उलूखल बन्धन-लीला-2

     आईये, मेरे साथ गोकुल में चलिये। भले ही आप अन्तर्देश के निभृततम प्रदेश में प्रवेश करके नितान्त शांत स्थिति में विराजमान हों।  आइये, एकबार एकान्तकान्तार का शून्यप्रदेश छोड़कर, जहाँ गौएँ-इन्द्रियाँ  घूम-फिरकर विषय-सेवन करती हैं वहीं उन्हीं के बीच में उन्हीं विषयों में, निराकार नहीं साकार, अचल नहीं चञ्चल, कारण नहीं कार्य, विराट् नहीं शिशु, गंभीर नहीं स्मितसुन्दर, जगन्नियन्ता नहीं यशोदोत्सङ्गलालित, साक्षात्परब्रह्म का दर्शन करें। यह ब्रह्म का प्रतीक नहीं है, साधन करके ब्रह्म नहीं हुआ है, अविद्यानिवृत्ति करके ब्रह्मानुभूति नहीं प्राप्त की है, यह ब्रह्म का अवतार नहीं है, यह आचूल-आपादमूल शिशु-ब्रह्म है- इसके दर्शन कीजिये।

     अभी-अभी यशोदा माता इस शिशु के मुख में विश्व-दर्शन करके चकित-विस्मित हो चुकी हैं। श्याम-ब्रह्म ने सोचा- कहीं मेरी माँ सिंहासन पर बैठा कर चंदनमाल्य अर्पित न करने लगे, आरती न उतारने लगे इसलिए ‘मैया-मैया’ कहकर गले में दोनों हाथ डाल दिये, हृदय से मुख लगा दिया। माता सबकुछ भूलकर दुग्धाकार-परिणत हार्दस्नेह-रस का पान कराने लगी। पहले का विश्वरूपविस्मृति के गर्भ में लीन हो गया। ऐश्वर्य अन्तर्धान हो गया। शैशव-माधुरी अभिव्यक्त हुई। इसमें प्रपञ्च का विस्मरण और शिशु-ब्रह्म में परमासक्ति अनिवार्य है। यह सुख स्वर्ग के समान परोक्ष नहीं है, ब्रह्मानुभूति के समान शान्त नहीं है, विषय-संसर्ग के समान आपातरमणीय एवं विनाशी नहीं है। इस रस में देश,काल एवं वस्तु का लोप हो जाता है। ऐसा ही हुआ। माँ सबकुछ भूल कर इसी रस में डूब गयी।    

(क्रमशः )

 

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उलूखल बन्धन-लीला-1

     

     प्रपंच का विस्मरण और भगवान् में तन्मयता यही लीला का प्रयोजन है। यह प्रपंच का लय करती है और भगवान् में लीन करती है। जहाँ स्वयं भगवान् ही लीलानायक हों, उस लीला की पूर्णता में कोई संदेह नहीं हो सकता। वहाँ प्रपञ्च का विस्मरण हो जाय, भगवान् की भगवत्ता भी भूल जाय, हम उनकी लीला में तन्मय हो जायें, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। यहाँ हम इतना स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि भगवान् की लीला के प्रतीकार्थ निकाले जा सकते हैं परन्तु वस्तुतः भगवान् की लीला प्रतीक नहीं होती। निराकार का साकार प्रतीक होता है। परोक्ष का प्रत्यक्ष प्रतीक होता है। अज्ञात का ज्ञात प्रतीक होता है। परन्तु जो सर्वात्मा, सर्व-स्वरुप है वह लीलाधारी और लीला भी है। अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है। सुनार भी वही, सोना भी वही। अतएव भगवान् की लीला भगवत्स्वरूप ही होती है और उसमें तन्मयता भगवत्स्वरूपापत्ति ही होती है। उस रस-कल्लोल में उन्मज्जन-निमज्जन के अतिरिक्त उसका कोई अन्य प्रयोजन या फल नहीं होता। भगवान् स्वयं सब फलों के फल हैं। उनकी लीला भी वैसी ही है। वह गौण हो और उसका फलितार्थ मुख्य- यह कल्पना ठीक नहीं है। उल्लसित रस का ही नाम लीला है। यह भगवन्मय-भगवद्विलास है। अविद्या मूलक बंधन की निवृत्ति के अनन्तर ही इसका यथार्थ अनुभव होता है।  

(क्रमशः)

 

 

 

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महात्माओं के सङ्ग

     आज तक जीवन में कई बड़े-बड़े महात्माओं के दर्शन मुझे हुए। मैंने संन्यास वेश ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य से लिया। संन्यास के पहले भी कभी मेरे मन में  यह भाव न था कि मैं ब्राह्मण हूँ, मैं गृहस्थ या वर्णाश्रम वाला हूँ और बाद में भी मेरे मन में कभी यह बात नहीं आती कि मैं मानव या दानव, ईश्वर या देवता हूँ। इसलिए जीवन में एक क्षण भी कभी नहीं आया जब मेरे मन में बात जमी हो कि मैं संन्यासी हूँ। ‘मैं ब्रह्म हूँ’ ऐसी कल्पना पुरे वेग के साथ एक बार आयी थी किन्तु उसके बाद ‘मैं मनुष्य हूँ’ ऐसी भ्रान्ति मुझे कभी नहीं हुई। 

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     एक महात्मा थे,उन्होंने हमसे भागवत सुना। फिर बोले कि ‘बैठो, मैं दक्षिणा देता हूँ।’ मैंने कहा, ‘दक्षिणा मैं दूँगा।’ दक्षिणा माने क्या ? भागवत में कहा है कि ज्ञान का सन्देश दक्षिणा है। शिष्य दक्षिणा नहीं देता, गुरु शिष्य को दक्षिणा देते हैं जिससे चेले में ब्रह्मज्ञान की योग्यता आ जाय। 

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     मैंने एक महात्मा से पूछा : ‘हमें और कोई अच्छा महात्मा बताओ जिनका मैं दर्शन करने जाऊँ।’ ऐसा कहना तो उनका अपमान है किन्तु मैं तब बालक था। उन्होंने कहा : ‘तुम्हें विरक्त महात्मा चाहिए न ? आओ, बैठो, नारायण, तुम कल्याण स्वरुप हो। मैं दुःखी हूँ ऐसा अभिमान कभी मत करो।’ हम जब बाहर से हमारा सम्बन्ध जोड़ते हैं तब दुःखी होते हैं। पागल को कभी ऐसा अभिमान नहीं होता। 

 

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