विरूपाक्ष-पञ्चाशिका=2

पहला प्रश्न यह है कि इस शरीर से कोई पृथक् तत्त्व है ? इस पर विरूपाक्ष जी का यह उत्तर है – शून्य से लेकर पृथिवी पर्यन्त जो कुछ मालूम पड़ रहा है वह आत्मचैतन्य का शरीर ही है। बात यह हुई कि मैं ज्ञाता हूँ; मैं ग्रहण करने वाला हूँ- इस अभिमान के कारण देह के बाहर और देह के रूप में भी अन्य जड़ वस्तु की प्रतीति होती है। इस पर थोड़ा ध्यान दीजिये। तुम्हें यह मांसपिण्ड शरीर आत्मा क्यों मालूम पड़ता है ? ज्ञातापने के अभिमान से तुमने अपने आपको परिच्छिन्न मान लिया है। यदि यह विचार किया जाय कि चाहे शरीर हो या उसके बाहर जो कुछ मालूम पड़ता है , वह दृश्य के रूप में एक है। यह देह या बाह्य संसार का भेद आत्मा को परिच्छिन्न नहीं कर सकता। देहावच्छिन्न और विश्वावच्छिन्न चैतन्य एक है। दृश्य होने के कारण शरीर और विश्व एक हैं। अतः यह शरीर ही मेरा शरीर नहीं है, सम्पूर्ण विश्व मेरा शरीर है। विश्व ही शरीर है- यह प्रतिज्ञा है। दृश्यता हेतु है। अतएव विश्व का शरीर होना युक्तिसिद्ध है। जैसे मनुष्य कभी नीला-पीला आदि रूप देखना चाहता है; तो उस समय वह केवल उसी-उसी रूप का ज्ञाता हो जाता है। परन्तु ज्ञाता की यह परिच्छिन्नता नीले-पीले रूप की उपाधि से है, स्वयं नहीं है। जब यह सभी वस्तुओं को सामान्य रूप से अनुसन्धान का विषय बनाता है, तब इसका प्रकाश अवच्छेद रहित, अपरिच्छिन्न होता है। जो देश-कालादि का प्रकाशक है, वह उनसे परिच्छिन्न हो ही नहीं सकता। तब समस्त विश्व दृश्य होता है और वही अपना शरीर होता है। यदि सम्पूर्ण विश्व दृश्यरूप से अपना शरीर न हो तो यह मांसपिण्ड भी अपना शरीर नहीं हो सकता क्योंकि दोनों की स्थिति एक ही है। अतएव जब मैं कुछ विषयों का ज्ञाता हूँ, यह परिच्छिन्न अभिमान गल जाता है, तब यह सम्पूर्ण विश्व ही आत्म चैतन्य का शरीर है, ऐसा अनुभव होने लगता है। देहाभिमान ही पूर्णता की अनुभूति में प्रतिबन्ध है।

(क्रमशः)

विरूपाक्ष-पञ्चाशिका=1

भगवान् शंकर ने समग्र विश्व का कल्याण करने के लिए अनुग्रह करके विरूपाक्ष नाम से अवतार ग्रहण किया था। दर्शन करने में उनका शरीर सुन्दर और इन्द्रिय-गोलक आकर्षक नहीं थे। अतएव उनका नाम विरूपाक्षनाथ प्रसिद्ध हुआ। इसका अभिप्राय यह है कि बाहर के शरीर में सुंदरता, मधुरता या आकर्षण न होने पर भी अंग-प्रत्यंग के अंतरंग में उनके रग-रग की रंग-तरंग में, एक निरतिशय महिमा भरपूर थी। बाह्य दृष्टि से वे व्यक्ति थे, परन्तु अंतर्दृष्टि से वे परमेश्वर।

