विचारणीय :

       दिन के साथ रात और रात के साथ दिन लगा ही रहता है। यह कभी नहीं हो सकता कि केवल दिन-ही-दिन हो या केवल रात-ही-रात हो। चलते हुए रथ का पहिया नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे जाता ही है। ठीक इसी प्रकार मनुष्य का भाग्यचक्र बदलता रहता है- कभी अच्छे दिन आते हैं, कभी बुरे दिन आते हैं। साधारण लोग अच्छे दिनों में आसक्त हो जाते हैं, बुरे दिनों से घबरा जाते हैं। वे अच्छे दिनों में प्रमाद करने लगते हैं और बुरे दिनों में पागल हो जाते हैं; परन्तु महापुरुष दोनों ही परिस्थितियों में एक-से रहते हैं, बुरे दिनों को शुभ दिनों के आगमन की सूचना समझते हैं और शुभ दिनों को बुरे दिनों का पूर्व रूप। वे दोनों को ही एक ही वस्तु के दो पहलू समझते हैं और इसी से समत्व में स्थित रहते हैं।

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      जो होनेवाला होता है, वह होकर ही रहता है। भगवान् की इच्छा,जीवों का प्रारब्ध और प्रकृति की अनुलङ्घनीय धारा का किसी प्रकार उल्लङ्घन नहीं किया जा सकता। सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म, शीत-उष्ण और पाप-पुण्य का किसी प्रकार मेल नहीं हो सकता। न्याय और अन्याय में कभी समझौता नहीं हो सकता। ये सब बातें अटल हैं; इनके विपरीत जो चेष्टा करते हैं, वे कभी सफलता प्राप्त नहीं कर सकते।

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जिज्ञासा और समाधान

   ‘भगवन् ! कई बार अपमान का बड़ा कटु अनुभव होता है, लोग तरह-तरह से अपमान कर देते हैं, क्या करूँ ?’

       ‘नारायण ! जब तुम्हें अपमान का अनुभव होता है, तब तुम ऐसी भूमि में उतर आये रहते हो, जहाँ अपमान तुम्हारा स्पर्श कर सकता है। तुम ऐसी भूमि में – ऐसी स्थिति में रहा करो, जहाँ अपमान की पहुँच ही नहीं है। यदि तुम अपने भगवान् को भूल कर, आत्मा को भूल कर अहंकार या ममकार के अधीन हो जाते हो तो अपमान अवश्य सताएगा, अन्यथा नहीं। इतना ही नहीं, अपमान तो तुम्हारी आत्म-ज्योति को जाग्रत् करने वाला है। तुम्हारी भगवद्-विस्मृति को नष्ट करके स्मृति को ताजी बनाने वाला है। अपमान क्षोभ का नहीं, प्रसाद का जनक है। अपमान होते ही प्रसन्नता से खिल उठना चाहिए कि मेरी स्मृति ताज़ी करने के लिए साक्षात् भगवान् के दूत, नहीं-नहीं स्वयं भगवान् आये हैं। महान् सौभाग्य है- जीवन में यह अपूर्व अवसर है।’

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‘क्षमा’

      एकनाथ जी का नित्य गोदावरी स्नान करने का नियम था। उनकी सरलता, मैत्री, भगवद्भक्ति आदि सद्-गुणों के कारण उनका उत्कर्ष न चाहने वाले कुछ लोग उनसे चिढ़ते भी थे। उनके धैर्य की परीक्षा के लिए एक दुष्ट को नियुक्त किया। नदी के मार्ग में वह एक पेड़ की शाखा पर छिपकर बैठ गया। एकनाथ जी स्नान करके लौटे तो उसने उनपर थूक दिया। एकनाथ जी लौटे और पुनः स्नान कर लिया। दुबारा थूकने पर फिर स्नान किया। इस तरह बार-बार थूकने पर  उन्हें नदी में सौ बार स्नान करना पड़ा फिर भी उनके मन में किञ्चित् भी क्षोभ न हुआ। दुष्ट घबराया, पश्चात्तापतप्त वह एकनाथ जी के चरणों में गिर पड़ा-

         ‘प्रभो, क्षमा करें, मैंने बड़ा अपराध किया।’

       ‘नहीं भाई,  तूने तो आज बड़ा उपकार किया’, उसे उठाकर अपने हृदय से लगाते हुए एकनाथ जी ने कहा – ‘नित्य तो मैं एक ही बार स्नान करता था। तेरे कारण आज मुझे सौ बार जाह्नवी स्नान का सौभाग्य मिला।’  

 

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