मन पर विजय प्राप्त करने की युक्ति

मन पर विजय प्राप्त करने के लिये चार युक्ति ध्यान में रखनी चाहिये –

अध्यात्मविद्याधिगमः साधु सङ्गतिरेव च। 

वासनासंपरित्यागः प्राणस्पन्द निरोधनम्। 

 एतास्ता युक्त्या पुष्टः सन्ति चित्तजयेखिल। 

  1. अध्यात्मविद्या – माने पोथी में लिखी हुई नहीं। अध्यात्मविद्या माने ऑंख का देखना और हमारे मनका सङ्कल्प। हाथ का उठना और हमारे मनकी स्थिति। पॉँव का चलना और हमारा मन। और ,मन और हमारी आत्मा। ये किस प्रकार सम्बद्ध होकर काम करते हैं !जैसे मोटर चलाने वाले ड्राइवर को मोटर की एक-एक मशीनरी का ज्ञान होवे ,तब तो वह बिगड़ने पर उसको चालू कर लेगा और मशीनरी का ज्ञान न होवे तो बिगड़ने पर वह चालू नहीं कर सकता। इसी प्रकार यह हमारे शरीर का यंत्र किस प्रकार से चालू होता है -यह हमको आँखसे देखने की ,कान से सुनने की, नाक से सूँघने की जो प्रक्रिया है ,मन के साथ जो इनका सम्बन्ध है ,वह ज्ञात होना चाहिये। तब हम मनको एकाग्र कर सकेंगे।
  2. साधुसंगतिरेव च – जिन्होंने अपना मन लक्ष्य में लगाया हो, उनकी संगति होनी चाहिए।
  3. वासनासम्परित्यागः  – जो भिन्न-भिन्न प्रकार की वासनायें हैं, उनका त्याग होना चाहिए।
  4. प्राण स्पन्द निरोधनं – प्राण को  रोकने का सामर्थ्य होना चाहिए।

ये चार युक्ति मन को निरुद्ध करने के लिए प्रधान हैं। यदि युक्ति नहीं करोगे भाई, ‘बिना युक्तिमनिन्दितं’ बिना प्रशस्त युक्ति के अनुष्ठान के मन कभी एकाग्र नहीं हो सकता।

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‘अभिमान’ आरोपित है, वस्तुतः नहीं

29may2017

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‘देवो भूत्वा देवं यजेत्’

        देखो, किसी बड़े आदमी से मिलना हो और एकदम गन्दी पोशाक पहनकर उसके पास जाओगे क्या ? अब तुम चाहते तो हो ईश्वर से मिलना और ये जो तुमने पहनी है गन्दी पोशाक वह काहे की ? बोले की चमड़े की। शरीर में अंगराग, स्नो काहे का लगाया ? चर्बी का स्नो लगाया। लिपस्टिक काहे का लगाया ? बोले की खून का। आँतों की पर्स ले-लेकर कहाँ जा रहे हैं ? बोले कि ईश्वर से मिलने के लिए जा रहे हैं । 

         तो जब तक स्थूल शरीर से अपने अहं को ऊपर नहीं उठावेंगे, तब तक ईश्वर से भला कैसे मिल पावेंगे ? इसमें एक बात और बता देते हैं ! नारायण, इसमें सगुण – निर्गुण, साकार-निराकार का कोई भेद नहीं है। साकार भगवान् का – राम, कृष्णादि का दर्शन भी इस गन्दी पोशाक से नहीं होगा। यह पोशाक छोड़कर जब भावमय शरीर बनता है, उस भावमय शरीर से उनका दर्शन होता है। निराकार में स्थिति भी इस पोशाक में नहीं होती। इसको छोड़कर समाधि लगानी पड़ती है, तदाकार-वृत्ति करनी पड़ती है। कर्मकाण्ड में यह बात आती है कि – 

‘देवो भूत्वा देवं यजेत्’

            अर्थात् देवता होकर देवता का यजन करना पड़ता है। 

            अब चोरी करके आवेंगे और महात्मा से कहेंगे कि हमको ब्रह्मज्ञान का उपदेश कर दो।  तो कैसे बनेगा ? पहले चोर शरीर को छोड़ो। व्यभिचारी शरीर को छोड़ो। उससे अलग हो जाओ। यह लोभी, कामी, क्रोधी, यह जो हड्डी, मांस, चाम, विष्ठा, मूत्र का पुतला है – इसमें  तो ‘मैं’ करके बैठे हैं। कहाँ साकार मिले, कहाँ निराकार मिले, कहाँ समाधि लगे और कहाँ ब्रह्मज्ञान होवे ?