एक बार स्वछन्द विचरण करते हुए विरूपाक्षनाथ देवताओं की राजधानी अमरावती में पहुँच गये। उन्होंने देखा कि सुरपति महेन्द्र अपने मनोविनोद के लिए हाथियों की लड़ाई देख रहे हैं। इन्द्र समझते थे कि हमको कितना ऐश्वर्य, सम्पदा और गौरव प्राप्त है। विरूपाक्ष इन्द्र के सम्मुख आकर खड़े हो गये। इन्द्र ने पूछा- ‘तुम कौन हो ?’ विरूपाक्ष- ‘मैं महेश्वर हूँ। मैं परमेश्वर हूँ।’ इन्द्र – ‘तुममें क्या ऐश्वर्य है ?’ विरूपाक्ष- ‘अच्छा देखो।’ उन्होंने बड़े-बड़े दो पर्वत प्रकट कर दिये। वे दोनों परस्पर टकरा रहे थे। एक दूसरे को टक्कर मार रहे थे। कहाँ हाथियों की लड़ाई, कहाँ पर्वतों की। इन्द्र का अभिमान टूट गया। वे विरूपाक्ष की शरण में आये। विधि-पूर्वक दीक्षा ग्रहण की। विरुपाक्ष ने अपने शरणागत शिष्य इन्द्र के प्रति पचास श्लोकों में उपदेश किया। उसी पुस्तक का नाम ‘विरुपाक्ष पञ्चाशिका’ है। प्रथम और अन्तिम दो श्लोकों में उपक्रम, उपसंहार है। एक श्लोक प्रासंगिक है। शेष सब उपदेश रूप हैं। विरूपाक्ष ने इन श्लोकों में अपनी सिद्धि का रहस्य बतलाया है।

इस अल्पकलेवर ग्रन्थ पर श्रीविद्या चक्रवर्ती की टीका है। अभीतक इस ग्रन्थ का हिन्दी में अनुवाद प्रकाशित नहीं हुआ है। मूल ग्रन्थ (संस्कृत टीका) वाराणसेय संस्कृत-विश्व-विद्यालय से मुद्रित हुआ है। ग्रन्थ की शैली और प्रक्रिया जिज्ञासुओं के लिए एक नूतन एवं अद्भुत विचारप्रणाली समर्पित करती है। अतएव इस ग्रन्थ का सार संक्षेप प्रस्तुत किया जाता है।

(क्रमशः )

पत्रोत्तर

परम प्रेमास्पद

नारायण, नारायण, नारायण

1.

किश्ती खुदा पर छोड़ दो – यह ठीक है। परन्तु सचमुच खुदा पर छूट गयी क्या ? उसका प्रमाण है लंगर को तोड़ दो। अगर लंगर अपने पास रखकर किश्ती धारा में छोड़ी जाती है, तो इसका अर्थ है कि हम अपने अनुसार किश्ती को चलाना या छोड़ना चाहते हैं। क्या हम खुदा या नाखुदा से भी अपने मन के अनुसार करवाना नहीं चाहते ? तब किश्ती छूटी कहाँ ? लंगर की पकड़ टूटी कहाँ ? जरा मन-ही-मन सोचो – मैं तो गिरधर हाथ बिकानी, होनी होय सो होय।

2.

सेवा क्या है ? अपनी बाहरी और भीतरी योग्यताओं को सामनेवाले के हित में लगाना। मुस्काना भी सेवा है, प्रेम से देखना भी सेवा है। ऑपरेशन करना भी सेवा है। बच्चे के हाथ में-से चाकू छीन लेना भी सेवा है। सामनेवाला माँगे तो सेवा करना असली सेवा नहीं है। वह भिखारी हो जाये और हम दाता बनें। यह क्या सेवा है ? सेवा करना अपने दिल की माँग है। पराई आवश्यकता नहीं। जब सेवा किये बिना मन में कुछ कचोटे;अपने को मन में कुछ कमी महसूस हो, सेवा किये बिना अपने को संतोष न हो तब सेवा होती है। सेवा करने में अपने को सुख होता है। जो सेवा का जन्मस्थान है, वही सुख छलकने का जन्मस्थान है। सेवा प्रेम से निकले; तन्मयता के साथ रहे। सेवा के बाद अभिमान पैदा न हो। हमारी सेवा कितनी कम है। काश ! मैं कुछ और कर पाता। सेवा बढ़ती हुई गंगा है, घटती हुई नहर नहीं। सेवा में शान्ति है, थकान नहीं। आनन्द है, ग्लानि नहीं। प्रेम उद्गम है, सेवा धर्म है। यह झरना आगे बढ़कर सूखता नहीं, गहरा और गंभीर होता जाता है।

शेष भगवत्कृपा

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पत्रोत्तर

परम प्रिय ………..

