‘मोक्ष आत्मा का स्वरुप ही है’

     अन्न आत्मा नहीं है। विष्ठा और भस्म भी आत्मा नहीं हैं। फिर दोनों के बीच की अवस्था देह और इन्द्रियाँ आत्मा कैसे हो सकती हैं ? जिसकी पूर्वावस्था आत्मा नहीं है और परावस्था आत्मा नहीं है, वह वस्तु मध्य में भी अविद्या से आत्मा मानी हुई है। 

     जैसे एक ही बीज पुआल, भूसी और चावल- तीन रूप धारण करता है, वैसे ही भोजन किया हुआ अन्न विष्ठा, मांस और बुद्धि का रूप ग्रहण करता है। यह सब जड़ के विकार हैं, आत्मा नहीं। 

     धर्म चरित्रशुद्धि के द्वारा अंतःकरण-शुद्धि का हेतु है, इसलिए वह तत्त्वज्ञान में परम्परा साधन है। शम-दमादि ज्ञान के कारण अर्थात् अंतःकरण के शोधक हैं, इसलिए बहिरंग साधन हैं। श्रवण-मननादि जीव-पदार्थ अर्थात् ईश्वर और जीव के स्वरुप के शोधक हैं, अतः अन्तरङ्ग साधन हैं। अविद्या की निवृत्ति केवल तत्त्वज्ञान से होती है, इसलिए मोक्ष का साक्षात् साधन तत्त्वज्ञान ही है। तत्त्वज्ञान से अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की निवृत्ति नहीं होती, बल्कि नित्य प्राप्त में अप्राप्ति का और नित्य निवृत्ति में अनिवृत्ति का जो भ्रम होता है उसकी निवृत्ति होती है। इसलिए मोक्ष अपने आत्मा का स्वरुप ही है।  अर्थात् आत्मा नित्य, शुद्ध,बुद्ध,मुक्त ब्रह्म ही है।    

 

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भगवद्-वात्सल्य

         भगवान् का वात्सल्य सम्पूर्ण विश्व पर एकरस बरस रहा है। वे ही समुद्र के रूप में लहरा रहे हैं, वे ही वायु के रूप में हमारी श्वास-प्रश्वास बन रहे हैं, वे ही हमारे शरीर की मिट्टी हैं, पानी हैं,गर्मी हैं, प्राण हैं; वे ही आकाश हैं, मन हैं, बुद्धि हैं, वे ही हमारी आत्मा हैं। जब परमात्मा के साथ हमारी शरणागति का बोध पूर्ण होता है तब यह सम्पूर्ण जगत् जैसे हमारी गोद में हो और स्वयं भगवान् भी आकर हमारी गोद में बैठ जाते हैं- ऐसा हो जाता है। तब सबके प्रति स्नेह, सबके प्रति वात्सल्य, सबका हित, सबके प्रति करुणा, सब स्वभाव से आ जाती है। और, तब हमारे जीवन में अपने आप ही महावीर की अहिंसा आ जाती है, बुद्ध की करुणा आ जाती है और हमारे वेद-शास्त्रों में जो हित भावना है, भगवान् के हृदय में अपनी सम्पूर्ण विश्व-सृष्टि के प्रति जो स्नेह भावना, वात्सल्य भावना है, वह हमारे हृदय में सबके प्रति हो जाती है। नारायण, परमात्मा की दृष्टि से अलग जो अपनी दृष्टि रखता है, वह महात्मा ही नहीं है। जैसे परमात्मा को यह सारी सृष्टि अपना स्वरुप दिखती है, वैसे ही महात्मा भी उसकी  नज़र-से-नज़र मिला करके सम्पूर्ण विश्व-सृष्टि को अपने स्वरुप में ही देखता है। 

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‘धर्म-नियंत्रित जीवन’

     कोई मनुष्य चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो अपनी सब इच्छाओं को पूर्ण नहीं कर सकता। 

  1. भोग की इच्छाएँ 
  2. संग्रह की इच्छाएँ 
  3. कर्म की इच्छाएँ 

    ऐसी स्थिति में आवश्यक है, कि इनमें छाँट की जाय। 

  1. कौन-कौन पूरी की जायँ। 
  2. कौन-कौन छोड़ दी जायँ। 
  3. किन्हें प्राथमिकता दी जाय। 
  4. किस एक के पूर्ण होने से और सब पूर्ण हो जाती हैं या मिट जाती हैं ?

