उलूखल बन्धन लीला-23

     कवि की अंतर्भेदिनी दृष्टि क्या देख रही है ? ध्यान दीजिये। यशोदा माता ने श्रीकृष्ण को बाँध लिया, यह बात अलग रहे। मुझे तो ऐसा दीखता है कि श्रीकृष्ण ने ही यशोदा माता और ऊखल दोनों को ही बाँध लिया। यशोदा भगवत्स्नेह में बँध गयी और ऊखल कृष्ण के साथ बँध कर दूसरों के उद्धार में समर्थ हो गया।

सा बबन्ध  तमित्यास्तां मन्मतं तु बबन्ध सः।

गोपिकोलूखले  एव तमस्तन्तुगुणात् प्रभुः।।

     भगवत्स्वरूप बोध में शब्दनिष्ठ शक्ति, योग, लक्षणा और गौणी वृत्ति कारण होती है। ऐसा लगता है कि योगीन्द्र गर्ग और वेदों ने पहली वृत्तियों से बोध कराया और यशोदामाता गौणी वृत्ति (रस्सी) से जानना चाहती हैं।

शक्तिर्योगो लक्षणा गौण्यपीति बोधे हेतौ श्रीपतौ तत्र चोक्तम्।

तद्बोध्यत्वं गर्गयोगीन्द्र-वेदैर्मन्ये गौण्या गोपिका ज्ञातुमैच्छत्।।

    उपक्रम में ही यह अभिप्राय प्रकट कर दिया है कि महापुरुष की कृपा ही भगवत्प्राप्ति का हेतु है। यशोदा माता इस रज्जु-बन्धन द्वारा ऊखल (खल) का भी श्रीकृष्ण के साथ बन्धन-सम्बन्ध करने में समर्थ हैं। माता- महापुरुष  के द्वारा भगवान् के साथ बाँधा गया ऊखल भी जड़ नलकूबर का उद्धार करने में समर्थ हो जाता है। बन्धन कुछ नहीं है। वह किसके द्वारा किसके साथ किया गया है- इसीका महत्त्व है।

     अपना बालक है – इसलिए माता को बाँधने का अधिकार है। पराया बालक होता तो उपेक्षा की जा सकती थी। कृष्ण ने अपराध किया है इसलिए वे बन्धन के योग्य हैं। श्रीजीवगोस्वामी कहते हैं कि रस्सी जब पहली बार दो अंगुल कम पड़ी तो यशोदा ने सोचा कि यह दैववश हुआ। परन्तु जब बार-बार दो अंगुल न्यून होने लगी, तब विभुता-शक्ति का चमत्कार देखने में आया। प्रेम बहुत अधिक है। परन्तु परिश्रम की पूर्णता और कृपा-विशेष की उपेक्षा है। अतएव सभी रस्सियाँ दो-दो अंगुल न्यून होती गयीं। विभुता-शक्ति भी इसीलिए प्रकट हुई कि श्री कृष्ण के बाल्योचित हठ की लीला पूर्ण हो।  

 (क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-22

     अब बन्धन – साधनस्वरूप पर विचार कीजिये। रज्जु आदि के पूर्वापर भाग में यही विद्यमान हैं। स्वयं यशोदा इस सम्बन्ध में प्रमाण हैं कि उन्होंने भगवान् के मुख में सम्पूर्ण विश्व देख लिया था। वे सबके बाहर और भीतर हैं। न केवल वे जगत् हैं, जगच्चय (जगतां चयः) हैं। जहाँ तक जगत् की गति है भगवान् उतने ही नहीं हैं। क्या जगत् जगदात्मा को बाँध सकता है। स्वयं स्व को नहीं बाँधता। किसी भी प्रकार से भगवान् में बन्धन नहीं है, यह सोचकर भक्त निश्चिन्त रहते हैं। परन्तु इस रूप में लोग भगवान् को नहीं जानते। यदि वह अपने को सर्वथा गुप्त ही रखे तो उसका स्वरुप किसी को ज्ञात नहीं होगा। अतः भगवान् स्वयं अपने परस्पर-विरुद्ध धर्मों का बोधन कराते हैं ; क्योंकि दूसरों के समझाने पर भी सन्देह की पूर्ण निवृत्ति नहीं होती। मर्मज्ञ पुरुष अन्याभिनय-परायण नट के वास्तविक स्वरुप को पहचान लेते हैं। परन्तु यह अधोक्षज (अधः अक्षजं ज्ञानं यस्मात्) प्रत्यक्षादि-जन्य ज्ञान जिसका स्पर्श नहीं कर सकते हैं। जबतक यह स्वयं अपनी पहचान स्वयं न करावें, क्या हो सकता है ? अतः बद्ध-मुक्त सब यही हैं – यह प्रकट करने के लिए बन्धन-लीला है।