सप्रेम नारायणस्मरण !

मोह के संस्कार जन्म-जन्म के और इस जन्म में भी बाल्यावस्था से अब तक के हैं उनका उदय होना कोई आश्चर्य नहीं। उनमें फँस जाना या राग-द्वेष के वशीभूत हो जाना दोष है। आयें तो आयें, जायें तो जायें। जैसे सड़क पर भीड़ चलती है, उसमें अच्छे-बुरे सब चलते हैं, वैसे ही मन में सब चलते-फिरते रहते हैं। जैसे सड़क से बुलाकर आदमी को घर पर नहीं रखा जा सकता, वैसे ही अपने मनमें उनको टिकने नहीं देना चाहिए। उपेक्षा ही उनकी औषध है। उनके हटने-सटने की अपेक्षा करने से उनका बल बढ़ जाता है। अवज्ञा की दृष्टि से देखने पर वे अपने आप ही निर्बल हो जाते हैं। क्रिया में पक्षपात और क्रूरता नहीं आनी चाहिए।

स्वप्नकाल में पुराने संस्कार व्यवस्थितरूप से नहीं आते हैं। संस्कार तो आदमी और घोड़ा दोनों का होता है, परन्तु स्वप्न में, घोड़े की धड़ और आदमी का सिर जुड़ जाता है, यही स्वप्नस्थान का चमत्कार है। उसमें मोटर बैलगाड़ी हो जाती है और सड़क खन्दक बन जाती है,नाव सूखे में चलने लगती है। यह न कोई सगुन है, न सूचना। इसमें कुछ अच्छाई-बुराई नहीं होती, जितनी देर देखता है, उतनी ही देर का तमाशा है। जाग्रतावस्था आने पर उसका ख्याल छोड़ देता है। सपने को बदलने की कोशिश भी मत कीजिये। बदलने की कोशिश में उसके बार-बार आने की सम्भावना हो जाती है।

आप मन का चिन्तन मत कीजिये। आपका स्वरुप नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्त है। इसका न जन्म है, न मरण है। बेटी-बेटे की ओर ध्यान जाना,देहाभिमान ही परिणामरूप है। आप यह देह नहीं हैं। आपका न जन्म है, न मरण है। आपको मरने के बाद कहीं आना-जाना या कुछ होना नहीं है। आप ज्यों-के-त्यों ब्रह्म हैं अपने स्वरूप का अनुसन्धान कीजिये। मोह और स्वप्न दोनों को एक कक्षा की कुक्षि में निक्षिप्त करके स्वस्थ रहिये।

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पत्रोत्तर

परम प्रिय

सप्रेम नारायणस्मरण !

यदि देहगत व्यष्टि पञ्चभूत हो, समष्टि पञ्चभूत से एक करके देखा जाय तो एक जीववाद की प्रक्रिया स्पष्ट हो जाती है। ‘माण्डूक्योपनिषद्’ में जागृत स्थान में जो विश्व या वैश्वानर आत्मा है वह सप्ताङ्ग है। सप्ताङ्ग का अर्थ होता है – पृथिवी,जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्रमा और सूर्य। तुम वैश्वानर हो और पूर्वोक्त सात पदार्थ तुम्हारे शरीर में। यह जो एक देह है, जिसको तुम ‘मैं’ ‘मैं’ करते फिरते हो, यह तो देहाभास है। यह भिन्न-भिन्न शरीर न पञ्चभूत हैं, न उनके कार्य। ये न परिणाम हैं, न विकार हैं, न आरम्भ हैं। पञ्चभूत में कल्पित आकृतियाँ हैं। कल्पना-दशा में ही इनका भान होता है और कल्पनारहित दशा में इनका भान नहीं होता। अतः यह शरीर आत्मा नहीं है। सात अङ्गों वाला ही जाग्रतावस्था में आत्मा है। मैं देह नहीं हूँ, विश्वात्मा हूँ, वैश्वानर हूँ। यह अलग-अलग दीख पड़ने वाले शरीर मुझमें आभासमात्र हैं। इस निश्चय में देहगत भेद को कार्य नहीं माना जाता।