     इस विवेक से धर्म  का प्रारम्भ होता है, बिना इच्छाओं में काट-छाँट या नियंत्रण से मनुष्य जीवन चल नहीं सकता,इसलिए संग्रह, भोग एवं कर्म पर विवेकानुसारी धर्म का नियंत्रण होना आवश्यक है। 

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     कर्म, भोग और संग्रह की इच्छाओं की मूल प्रेरणा एवं उद्देश्य के सम्बन्ध में विचार करने पर ज्ञात होता है कि उन्हें भी साधारण रूप से तीन भागों में बाँट सकते हैं। 

  1. जीवन सम्बन्धी– मृत्यु, रोग, भूख, ठंड, निर्बलता आदि से बचने के लिए सामग्रियों की आवश्यकता। 
  2. ज्ञान सम्बन्धी– कहीं मूर्ख न बनना पड़े, इसके लिए ग्रन्थ, पाठशाला, पर्यटन, चिन्तन, सत्संग आदि ज्ञान-रक्षक एवं वर्धक सामग्री। 
  3. आनन्द सम्बन्धी– इन्द्रिय और मन को अभाव, दुःख, चिन्ता आदि से बचा कर प्रफुल्ल-प्रसन्न करने के लिए सामग्री।    

 

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‘शान्ति का उपाय’

       कच ने सम्पूर्ण शास्त्रों के स्वाध्याय एवं मीमांसा के अनन्तर पिता के सामने निवेदन किया- ‘पिता जी, सब जान लिया, परन्तु शान्ति नहीं मिली।’

       बृहस्पति ने कहा- ‘बेटा, त्याग के बिना शान्ति नहीं मिलती।’

     और उसने सब कुछ त्याग दिया। केवल कौपीन-कमण्डलु रख कर वर्षों व्यतीत हुए। एक वर्ष, दो वर्ष, तीन वर्ष- त्याग का संकेत मिलने पर कौपीन-कमण्डलु भी छोड़ दिया। फिर भी शान्ति नहीं मिली। पिता के संकेत पर चिता जला कर शरीर भस्म करने के लिए उद्यत हुआ । पिता ने हाथ पकड़ लिया, बोले- ‘बेटा, जब तक वासनाओं से भरा चित्त है, उसके प्रति अहंता-ममता है, तब तक देह भस्म करने से कुछ न होगा। वासना के अनुसार देह पर देह मिलते जायेंगे। वस्तुतः देह का त्याग त्याग नहीं है, चित्त का त्याग ही त्याग है। चित्त-त्याग ही शान्ति है, चित्त-त्याग ही मुक्ति है।’

     कच- ‘चित्त त्याग की युक्ति क्या है,  पिताजी ?’

    बृहस्पति- ‘अपने आत्मा को ब्रह्म जान लेने से चित्त, चेत्य और चित्ति अर्थात् त्रिपुटी का बाध हो जाना ही चित्त का सच्चा त्याग है। फिर तो फुरता हुआ चित्त भी अकिंचित्कर है।’ 

 

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विचारणीय :

      जिनका धर्म से प्रेम है, वे कैसी भी परिस्थिति में पड़ जायें, धर्म उनका साथ नहीं छोड़ सकता। वे स्वयं आश्रयहीन होने पर भी दूसरों के आश्रय होंगे। वे स्वयं उपकार के पात्र होने पर भी दूसरों का उपकार करेंगे। जो सर्वदा दूसरों को देते चले आए हैं, वे अपने पास कुछ न रहने पर भी दूसरों को कुछ-न-कुछ देंगे ही। इसके ठीक विपरीत जो अधर्म से प्रेम करते हैं, अन्याय को आश्रय देते हैं, परपीड़न में ही उत्साह रखते हैं, वे चाहे कितनी भी अच्छी परिस्थिति में पहुँचा दिये जायें, अपनी दुष्टता नहीं छोड़ेंगे। यह बात कौरव और पाण्डवों के चरित्र में बहुत स्पष्ट रूप से दीखती है। 

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        सज्जन पुरुषों में यह स्वाभाविक गुण होता है कि यदि दूसरा कोई उनका अनिष्ट करना चाहे तो वे यथाशक्ति अनिष्ट से अपने को बचाने की चेष्टा करते हैं, परन्तु अनिष्ट करनेवाले का अनिष्ट नहीं करना चाहते। वे स्वभाव से ही सबका हित चाहते हैं और हित चाहने में यह भेदभाव नहीं रखते कि कौन मेरा शत्रु है कौन मेरा मित्र है। वे दुःखी को देख कर दयार्द्र हो जाते हैं, अनिष्ट करने वालों को देखकर उसके अन्दर सद्-बुद्धि का संचार करने लिये तड़पने लगते हैं और पुण्यात्मा को देखकर उसके पुण्य की अभिवृद्धि के लिए सचेष्ट हो जाते हैं। उनके जीवन का यही नियम है।  

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‘हमें भगवत्प्राप्ति में देर क्यों ?’

