उलूखल बन्धन लीला-27

     जिस पर प्रभु का कृपा-प्रसाद उतरता है, जिसपर उनकी अनुग्रह दृष्टि पड़ जाती है उसे भी बन्धन का अनुभव नहीं होता। श्री कृष्ण ने जब रस्सी की ओर देखा तो वह भी मुक्त हो गयी उसमें बन्धन की योग्यता नहीं रही।

यस्मिन् कृपानुग्रहवीक्षणं विभोर्भवत्यसौ वेत्ति न बन्धनसम्भवम्।

युक्तं तदा तद्धरिणा तथेक्षितं मुक्तं स्वयं दाम न बन्धभागभूत।।

     रज्जुगुण  की न्यूनता निरन्तर यह सूचना दे रही है कि संसार के सारे गुण भी उसकी पूर्ति में समर्थ नहीं हैं।

     एक अन्धा जिसको नहीं देख सकता, उसको सौ अन्धे भी मिलकर नहीं देख सकते। सभी दाम (रज्जु) समान हैं। व्यर्थ परिश्रम से कोई लाभ नहीं। इसी अभिप्राय को रज्जु की न्यूनता प्रकट करती है।

     बन्धन-रज्जु दो ही अंगुल कम क्यों हुई ? इसपर श्रीहरिसूरि की उत्प्रेक्षाएँ सुनिये –

     जब मैं शुद्धान्तःकरण योगियों को प्राप्त होता हूँ तब केवल एकमात्र सत्त्वगुण से ही मुझमें सम्बन्ध की स्फूर्ति होती है। रजोगुण और तमोगुण का सम्बन्ध नहीं होता। रस्सी में दो अंगुल की न्यूनता प्रकट होना इसी सत्य को प्रकट करता है।

यदाहं प्राप्यः स्यामिह सुमनसां युक्तमनसां

तदानीं सम्बन्धः स्फुरति मयि सत्त्वैकगुणतः। 

द्वयोर्नेति प्रायः प्रकटितमिहेशेन स तदा

यतो द्वाभ्यामूनात्तदुचितगुणाद् बन्धयुगभूत्।।

     जहाँ नाम-रूप होते हैं वही बन्धन का औचित्य है। मुझ ब्रह्म में ये दोनों नहीं हैं। दो अंगुल की न्यूनता से यही बोधन किया गया है।

यत्र स्यातां नामरूपे सरूपे बंधस्तस्यैवोचितो नोचितोऽत्र। 

द्वाभ्यामूने ब्रह्मगीति व्यबोधि दाम्ना तेन द्वय्ङ्गुलोनेन मन्ये।।    

     रज्जु ने दो अंगुल न्यून होकर यह सूचना दी कि इन दोनों वृक्षों (नलकूबर-मणिग्रीव) का उद्धार करके इन्हें मुक्त कीजिये।

     भगवत्कृपा से द्वैतानुरागी गोकुल भी मुक्त हो जाता है और प्रेम से भगवान् भी बद्ध हो जाते हैं। इन दो रहस्यों को दो अंगुल की न्यूनता सूचित करती है।  

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-26

     सारार्थदर्शिनीकार चक्रवर्ती विश्वनाथ यह भाव विशद करते हैं – परमेश्वर का प्रेम-परवश होकर बँध जाना दूषण नहीं, भूषण है। आत्माराम की भूख-प्यास, पूर्णकाम की अतृप्ति-तृष्णा, शुद्धसत्त्व का कोप, स्वाराज्य-लक्ष्मी के अधिपति का चौर्य-कर्म, महाकाल के काल का भय-पलायन, मन के अग्रगामी का पकड़ा जाना, आनन्दमय का दुःखरोदन और सर्वव्यापी का बन्धन- यह सब स्वाभाविक भक्त-पराधीनता का प्रदर्शन है। अज्ञानियों के प्रति इसका उपयोग न होने पर भी ब्रह्मा,शंकर, सनत्कुमारादि विज्ञानियों को भी चमत्कृत करके इसका प्रदर्शन किया गया। इसको केवल अनुकरण-मात्र समझना भूल है;क्योंकि आगे ‘तद्विदाम्’ कहा गया है।

     सिद्धान्तप्रदीपकार श्रीशुकदेव का अभिप्राय है कि यह ठीक है, भगवान् में अंतर्बाह्य, पूर्वापर आदि का व्यवहार न होने पर भी उन व्यवहारों का औचित्य भी है। वे अणु-से-अणु और महान्-से-महान् हैं। वे स्वयं अपने संकल्प से बद्ध भी हो सकते हैं। 

