‘आसक्ति मत करो, आगे बढ़ो’!

     वैराग्य के लिए परमात्मा को जानने की ज़रूरत नहीं है। वैराग्य के लिए तो संसार को जानने की ज़रूरत है। जो लोग संसार में फँसे हुए हैं – ये संसार के रहस्य को नहीं जानते हैं। जहाँ फँसे हुए हैं, उसीके रहस्य को नहीं जानते हैं। न धन का रहस्य जानें, न भोग का रहस्य जानें, न सोना आवे और न ही खाना आवे। यद्यपि विद्वान् पुरुष की बुद्धि भी रजोगुण और तमोगुण से विक्षिप्त हो जाती है; परन्तु विषयों के प्रति दोष-दृष्टि होने से वह उनमें फँसता नहीं। यह मत समझना कि विद्वान् पुरुष के मन में काम नहीं आता, क्रोध नहीं आता, लोभ नहीं आता।  यह तो सैकड़ों जगहों के संस्कार मनुष्य में आये हुए होते हैं – इसलिए, यदि मन में कोई विकार आ जाए तो पागल नहीं हो जाना कि हाय-हाय,  हमारे मन में तो यह आ गया, वह आ गया। इसके लिए डरना नहीं। कभी ऐसा मत समझना कि कोई ऐसी बात कभी मन में आ गयी तो हमारा नाश ही हो गया। यह तो बड़े-बड़े विद्वानों के मन में भी, साधुओं के मन में भी विकार आ जाते हैं;व्यास-वशिष्ठ के मन में भी आते हैं- ऐसा वर्णन शास्त्रों में है। लेकिन आ गए तो आ गए – उनके वश में मत हो जाओ। गिरे तो गिरे, फिर उठो। तन्द्रा मत करो। जहाँ गिरे हो, वहाँ दोष-दृष्टि करो और फिर से मन को पकड़ कर अच्छी जगह लगाओ। वहाँ आसक्ति मत करो, आगे बढ़ो। संसार में दोष-दृष्टि करो और आनन्द से परमात्मा की ओर चलो।       

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‘जिज्ञासा और समाधान’

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चिन्तन की महिमा

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‘सद्-गुण सबमें है’

     यह अपना अहंकार ही है कि हम कहीं किसी में दोष देखते हैं। इसी प्रकार गुण देखना भी अहंकार ही है। किसी के भी गुण का क्या भरोसा ?क्या पता है कि किसमें कब वासना जाग पड़ेगी ? और जब सबमें सर्वत्र ईश्वर है तो किसीमें भी सद्-गुण कभी भी व्यक्त हो सकते हैं। 

     एक सज्जन नदी के किनारे-किनारे कहीं जा रहे थे। उन्होंने देखा- कगार की आड़ में बैठ कर दो स्री-पुरुष सुरा पान कर रहे हैं और वासना से सनी गन्दी चेष्टाएँ। वे सोचने लगे – ‘ये कितने घृणित हैं, नीच हैं। मैं तो इनसे सौ गुना अच्छा हूँ।’ इतने में ही क्या देखते हैं कि सामने  ही नदी में एक नाव उलट गयी। नदी की वेगवती धारा में बहुत से स्री-पुरुष उभ-चुभ गोते खाने लगे। ‘बचाओ-बचाओ’ के चीत्कार से वातावरण मुखरित हो गया। शराबी बोतल फेंक कर, स्री को एक ओर हटा कर नदी में कूद पड़ा और डूबते लोगों को पकड़-पकड़ कर किनारे पहुँचाने लगा। वह स्री भी उसकी सहायता में लग गयी। शराबी ने तट पर खड़े किंकर्त्तव्यविमूढ़ सज्जन से कहा- ‘हम घृणित हैं, नीच हैं, ठीक है; परन्तु हमारा यह काम तो ठीक है न ? आइये, आप भी हमारे साथ डूबते लोगों को बचाइये।’ वे सज्जन भी जुट गये। उन्होंने अपने मन में निश्चय किया  कि किसी की कोई क्रिया देखकर हमेशा के लिए यह निश्चय कर बैठना कि यह नीच है, एक गलत निश्चय है। सबके अन्दर सत्यं शिवं सुन्दरं छिपा है। पता नहीं, कब प्रकट हो जाये।  

 

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जीवनोपयोगी सूत्र

चार बात पर किसी का कन्ट्रोल हो जाए तो समझ लो कि वह सत्पुरुष हो गया-

     एक, हम इकट्ठा क्या करते हैं ? जो कायदे से हो, उसको इकट्ठा करें और बेकायदे हो तो इकट्ठा न करें। 

     दूसरी, हम भोगते क्या हैं ?

     खाना, पीना, औरत, मर्द- इस पर हमारा कन्ट्रोल है कि नहीं ?

     तीसरी, हम बोलते क्या हैं ?

    यह दुनिया का जो व्यवहार है, अगर आपको सीखना हो तो इतना सीख लीजिये कि यदि आपको बोलना आता है तो आप दुनिया के व्यवहार में हमेशा सफल होंगे। जितना बोलना जरूरी हो उतना ही बोलिये। जहाँ तक हो सके झूठ बोलने का मौका आवे तो उसको बोले बिना टाल दीजिये। बोलिये तो प्रिय बोलिये ! जिससे बोलिये, उसकी भलाई की बात हो तब बोलिये। मौके से बोलिये। भोजन करने बैठे और होने लगी जुलाब की चर्चा कि आज हमने जुलाब लिया था तो ऐसी-ऐसी टट्टी हुई ! ब्याह में इकट्ठे हुए तो चर्चा करने लगे कि उनके घर में जब मौत हो गई थी। तो ब्याह में मातमपुर्सी  की चर्चा करने लगे। तो बोलने का भी कोई मौका होता है। ज़रूरत हो तब बोलना चाहिए। बिना ज़रूरत नहीं बोलना चाहिए। 

    चौथी, जब हम अकेले में बैठते हैं, तब हमारे मन में क्या आता है ? दुश्मन की बात आती है कि दोस्त की बात आती है कि चोरी-बेईमानी की बात आती है। 

     ये चार बातें जिसके जीवन में बिलकुल ठीक हैं, उसका जीवन पक्का हो जाता है। 

नव-वर्ष मंगलमय हो !

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