‘स्वरुप को जानो’

     पाप करो अथवा आत्महत्या, दण्ड तो मिलेगा ही।  सरकार शायद फांसी न भी दे; किन्तु पाप से कैसे छूटोगे ? सूक्ष्म उपाधियों के संस्कार जो तुम्हारे साथ हैं सदा-सदा से ! परमात्मा की प्राप्ति बिना आवागमन का चक्र चलता रहेगा संस्कार, कर्म, भोग के अनुसार। 

     पुनर्जन्म नहीं मानने से भी काम नहीं चलेगा। ऐसा कोई धर्म, मजहब नहीं जो मृत्यु के अनन्तर जीवात्मा का अस्तित्व न मानता हो। जन्म से पूर्व जीव का अस्तित्व न मानें ऐसे पंथ तो हैं, मरने के पश्चात् भी जीव रहता है- यह सब मानते हैं। 

     जीव का पुनर्जन्म न होता तो वेदान्त का अध्ययन व्यर्थ था। क्योंकि इसी जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्त करने के लिए ही तो वेदान्त की आवश्यकता है। व्यक्तिगत जीवन भोग, उपासना, कर्मकाण्ड आदि से भी सुधरेगा ! परन्तु हमेशा-हमेशा का बन्धन छुड़ायेगा वेदान्त – ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः। 

      अतः जीव के रूप पर विचार करके स्वरुप को जानो। 

 

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‘व्यवहार और परमार्थ का ऐक्य’

प्राणिमात्र की सेवा को परमार्थ न मानना तुम्हारे मन का दोष है या क्रिया का ?

     कोई भी क्रिया वस्तुरूप से परमार्थ ही है या नहीं ?

     वस्तुसत्य में, चिद् धातु में द्रष्टा-दृश्य का भेद सम्भव है अथवा नहीं ?

    द्रष्टा और दृश्य में कोई सन्धि (विभाजक रेखा ) है या नहीं ?

     है,तो वह भी दृश्य होने के कारण सन्धि कैसे ?

     नहीं है, तो द्रष्टा-दृश्य में भेद कैसे ?

     भेद नहीं, तो जैसे दृश्य को परमार्थ मानना मान्यता मात्र है, वैसे ही द्रष्टा को परमार्थ मानना भी मान्यतामात्र  है  कि नहीं ? 

     यदि दोनों मान्यता है तो संसार के सभी कर्म-भक्ति-ज्ञान सम हैं या नहीं ?

     तत्त्व में, साधना में, क्रिया में, द्रव्य में, गुण में, भाव में, जो भेद है वह मान्यता मात्र ही है, तत्त्वगत नहीं-यह जाने बिना निर्द्वन्द्वता, जीवन्मुक्ति अथवा वर्तमान जीवन के आनन्द में मस्ती आ सकती है या नहीं ?

     न भी आवे तो तत्त्वतः कुछ अन्तर हो गया क्या ?

     क्या जड़- चेतन दो हैं ?

     इनकी सन्धि क्या है ?

     सन्धि नहीं है तो सम्पूर्ण एकत्व ही है न ?

     फिर व्यवहार और परमार्थ अलग-अलग क्यों ?

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देह के विरोधी या अंतर्भूत होने का भाव मिटाये बिना परमार्थ और व्यवहार भेद भी नहीं जाता। यह भेद भी अन्य भेदों की भाँति दुःखद है; क्योंकि जो परमार्थ सर्व देश, सर्व काल, सर्व रूप और सर्व अनुभवरूप नहीं है,वह अपने अभाव में दुःख देगा ही, इसमें सन्देह नहीं। 

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‘संसार की विविधता’

1. किसी पदार्थ को परमात्मा से भिन्न समझना संसार है। समझ का नाम संसार है- ईंट-पत्थर का नहीं। 

2.साधारण जन समझते हैं- देश, काल, वस्तु, शक्ति आदि से समझ बनती है। व्यवहार-दृष्टि से यह सत्य भी है; परन्तु सर्वथा सच्ची यह बात है कि समझ ही उनका निर्माण करती है। 

3. अपने को भोक्ता, दूसरे को भोग्य और दूसरे को भोक्ता, स्वयं को भोग्य समझना संसार है। दरअसल एक परमात्मा है, उसमें भोक्ता-भोग्य का भेद नहीं है। पुरुष भोक्ता है, स्री भोग्य- यह भ्रम है। स्री भोक्ता और पुरुष भोग्य- यह भी भ्रम है। विषय शरीर को खाये जा रहे हैं या शरीर विषयों को इसका निर्णय जज बनकर करो। 

4. जैसे बेवकूफ आदमी  दाद खुजलाने को ही सुख मानता है, वैसे ही त्वचा को त्वचा से, जीभ को मिर्च-मसाले से- इन्द्रियों को विषयों से घिसने को ही सुख कहा जाता है। यह तो केवल आवेग की शान्ति है। सुख कहाँ है ? जिसे लोग सुख कहते हैं, वह तो इच्छा उदय होने के पूर्व भी था। फिर मिला क्या ? भोग्य क्षणभंगुर है। इन्द्रियों में संतोषजनक शक्ति नहीं। भोक्ता भिन्न-भिन्न कर्मों के अनुसार न्यूनाधिक भोग करने के लिए विवश है। ऐसी स्थिति में संसार में क्या सुख है ?

