ध्यान का रहस्य- (1)

         मन में आये बिना कोई वस्तु भासती नहीं। मन बिना चेतन का नहीं होता। इसको फिर से समझ लें। चेतन ज्ञानस्वरूप आत्मा में मन भासता है। मन में वस्तु भासती है। इन्द्रियों के द्वारा वस्तु को अभी देख रहे हो, या पहले की देखी हुई है, वह वस्तु  गन्ध, रस, रूप,स्पर्श  अथवा शब्द का आश्रय हो सकती है या सबका सम्मिलित-रूप से आश्रय हो सकती है। अब आप ध्यान करने के लिए चाहे गन्ध के आश्रय ,एक मिट्टी के टुकड़े को लें, रस के आश्रय जल को लें, रूप के आश्रय अग्नि को लें, अथवा एक पुष्प ले लें जिसमें इन तीनों के अतिरिक्त स्पर्श भी हो। उस वस्तु का जिस इन्द्रिय के द्वारा ग्रहण हो रहा है, जैसे पुष्प के रूपदर्शन में नेत्र। नेत्रवृत्ति के द्वारा वह पुष्प मन में पहले से आया हुआ है या अब आ रहा है, चाहे कुछ भी हो, उसका रंग,रूप, आकृति, गन्ध, कोमलता, रसीलापन सब कुछ मन में ही भास रहा है। पुष्प के दर्शन की क्रिया मन में ही संपन्न हो रही है। अब आप मन-ही-मन  बंद आँख या खुली आँख उस पुष्प को देखिये। जहाँ पुष्प दीख रहा है, उस मन में पुष्प बिना हुए भास रहा है। इस स्थान में इतनी लम्बाई-चौड़ाई का, इस रंग,रूप, आकृति का, इस गन्ध-रस का, इस नाम वाला पुष्प इतनी देर तक दीखता रहा-यह सब केवल कल्पना है। मन में दिखने वाले फूल का न देश है, न काल है, न आकृति है, न भार है , न गुण है, न विशेषता है। आपका मन ही है जो फूल के रूप में दीख रहा है। अब आप फूल को ऐसी दृष्टि से देखिये कि फूल के कण-कण में, क्षण-क्षण में, रश्मि-रश्मि में मन ही है। वस्तुतः फूल नहीं है मन ही है। जब उस फूल के बिना आपका मन रह जायेगा, तब वह अपने को आपकी चेतना से पृथक् नहीं दिखायेगा। साकार मन ही दीखता है, निराकार मन नहीं।  निराकार मन चेतन से अभिन्न होता है। इस स्थिति को रहने दीजिये, जब तक रहे। इसमें विषयावच्छिन्न  चैतन्य  और मन अवच्छिन्न चैतन्य का भेद नहीं रहा। मन के चंचल होने पर आपकी बुद्धि कहेगी कि आप चेतन हैं , आप मन हैं, आप फूल हैं अर्थात् आपके अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु नहीं है। जो आप ध्यान में थे, वही आप व्यवहार में हैं। यह केवल फूल का ध्यान नहीं है, आप किसी भी विषय का इसी प्रकार अनुसन्धान करके ध्यानस्थ हो सकते हैं। इसका रहस्य यह है कि जहाँ वस्तुतः सर्प न हो और दीख रहा हो तो अवधानपूर्वक देखने से वह लुप्त हो जाता है और उसका अधिष्ठान रह जाता है।  इसी प्रकार चेतन अथवा  मन में जो वस्तु विद्यमान नहीं है, वह सावधान होकर ध्यान देने पर अदृश्य हो जाती है। 

                                                                                                                                      (क्रमशः)

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पूज्यपाद महाराजश्री से वार्तालाप-2

     प्रश्न – तब क्या भेद के प्रतिपादन से  किसी प्रयोजन की सिद्धि नहीं होती ?

    उत्तर – भेद के प्रतिपादन से अर्थ, धर्म,काम रूप तीनों पुरुषार्थों की सिद्धि होती है, परन्तु मुक्ति की सिद्धि नहीं होती। भेद में परिच्छिन्नता की भ्रान्ति दुःख है, अहंकार दुःख है, राग-द्वेष दुःख है और जन्म-मरण भी दुःख है। भेद में समाधि-विक्षेप नहीं छूटते, सुख-दुःख नहीं छूटते, पाप-पुण्य नहीं छूटते  और संयोग-वियोग भी नहीं छूटते; इसलिए भेद में जन्म-मरण का चक्र अव्याहत रूप से चलता रहता है। इसलिए मुक्ति पुरुषार्थ की सिद्धि भेद से नहीं हो सकती। मुक्ति स्वयं आत्मा का स्वरुप ही है। ज्ञान रूप से उपलक्षित आत्मा ही अज्ञान की निवृत्ति है।  निवृत्ति कोई स्वतंत्र पदार्थ नहीं है। इसलिए मुक्ति में प्राप्य-प्रापक, साध्य-साधन आदि भाव भी नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि श्रुति का तत्पर्य भेद के प्रतिपादन में नहीं है, क्योंकि भेद की सिद्धि से मुक्ति की सिद्धि नहीं हो सकती।

     प्रश्न – फिर भेद प्रतिपादक श्रुतियों का क्या होगा ?