new sg

पत्रोत्तर

परम प्रिय,

सत् माने अजर अमर एकरस परमात्मा। चित् माने स्वयंप्रकाश ज्ञान, जो बिना किसी आधार के, बिना किसी माध्यम के बिना किसी विषय के, हर हालत में जगमग-जगमग झिलमिलाता रहे। सत् और चित् में न मौत है, न बेवकूफी है, न वियोग है, न बेवफाई है। फिर दुःख काहेका? जो सत् व चित् में संतुष्ट नहीं है, उसे कुछ असत् चाहिए; उसे कुछ जड़ता चाहिए; वह कभी रोयेगा, कभी हंसेगा; कभी मुहब्बत में मुब्तिला, कभी नफरत से बेचैन। उसे वस्तु चाहिए, भोग चाहिए, हलचल चाहिए, परिवर्तन चाहिए। वह अपने में संतुष्ट नहीं है। उसे आनन्द का एकाध खण्ड, टुकड़ा कभी-कभी मिल जाता है। सच पूछो तो अखण्ड आनन्द मैं ही हूँ। वह तो तुम्हें मिला मिलाया ही है। ‘मुझको क्या तू ढूंढ़े बन्दे, मैं तो तेरे पास हूँ।’

शेष भगवत्स्मरण

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पत्रोत्तर

परम प्रेमास्पद

सप्रेम श्रीकृष्णस्मरण

शरणागति धर्म बहुत कठिन है। जिसको संसार की वस्तु का सहारा न हो और किसी दूसरे से किसी प्रकार की आशा-आकांक्षा न हो वह शरणागत होता है। अकिंचन और अनन्यगति होना शरणागत की पात्रता है।

शरणागति आत्मबोध है। पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, दिशा-काल, चन्द्र-सूर्य आदि जिसके द्वारा नियंत्रित हैं, वही हमारे इस जीवन का भी नियन्ता है। सब कुछ जिसके अधीन है, मैं भी उसी के अधीन हूँ। यह केवल विश्वास नहीं है, सत्य है, बोध है, अनुभव है। मैं शरणागत नहीं, स्वतंत्र हूँ- यह असत्य है, भ्रम है, कल्पना मात्र है। आप अपनी शरणागति को पहचानिये, उसका अनुभव कीजिये। आप पहले से ही शरणागत हैं। प्रभु के हाथों के खिलौना हैं। वह यंत्री हैं। आप यंत्र हैं।

आपके जीवन-क्रम में अध्ययन है। अधिवक्ता का काम है। साथ ही परिवार भी है। कर्त्तव्य-पालन भी भगवान् के भजन का ही एक अंग है। आप अपने जीवन को व्यवस्थित कीजिये। जो लोग विधि-विधान को नहीं जानते, उनकी बात सुनने-समझने और परामर्श देने के लिए एक निश्चित समय रखिये। न्यायालय में उन्हें ठीक-ठीक न्याय मिल सके,इसके लिए प्रयत्न कीजिये। कोई अज्ञान के कारण न्याय से वञ्चित न रह जाये यह प्रभु के सद्भाव व चिद्भाव की सेवा है।

