पत्रोत्तर

प्रतीक के संबंध में कुछ बातें विशेष ध्यान देने योग्य हैं; पहला बोध्यप्रतीक, दूसरा उपास्य प्रतीक। जैसे छोटे-छोटे बच्चों को अज्ञात अक्षरों का ज्ञान करने के लिए शीशे की गोलियों का सहारा लेते हैं वैसे ही अक्षरतत्त्वका ज्ञान कराने के लिए मूर्तियों का प्रतीक ग्रहण करते हैं। गोलियाँ प्रतीक हैं उसी प्रकार कण्ठ,तालु आदि के आघात से उच्चार्यमान स्वर-वर्णों की प्रतीक लिपियाँ हैं। ये विभिन्न भाषाओं में भिन्न-भिन्न प्रकार की होती हैं, नागरी,तमिल, अंग्रेजी आदि में लिपि अलग-अलग हैं परन्तु ‘अ’, ‘क’ आदि स्वर वर्ण में एक ही हैं। अक्षर अक्षरात्मा हैं, लिपियाँ उनके ज्ञान की प्रतीक;यही मूर्ति हैं। इसमें परम्परा की प्रधानता रहती है, नयी भी बनायी जा सकती हैं।

उपास्य प्रतीक हैं, जैसे शालग्रामशिला या शिवलिङ्ग। जगत् का कारण है निराकार ब्रह्म, उसके प्रतीक है नारायण, शिव, चतुर्भुज, श्याम-गौर। उनके बीजरूप की सूचना है शालग्राम या शिवलिङ्ग। उपादान तथा निमित्त की अभिन्नता से शालग्राम या शिव, इस प्रतीक को समझने के लिए दार्शनिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखना आवश्यक है। ईसाई, मुसलमान या आर्यसमाजी ईश्वर की मूर्ति नहीं मान सकते क्योंकि वे ईश्वर को नितान्त निराकार मानते हैं। ईश्वर चेतन है, मूर्ति जड़ है, इसी सिद्धांत को स्वीकार करके आज के शिक्षित मूर्तिपूजा को प्रायः प्रतीकोपासना मानते हैं। इसके आधार पर ईश्वर का ज्ञान या ध्यान तो हो सकता है परन्तु वह ईश्वर नहीं है- ऐसी इन लोगों की मान्यता है।

भारतीय दर्शन की पृष्ठभूमि में भी जो लोग जड़, चेतन दो तत्त्व स्वीकार करते हैं वे जड़ प्रतीक में वेदमंत्रों के द्वारा प्राणप्रतिष्ठा करके चैतन्य का आधान करते हैं। उसमें जिस महात्मा के लिए विशेष प्रकार से मूर्ति प्रकट हुई है, जिसकी अर्चा-पूजा सतत प्रवाहित रही है और जिसमें किसी विशेष प्रकार का चमत्कार देखा जाता है उसमें लोगों की श्रद्धा होती है। पुजारी का उत्तम होना भी मूर्तिपूजा में विशेषता को प्रकट करता है, अपनी श्रद्धा तो है ही।

परन्तु यह सब मूर्तिपूजा का सिद्धांत नहीं है, उसका मूल-दृष्टिकोण तो यह है कि स्वयं परब्रह्म-परमात्मा ही सम्पूर्ण विश्व के रूप में प्रकट है,वह निराकार-साकार चर-अचर जीव-जगत् सबके रूप में पहले से ही है। ऐसा कोई देश, काल या वस्तु नहीं है जो परमात्मा से अलग हो। कहीं भी, किसी भी रूप में परमात्मा की उपासना की जा सकती है। यह सब उसका प्रतीक नहीं है,वही हैजैसे गाय के किसी भी अंग का स्पर्श गाय का ही स्पर्श है, जैसे पिता की उंगली पकड़ कर चलना,पिता को ही पकड़ना है, इसी प्रकार परमात्मा के किसी रूप की पूजा उसी की पूजा है। पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य आत्मा सब उसी के स्वरुप हैं। जड़ कुछ नहीं है, सब भगवान् है। हमारी श्रद्धा भावना और भगवान् का अनुग्रह दोनों मिलकर चमत्कार की सृष्टि कर देते हैं। मूर्ति बोलती है, हँसती है, खाती है, उदास होती है, प्रसन्न होती है, उसमें विविध भाव प्रकट होते हैं क्योंकि वस्तुतः वह चेतन ही है, जड़ता तो उसमें मनुष्य की मूर्खता से आरोपित है। मूर्ति में व्यापक है परमात्मा- यह निराकार वाद है। प्रतिष्ठा है परमात्मा- यह धर्मवाद है। परमात्मा ही मूर्ति है यह भागवत-सिद्धांत है। प्रतीक में परमात्मा हो ऐसा नहीं, प्रतीक परमात्मा ही है। अतएव मीरा आदि भक्तों को मूर्ति में प्रत्यक्ष भगवान् का दर्शन होता है। भक्त की दृष्टि में यह भगवान् का अनुग्रह है, जिज्ञासु की दृष्टि में यह भक्त की श्रद्धा है, तत्त्वज्ञ की दृष्टि में यह आत्मस्वरूप ही है।