     यशोदा माता ने ऊखल में क्यों बाँधा ? इसपर हरिसूरि की उत्प्रेक्षा सुनिए- नामैकदेशग्रहण-न्याय से उलूखल खल है। खल-संग छुड़ाने के लिए उसका अति संग  ही कारण बन जाता है। अत्यन्त सान्निध्य से अवज्ञा का उदय होता है। इस नीति के अनुसार ही यशोदा ने उलूखल में बाँधा।

परिहातुं खलसङ्गममतितरखलसङ्ग  एव हेतुरिति।

अतिसन्निकर्षशास्त्राज्ज्ञानत्येषा बबन्ध किमु तस्मिन्।।

     यशोदा मैया ने सोचा कि उलूखल भी चोर है; क्योंकि माखनचोरी करते समय इसने कृष्ण की सहायता की थी। चोर का साथी चोर। इसलिए दोनों बन्धन के योग्य हैं।

अयं चौरश्चौर्यकर्मण्येतत्साहाय्यभागभूत्।

इति वीक्ष्य द्वयोर्बन्धार्हतां तत्र बबन्ध तम्।।

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-21

    श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ने यह आशय प्रकट किया है कि यद्यपि भगवान् वैसे ही हैं फिर भी उन्हें अनन्त प्रेम का, असाधारण वात्सल्य का विषय बना कर माता ने उन्हें बाँध दिया। बात यह है कि ईश्वर के अधीन सब है परन्तु ईश्वर प्रेम के अधीन है। भक्ति में जो बाँधने की शक्ति है वह भी प्रभु की ही शक्ति है। वे किसी और से नहीं, अपनी शक्ति से ही बँधते हैं। प्रेम उनके ऐश्वर्य को आच्छादित कर देता है। वे प्राकृत नहीं हैं, चित्पुञ्ज हैं। फिर भी प्राकृत के समान बाँध दिये गये। यही प्रेम की शक्ति है।

    आचार्य वल्लभ बंधन-प्रसंग पर प्रसन्न-गम्भीर विवेचन करते हैं। उनका कहना है – भगवान् में दोनों प्रकार से बन्धन का अभाव सिद्ध होता है। पहला भगवत्स्वरूप का विचार और दूसरा बन्धन के साधनस्वरूप का विचार। देखिये, बन्धन दो काम करता है – बाहर से निरोध और भीतर से ताप। ये दोनों उसीको हो सकते हैं  जिसमें अन्तर-बाह्य का भाव हो। भगवान् पूर्ण हैं। सबमें व्याप्त हैं। वे किसी के भीतर नहीं हैं। वे निरवयव हैं। अतः उनका कोई परिच्छेदक नहीं है। ‘अन्तः’ शब्द का अर्थ है – शब्द – सहित आकाश। उसकी प्रवृत्ति भगवान् में नहीं है। अर्थात् न भगवान् आकाश के अन्तर्गत हैं, न तो शब्द के विषय हैं। अन्तर्यामी ब्राह्मण के अनुसार वे ही सर्वान्तर हैं। फिर वे किसके अन्तर्गत होंगे जिससे वे उसमें बाँधे जाँये? आधार होने पर तो किसी में  अंतर्भाव हो ही नहीं सकता। दूसरी बात यह है कि बन्धन वेष्टनात्मक होता है। वह देश-परिच्छिन्न में ही सम्भव है। निरवयव, अनिरुक्त, स्वयंप्रकाश, ज्ञातृ-ज्ञेय भाव के द्वैत से रहित परमात्मा में पूर्वापर या उत्तर-दक्षिण सम्भव ही नहीं है। अतः स्वरूपकृत,देशकृत, कालकृत या अन्यकृत बन्धन भगवत्स्वरूप में सम्भव नहीं है।  