आपको प्रभु का दिया हुआ युवा शरीर और तत्सम्बन्धी परिवार प्राप्त है। प्रभु के इस दान की उपेक्षा मत कीजिये। शरीर ठीक रखिये। परिवार का भरण-पोषण कीजिये। सम्बन्धियों के प्रति जो कर्त्तव्य है, उसका उचित निर्वाह कीजिये। अपने सोने-जागने का समय निश्चित कीजिये। जीवन में प्रमाद-आलस्य को स्थान मत दीजिये। युवा अवस्था का सहज धर्म है- उत्साह। उत्साह वीर रस का स्थायी भाव है। इससे शरीर और मन में सुषुप्त शक्तियों का जागरण होता है। सफलता आकाश से नहीं टपकती। वह सेना, सामग्री से भी प्राप्त नहीं होती। भीख माँगने से भी नहीं मिलती। आशावान् होकर दृढ़ता से अपने पथ पर चलते रहिये। पहुँचना सिद्धि नहीं है, चलना ही सिद्धि है। चरैवेति। जीवन में जो मिलता है, वह सपना है। सपने बदलते रहते हैं, जीवन चलता रहता है।

आपके शरीर में रोग की अधिकता है, वह भोजन-पान आदि की अनियमितता के कारण है। मन कहीं, तन कहीं, दोनों में सामञ्जस्य नहीं है। जिसके मन में कर्त्तव्य-पालन के समय भी ग्लानि भर रही हो, वह स्वस्थ कैसे रह सकेगा ? आपका मन जीवन की मुख्य धारा से अलग हो गया है। आप क्यों नहीं अपने जीवन में भगवान् के भजन के लिए घण्टे -दो-घण्टे का एक या दो समय निश्चित कर देते। उतनी देर तक जप-पूजा कीजिये। बाकी समय सामाजिक, पारिवारिक और शारीरिक कर्म कीजिये। निरन्तर भजन करने की जिद्द अज्ञानमूलक है। कोई भी व्यष्टि सृष्टि में ऐसा नहीं है जो निरन्तर एक ही वृत्ति रख सके। एक अशक्य अनुष्ठान का संकल्प करके पूरा न होने पर मनुष्य दुःखी होता है।

जब शरीर की स्थिति और मन के भजन में समन्वय नहीं हो पाता तब नाना प्रकार की व्याधि उत्पन्न होते हैं। आपके कष्ट का अधिकांश मानसिक है। क्योंकि भजन छोड़ते ही आपका आधा कष्ट दूर हो जाता है। मानसिक कष्ट अधिक दिनों तक रहने पर शारीरिक बन जाता है। आप अपनी जीवनचर्या की एक समय-सारिणी बनाइये। उसमें घण्टे या दो घण्टे से अधिक नामस्मरण के लिए मत रखिये। शुद्ध आहार-विहार कीजिये। वह अधिक या न्यून नहीं होना चाहिए। नियमित होना चाहिए। प्रातःकाल ही एक कार्यक्रम बना लीजिये कि आज दिन में इतने काम करने हैं। रोग के चार कारण हैं। मन के अनुकूल परिस्थिति न बनना; बार-बार विपरीत परिस्थितियों का आना; अधिक श्रम करना; और शरीर में धातुओं का विषम हो जाना। आप निश्चय कर लीजिये कि समाज का, परिवार का, शरीर का ठीक-ठीक व्यवहार निर्वाह करना मुख्य है और बीच में या आदि-अन्त में भगवान् का स्मरण कर लेना आवश्यक है। बैटरी में बिजली भर लेने के बराबर मन को भगवान् के साथ जोड़ना आवश्यक है। यदि एक क्षण भी ठीक-ठीक मन की कड़ी भगवान् के साथ जुड़ जाये तो सारा दिन आनन्दमय हो जाता है। आप निराश न हों, उदास न हों। अपने जीवन को कर्त्तव्य-पथपर अग्रसर करें और अपने प्रत्येक कर्म के द्वारा सर्वात्मा प्रभु की आरधना करें।

शेष भगवत्कृपा !