प्रत्यक्ष मूर्ति में परोक्ष परमेश्वर की बुद्धि होने से – प्रत्यक्ष भले ही कुछ भी क्यों न हो- भक्त की बुद्धि परमेश्वराकार हो जाती है। इससे परमेश्वर का साक्षात्कार होता है। बुद्धि का आश्रय चेतन और बुद्धिस्थ आकार का आश्रय-चेतन जब एक हो जाता है तब मूर्ति चैतन्य होती है। गुरु’ मंत्र, भक्त और ईश्वर इन चारों की एकता ही मूर्ति-पूजा की चरम-परिणति है। निश्चय ही विषयवासना से संसार में भटकते हुए प्राणियों के लिए उद्धार का अनुपम साधन है मूर्ति-पूजा। यह यांत्रिक दृष्टिकोण से नहीं, अनुभव-दृष्टि से साक्षात्कार करने योग्य है।

शेष भगवत्कृपा !

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पत्रोत्तर

परम प्रिय

सप्रेम श्रीकृष्णस्मरण !

शरणागति धर्म बहुत कठिन है। जिसको संसार की किसी वस्तु का सहारा न हो और किसी दूसरे से किसी प्रकार की आशा-आकांक्षा न हो वह शरणागत होता है। अकिंचन और अनन्यगति होना शरणागत की पात्रता है।

शरणागति आत्मबोध है। पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, दिशा-काल,चंद्र-सूर्य आदि जिसके द्वारा नियंत्रित हैं वही हमारे इस जीवन का भी नियंता है। सब कुछ जिसके अधीन है, मैं भी उसीके अधीन हूँ। यह केवल विश्वास नहीं है, सत्य है, बोध है, अनुभव है। मैं शरणागत नहीं, स्वतंत्र हूँ- यह असत्य है, भ्रम है, कल्पनामात्र है। आप अपनी शरणागति को पहचानिये, उसका अनुभव कीजिये। आप पहले से ही शरणागत हैं। प्रभु के हाथों के खिलौना हैं। वह यंत्री है। आप यंत्र हैं।

उमा दारु जोषित की नाईं। सबहीं नचावत राम गुसाईं। ।

आपके जीवन-क्रम में अध्ययन है। अधिवक्ता का काम है। साथ ही परिवार भी है। कर्त्तव्य-पालन भी भगवान् के भजन का ही एक अंग है। आप अपने जीवन को व्यवस्थित कीजिये। जो लोग विधि-विधान को नहीं जानते, उनकी बात सुनने-समझने और परामर्श देने के लिए एक निश्चित समय रखिये। न्यायालय में उन्हें ठीक-ठीक न्याय मिल सके,इसके लिए प्रयत्न कीजिये। कोई अज्ञान के कारण न्याय से वञ्चित न रह जाये। यह प्रभु के सद्भाव व चिद्भाव की सेवा है।

शेष भगवत्कृपा !

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पत्रोत्तर

परम प्रेमास्पद

शुभाशीर्वाद !

