निन्दा की परवाह न करना बहादुरी हो सकती है; परन्तु स्तुति का मीठा ज़हर पचा लेना उससे भी बड़ी बहादुरी है।  

new sg

निष्काम कर्मयोग

इसकी चार भूमिकाएँ हैं :-

  1. फलासक्ति का त्याग 

  2. कर्तापन के अभिमान का त्याग 

  3. कर्मासक्ति का त्याग 

  4. अकर्तापन के अभिमान का त्याग 

    इनमें प्रथम दो तो समझ में तुरन्त आ जाती हैं और अभ्यास एवं प्रयत्न करने पर आचरण में भी उतर आती है। परन्तु फल की इच्छा तथा कर्तापन का अभिमान न होते हुए भी  हम उपस्थित कार्य पूरा करना अवश्य चाहते हैं। भला क्यों, किसलिए ? माना, हम श्रीहरि की प्रसन्नता के लिए कथा कर रहे हैं। श्लोकों की अर्धाली बोली, आरती का घंटा बज गया। क्या बता सकते हो, हम क्यों श्लोक का उच्चारण पूरा करना चाहते हैं ? जब हम कुछ फल नहीं चाहते, जब हम कर्ता नहीं, किस लक्ष्यार्थ से इच्छा करते हैं कि श्लोक का पाठ पूरा हो जाये ? घर-गृहस्थी के काम भी क्यों पूरे हों ? क्यों न हम इस क्षण, इसी स्थान से, सब व्यवस्था छोड़कर, विरक्त होकर चले जाएँ, अथवा विदेहमुक्त हो जाएँ।  क्या हमारे मन में अगले क्षण की कुछ आसक्ति बनी है? यदि है तो छोड़नी पड़ेगी। इतनी सब आसक्ति छोड़ने के बाद चित्त में अनासक्ति आती है; परन्तु अकर्तापन का एक अभिमान बना रहता है जो बड़ा सूक्ष्म होता है और कठिनता से कटता है। ;यदि वह कट जाये तो ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, क्योंकि इस प्रकार का निष्काम कर्मयोग साधन नहीं, तत्त्व है। 

new sg

‘साधन-पथ’

कृपण कौन ?

भगवान् भले ही न मिलें, पर संसार न छूटने पाए- ऐसी चेष्टा वाला। 

बुद्धिमान् कौन ?

जो परमात्मा को पाने के लिए संसार छोड़ने को उद्यत है। 

**************************

ध्यान के पॉँच विघ्न 

  1. लय – मन का सो जाना।
  2. विक्षेप- मन का चञ्चल होना। 
  3. रसास्वाद – मज़ा लेना, भोक्ता होना। 
  4. कषाय – रागास्पद या द्वेषास्पद का स्मरण। 
  5. अप्रतिपत्ति – ध्येय के स्वरूप को ठीक-ठीक ग्रहण न कर सकना। 

***************************

    साधना का मार्ग प्राइवेट है। अकेले चलने का, अन्तरङ्ग मार्ग है। इसमें सगे-सम्बन्धी, स्वजन परिजन को साथ लेकर नहीं चला जा सकता। ये सब तो यहीं छूट जाते हैं। संसार के सब रास्ते, सब सम्बन्ध जहाँ समाप्त हो जाते हैं, साधन-पथ वहीं से प्रारम्भ होता है।  

new sg  

विचारणीय बिन्दु

    सेठ जी बहुत क्रुद्ध हुए नौकर के अपराध पर।  उसे नौकरी से अलग करने लगे। मैंने उनसे कहा- ‘उसे सेवा से अलग करो या जुर्माना करो, वह तो बाद में दुःखी होगा; आपने तो क्रोध की आग से अपना सुख पहले ही फूँक दिया। दण्ड देने का, निकालने का मज़ा तो तब है जब आपका सुख यथापूर्व बना रहे। 

************************

    दुःख कहाँ है ? अपनी नासमझी में। तुम जैसी स्थिति में इस संसार में आये थे, उस स्थिति के लिए सदा तैयार रहो तो कोई दुःख नहीं- ‘यथा जातरूपधरः’। कुछ भी चला जाय, कोई भी बिछुड़ जाय- जरा भी दुःख नहीं। बेईमानी से पैसा कमाया, बड़ी ख़ुशी।  पैसा चला गया तो रोने लगे। चौपाटी पर चाट खायी, जीभ की खाज शान्त की, बड़े खुश हुए। और, पेट में दर्द हुआ तो रोने लगे। बेवक़ूफ़, रोना था तो पहली स्थिति में रोता। 

************************

    दुःख केवल उसका ही स्थिर रहता है, जो दुनिया में तो फेरफार करना चाहता है; परन्तु अपने मन को थोड़ा भी इधर-उधर सरकाना स्वीकार नहीं करता। 

new sg

 

 

 

प्रेरक प्रसङ्ग

     एक बार महाराजश्री के सामने किसी ने नास्तिकों की निन्दा की। उन्होंने बीच में ही किन्तु बड़े प्रेम से कहा- ‘भैया, नास्तिक भी भगवान् के वैसे ही हितैषी हैं, जैसे किसी बड़े आदमी का सेवक अपने मालिक का। इसे यों समझना चाहिए कि जैसे मालिक को विश्राम करते देखकर सेवक आगन्तुक से कह देता है कि मालिक घर में नहीं है, वैसे नास्तिक भी- ‘भगवान् नहीं हैं’ यह कह कर उनके नित्य-निकुञ्ज-विहार में बाधा नहीं पड़ने देता। और, फिर नास्तिक भी तो भगवान् की ही सृष्टि में हैं। भला गर्भस्थ शिशु की किसी भी क्रिया से माँ नाराज़ होती है ? भगवान् भी किसी नास्तिक से नाराज़ नहीं होते।’

*****************************

    एक बार कोई साधु जनकपुर से वृन्दावन आए। श्रीमहाराजश्री ने उनके वहाँ के समाचार पूछे। साधु ने कहा-  ‘है तो सब ठीक, पर वहाँ के साधुओं में कथा-सत्सङ्ग प्रचलित नहीं है। सब मन्दिरों के अपने खेत हैं और सब साधु हल चलाते हैं। श्रीमहाराजश्री यह सुनकर बोले- ‘अरे महात्मा, श्रीजनक जी महाराज को हल चलाने से ही जानकी जी की प्राप्ति हुई थी न, इसीलिए वे लोग भी अपनी साधना ‘हल चलाने में ही मानते हैं।’

    किसी का भी दोष देखना असल में आपके स्वभाव में ही नहीं था।   

new sg

Previous Older Entries Next Newer Entries