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पत्रोत्तर

परम प्रेमास्पद

सप्रेम नारायणस्मरण

जो स्वप्न का द्रष्टा आत्मा है समग्र स्वप्न ही उसका शरीर है। वह भी सप्ताङ्ग है। स्वप्न में भी जो सूर्य, चन्द्रमा, आकाश आदि हैं, वे स्वप्नद्रष्टा के शरीर ही हैं। देश, काल, वस्तुएँ सब दृष्टि में कल्पित आकृतियाँ हैं। स्वप्न में मैं कुम्भ मेला देखने गया। प्रयाग की विशाल भूमि दृश्य है। वहाँ दिन-रात काल भी दृश्य है। सूर्य-चन्द्रमा भी दृश्य है। देश-काल और वस्तु का इतना लम्बा-चौड़ा विस्तार,उसमें जो स्नानार्थी यात्री हैं, सब स्वप्न पुरुष हैं। उन्हीं में एक मैं भी धक्का खा रहा हूँ, स्नान कर रहा हूँ। मैं- सहित सब यात्री स्वप्न पुरुष हैं मैं तो वह हूँ जो यह स्वप्न देख रहा है। स्वप्न के पूर्वोक्त सातों पदार्थ स्वप्न देखनेवाले के मन के ही रूप हैं। वहाँ दीखने वाला कोई भी पूर्व-जन्म का पापी या पुण्यात्मा जीव नहीं है। स्वप्न में जो जीव दीखते हैं, उनका पूर्व जन्म या उत्तर जन्म नहीं होता। वे तो उसी समय दीखते हैं। वहाँ के पति-पत्नी पहले के ब्याहे हुए नहीं हैं। वहाँ के पिता-पुत्र की उम्र छोटी-बड़ी नहीं है। उन स्नान करने वालों को स्वर्ग भी नहीं मिलेगा। वह सब स्वप्न द्रष्टा की दृष्टि है। जीवाभास, द्रव्याभास, देशाभास और कालाभास चमक रहे हैं। वहाँ कोई वस्तु है तो स्वप्न देखने वाला। वह एक है, उसमें अनेकता नहीं है। जरा दृश्य से अलग करके उसके स्वरुप को समझो। स्वप्न दृश्य का निर्माता,स्वप्नपुरुषो का स्वामी, स्वप्न के बदलने और मिटने का साक्षी, कोटि-कोटि स्वप्नों में एक है। परमात्मा से अलग-अलग होने पर उसका कोई स्वरुप सिद्ध नहीं हो सकता। परमात्मा से एक होना ही उसका सत्-चित् आनन्दरूप है। यदि उसकी दृष्टि का विपरिलोप हो जाय तो विपरिलोप को कौन देखेगा ?

जो है, हो रहा है, दीख रहा है, बदल रहा है, मर रहा है- बस, यही सहज समाधि है।

शेष भगवत्कृपा

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पत्रोत्तर

परम प्रेमास्पद

शुभाशीर्वाद

तुम अपने मन भावों को भाषा देने में निपुण हो। प्रश्न यह है कि मन में कई आकृतियाँ चल-चित्र-सी उभरती-मिटती हैं, कोई अभिव्यक्ति स्थिरता ग्रहण नहीं करती। यह ठीक है। ऐसा ही होता है।

गङ्गा बह रही थी। तरङ्ग के बाद तरङ्ग। हर-हर-हर-हर। मैं तटस्थ था। मैं केवल देख रहा था। तरङ्गों के बहने-बदलने से, उनकी तीव्र एवं मधुर ध्वनि से, द्रुत तथा विलम्बित गति से मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। मैं तटस्थ, कूटस्थ, मैं केवल द्रष्टा; साक्षी, निष्पन्द, निःसंग, निस्तरंग देख रहा था, और केवल देख रहा था। स्थिरता आकृतियों को नहीं देना है। उन्हें कितनी भी स्थिरता दी जाये, थोड़ी देर के बाद टूट जायेगी। वैसे न भी टूटे, तो भी नींद मन की सभी आकृतियों को तोड़ देती है। ऐसी अवस्था में इसे अन्तर्यामी की ही एक लीला समझनी चाहिए कि आकृतियाँ टूटती-छूटती-फूटती रहती हैं। अन्तर्यामी खेल रचता रहता है। साक्षी पहले खेल देखता है और उन आकृतियों से अन्तरङ्ग, किन्तु स्वयं से बहिरङ्ग अंतर्यामी को देखता रहता है। तुम स्थिर साक्षी हो यह सत्य है। अन्तर्यामी को अपनी दृष्टि से स्थिर बना सकते हो यह भी सत्य है, परन्तु चलचित्र को स्थिर बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है उसकी उपेक्षा कर दो अथवा उसके खेल और खिलाड़ी का आनन्द लो !सटाओ मत, हटाओ मत। दोनों अवस्थाओं को अपने साथ पटालो। जीवन कड़वे से शत्रुता और मीठे से मित्रता करने के लिए नहीं है। दोनों का स्वाद लेने के लिए है। वे दोनों ही एक दूसरे के स्वाद के पूरक हैं।