आपका पत्र मिला। बहुत प्रिय लगा। आप अपने मन के भावों को भाषा देने में निपुण हो। प्रश्न यह है कि मन में कई आकृतियाँ चलचित्र-सी उभरती-मिटती हैं कोई अभिव्यक्ति स्थिरता ग्रहण नहीं करती। यह ठीक है। ऐसा ही होता है।

गङ्गा बह रही थी। तरङ्ग के बाद तरङ्ग। हर-हर-हर-हर। मैं तटस्थ था। मैं केवल देख रहा था। तरङ्गो के बहने-बदलने से, उनकी तीव्र एवं मधुर ध्वनि से, द्रुत तथा विलम्बित गति से मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। मैं तटस्थ, कूटस्थ, मैं केवल द्रष्टा; साक्षी, निःस्पन्द, निःसंग, निस्तरंग देख रहा था, और केवल देख रहा था। स्थिरता आकृतियों को नहीं देना है। उन्हें कितनी भी स्थिरता दी जाय, थोड़ी देर के बाद टूट जायेगी। वैसे न भी टूटे, तो भी नींद मन की सभी आकृतियों को तोड़ देती हैं। ऐसी अवस्था में इसे अन्तर्यामी की ही एक लीला समझनी चाहिए कि आकृतियाँ टूटती-छूटती-फूटती रहती हैं। अन्तर्यामी खेल रचता रहता है। साक्षी पहले खेल देखता है और उन आकृतियों से अन्तरंग, किन्तु स्वयं से बहिरंग अन्तर्यामी को देखता रहता है। तुम स्थिर साक्षी हो यह सत्य है। अन्तर्यामी को अपनी दृष्टि से स्थिर बना सकते हो यह भी सत्य है, परन्तु चलचित्र को स्थिर बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है। उसकी उपेक्षा कर दो अथवा उसके खेल और खिलाड़ी का आनन्द लो !सटाओ मत, हटाओ मत। दोनों अवस्थाओं को अपने साथ पटा लो। जीवन कड़वे से शत्रुता और मीठे से मित्रता करने के लिए नहीं है। दोनों का स्वाद लेने के लिए है। वे दोनों ही एक दूसरे के स्वाद के पूरक हैं।

यदि तुम्हें यही ठीक लगता हो कि कोई आकृति स्थिर कर दी जाय तो उसका एक नाम रखो- कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण। यह नाम तुम्हारे अन्तरतम में गुप्त-लुप्त-सुप्त प्रियता को मूर्ति देकर अभिव्यक्त कर देगा। और तुम देखोगे की चञ्चलता भी तुम्हें प्रिय लगेगी। जिससे प्रेम होता है उसकी चञ्चलता-छेड़छाड़ भी प्रिय लगती है। चितवन चञ्चल, मुस्कान चञ्चल, अंग-प्रत्यंग तरंगायित। जैसे सिनेमा का चित्र चञ्चल होने पर भी एक लगता है, वैसे ही अन्तर्देश के सूक्ष्मतम प्रदेशों में वह मधुर मूर्ति भी हँसकर, नाचकर,गाकर स्पन्दित रहेगी; परन्तु तुम्हें एक ओर ज्यों-की-त्यों जान पड़ेगी। इस अवस्था में अन्तर और बाहर का भेद मिट जाता है। आह्लाद के चरम प्रकाश में बाहर-भीतर और अपने पराये का भेद नहीं होता। वह तुम्हारी आत्मा ही है जो प्रियता की अभिव्यक्ति में मुस्करा रही है और वह भी तुम्हीं हो जो उसको देख-देखकर तृप्त हो रहे हो।

शेष भगवत्कृपा

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विरूपाक्ष-पञ्चाशिका=5

यह प्रश्न उठता है कि केवल अस्मिता अर्थात् अहम्-भाव और इच्छामात्र से ही हाथों से ताली नहीं बजायी जाती। उसमें तो बिन्दु, प्राणादि की चेष्टा भी सामग्री के रूप में विद्यमान है। पर्वत-सञ्चालन में क्या चेष्टा है ? इसका उत्तर यों समझिये। तुम्हारी अहंता बिन्दु, प्राण, शक्ति, मन, इंद्रियमण्डल और शरीर में प्रवेश करके सबको चेष्टायुक्त बना रही है। सम्पूर्ण विश्व को तुम्हीं चेष्टवान् बना रहे हो। ज्ञाता और ज्ञेय की विशेष प्रतीति का उदय होने के कारण स्वरस- वाहिनी दृश्यमान, सामान्य, सूक्ष्म अहम् प्रतीति को ही बिन्दु कहते हैं। जो अभिमान-अध्यवसाय आदि रूप अंतःकरण को धारण करता है, वह प्राण है। बुद्धि और अहंकार शक्ति है। आत्म-चैतन्य अपने किंचित् स्पर्श की महिमा से इन सबको स्पन्दित चेष्टित करता है। इस आत्म-चैतन्य को अहम् रूप से सर्वत्र धारण करो। जिस दृढ़ता से शरीर में, उसी दृढ़ता से सर्वत्र। सम्पूर्ण विश्व तुम्हारा शरीर है। सारी सिद्धियाँ तुममें नित्यसिद्ध रूप से निवास करती हैं।