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-20

     माता के मन में भगवान् श्रीकृष्ण को बाँधने की इच्छा उदित हुई। ऐसा क्यों हुआ ? भगवान् के स्वरुप में बन्धन नहीं है। क्या यशोदा भगवान् के इस सामर्थ्य से अपरिचित है ? शुकदेवजी कहते हैं  कि ‘हाँ अपरिचित है।’ तब क्या पूतना, तृणावर्त आदि के वध का ऐश्वर्य, वीर्य देखकर भी न पहचान सकी ? यही प्रेम का सामर्थ्य है।’ वह प्रियतम के माधुर्य को पहचानता है,ऐश्वर्य को नहीं। मूल में कहा है कि भगवान् में भीतर-बाहर, पूर्वापरका भेद नहीं है। वही बाह्याभ्यन्तर, पूर्वापर एवं जगत् भी हैं। वे अजन्मा और अव्यक्त हैं। इन्द्रियातीत हैं। फिर भी मनुष्यरूप में प्रकट कृष्ण को गोपी ने रस्सी से ऊखल में बाँध दिया मानो, कोई प्राकृत शिशु हो।

     श्रीधर स्वामी ने कहा है- बन्धन तो तब हो जिसको बाहर से चारों ओर से लपेटा जा सके और वह रस्सी के घेरे में आ जाये। एक ओर से रस्सी पकड़े और दूसरी ओर से मिला दें। यहाँ भगवान् सर्वथा उसके विपरीत हैं। व्याप्य व्यापक को बाँध नहीं सकता और फिर दूसरा कोई हो तो बाँधे। जब भगवान् के अतिरक्त और कुछ है ही नहीं तो कौन किसको बाँधे ? फिर भी यशोदा ने मनुष्य-रूप में प्रकाशमान इन्द्रियातीत को अपना पुत्र मानकर बाँध लिया।

     श्री जीवगोस्वामी का अभिप्राय है कि श्रीकृष्ण व्यापक हैं इसलिए उनके बाहर कुछ नहीं है। बाहर के प्रतियोगी के रूप में प्रतीयमान अन्तर भी नहीं है। पूर्वापर की भी यही दशा है। वही जगत् है अर्थात् कारण से अतिरिक्त कार्य नहीं होता। देश-काल-वस्तु वही हैं। उनकी शक्ति से ही जगत् की शक्ति है। ऐसी अवस्था में उनकी शक्ति का एक क्षुद्र अंश रस्सी उन्हें कैसे बाँध सकती है ?क्या स्फुल्लिंग (चिनगारी) अग्नि को जला सकते हैं ? परन्तु यशोदा माता ने कृष्ण को बाँध लिया। वे अधोक्षज (इन्द्रियातीत ) होने के साथ-ही-साथ  मनुष्य-वेषधारी भी हैं। ‘नारायणाध्यात्मम्’ में कहा गया है कि ‘अव्यक्त भगवान् अपनी शक्ति से ही दर्शन के विषय होते हैं। उन्हें दूसरा कोई अपनी शक्ति से नहीं देख सकता।’ श्रुति में कहा है – देवता और इन्द्रिय उसके बनाये हुए उत्पन्न हैं। वे अपने  पूर्ववर्ती अनुत्पन्न कारण को नहीं जान सकते।’ मध्वाचार्य भगवान् को अस्थूल-स्थूल, अनणु-अणु एवं अवर्ण-श्यामवर्ण कहा है। अर्थात् उनमें परस्पर विरोधी धर्म हैं। श्री नृसिंहतापिनी श्रुति कण्ठतः घोषणा करती है-

तुरीयमतुरीयमात्मानमनात्मान मुग्रमनुग्रं वीरमवीरं महान्तम-

महान्तं विष्णुमविष्णुं ज्वलन्तमज्वलन्तं सर्वतोमुखम सर्वतोमुखम्

     तुरीय-अतुरीय, आत्मा-अनात्मा, उग्र-अनुग्र, वीर-अवीर, महान्-अल्प, विष्णु-अविष्णु, प्रदीप्त-शान्त, व्यापक-अव्यापक सब भगवान् ही हैं। गीता में ‘मत्स्थानि’ एवं ‘न च मत्स्थानि’ एक साथ ही हैं। वे विरुद्ध-अविरुद्ध अनन्त शक्तियों के निधान हैं और उनकी प्रत्येक शक्ति अचिन्त्य है। अतः बन्धन की असम्भावना और सम्भावना दोनों ही उनमें युक्ति-युक्त हैं। दोनों एक साथ ही संगत हैं।

(क्रमशः)

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