            इसलिए, पहली शर्त परमात्मा के मार्ग में चलने की यह है कि  हड्डी, मांस, चाम, विष्ठा, मूत्र  की जो पोटली है, इसमें  से  अपने ‘मैं’ को निकाल लो। इसमें से अपने ‘मैं’ को निकाल कर देखोगे कि तुम्हारा ‘मैं’ तो व्यापक हो गया, तुम्हारा ‘मैं’ तो द्रष्टा है, भरपूर है। देहाभिमान को छोड़ते ही  इस द्रष्टा की दृष्टि कितनी बड़ी है कि उसमें अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों का नियन्ता अन्तर्यामी  ईश्वर और नियम्यजीव, दोनों उस दृष्टि के पर्दे पर आकर नाचने लगते हैं।  यह अखण्डतत्त्व के साक्षात्कार की विद्या है।    

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‘दान’ : विभिन्न प्रकार

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शरणागति :विभिन्न सम्प्रदाय

 

                  नारायण ,शरणागति जैन -सम्प्रदाय में भी है। जैन भाषा में इसे ‘आत्त -शरणो -भव ‘ बोलते हैं। आत्त माने आत्मा। यानी आत्मा की शरण में रहो। उनका कहना है कि यह सृष्टि पुद्गलों से बनी हुई है और इसमें अनादिकाल से संस्कारों की धारा बह रही है और जीव जन्मसे मृत्यु और मृत्युसे जन्ममें प्रभावित हो रहा है। अतः इनका आश्रय छोड़कर अपनी उस आत्माकी शरण लो ,जिसमें न राग है ,न द्वेष है ,न जन्म है और न मृत्यु है। इसको ‘आत्त शरणो भव ‘बोलते हैं। जैन -धर्ममें महावीरकी ,ऋषभदेवकी ,पार्श्वनाथकी शरण मुख्य नहीं है। वहाँ आत्म -शरण होना ही मुख्य है।   जो भी आत्म -शरण ,आत्म -निष्ठ हो गया ,वह निर्भार होनेके  कारण, सिद्ध-शिला पर बैठकर अलोकाकाश जानेका अधिकारी हो गया। 

          शरणागति बुद्ध -धर्ममें भी है। पर ,वहाँ शरणागति जरा दूसरे ढंग की है। इसमें -बुद्धं शरणं गच्छामि ,धर्मं शरणं गच्छामि ,संघं शरणं गच्छामि है।  तत्त्व -दृष्टि से बुद्धकी शरणागति है ,साधन -दृष्टिसे धर्मकी शरणागति है और आचार -दृष्टिसे संघकी शरणागति है। 
      
              शरण शब्दका प्रयोग बौद्ध -धर्ममें भी है और जैन -धर्ममें भी है और वेदान्तमें भी है ही। पर विशेषता यह है कि बौद्ध -धर्ममें बुद्ध -शरण है और जैन -धर्ममें आत्म -शरण है। बुद्धकी शरणमें हो जाना बुद्धकी करुणाकी पराकाष्ठा है और अपनी शरणमें आप हो जाना पौरुषकी पराकाष्ठा है। करुणा -प्रधान बौद्ध -धर्म है और अहिंसा -प्रधान जैन -धर्म है। न्याय -वैशेषिकमें शरणागतिका कोई प्रसङ्ग ही नहीं है। उसमें तो सभी पदार्थ ऐसे हैं कि यदि साधर्म्य -वैधर्म्य के द्वारा उनका ज्ञान ठीक – ठीक हो जाये तो मुक्ति हो जाती है। उसमें कोई लोक नहीं है। सांख्य -योगमें साधनके रूपमें ईश्वरप्रणिधान एवं अन्ततः आत्म -स्थिति ही शरण है। पूर्व -मीमांसा और वेदान्तमें अन्तःकरणकी शुद्धिके द्वारा परमात्माका साक्षात्कार मानते हैं। अब भक्ति -दर्शन बड़ा विलक्षण है। उनका मानना है कि भगवान् का एक नाम शरण है और दूसरा जो शरण -भाव है सो अर्थात् एक ,शरण -रूप भगवान् और दूसरा शरणागतिका भाव -माने उपाय और उपेय ,साधन और साध्य दोनों प्रभु ही हैं। वही मिलनेवाले और वही मिलानेवाले। 
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