अब प्रश्न यह है कि यह जो अहंता है, भावना मात्र से ही इसका विकास सम्पन्न होता है। इसमें ईश्वरत्व, कर्तृत्व आदि का स्वभावसिद्ध धर्मोत्कर्ष नहीं है। अतः ऐसी सिद्धि कैसे सम्भव है ?आपका प्रश्न ठीक है। इसका उत्तर यह है कि यह जो विश्व में अहंता की प्रत्यभिज्ञा होती है,वही ईश्वरता, कर्तृत्व, स्वातन्त्र्य और चिन्मयता है। शास्त्रों में जो ऐश्वर्य या सिद्धियों का वर्णन है, वह अहंतामय ही है। अतः ईश्वर आदि शब्द पर्यायवाची हैं। अहंता में ईश्वरत्व आदि के अनुभव पर अनास्था मत करो। जैसे-जैसे प्रत्यभिज्ञा दृढ़ होती है वैसे ही वैसे नित्यसिद्ध ईश्वरत्व, कर्तृत्व आदि सिद्धियों का आविर्भाव होता है।

विरूपाक्ष-पञ्चाशिका=4

अच्छा ! ऐसा है। तब तो सभी विश्व शरीर हैं। किन्तु ऐसा अनुभव में नहीं आता। क्यों ?इस पिण्ड शरीर में ही अहंता परिनिष्ठित हो गयी है। यह प्रत्यक्ष-सिद्ध है। ऐसी स्थिति में देह की अहंता को अन्यथा कैसे किया जा सकता है ? इसका उत्तर सुनिये। यह लोक सिद्ध अनुभव है कि मनुष्य जब मरने लगता है तब मालूम पड़ता है कि उसके प्राण कण्ठ में आकर अटक गये हैं। पूरे शरीर का प्राण कण्ठगत कैसे हो गया ? इसीको जीवन्मृत कहते हैं। ठीक इसी प्रकार यह सम्पूर्ण विश्व अपना शरीर है – शिव से लेकर पृथिवी तक। अपने स्वरुप का विमर्श न करने के कारण सम्पूर्ण विश्व में रहते हुये भी मानों उसके एक भाग, एक शरीर में अपनी अहंता संकुचित हो गयी है। शरीर है सम्पूर्ण विश्व किन्तु एक देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि में अपना अहंता, अस्मितारूढ़= परिपक्व हो गयी है। सचमुच यही दशा है,जीवन्मृत के समान। इस बात को हम काटते नहीं, परन्तु इसके कारण पर विचार करने से ज्ञात होता है, अपने स्वरुप का विमर्श न करना अर्थात् माया ही इसका कारण है। विमर्श प्राप्त हो जाने पर आत्मा विश्व-शरीर शिव ही है।

देखो- तुम अपने को समझते हो ज्ञाता। देह में मैं पना करके बैठे हो। तुम स्वच्छन्दता से, स्वेच्छा से, अपने दोनों हाथों से ताली बजा सकते हो। सचमुच !तुम एक शरीर में मैं करके इन्द्र बनकर बैठे हो। मैं चैतन्यात्मा हूँ। सम्पूर्ण जगत् मेरा शरीर है। जैसे तुम अपने दोनों हाथ परस्पर टकरा सकते हो, वैसे मैं दोनों पहाड़ों की टक्कर करा सकता हूँ। हाथों से ताली बजाने का कारण क्या है ? देह में दृढ़ता से अहम् भाव और इच्छा, और कोई कारण नहीं है। मेरा सम्पूर्ण विश्व में दृढ़ अहम् भाव और इच्छा है। विश्व में मेरा अभिनिवेश है, यही कारण है कि मैं दो पर्वतों को परस्पर लड़ा सकता हूँ। तुमको यह अनैश्वर्य कहाँ से प्राप्त हुआ ? जगत् में अहम् का अभिनिवेश शिथिल होने से। ईश्वर अनीश्वर की भाँति हो गया। अपनी ईश्वर-भावना को दृढ़ करो। तुम्हारा नित्य सिद्ध ऐश्वर्य प्रकट हो जायेगा।

