‘दुःख आगमापायी’

     एक बहिन कार दुर्घटना में घायल हो गयी। उसके शरीर की तीन जगह से हड्डियाँ टूट गयी थीं। सारा शरीर पट्टियों से बँधा था। उसके पति, दो बच्चे और नौकर भी मर गए थे, केवल गोद का शिशु बचा था। एक दिन मैं उसे देखने मथुरा गया। उसके समीप बैठे एक सज्जन ने पूछा – ‘तुमने तो सत्सङ्ग बहुत किया है, फिर यह कष्ट क्यों मिला ?’ मैं तो चुप रहा; परन्तु वह लड़की बोली -‘सत्संग का फल यह नहीं है कि जीवन में कष्ट न आयें। और वे आते हैं; परन्तु हमारा उनसे तादात्म्य नहीं होता, उनसे हमें विक्षेप नहीं होता। वे आगमपायी हैं,इसलिए हम दुःख में,पीड़ा में भी शान्त हैं।’ सुनकर वे सज्जन गद्गद हो गए।  

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अरे अमृत ! क्यों डरे मृत्युभय से 

मृत्युंजय- शरण ग्रहण कर। 

इससे होगा क्या, मैं-मति की मृत्यु 

प्रथम क्षण, इसे वरण कर। 

मैं अपने को क्या भूला या क्या जाना यह किसे सुनाऊँ ?

भूला अपनी मस्ती में फिर जाना तो क्या ख़ुशी मनाऊँ ?

भले भूल जाऊँ या जानूँ पर मैं तो ज्यों-का-त्योंही हूँ। 

मृत्यु-अमृत के अनृत सन्धि-कौशल का कारीगर यों ही हूँ। 

 

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‘विरक्त साधक के लिए’

  1. संसार की अनित्यता एवं दुःखरूपता का अनुभव 

  2. उसके त्याग का  दृढ़ सङ्कल्प। जैसे, 

                 एकाकी निःस्पृहः शान्तः पाणिपात्रो दिगम्बरः।  

                    कदा   शम्भो   भविष्यामि  कर्मनिर्मूलनक्षमः ।।

    इस प्रकार की लालसा का बार-बार होना।

  3. इंद्रियों का दमन, मन का शमन, सांसारिक प्रवृत्तियों से उदासीनता, कष्ट सहिष्णुता, श्रद्धा और इष्ट में एकग्रता।

  4. मुझे क्या मिलेगा-इसका विचार न करके केवल वर्तमान वासना- बन्धन से मुक्ति की इच्छा। 

  5. वासनापूर्ति से दुःख और निवृत्ति से सुख का स्वभाव बनाना। 

  6. यथाशक्ति तीनों तप धारण करना। 

  7. सप्त महाव्रतों का भी ध्यान करना।  सत्य,अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह,अस्वाद और अभय – यही सप्त महाव्रत हैं। 

  8. निद्रा छः घण्टे से अधिक नहीं। 

  9. भोजन असंकल्पित और आवश्यक। 

  10. आसन नित्य तीन घण्टे। 

  11. जप मौन होकर अधिक से अधिक

         बुद्धि की अशुद्धि ही जीवन की अशुद्धि है। जिसकी बुद्धि अशुद्ध है उसकी वासना, क्रिया सभी अशुद्ध हैं। 

          असङ्ग आत्मा का बोध अनन्त है। जीवन एक व्यक्ति है। जीवन्मुक्त का व्यवहार व्यक्तिगत है। वह शुद्ध ही होना चाहिए। उसमें प्रलोभन और पीड़ा के लिए कहीं स्थान नहीं। 

          योगी लोग वृत्ति से दुःख हटाकर सुख भरते हैं। उपासक इष्टदेव को बसाता है। वेदान्ती दुःख को हटाता है, सुख को भी हटाता है- इष्टदेव को भी हटाता है। 

         वह यदि किसी वृत्ति का स्थापन करे तो फिर उसे भी हटना ही पड़ेगा। इसलिए स्वाद और पीड़ा दोनों मिथ्या हैं, बाधित हैं, प्रतीतिमात्र हैं। ऐसा ज्ञान ही उन सबपर कुठाराघात है। 