     उत्तर – भेद प्रतिपादक श्रुतियां अविरक्त अधिकारी के लिए हैं। उनसे लौकिक-पारलौकिक सिद्धि की प्राप्ति होती है, व्यष्टि-समष्टि का कल्याण करती हैं, अंतःकरण शुद्ध करती हैं, मुमुक्षु को ज्ञानोन्मुख करती हैं। इसलिए व्यवहार में उनका बहुत ही उपयोग है; परन्तु जहाँ वस्तु की प्रधानता से परमार्थ तत्त्व का निरूपण है, वहाँ श्रुतियाँ भेद को ज्ञाननिवर्त्य; अतएव मिथ्या बताती है। जो वस्तु अज्ञान से सिद्ध होती है; वह मिथ्या होती है और जो ज्ञान से निवृत्त होती है, वह भी मिथ्या ही होती है। अतएव सर्वाधिष्ठान  सर्वावभासक, स्वयं प्रकाश प्रत्यक्चैतन्याभिन्न अद्वितीय ब्रह्मतत्त्व के अज्ञान से तद्विषयक अज्ञानकृत सर्वभेद की आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है। 

     बात यह है कि केवल इन्द्रिययंत्रों से तत्त्व का अनुसन्धान करने पर केवल एक या अनेक जड़सत्ता की ही सिद्धि होती है। चिद्वस्तु  यंत्रग्राह्य नहीं है। केवल बुद्धि से अनुसन्धान करने पर बुद्धि की शून्यता ही परमार्थरूप से उपलब्ध होती है; क्योंकि विचार-विक्षेपात्मक बुद्धि का अन्तिम सत्य निर्वाणात्मक शून्य ही है। भक्तिभावना युक्त बुद्धि के द्वारा अनुसन्धान करने पर सर्व प्रमाण-प्रमेय- व्यवहार के मूलभूत सर्वज्ञ सर्व शक्ति परमेश्वर की सिद्धि होती है। ऐसी स्थिति में स्वतःसिद्ध साक्षी को अपरिच्छिन्न अद्वितीय ब्रह्म बताने के लिए कोई इन्द्रिययंत्र या भाव-भक्ति समर्थ नहीं है।  उसका ज्ञान केवल औपनिषद ऐक्यबोधक महावाक्य से सम्पन्न होता है।    

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पूज्यपाद महाराजश्री से वार्तालाप-1

प्रश्न – क्या वेद का तात्पर्य-विषय भेद है ?

उत्तर – नहीं, क्योंकि भेद प्रत्यक्षादि प्रमाण से सिद्ध है। प्रमाणान्तर से सिद्ध वस्तु का प्रतिपादन करने पर वेद अज्ञातज्ञापक प्रमाण नहीं रहेगा, दूसरे प्रमाण से सिद्ध पदार्थ का अनुवादक हो जायेगा। जो वस्तु साक्षी के अनुभव से ही सिद्ध हो रही है, उसकी सिद्धि के लिए वेद तक दौड़ने की क्या आवश्यकता है ? वेद ऐसी वस्तु बताता है जो प्रत्यक्ष, अनुमान आदि से सिद्ध नहीं होती। वेद केवल साक्षी-मात्र का भी प्रतिपादक नहीं है, क्योंकि वह तो स्वतःसिद्ध है और सबका प्रकाशक है। वेद का वेदत्व साक्षी को ब्रह्म बताने से ही सफल होता है।

     वस्तुतः बात यह है कि परिच्छिन्न स्थूल, सूक्ष्म पदार्थ से अभेद अथवा तादात्म्य होना अज्ञान का लक्षण है। दृश्य, साक्ष्य अथवा भेदमात्र से अपने को पृथक् द्रष्टा जानना विवेक है। इस पृथक्त्व में भिन्नत्व अनुस्यूत है। जड़ चेतन आत्मा भिन्न है। यह भिन्नत्व की भ्रान्ति भी अज्ञानकृत है। वेद प्रमाणान्तर से अज्ञात आत्मा की अपरिच्छिन्नता अद्वितीयता का बोध करा देता है। आत्मा होने से चेतन है, ब्रह्म होने से अपरिछिन्न, अद्वितीय है। इस ऐक्य के ज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति हो जाती है। भेद बाधित हो जाता है। यह अज्ञान की निवृत्ति  और बाधित भेद भी आत्मस्वरूप ही है। क्योंकि वह अधिष्ठान आत्मा से भिन्न नहीं है। प्रमाणान्तर से अज्ञात वस्तु का बोध कराने के कारण ही श्रुति का वास्तविक प्रामाण्य है।

प्रश्न – तब क्या भेद सत्य नहीं है ?

