भगवद् स्मृति के कुछ उपाय

 

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अध्यात्म का स्वातन्त्र्य

                    भौतिक वस्तु की प्राप्ति में मनुष्य का स्वातन्त्र्य कभी नहीं हो सकता। एक बगीचे में अँगूर का फल लगा हो ,तो उसमें तुम स्वतंत्र नहीं हो कि तोड़कर ले आओ और खा जाओ। वह राजा का है कि सेठ का है ?वह अभी पका है कि नहीं पका है ?-उसमें तुम्हारा स्वातन्त्र्य नहीं है। अँगूर को देखकर तुम्हारी जीभ पर पानी आवे और जब चाहे उसको तोड़कर खा लोगे?चोरी से तोड़ोगे तो पुलिस पकड़ कर ले जायेगी कि नहीं ?अधर्म से तोड़ोगे तो यमपुरी देखनी पड़ेगी। तो भौतिक रस जो होगा उसमें राजा की अनुकूलता चाहिये ,धर्म की अनुकूलता चाहिये ,अपना स्वत्व चाहिये ;तब न आनन्द ले सकते हो !अतः भौतिक वस्तु में स्वातन्त्र्य नहीं है।                   

             अब देखो ,आधिदैविक रस में देवता के अनुग्रह की ज़रुरत पड़ती है। देवता की अनुकूलता चाहिये। परन्तु ,आध्यात्मिक -रस जिसे ‘आत्म -रस ‘ बोलते हैं ,उसमें न समाज की अनुकूलता चाहिये ,न उसमें राजा के कानून को देखने की ज़रुरत है ,न किसी से इज़ाज़त लेने की ज़रुरत है। यह तो ‘आत्म -रस ‘ है ,अपने आप में ही प्रकट होने वाला है। यह जो आत्म -रस की अनुभूति है ,यह परम स्वातन्त्र्य है। सबसे बड़ी चीज़ इसमें यही है कि हम ऑंख बन्द रखें कि खुली ,अपने हृदय में भगवद्-रस है। यह जो आध्यात्मिक प्रीति है ,यह तो आत्म रस का विकास है ,आत्म -रस का उल्लास है। 

                उल्लसित ज्ञान का नाम नृत्य है ,नृत्यत ज्ञान का नाम रस है। अपना ज्ञान स्वरूप आत्मा जबआनन्द में मग्न होकर स्वातंत्र्येण नृत्य करता है ,तब आध्यात्मिक -रस का अनुभव होता है -आनन्द -ही -आनन्द !बाहर आनन्द ,भीतर आनन्द !आगे आनन्द ,पीछे आनन्द !ऊपर आनन्द ,नीचे आनन्द !आनन्द का समुद्र ,आनन्द की लहर ,आनन्द की बौछार ,आनन्द की हवा ,आनन्द की तरंग ,आनन्द का कण ,आनन्द का स्पर्श ,आनन्द की ध्वनि !नारायण ,इसमें समाज की ,कानून की ,हकदारी की कोई व्यवस्था नहीं ;क्योंकि यह तो अपना आपा ही है। इसी आनन्द की पराकाष्ठा का नाम ‘श्रीकृष्ण ‘ है ,’ब्रह्म’ है , ‘आत्मा ‘ है।  

‘रसो वै सः ‘ !

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Anand Prabodh

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Anand Prabodh

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रुचि और आसक्त्ति
 
                                               रुचि किसमें है ?अपनी रुचि को समझना कठिन पड़ता है। मालूम पड़ता है कि हमको दर्शन -शास्त्र में रुचि है ,लेकिन जब कहानी की क़िताब मिलती है तो उसमें मन ऐसा लगता है कि दर्शन -शास्त्र रखा ही रह जाता है। इससे मालूम पड़ता है कि रुचि कहाँ है ?रुचि भजन में जब होती है तो स्वाद आने लगता है। भजन माने मन -ही मन भगवत्सेवन। ‘भजनं नाम रसनम् ‘ जैसे लोगों को चाट खाने में मज़ा आता है ,उसी तरह से जब भगवान् का भजन करने लगते हैं तो मज़ा आता है। मथुरा के चौबे जैसे रबड़ी खाने में मज़ा लेते हैं ,जैसे खुरचन खाने में मज़ा लेते हैं ,वैसे ही जब भगवान् के भजन में मज़ा आने लगे और आसक्त्ति हो भगवान् में ;तो आसक्त्ति का विषय भगवान् हैं और उनकी सेवा में ,भजन में रुचि है। 
           रुचि और आसक्त्ति ,ये दो नहीं हैं। पहले की अवस्था को रुचि बोलते हैं और उत्तर अवस्था को आसक्त्ति बोलते हैं। जैसे अधौटा और मलाई -एक ही चीज़ है ,दूध ही है दोनों। जब भगवान् में आसक्त्ति होती है तो हृदय निर्मल हो जाता है। आसक्त्ति माने चिपक जाना। मन चिपक गया तो आसक्त्ति। आसक्त्ति हृदय के शीशे को ऐसा स्वच्छ बना देती है कि उसमें भगवान् का प्रतिबिम्ब दिखने लगता है। भगवान् में मन लगाने का सङ्कल्प नहीं करना पड़ता ,प्रयत्न नहीं करना पड़ता। स्वयं मन कब चला गया भगवान् में ,इसका पता नहीं चलता। मन कहीं दूसरी जगह टिकता ही नहीं है। जब देखो भगवान् में !  जब देखो भगवान् में ! !
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