अपने भीतर का खजाना बाहर निकालियेऔर बाँटिये!

     तुममें शान्ति का खजाना भरा है। तुममें आनन्द का सागर लहरा रहा है। तुम्हारे हृदय में समाधि की शान्ति भरी है। तुम्हारे हृदय में प्रेम का स्रोत बहता है। तुम तो सौंदर्य और माधुर्य के निधि हो। उसको बाहर निकालो और अपनी आँख द्वारा, स्पर्श द्वारा, व्यवहार द्वारा सबमें बाँटो। नहीं तो वह बेकार जायेगा। 

     भक्त की हरेक प्रक्रिया प्रभु के अनन्त माधुर्य, सौंदर्य, ऐश्वर्य, रस, सुकुमारता और आनन्दस्वरुप को बाहर लाकर सम्पूर्ण जगत् को बाँटने के लिए ही है। 

     भक्ति तो भीतर में सोये हुए परमात्मा को जगाकर कण-कण में नचाने के लिए और क्षण-क्षण में हँसाने के लिए है। जीवन में भक्ति भरने के बाद वैकुण्ठ में जाने के लिए नहीं किन्तु इसी जीवन में वैकुण्ठ का माधुर्य पाने के लिए है। 

  आपका कोई-न-कोई प्रेमी होगा ही। उसको आपमें कितना प्यार, सुख और आनन्द काअनुभव होता होगा ! उसकी प्यार भरी आँखों से आप अपने को ही देखिये। और, तब आप अपने आनन्द को जगत् में बिखेरिये। 

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अपनी प्रियता को पहचानिये तो !

     आपके घर में कुत्ता होगा तो आप जब बाहर से आयेंगे तब तुरन्त ही आपका स्वागत करने के लिए पूँछ हिला-हिलाकर सामने दौड़कर आयेगा और आपको अनोखे प्यार से चाहने लगेगा, चाटने लगेगा। आपकी मिठास और आपकी प्रियता को वह पहचानता है इसलिए ही वह ऐसा करता है। आप अपनी मिठास और प्रियता नहीं पहचानते इसलिए ही आप अपने को चाहते नहीं। 

     मच्छर को, कुत्ते को, मक्खी को, आप में जो स्वाद दिखाई देता है, उसे आप देखेंगे तो आपको भी मस्ती आ जायेगी। 

     आपके भीतर सोयी हुई प्रियता को जगाने के लिए ही ‘हरे राम हरे राम’ आदि भगवान् की धुन है। 

    जैसे किसी बालक को मिठाई दी जाय, जो उसको बहुत ही पसन्द आये, और जिसके खतम होने पर वह उसी मिठाई की रट लगाता रहे, जैसे कोई प्यासा रेगिस्तान में खो जाये और निरन्तर ‘पानी-पानी’ ही करता रहे।

     उसी रीति से, नाम-जप भी हृदय के रस को व्यक्त करने की अनोखी प्रक्रिया है। हृदय के रस को बाहर निकाल कर हड्डी,मांस और चाम में भर देती है।

    और, ऐसा मनुष्य जिसको देखता है, जिसको स्पर्श करता है, जिसको बुलाता है, उसके जीवन में आनन्द बरसने लगता है।

     जैसे कई लोग आटा लेकर चींटियों के बिलों में डालते हैं और श्रीमान् लोग रुपयों को गरीबों में बाँटते हैं वैसे ही आप भी अपने भीतर के आनन्द के खजाने को सर्वत्र बाँटने के लिए तत्पर रहिये।  

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आइये, ईश्वर का दर्शन कीजिये !

     ईश्वर सर्वत्र और सर्वदा विराजमान ही है। ईश्वर यदि यहाँ नहीं तो कहीं भी नहीं। ईश्वर जो अभी नहीं तो भविष्य में कभी भी नहीं। इसलिए  ईश्वर नहीं है, और ढूँढना बाकी है ऐसा भी नहीं कह सकते। ईश्वर तो सर्वव्यापक और सर्वातीत है। 

     इन्द्रियाँ जिसको देखती हैं, वही ईश्वर की आधारभूत सत्ता है। इसलिए ईश्वर यहीं है, अभी है और कोई नहीं किन्तु यही है। 

     ईश्वर दर्शक भी है और द्रष्टा भी। 

     दृश्य भी है और दर्शन भी। 

     इसलिए आइए, अभी यहीं ही अनेकविध रूपमें हम ईश्वर का दर्शन करें !

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ईश्वर नहीं दिखाई देगा

     तुम अपने व्यक्तित्व के घेरे में ही बैठकर चारों ओर ढूँढोगे तबतक ईश्वर तुम्हें नहीं दिखाई देगा। परमेश्वर को देखने और पाने के लिए तुम्हें भी कालातीत, देशातीत और द्रव्यातीत होना पड़ेगा। 

     हमारी सभी खोजें द्रव्य में, दृश्य में और काम में ही पूरी होती हैं। इसलिए ही हमें ईश्वर नहीं प्राप्त होता। 

     ईश्वर का दर्शन आत्मा के रूप में, पूर्ण विचार रूप में या शान्ति के रूप में ही हो सकता है। 

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“श्रद्धाधन”

     एक विद्यार्थी काशी में पढ़ने गया। 

     वह गुरुकुल में ही था कि एक दिन गुरुदेव उसके घर पहुँच गये। 

     उसके पिता ने पूछा : ‘मेरा पुत्र  क्या करता है ?’

     गुरूजी ने कहा : ‘उसकी बहुत चिन्ता रहती है।  क्योंकि वह स्वयं तो कुछ भी नहीं जानता और जो  मैं समझाता हूँ उसे वह मानता नहीं है।’

     हम भी उस शिष्य की तरह हैं। …… आत्मा में विराजमान परमात्मा का हम अनुभव नहीं कर सकते और अनुभव करके कोई इस विज्ञान को बताये तो श्रद्धापूर्वक मान भी नहीं सकते। इसलिए हमारी हालत ‘अतो भ्रष्ट ततो भ्रष्ट’ जैसी हो गयी है। इसलिए या तो अनुभव करो या अनुभव न होने पर श्रद्धापूर्वक अनुसरण करो। 

     अविद्वान्, स्त्री, बालक के लिए तो श्रद्धा ही बड़ा धन है। 

     श्रद्धा लेकर आप जहाँ भी जायेंगे वहाँ अवश्य सफल होंगे। 

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