     उन दिनों श्री ध्रुव जी को भगवत्प्राप्ति हुई थी। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि इकट्ठे हुए। परस्पर विचार करने लगे कि हम लोगों ने कठिन-कठिन तप, व्रत, आराधन किये, भगवत्प्राप्ति नहीं हुई। यह नन्हा-सा शिशु। छः मास इसकी तपस्या। भगवान् कैसे मिल गये और हमें भगवत्प्राप्ति में देर क्यों ?

     निश्चय हुआ की चलकर ध्रुव से ही पूछा जाये। उनके पूछने पर ध्रुव कोई उत्तर न दे सके; क्योंकि उन्हें अपने में किसी विशेषता का कोई पता नहीं था। ध्रुव के चुप रहने पर महात्माओं ने कहा-  ‘अच्छा, जब भगवान् मिलें,तब उनसे पूछकर बतलाना।’एक बार भगवान् ध्रुव को मिले तो ध्रुव के प्रश्न करने पर भगवान् ने कहा – ‘अभी चलो, घूम आयें, फिर प्रश्नोत्तर। ‘

     दोनों निकल पड़े। सामने विशाल जलराशि। खिले कमल। सारस, हंस तैर रहे। छोटी-सी सुन्दर नाव पर दोनों बैठे। भगवान् ने पतवार अपने हाथ में ली। नाव जल पर तैरने लगी। ध्रुव अपलक नेत्रों से अनूप रूपराशि का पान करने लगे। थोड़ी दूरी पर एक श्वेत पर्वत मिला। ध्रुव ने पूछा – ‘प्रभो, यह क्या है ?’ भगवान् ने कहा – ‘यह तुम्हारे अनादिकाल से अबतक के उन जन्मों की हड्डियों का पर्वत है जिनमें तुमने मेरी भक्ति नहीं की थी।’

    आगे बढ़ने पर पहले से भी विशाल गगनचुम्बी पर्वत देखकर ध्रुव ने जिज्ञासा की। भगवान् ने कहा – ‘ध्रुव ! यह तुम्हारे  उन जन्मों की हड्डियों का पर्वत है, पहले-से लाखों गुना बड़ा, जिनमें तुमने मेरी भक्ति की है। और जो आज मैं तुम्हें मिला हूँ, तुम्हारी नाव खे रहा हूँ- यह केवल एक जन्म की साधना नहीं है। तुमने मेरे लिए कोटि-कोटि जन्म खपा दिये।’

    ध्रुव ने चर्चा की, महात्माओं के प्रश्न का उत्तर मिल गया।    

 

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‘जगत् एक नाटक है या उसकी लीला है !’

      श्रवण, मनन और निदिध्यासन से जब यह निश्चय हो गया की सब कुछ परमात्मा है , तब यह भला है, यह बुरा है, इस प्रकार की दृष्टि ही क्यों होती है ? यह भला है- इस प्रकार की दृष्टि तो यथाकथञ्चित् क्षम्य भी है, परन्तु बुरे की कल्पना  तो सर्वथा विपर्यय है।  यदि सर्वथा समत्व न रहे, वैषम्य हो ही जाय, तो अपनी दृष्टि भले पर ही जानी चाहिए। परन्तु भले-बुरे की भावना और सत्ता को दृढ़ करने की क्या आवश्यकता; उन्हें तो शिथिल करना चाहिए। यदि प्रतीत होता है भला-बुरा, तो वह लीला विलास ही है, नाटक मात्र है। नाटक के भीम और दुर्योधन दोनों ही मनोरंजन के लिए हैं। नाटक की मृत्यु, रोग और उत्पीड़न रसानुभूति के लिए है। अद्-भुत, रौद्र, भयानक और बीभत्स भी तो रस ही है ! तब इनको क्षुब्ध होने का क्या कारण है ?

      यह भी आवश्यक नहीं कि नाटक को नाटक के रूप में स्मरण रखा ही जाय; नाटक देखते-देखते उसका नाटकत्व भूल जाना तो नाटक की अपूर्व सफलता और मनोहरता का चिह्न है। उस विस्मृति में भी यह निश्चय अडिग रहे कि  यह नाटक है। जो अभिनय अपने को मिले उसको पूर्ण करो और खूब सफलता के साथ। वैसे कठोर कर्तव्यों का भी पालन करो, भगवान् श्री कृष्ण के प्रति जिनका पालन भीष्म को करना पड़ा था। बस ध्यान  रहे, व्यावहारिक जगत् एक नाटक है और मैं उसका पात्र तथा द्रष्टा हूँ, भला-बुरा कुछ नहीं, सब लीला है।   

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