यदि तुम्हें यही ठीक लगता हो कि कोई आकृति स्थिर कर दी जाय तो उसका नाम रखो- कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण। यह नाम तुम्हारे अन्तरतम में गुप्त-लुप्त-सुप्त प्रियता को मूर्ति देकर अभिव्यक्त कर देगा और तुम देखोगी कि उस मूर्ति की चलता भी तुम्हें प्रिय लगेगी। जिससे प्रेम होता है उसकी चञ्चलता-छेड़छाड़ भी प्रिय लगती है। चितवन चञ्चल, मुस्कान चञ्चल, अंग-प्रत्यंग तरंगायित।जैसे सिनेमा का चित्र चंचल होने पर भी एक लगता है, वैसे ही अन्तर्देश के सूक्ष्मतम प्रदेश में वह मधुर मूर्ति भी हँसकर, नाचकर, गाकर स्पंदित रहेगी; परन्तु तुम्हें एक और ज्यों-की-त्यों जान पड़ेगी। इस अवस्था में अन्तर और बाहर का भेद मिट जाता है। आह्लाद के चरम प्रकाश में बाहर-भीतर और अपने पराये का भेद नहीं होता। वह तुम्हारी आत्मा ही है जो प्रियता की अभिव्यक्ति में मुस्करा रही है और वह भी तुम्हीं हो जो उसको देख-देखकर तृप्त हो रहे हो।

शेष भगवत्स्मरण

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पत्रोत्तर

परम प्रिय

आनन्द में मस्त रहा करो।

अलमस्त फकीरा रहम अल्ला। अल्ला की रहम से फकीर अलमस्त हो गया है। सचमुच गुरु, दीक्षा के साथ ही शिष्य के हृदयदेश में प्रवेश करता है। यदि हृदय में पहले से कोई रह रहा हो या बहुत कुछ रह रहा हो, तो उनका असर खत्म करने में या उन्हें बाहर निकालने में देर लगती है। रोग प्रबल हो तो पहले इंजेक्शन से कोई फायदा दीखने में नहीं आता। वैसे कुछ-न-कुछ फायदा तो होता ही है। जब गुरु रोम-रोम में प्रवेश कर जाता है, तब मौत का डर, मूर्खता और दुःख भाग जाते हैं। गुरु जब अपने आत्मा से एक हो जाते हैं तब वही मन्त्र परमेश्वर के प्रेम के रूप में प्रकट होता है। जो भीतर प्यारा लगता है उसको बाहर देखने का भी मन होता है। जिससे हृदय में प्रेम है,उसको बाहर भी देखना चाहते हैं। ठाकुरजी की एक मूर्ति मंदिर में अचल बैठी रहती है, दूसरी उत्सव-मूर्ति रथ पर बैठाकर बाहर घुमाई जाती है। क्यों ठीक है न ? जो भीतर अच्छा लगता है, वह बाहर भी मिलता रहे, तो कितना अच्छा है ? क्या आँख बन्द करने पर दोस्त दीखे और खोलने पर दुश्मन, तो अच्छा लगेगा? सेवा तो प्रेम का अनुभाव है। प्रेम अन्तरङ्ग है, सेवा उसका जाहिर रूप है। सेवा के बिना प्रेम कैदी है। प्रेम के बिना सेवा केवल बटन दबाकर मिलनेवाली मिठाई है।

शेष भगवत्कृपा

new sg

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