(क्रमशः)

विरूपाक्ष-पञ्चाशिका=3

इस प्रसङ्ग में एक विचार उदय होता है। क्या केवल दृश्य होने से ही हम देह को अपना देह मानते हैं? ऐसा तो नहीं है। देह अहम् के रूप में मैं-मैं प्रतीत होता है। यह मांसपिण्ड मैं के रूप में जान पड़ता है। और विश्व इदम्, यह के रूप में जान पड़ता है। ‘मैं’ और ‘यह’ का भेद होने से देह और विश्व अलग-अलग हैं, एक नहीं। इस प्रश्न का उत्तर आगे दिया जाता है।

यह आत्मचैतन्य घर, खेत, धन-धान्य के कारण समझता है कि मैं संपन्न हूँ। शरीर दुबला हो तो मान बैठता है कि मैं कृश हूँ। मेरी आँखों में आँसू हैं, शरीर में रोमाञ्च है, मैं बड़ा प्रेमी हूँ। अंतःकरण सुखाकार होता है और यह मानता है कि मैं सुखी हूँ। वायु शरीर के भीतर आती-जाती है और यह मानता है कि मैं प्राणी हूँ। सुषुप्ति की माया, मैं शून्य हूँ, इस अनुभव का कारण बन जाती है- इन अवस्थाओं में अस्मिता=मैंपने का अभिमान अपने ही अनुभव से सिद्ध है। यदि इसी प्रकार, जो देह के बाहर स्थित है, उससे भी मैं पने का अभिमान बनता है तो विश्वरूप विषय भी अपना ही शरीर है क्योंकि शरीर के समान ही वह भी दृश्य है। यदि अहम् का मैं पने का अभिमान न हो तो देह, इन्द्रिय आदि भी शरीर नहीं हैं। अतएव देह मैं है और बाहर की वस्तुएँ यह हैं, ऐसी विषमता का निश्चय करना युक्तियुक्त नहीं है। अपने स्वरुप का विमर्श अथवा अनुसन्धान न करने के कारण ही शरीर और विश्व का भेद मालूम पड़ता है। यह एक धोखा है।

यह जो छः स्थानों में अस्मिता अर्थात् मैं पन देखा जाता है, वह अपने स्वरुप का विमर्श न करके मैं पनेका सम्वेदनमात्र ही है। ये छः हैं- सम्पत्ति, कृशता, स्नेह, आनन्द, जीवन और शून्यता। इनमें मैं पना एक धोखा है। ठीक है, फिर भी इन छहों में तो अस्मिता होती है, सर्वत्र नहीं। इसका उत्तर है- विषय, शरीर, इन्द्रिय, मन, प्राण और निरोध इन सबमें अस्मिता, अहंता किसकी होती है ? चेतन की ही तो । तब केवल परिच्छिन्न विषयों में ही क्यों ? समस्त विषय, शरीर, इन्द्रिय, मन, प्राण और सुषुप्ति, समाधि आदि निरोध दशाएँ अपनी ही अस्मिता के विषय क्यों नहीं ? इसका अभिप्राय है कि जैसे हम एक शरीर को अपना शरीर मानते हैं, वैसे ही सम्पूर्ण विश्व को अपना शरीर मानना चाहिए। शिव से लेकर पृथिवी पर्यन्त अपना ही शरीर है। दृढ़ता से इस नित्य शुद्ध प्रत्यभिज्ञा = पुनः स्मृति का अनुसन्धान करना चाहिए। ग्राहक= ज्ञाता विश्व शरीर नहीं है। जो किसी से अवच्छिन्न होनेवाली चिति नहीं है; वह केवल विशेष विषय को ही अस्मिता का विषय नहीं बना सकती, वह सभी को अपनी अस्मिता का विषय बना सकती है। यदि तुम यह विमर्श करो कि यह आत्मचिति सर्वग नित्य-सिद्ध परिपूर्ण मैं ही है, तो इसकी दृढ़ता हो जाने पर सम्पूर्ण विश्व अपने शरीर के रूप में जान पड़ेगा। पहले भी ऐसा ही था। अब पुनः प्रत्यभिज्ञा हो जायेगी।