     अब श्री हरिसूरि कृत भक्ति-रसायनम् के कुछ भावों का सप्रेम समास्वादन कीजिए। यशोदा ने अपने गुणों= रस्सी एवं सद्गुणों से जितना-जितना उद्योग किया विभु के उदर की पूर्ति के लिए, श्रीकृष्ण ने भी उतने ही उतने अपने गुण असंगता, नित्यमुक्ति आदि को प्रकट किया। अतएव कन्हैया मैया के साथ यह परमानन्द जनक क्रीड़ा  सम्पन्न हो गयी। 

     रज आदि प्राकृत गुण जिनका स्पर्श भी नहीं कर सकते, उन्हें यह छोटा-सा गुण (रस्सी) कैसे बाँध सकेगा? अतएव गुणों का पूरा न पड़ना उचित ही है। 

     इन्द्रियों का बन्धन होता है उनके अधिष्ठाताओं का नहीं। श्रीकृष्ण गोपति-इन्द्रियाधिपति हैं। गोबंधक रज्जु उन्हें नहीं बाँध सकती। 

     यह प्रसिद्ध है कि अध्यस्त ही बद्ध होता है, अधिष्ठान नहीं। इस श्रुत्यर्थ को स्पष्ट करने के लिए विश्वावभासक परमात्मा में बन्धन न लग सका। 

अध्यस्तस्याश्रावि बन्धो जगत्यां नाधिष्ठानस्यांशतोऽपीति कोके।

श्रुत्यर्थस्य ख्यातये नोदरेऽभूद् बन्धस्तस्मिन् विश्वविश्वप्रकाशे।।    

(क्रमशः )

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उलूखल बन्धन लीला-25

     श्री जीवगोस्वामी ने यह प्रश्न उठाया है कि पहले तो श्रीकृष्ण को पूर्ण और परमेश्वर सिद्ध करते हो। फिर उनमें भूख, प्यास, अतृप्ति, चोरी, भय, पलायन, पकड़ा जाना, रोदन और बन्धन का वर्णन करते हो। इसका कोई न कोई रहस्य अवश्य होना चाहिए और रसिकों के लिए आस्वाद का हेतु भी, अतः वह क्या है ?इसका समाधान करते हैं। यह सर्वथा सत्य है कि श्रीकृष्ण परिपूर्णतम परमेश्वर हैं तथापि उनमें भक्तों के प्रति अनुग्रह भी अवश्य स्वीकार करना चाहिए। यदि अनुग्रह न होगा तो भगवान् के गुण किसी के प्रति सुखकारी नहीं होंगे। कठोर हृदय पुरुषका कुछ भी रुचिकर नहीं होता। फिर वे गुण भी नहीं रहेंगे। जन-सुखकारी धर्म निर्दयता-रूप दोष में परिणत हो जायेंगे। अपहतपाप्मा परमेश्वर के साथ उनकी कोई संगति नहीं लगेगी। अतएव सभी गुणों को गुण बनाने वाला दोषांतर विरोधी भक्ति के अनुरूप कृपा गुण ही भगवान् में स्वीकार करना चाहिए। भक्ति भगवान् को वश में करती है। यह ठीक है तो भगवान् भी भक्ति के वश में होते हैं। इससे उनके ऐश्वर्य में कोई त्रुटि नहीं आती; क्योंकि वे बद्ध दशा में भी नल-कूबर, मणिग्रीव का उद्धार ही करते हैं। इससे सर्वाकर्षण और ऐश्वर्य की वृद्धि होती है। वे स्वयं ही बार-बार कहते हैं – मैं भक्त-पराधीन हूँ। भक्त निष्कपट हैं, मैं भी निष्कपट हूँ। अतः भक्तों के आनन्द के लिये उन-उन भावों का प्रकट होना तात्त्विक ही है। यही देख कर कुन्ती देवी मुग्ध हो गयी थीं। यह भक्तों का मन हरण करने की लीला है। जो अपने भक्त से इतनी ममता कर सकता है कि उसके हाथों बँध जाये तो उसकी भक्ति कोई क्यों नहीं करेगा ?