उत्तर – कदापि नहीं। भेद सर्वथा मिथ्या है;परिच्छिन्न के तादात्म्य से भेद सत्य भासता है। जिस अधिष्ठान में भेद भास  रहा है; उसी में उसका अत्यन्ताभाव भी भास रहा है। अपने अभाव के अधिष्ठान में भासना ही मिथ्या का लक्षण है। इसलिए यह युक्ति बिलकुल ठीक है – ‘भेदो मिथ्या स्वभावाधिकरणे भासमानत्वात् ‘ यह अनुभवसिद्ध है कि अधिष्ठान-ज्ञान से भेद मिथ्या हो जाता है। इसलिए वेद का तात्पर्य मिथ्या भेद के प्रतिपादन में नहीं है, प्रत्युत भेद के भाव और अभाव के अनुकूल शक्ति, माया के अधिष्ठान के प्रतिपादन में है।  

(क्रमशः )

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श्री श्रीउड़ियाबाबाजी महाराज के संस्मरण-2

    कहना न होगा कि हमारे महाराजश्री ऐसे ही जीवन्मुक्त महापुरुष थे। प्रत्यक्ष दर्शन के पूर्व भी सत्संगियों  द्वारा उनकी महिमा सुनकर तथा ‘कल्याण’ में उनके उपदेश पढ़कर मेरे हृदय में उनके प्रति एक महान् आकर्षण था। परन्तु उनके दर्शन का सौभाग्य तो तब प्राप्त हुआ जब वे स्वयं कृपा करके प्रयागराज पधारे। उन दिनों मैं कथा के अतिरिक्त और कुछ नहीं बोलता था। कथा में ही उस चलते-फिरते ब्रह्म का दर्शन करने के अनन्तर सायंकालीन सत्सङ्ग में मैंने उनसे प्रश्न किया – “पुनर्जन्म किस वस्तु का होता है ?”

    मैंने अपने मन में यह सोचा था कि वे वेदान्तियों और वेदान्तग्रंथों में प्रसिद्ध यह उत्तर देंगे कि सत्रह तत्त्वों वाले लिंग शरीर का ही पुनर्जन्म होता है। साथ ही कहेंगे कि मनुष्य इस जन्म में जो सुख-दुःखरूप फल भोग रहा है इससे पूर्व जन्म में किये हुए कर्मों की सिद्धि होती है तथा इस जन्म में किये जाने वाले कर्मों के फल अभी देखने में नहीं आते, इसलिए आगामी जन्म की सिद्धि होती है। ऐसा न मानने पर अकृताभ्यागम (बिना किये कर्म के फल की प्रप्ति ) और कृतविप्रणाश (किये हुए कर्म के फल का नाश ) दो दोषों की प्राप्ति होगी तथा ईश्वर में पक्षपात और निर्दयता के दोषों का प्रसङ्ग उपस्थित होगा। अतः पूर्वजन्म अवश्य स्वीकार करना चाहिए। इसके पश्चात् पूछने के लिए मन ही मन यह सोच रखा था कि लिंग शरीर का ही जन्म होता है तो हुआ करे, मैं तो द्रष्टा हूँ, उससे मेरा क्या सम्बन्ध ? मैं (आत्मा) तो द्रष्टा हूँ,इसलिए मेरे लिए तो पुनर्जन्म  के निवारण का प्रयत्न करने की भी कोई आवश्यकता नहीं है। 

    परन्तु यह सब तो मेरा मनोराज्य था। उनका उत्तर था अश्रुतपूर्व ! उन्होंने कहा, “विचार पुनर्जन्म के निषेध के लिए किया जाता है, सिद्धि के लिए नहीं।” इतना कह कर वे हंसने लगे। मैं इस अतर्कित उत्तर पर आश्चर्यचकित रह गया। बात कितनी सीधी-सादी किन्तु मर्मस्पर्शी है। अविद्या से सिद्ध वस्तु की उत्पत्ति के लिए विचार की क्या आवश्यकता है? उसकी तो निवृत्ति का ही प्रयत्न करना चाहिए। 

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