(क्रमशः)

विरूपाक्ष-पञ्चाशिका=2

पहला प्रश्न यह है कि इस शरीर से कोई पृथक् तत्त्व है ? इस पर विरूपाक्ष जी का यह उत्तर है – शून्य से लेकर पृथिवी पर्यन्त जो कुछ मालूम पड़ रहा है वह आत्मचैतन्य का शरीर ही है। बात यह हुई कि मैं ज्ञाता हूँ; मैं ग्रहण करने वाला हूँ- इस अभिमान के कारण देह के बाहर और देह के रूप में भी अन्य जड़ वस्तु की प्रतीति होती है। इस पर थोड़ा ध्यान दीजिये। तुम्हें यह मांसपिण्ड शरीर आत्मा क्यों मालूम पड़ता है ? ज्ञातापने के अभिमान से तुमने अपने आपको परिच्छिन्न मान लिया है। यदि यह विचार किया जाय कि चाहे शरीर हो या उसके बाहर जो कुछ मालूम पड़ता है , वह दृश्य के रूप में एक है। यह देह या बाह्य संसार का भेद आत्मा को परिच्छिन्न नहीं कर सकता। देहावच्छिन्न और विश्वावच्छिन्न चैतन्य एक है। दृश्य होने के कारण शरीर और विश्व एक हैं। अतः यह शरीर ही मेरा शरीर नहीं है, सम्पूर्ण विश्व मेरा शरीर है। विश्व ही शरीर है- यह प्रतिज्ञा है। दृश्यता हेतु है। अतएव विश्व का शरीर होना युक्तिसिद्ध है। जैसे मनुष्य कभी नीला-पीला आदि रूप देखना चाहता है; तो उस समय वह केवल उसी-उसी रूप का ज्ञाता हो जाता है। परन्तु ज्ञाता की यह परिच्छिन्नता नीले-पीले रूप की उपाधि से है, स्वयं नहीं है। जब यह सभी वस्तुओं को सामान्य रूप से अनुसन्धान का विषय बनाता है, तब इसका प्रकाश अवच्छेद रहित, अपरिच्छिन्न होता है। जो देश-कालादि का प्रकाशक है, वह उनसे परिच्छिन्न हो ही नहीं सकता। तब समस्त विश्व दृश्य होता है और वही अपना शरीर होता है। यदि सम्पूर्ण विश्व दृश्यरूप से अपना शरीर न हो तो यह मांसपिण्ड भी अपना शरीर नहीं हो सकता क्योंकि दोनों की स्थिति एक ही है। अतएव जब मैं कुछ विषयों का ज्ञाता हूँ, यह परिच्छिन्न अभिमान गल जाता है, तब यह सम्पूर्ण विश्व ही आत्म चैतन्य का शरीर है, ऐसा अनुभव होने लगता है। देहाभिमान ही पूर्णता की अनुभूति में प्रतिबन्ध है।

(क्रमशः)

विरूपाक्ष-पञ्चाशिका=1

भगवान् शंकर ने समग्र विश्व का कल्याण करने के लिए अनुग्रह करके विरूपाक्ष नाम से अवतार ग्रहण किया था। दर्शन करने में उनका शरीर सुन्दर और इन्द्रिय-गोलक आकर्षक नहीं थे। अतएव उनका नाम विरूपाक्षनाथ प्रसिद्ध हुआ। इसका अभिप्राय यह है कि बाहर के शरीर में सुंदरता, मधुरता या आकर्षण न होने पर भी अंग-प्रत्यंग के अंतरंग में उनके रग-रग की रंग-तरंग में, एक निरतिशय महिमा भरपूर थी। बाह्य दृष्टि से वे व्यक्ति थे, परन्तु अंतर्दृष्टि से वे परमेश्वर।