तुम जज होकर निर्णय करो, भोगी सुखी है या त्यागी ? कहीं दोनों के निर्णायक जज साहब ! आप साक्षी ही तो सुखी नहीं ? 

 

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प्रेमी आराधक के गुण

आनन्दमुकुन्द के प्रेमी आराधक के जीवन में यह बातें सर्वदा रहती हैं-

१. सम्मान– अपने इष्टदेव प्रियतम के प्रति सर्वदा सम्मान का भाव। अर्जुन किसी भी अवस्था में हों, कृष्ण को देखते ही खड़े हो जाया करते थे।

२. बहुमान– अपने प्राणाराम को स्मरण करानेवाली वस्तुओं को देखते ही तन्मयता। नृसिंह पुराण में कथा है कि राजा इक्ष्वाकु कृष्णसार मृग को देखते ही ‘कृष्णसार- कृष्ण कृष्ण’, कमल सामने आते ही ‘कमलनयन’ और श्याम मेघ देख कर ‘मेघश्याम श्यामसुन्दर’ पुकारते हुए तन्मय हो जाते थे।

३. प्रीति– अपने हृदय में आनन्दात्मक राग का उल्लास फुदकना। अक्रूर के घर पर कृष्ण के आने पर उनका हृदय बल्लियों उछलने लगा था।

४.विरह– एक गोपी कहती है- ‘अपने बड़ों के सामने कैसे बोलूँ ? हृदय फट रहा है।’

दूसरी कहती है- ‘जब हम विरह की आग में जल ही मरेंगी, तब यह निगोड़ी लाज किस काम आयेगी।

५. इतर विचिकित्सा – ‘दूसरे पर दृष्टि न डालना। भक्त उपमन्यु पर शिव जी प्रसन्न हुए। ऐरावत पर चढ़कर वज्रधारी इन्द्र के वेश में आये वरदान देने। उसने मुँह फेर लिया, बोला- ‘शंकर जी कीड़ा बना दें, नरक में डाल दें, स्वीकार है। आप त्रिलोकी का राज्य भी दें तो नहीं चाहिए। 

६. महिमख्याति – जहाँ-तहाँ, मौके-बेमौके अपने स्वामी की महिमा प्रकट करना। यमराज ने नरक में पड़े जीवों से कहा- ‘तुमने पहले कृष्ण भक्ति क्यों नहीं की ?’ दूतों से बोले – ‘भगवद्भक्तों के पास कभी न जाना।’ उपदेश के अच्छे पात्र मिले; परन्तु मन की बात जो ठहरी। 

७. तदर्थ प्राणधारण – केवल उसी के लिए जीना। खाये-पिये, सोये, पहने बिना शरीर ठीक नहीं रहेगा, तो उसे कैसे सुखी करेंगे। मुझे दुःखी देख कर वह भी दुःखी हो जायेगा। जीते हैं तो उसीके लिए, मरेंगे तो उसीके लिए। 

८. तदीयता– अपनी सब वस्तुओं को उसीका समझना। 

९. सर्वत्र तद्भाव – सबमें उसीका दर्शन। 

१०. अप्रतिकूल्य – कभी प्रतिकूल भाव न आना।  

 

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‘बन्धन कहाँ ?’

     आवरण लक्ष्य पर नहीं है। अपना आत्मा ही अविचारित-अज्ञात होकर आवृत- सा प्रतीत हो रहा है। अज्ञातरूप से आत्मा ही अन्य-सा, अप्राप्त-सा भासता है। न केवल लक्ष्य स्वतः प्राप्त है, वस्तुतः साधन भी स्वतः प्राप्त ही है। अनन्तता अपना स्वयंसिद्ध स्वरुप है, तो ज्ञान क्या अपना स्वयंसिद्ध स्वरुप नहीं है ? अनित्यता हमें छू नहीं सकती- हम विविक्त हैं। अद्वितीय असङ्ग में राग कहाँ ? हम विरक्त हैं। मन, इन्द्रिय, कर्म, शरीर, अभिमान, मनोराज्य- इनका विषय या आश्रय आत्मा नहीं है। फिर षट्सम्पत्ति की न्यूनता अपने स्वरुप में कहाँ ? बन्धन, किसका, किसको और क्या ?

