श्री श्रीउड़ियाबाबाजी महाराज के संस्मरण

     हमारे महाराज श्री तत्त्व नहीं, स्वयं तत्त्व ही थे।  उनकी वाणी तत्त्वज्ञ की, स्वयं तत्त्व की ही वाणी होती थी। वे उसी की भाषा में बोलते थे। उन्हीं दिनों की बात है। ‘कल्याण’ का वेदांताङ्क प्रकाशित होने वाला था। उसके लिए आपके उपदेशों का संग्रह करने के उद्देश्य से कल्याण-परिवार के कुछ सदस्य आये हुए थे। उनके तथा अन्यान्य जिज्ञासुओं के साथ आपका वेदान्तविषयक सत्सङ्ग चलता था। उसमें मैं भी सम्म्मिलित होता था। एक दिन मैंने पूछा, ‘महाराज जी !आत्मा तो अपना स्वरुप ही है। अतः वह अपने से कभी परोक्ष हो ही नहीं सकता। फिर आत्मा का परोक्ष ज्ञान कैसे?’

     मैं तो समझता था कि आप कहेंगे, ‘ज्ञान सर्वदा अपरोक्ष ही होता है।’ परन्तु आपने बड़ा ही चमत्कार पूर्ण उत्तर दिया। बोले, ‘ज्ञान अपरोक्ष भी नहीं है रे ! जो स्वयं है उसका क्या परोक्ष और क्या अपरोक्ष। केवल जिज्ञासुओं का भ्रम मिटाने के लिए ही परोक्ष और अपरोक्ष ज्ञान की कल्पना की जाती है।’ मैं सुनकर चकित रह गया। मैंने इस प्रकार का खुला उत्तर पहले कभी नहीं सुना था। यद्यपि उस समय मुझे दृढ़ निश्चय था कि मैं तत्त्वज्ञानी हूँ। इसी प्रकार एक बार जब मैंने- पूछा, ‘महाराज ! जीवन्मुक्ति श्रेष्ठ है या विदेहमुक्ति ?’ तो आप बोले, ‘भैया! इनका संकल्प ही अमङ्गल है। ऐसी थी आपकी तत्त्वदृष्टि।    

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श्री श्रीउड़ियाबाबाजी महाराज के संस्मरण

     उन्हीं दिनों की बात है, झूसी के सुप्रसिद्ध सन्त ब्रह्मचारी प्रभुदत्त जी के यहाँ एक वर्षीय नाम यज्ञ की पूर्णाहुति का समारोह था। मैं भी साधक के रूप में इस यज्ञ में था। महाराजश्री के तत्त्वावधान में इस महोत्सव का आयोजन हुआ था। अंत में प्रयाग पञ्चकोसी की परिक्रमा हुई। बाबा के एक निजजन थे ब्रह्मचारी श्री कृष्णानन्द जी। निजजन क्या, भक्तों की भावना के अनुसार तो वे बाबा के पुत्र ही थे। बाबा में भक्तों का शंकरभाव था और ब्रह्मचारी जी को वे साक्षात् गणेश ही मानते थे। आकृति-प्रकृति से भी वे गणेश जी ही जान पड़ते थे। अधिकतर इसी नाम से उनकी प्रसिद्धि भी थी। एकदिन उनसे कुछ परमार्थ चर्चा होने लगी। गणेश जी ने पूछा, “भगवान् कृष्ण के उपासक विविध रूपों में उनकी उपासना करते हैं। कोई बाल रूप में, कोई किशोर रूप में, कोई गोपीवल्लभ रूप में और कोई पार्थसारथी के रूप में। इन सबको क्या एक ही कृष्ण दर्शन होते हैं ?”

     मैं- एक ही कृष्ण के दर्शन क्यों होंगे ? भक्त के भाव भेद के अनुसार कृष्ण भी अनेक होंगे।

     गणेश जी – ऐसा कैसे हो सकता है ? इस प्रकार तो अनेक ईश्वर सिद्ध होंगे।

     मैं – ईश्वर तो एक ही है। परन्तु भगवान् का साकार विग्रह तो भक्त की भावना के अधीन है। वे भक्त के भगवान् हैं। इसीलिए तो भावुक भक्त वृन्दावनबिहारी, मथुरानाथ और द्वारिकाधीश को अलग-अलग मानते हैं। 

     इस प्रकार कुछ देर हम दोनों का परस्पर-विनिमय होता रहा। गणेश जी का कथन था कि एक ही कृष्ण भक्तों की भावना के अनुसार विभिन्न रूपों में दर्शन देते हैं और मैं कहता था कि परमार्थतत्त्वमें ईश्वरता तो आरोपित ही है और ईश्वर का व्यक्तित्व तो भक्त की भावना के अधीन है। अतः भक्तों के भाव-भेद के अनुसार वे अलग-अलग हैं। फिर यही प्रश्न हमने श्री महाराजश्री से किया। उन्होंने कहा, “अरे! प्रत्येक भक्त के कृष्ण अलग-अलग हैं – यही नहीं, प्रत्युत प्रत्येक भक्त भी जब-जब दर्शन करता है उसे नवीन कृष्ण का ही साक्षात्कार होता है, क्योंकि दृष्टि ही सृष्टि है। प्रत्येक दृश्य हमारी वृत्ति का ही तो विलास है। भगवद्दर्शन भी क्या बिना वृत्ति के ही होता है। अतः भक्त जब-जब भगवदाकार वृत्ति करता है उसे नवीन भगवन्मूर्ति का ही दर्शन होता है। भगवान् तो एक भी हैं और अनेक भी। स्वरूपतः वे एक हैं और भक्तों के लिए अनेक।” 

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