एक बार स्वछन्द विचरण करते हुए विरूपाक्षनाथ देवताओं की राजधानी अमरावती में पहुँच गये। उन्होंने देखा कि सुरपति महेन्द्र अपने मनोविनोद के लिए हाथियों की लड़ाई देख रहे हैं। इन्द्र समझते थे कि हमको कितना ऐश्वर्य, सम्पदा और गौरव प्राप्त है। विरूपाक्ष इन्द्र के सम्मुख आकर खड़े हो गये। इन्द्र ने पूछा- ‘तुम कौन हो ?’ विरूपाक्ष- ‘मैं महेश्वर हूँ। मैं परमेश्वर हूँ।’ इन्द्र – ‘तुममें क्या ऐश्वर्य है ?’ विरूपाक्ष- ‘अच्छा देखो।’ उन्होंने बड़े-बड़े दो पर्वत प्रकट कर दिये। वे दोनों परस्पर टकरा रहे थे। एक दूसरे को टक्कर मार रहे थे। कहाँ हाथियों की लड़ाई, कहाँ पर्वतों की। इन्द्र का अभिमान टूट गया। वे विरूपाक्ष की शरण में आये। विधि-पूर्वक दीक्षा ग्रहण की। विरुपाक्ष ने अपने शरणागत शिष्य इन्द्र के प्रति पचास श्लोकों में उपदेश किया। उसी पुस्तक का नाम ‘विरुपाक्ष पञ्चाशिका’ है। प्रथम और अन्तिम दो श्लोकों में उपक्रम, उपसंहार है। एक श्लोक प्रासंगिक है। शेष सब उपदेश रूप हैं। विरूपाक्ष ने इन श्लोकों में अपनी सिद्धि का रहस्य बतलाया है।

इस अल्पकलेवर ग्रन्थ पर श्रीविद्या चक्रवर्ती की टीका है। अभीतक इस ग्रन्थ का हिन्दी में अनुवाद प्रकाशित नहीं हुआ है। मूल ग्रन्थ (संस्कृत टीका) वाराणसेय संस्कृत-विश्व-विद्यालय से मुद्रित हुआ है। ग्रन्थ की शैली और प्रक्रिया जिज्ञासुओं के लिए एक नूतन एवं अद्भुत विचारप्रणाली समर्पित करती है। अतएव इस ग्रन्थ का सार संक्षेप प्रस्तुत किया जाता है।

(क्रमशः )

पत्रोत्तर

परम प्रेमास्पद

नारायण, नारायण, नारायण

1.

किश्ती खुदा पर छोड़ दो – यह ठीक है। परन्तु सचमुच खुदा पर छूट गयी क्या ? उसका प्रमाण है लंगर को तोड़ दो। अगर लंगर अपने पास रखकर किश्ती धारा में छोड़ी जाती है, तो इसका अर्थ है कि हम अपने अनुसार किश्ती को चलाना या छोड़ना चाहते हैं। क्या हम खुदा या नाखुदा से भी अपने मन के अनुसार करवाना नहीं चाहते ? तब किश्ती छूटी कहाँ ? लंगर की पकड़ टूटी कहाँ ? जरा मन-ही-मन सोचो – मैं तो गिरधर हाथ बिकानी, होनी होय सो होय।

2.

सेवा क्या है ? अपनी बाहरी और भीतरी योग्यताओं को सामनेवाले के हित में लगाना। मुस्काना भी सेवा है, प्रेम से देखना भी सेवा है। ऑपरेशन करना भी सेवा है। बच्चे के हाथ में-से चाकू छीन लेना भी सेवा है। सामनेवाला माँगे तो सेवा करना असली सेवा नहीं है। वह भिखारी हो जाये और हम दाता बनें। यह क्या सेवा है ? सेवा करना अपने दिल की माँग है। पराई आवश्यकता नहीं। जब सेवा किये बिना मन में कुछ कचोटे;अपने को मन में कुछ कमी महसूस हो, सेवा किये बिना अपने को संतोष न हो तब सेवा होती है। सेवा करने में अपने को सुख होता है। जो सेवा का जन्मस्थान है, वही सुख छलकने का जन्मस्थान है। सेवा प्रेम से निकले; तन्मयता के साथ रहे। सेवा के बाद अभिमान पैदा न हो। हमारी सेवा कितनी कम है। काश ! मैं कुछ और कर पाता। सेवा बढ़ती हुई गंगा है, घटती हुई नहर नहीं। सेवा में शान्ति है, थकान नहीं। आनन्द है, ग्लानि नहीं। प्रेम उद्गम है, सेवा धर्म है। यह झरना आगे बढ़कर सूखता नहीं, गहरा और गंभीर होता जाता है।

शेष भगवत्कृपा

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