    निश्चय, निर्णय एवं स्थिति को श्रवण, मनन और निदिध्यासन कहते हैं। पिछले दो पहले की अदृढ़ता या प्रतिबन्ध को मिटाते हैं। निश्चय अन्य विषयक हो तो प्रवर्तक होता है। स्व विषयक निश्चय साध्य का नहीं, सिद्ध का ही होता है। सिद्ध वस्तु का अनिश्चय से कुछ बिगड़ता नहीं, निश्चय से बनता नहीं। वह तो ज्यों का त्यों रहता है, केवल सत् हो तो। चित् तो निश्चय अनिश्चय का प्रकाशक है। उसे उनकी आवश्यकता नहीं। आनन्द हो और स्व हो तो निश्चय का कोई प्रयोजन ही न रहा। क्या अपना होना, जानना और प्रियता अपरोक्ष निश्चित नहीं है !    

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‘भेद कहाँ’

     मैं उनके लिए रो रहा था, उनकी प्यारी-प्यारी स्मृति में अपने को खो कर। वे आये मन्द-मन्द मुस्कराते हुए। हृदय की भेंट उनके सामने रखते हुए मैंने कहा- ‘मैं तुम्हारे लिए।’

     वे बोले- ‘और मैं, मैं तुम्हारे लिए !’

     दोनों ने एक-से ही शब्दों का प्रयोग किया। तब क्या अर्थ में भेद है ? ऐसा कैसे सम्भव है ? मेरे शब्दों की गम्भीरता में भेद सम्भव है- उनकी सत्यता तो असन्दिग्ध है।

     ऐसी अवस्था में शेष और शेषी का, भोक्ता और भोग्य का विभाजन कितना निराधार होगा ?

     इसका अर्थ यह हुआ कि तुम्हारा ‘मैं’ और मेरा ‘मैं’- ऐसा कुछ अलगाव नहीं है। दोनों का ‘मैं’ एक ही है। तुम्हारे लिए ‘मैं’ और मेरे लिए ‘तुम’ यह दोनों विकल्प मात्र हैं- अर्थशून्य वाग्व्यवहार-मात्र।

 

तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। 

   दिवीव चक्षुराततम् ।।  (विष्णु सूक्त -५ )

      ‘जैसे नेत्र आकाश में फैल कर सब कुछ देख लेता है अथवा जैसे आकाश में सूर्य का विस्तृत प्रकाश देखा जाता है, वैसे ही श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष भगवान् विष्णु के उस परम पद अर्थात् प्रत्यक्चैतन्याभिन्न ब्रह्म स्वरुप का सदा-सर्वदा अपरोक्ष अनुभव करते हैं।’  

 

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प्रसङ्गों में सूक्तियां

     एक बार श्रीमहाराजजी श्रीसाईं साहब के साथ बैठे थे। तभी महाराजजी के पास एक पागल प्रेमी आया और उनके पास ही तख्त पर बैठ कर और उनके कन्धे पर हाथ रख कर उनको प्यार करने लगा। सेवकों ने ऐसा करने से रोक दिया। श्री साईं साहब ने (उनके जाने पर ) कहा – ‘ऐसे आदमी से भय रखना चाहिए। इनकी मनोवृत्ति का क्या ठिकाना ?’ श्रीमहाराजजी ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘मुझे प्रसन्नता हो रही थी कि कोई तो हमारा आशिक हुआ।’

     किसी का दोष देखना असल में आपके स्वभाव में ही नहीं है। 

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     एक बार श्रीमहाराजजी के सामने किसीने नास्तिकों की निन्दा की।  किसी की निन्दा सुनना इनके स्वभाव के विरुद्ध है। उन्होंने बीच में ही किन्तु बड़े प्रेम से कहा- ‘भैया, नास्तिक भी भगवान् के वैसे ही हितैषी होते हैं, जैसे किसी बड़े आदमी का सेवक अपने मालिक का। इसे यों समझना चाहिए की जैसे मालिक को विश्राम करते देख कर सेवक आगन्तुक से कह देता है कि मालिक घर में नहीं है, वैसे ही नास्तिक भी – ‘भगवान् नहीं है’, यह कह कर उनके नित्य-निकुञ्ज-विहार में बाधा नहीं पड़ने देता। और फिर नास्तिक भी तो भगवान् की सृष्टि में ही हैं। भला गर्भस्थ शिशु की किसी भी क्रिया से माँ नाराज़ होती है ? भगवान् भी किसी नास्तिक से नाराज़ नहीं होते।  

 

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