     श्री वीरराघवाचार्य कहते हैं कि इस भक्तकृत बन्धन से भगवान् की स्वतंत्रता में कोई बाधा  नहीं पड़ती है। ब्रह्मा-शंकर आदि श्रीकृष्ण के वश में हैं। सम्पूर्ण जगत् उनके वश में है।  उन्होंने स्वयं ही यह प्रकट किया कि मैं भक्तों के वश में हूँ। सर्वत्र स्वतंत्र, भक्तों के परतंत्र। श्रीवत्सांक मिश्र ने कहा है – अनन्याधीनत्वं तव किल जगुर्वैदिकगिरः पराधीनं त्वां तु प्रणतपरतंत्रं मनुमहे। वेदवाणी आपको अनन्याधीन=किसी के आधीन नहीं कहती है परन्तु हम तो प्रणत- परतंत्र आपको पराधीन ही मानते हैं। अनन्य भक्तों के अधीन – वेदवाणी का ऐसा अभिप्राय है।

(क्रमशः)

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उलूखल बन्धन लीला-24

     आचार्य वल्लभ का कथन है कि भगवान् ने अपने में दो दोष दिखाये- पहला उसका पुत्र होना और दूसरा अपराधी होना। दो अंगुल न्यून होकर रस्सी कहती है कि ये दोनों दोष श्रीकृष्ण में नहीं हैं। माता को आश्चर्य भी होता है परन्तु श्रीकृष्ण की इच्छा अपनी व्यापकता के प्रदर्शन की भी है। पेट बढ़ता नहीं है, कमर मोटी होती नहीं है, रस्सी पर रस्सी जोड़ने पर भी दो ही अंगुल कम होती है। देवता तीन बार अपना सत्य प्रकट करता है। अतएव तीन बार न्यूनता हुई। गोपियाँ हँसती थीं। उन्हें लीला-दर्शन का आनन्द आता था। गोपियों ने यशोदा माता से कहा – ‘अरी, यशोदा !पतली-सी कमर में रुन-झुन-रुन-झुन करके छोटी-सी करधनी बँधी हुई है और घर की सारी रस्सियों से यह नटखट बँधता नहीं है। यह बड़े मंगल की सूचना है कि विधाता ने इसके ललाट में बन्धन योग नहीं लिखा है। अब तू छोड़ दे यह उद्योग।’ परन्तु यशोदा माता ने कहा – ‘भले ही बाँधते-बाँधते संध्या हो जाय, गाँव की सारी रस्सियाँ लग जायँ, मैं आज बाँधे बिना नहीं मानूँगी।’ कृष्ण का हठ है- मैं नहीं बंधूँगा। माता का हठ है मैं बाँधूंगी। यह निश्चय है कि भक्त का हठ विजयी होगा। भगवान् ने अपना आग्रह छोड़ दिया। बात यह है कि भगवान् में असंगता, विभुता आदि अनेक शक्तियाँ हैं परन्तु परम भास्वती भगवती कृपाशक्ति ही सर्वशक्ति चक्रवर्तिनी हैं। वे भगवान् के मनको नवनीत के समान पिघला देती हैं और असंगता, सत्य-संकल्पता, विभुता को छिपा देती हैं। दो अंगुल की न्यूनता का अभिप्राय यह है कि जब तक  भक्त में भजनजन्य श्रान्ति का उदय नहीं होता तब तक वे भक्त के वश में नहीं होते। जब दोनों एकत्र हो गये तब भगवान् बँध गये यह श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती का भाव है।

     श्री वल्लभाचार्य कहते हैं कि माता का शरीर स्वेद से भींग गया। उसकी केशों में लगी मालाएँ बिखर गयीं। वह थक गयी। पुत्र का कर्तव्य है कि माता का परितोष करे। श्रुति है – ‘मातृदेवो भव।’ स्मृति है – ‘माता सबसे बड़ी है।’ अतः उसको थकाना उचित नहीं है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि ‘इसके कोई दूसरा पुत्र भी नहीं है जो इसका दुःख दूर करे। मैंने ही इसे अपनी माता बनाया है। मैं गोकुल का दुःख दूर करने के लिए प्रकट हुआ और माता का दुःख दूर न करूँ, तो क्या ठीक होगा ? सौभाग्य-दान के लिए आया और इसके अलंकारों का तिरस्कार कर दूँ ?’ जो भक्तों के दूरस्थ दुःख को भी नहीं देख सकते, वे अपने सम्मुख माता के दुःख को कैसे देख सकते हैं ? अतएव कृपानुग्रह से श्रीकृष्ण ने बन्धन स्वीकार कर लिया। कृपा सब धर्म और धर्मियों से बलवती है। भगवान् अपनी कृपा से ही सबसे बँधते हैं।  

    (क्रमशः) 

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