         यदि तुम्हें अनुभव होता है कि वृत्तियाँ मेरे सामने उछल – कूद मचाती रहती हैं,तो इसका अर्थ हुआ कि तुम उनके प्रकाशक हो। कोई भी प्रकाश्य वस्तु अपने प्रकाशक से अलग नहीं होती। यदि तुम अपने प्रकाशक स्वरूप का अनुसन्धान करो, वृत्तियों से काम लेना बंद करो तो देखोगे कि कोई वृत्ति नहीं है। तुम उनसे काम लेते हो,यही उनका काम बना रहना है।

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महाशिवरात्रि पर्व पर-

 

 

shiv ji

      रुद्र के दो रूप हैं-एक घोर और एक अघोर। यह जो मृत्यु है,प्रलय है,काम है,क्रोध है,लोभ है,मोह है,जिससे मनुष्य संसार में फँसता है-यह भी रुद्र का ही शरीर है,परन्तु घोर शरीर है,सज़ा देने वाला है। और,दूसरा शरीर है,अघोर। अघोर माने शम है,दम है,उपरति है,तितिक्षा है,श्रद्धा है,समाधान है। जिसमें घोरता नहीं है,उग्रता नहीं है उसका नाम है अघोर। समझो कि वैष्णव लोग कहते हैं कि परमात्मा का जो स्वरूप है,वह अचिन्त्य,अनन्त कल्याण गुण-गण निलय है-उसमें गुण-ही गुण है। कहते हैं कि अखिल हेय प्रत्यनीक कोई त्यागने योग्य वस्तु ईश्वर में है ही नहीं। अच्छा ,जैसा कि वेद में मंत्र आते हैं और श्रीवल्लभाचार्यजी महाराज का मानना है कि ईश्वर परस्पर विरुद्ध धर्माश्रय है -अच्छा भी तुम्हारा शरीर और बुरा भी तुम्हारा शरीर। पाप भी इसमें,और पुण्य भी इसमें। परन्तु,एक अध्यात्म का जिज्ञासु भगवान् शिव से यह प्रार्थना कर रहा है कि हे प्रभु,यह ठीक है कि सब तुम्हारा शरीर है,लेकिन हम चाहते हैं कि हमारे सामने तुम्हारा वह शरीर प्रकट होवे,जो शिव है माने मङ्गलमय है-शिवं,भव्यं,भावितं,मङ्गलं-ऐसा जो तुम्हारा भव्य-भावित मङ्गलमय शरीर है और जिसमें उग्रता का लेश भी नहीं है। हे प्रभु,तुम्हारी उस अघोर मङ्गलमयी चिर मूर्ति को हम चाहते हैं जो हमारे हृदय में छिपे हुए सुख के जो तार हैं उनको प्रकाशित कर दे। माने जो इसी जीवन में अपने भक्त को ,अपने शिष्य को,अपने अनुग्रह भाजन को परम कल्याण-स्वरूप आत्म तत्त्व का बोध करा दे। 
 
या  ते  रुद्र  शिवा  तनूरघोरापापकाशिनी। 
तयानस्तनुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि।। 
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‘दोष अपना’

     एक सेठ को नौकर की आवश्यकता थी। समाचार पत्रों में विज्ञापन छापा। लोग मिलने के लिए आने लगे। एक से सेठ ने कहा- ‘एक गिलास पानी लाओ।’ वह ले आया। सेठ ने कहा- ‘फेंक दो।’ उसने फेंक दिया। सेठ- ‘क्यों फेंक दिया ?’

     आगन्तुक- ‘आपने कहा, इसलिए फेंक दिया।’

     सेठ ने उसे विदा कर दिया। 

     बहुत आये बहुत गये- सबके साथ यही बर्ताव हुआ। अन्तिम व्यक्ति से जब सेठ ने कहा- ‘क्यों फेंक दिया’, तो उसने कहा – ‘मालिक, मुझसे भूल हुई।’  सेठ ने उसे रख लिया। 

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      जो गुणों के अन्दर ईश्वर का हाथ और दोषों में अपनी गलती देखता है, वही ईश्वर का प्यारा होता है।  

 

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