साधन अपने लिए

               जो लोग दूसरों को सुनाने के लिये अध्यात्मशास्त्र का अध्ययन करते हैं,उनके हृदय में अध्यात्मशास्त्र का रहस्य प्रकट नहीं होता। वह उन्हीं के हृदय में प्रकट होता है,जो अपने लिये उसका अध्ययन करते हैं। 

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               सुनाने का सुख राजस सुख है। दूसरों ने बड़े प्रेम से सुना,श्रोताओं को खूब आनन्द आया। लोग खूब तन्मय होकर सुनते रहे। बड़ी प्रशंसा हुई। इस प्रकार वक्ता में जो आनन्द आया,वह राजस सुख है। इससे उसका अहंकार बढ़ा। सात्त्विक आनन्द एकान्त में अपने अन्तर के भाव से आता है। 

 
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                सत्पुरुष को चाहिये कि वह सामने वाले व्यक्ति की वह बात स्वीकार कर ले, जिसे स्वीकार करने में धर्मकी हानि न होती हो। लोभ,कष्टका भय अथवा अहंकार के कारण ही सामान्य जन दूसरों की बात नहीं मानना चाहते; किन्तु सत्पुरुष में ये दुर्बलताएँ नहीं होतीं। 

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अनुभव का स्वरुप

anubhaw ka swaroop

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चिन्तन

chintan

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ईश्वर का चिन्तन कैसे करें ? (8)

     भजन हाथ से- जीभ से ही नहीं, पाँव से भी सम्भव है। एक अच्छे महात्मा हैं।  वे बोलते नहीं, किन्तु सब समय  बैठे तो रह नहीं सकते। उन्होंने पाँच – सात गज का गोवर्धन बना लिया है। उसकी 108 परिक्रमा करते हैं। यह पैर से भजन करना ही तो है। इससे घूमना भी हुआ जिससे स्वास्थ्य ठीक रहे और भजन भी हुआ। क्रिया कुछ करो, किन्तु हृदय में भाव हो कि भगवान् के लिए कर रहे हो, तो वह भजन है।  हाथ से भगवान् के लिए कुछ करो। मुख से जप, पाठ, कथा करो। माला चढ़ाओ या पूजा-परिक्रमा करो। जिसने तुम्हें शरीर, हृदय, बुद्धि दी, परिवार दिया, खुशियाँ दीं, उसके लिए जीवन में कुछ न किया जाय, यह तो भारी कृतघ्नता है। तुम्हारे पास बेटा-बेटी के लिए है, पति या पत्नि के लिए है, शरीर के लिए है, परन्तु ईश्वर के लिए कुछ नहीं है ? जब हर बात में भगवत्कृपा दीखती है, तब भक्ति होती है। एक है जो रात-दिन तुम्हारी रक्षा के लिए सावधान रहता है। उस ईश्वर को देखो। पैसे के स्थान पर ईश्वर को चाहो। पैसा तो प्रारब्ध से मिलता है। 

     आपका उत्तराधिकारी चाहता है कि आप जल्दी से जल्दी चाभी उसे दे दें। वह कहता है – ‘अब ये बुढ्ढे हो गये, इन्हें अब भजन करना चाहिए। अब ये काम-धन्धे में क्यों व्यस्त रहते हैं ?’ आप जिससे सबसे अधिक प्यार करते हैं, जिसे आप सब कुछ दे जाना चाहते हैं, वह चाहता है – ‘आप शीघ्र दे जाएँ।’ आप मोह में फँसे हैं। संसार के विषय नाशवान् हैं। ये एक दिन अवश्य छूटेंगे। एक सज्जन समाचार पत्र पढ़ रहे थे, बैठे-बैठे ही मर गये। एक स्वस्थ व्यक्ति काम कर रहे थे, सहसा नेत्र-ज्योति चली गयी। न विषयों का हिसाब है कि वे कबतक रहेंगे, और न इन्द्रियों का ठीक है कि वे कब तक काम करेंगी। न मन का पता है कि जो आज प्रिय लगता है, वह कल भी प्रिय रहेगा या नहीं ? शरीर का भी ठीक नहीं कि कब तक रहेगा ? यह भोगायतन देह नदी के कगार पर बैठा है। आग लग गयी तब कुआँ खोदने लगना समझदारी नहीं है। पहले से कुआँ होगा तब आग बुझेगी। अतः जीवन में पहले से तैयारी करो। 

     भक्ति के दो पुत्र हैं – ज्ञान और वैराग्य। जितनी-जितनी भक्ति मन में आयेगी, संसार से उतना वैराग्य होगा और भगवान् के विषय में उतना ज्ञान होगा। 

     आप घड़ी को वाटरप्रूफ रखते हैं, शाकप्रूफ रखते हैं कि कभी भींग जाय या हाथ से गिर जाय तो ख़राब न हो, किन्तु  अपने हृदय और मष्तिष्क को सुरक्षित बनाकर नहीं रखते ? उसकी यही सुरक्षा है कि उसे भगवान् के चरणों में लगा दो। यदि कहीं संसार में हृदय लगाओगे तो दुःखी होगे। अतः ईश्वर का चिन्तन करो।

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ईश्वर का चिन्तन कैसे करें ? (7)

     जीवन की किसी घटना का कर्ता कोई मनुष्य नहीं है, ईश्वर है। अतः जब तुम किसी काम करनेवाले को गाली देते हो तो उस काम करने वाले को गाली नहीं देते, गाली सीधे ईश्वर को जाती है। एक बार किसी बड़े पण्डित ने कोई बात कही। बात मुझे जँची नहीं।  मैंने कह दिया- ‘किस मूर्ख ने ऐसा कहा है ?’ उस पण्डित जी ने मेरे गुरूजी का नाम लेकर कहा- ‘उन्होंने कहा है। ‘

     मैं- ‘तब तो ठीक है।’

     पण्डित जी – ‘पहले गली दे दी, अब कहते हो – ठीक कहा है।’ इसी प्रकार हम कार्यों को दूसरों का किया मानकर गाली देते हैं। जैसे खीर खिलाने वाला चटनी, नमक, मिर्च भी परसता है  कि इन्हें बीच-बीचमें  खाने से खीर का स्वाद बढ़ जायेगा, वैसे ही भगवान् बीच-बीच में अपमान, दुःख, अभाव, रोग भेजते हैं। इन्हें हमारे अभिमान को तोड़ने के लिए भेजते हैं।

    जन्माष्टमी भगवान् का अवतार-काल है। शरद-पूर्णिमा रास का दिन है। इसी प्रकार रामनवमी, शिवरात्रि आदि भगवत्स्मरण कराने वाले काल हैं। प्रत्येक महीने में एकादशी, द्वादशी, प्रदोष आदि आते हैं। अयोध्या, वृन्दावन, वाराणसी आदि देश भगवत्स्मरण कराने वाले हैं। संत ज्ञानेश्वर, एकनाथ, नामदेव, तुकाराम, नरसी मेहता, सूरदास, तुलसीदास, गुरुनानक, आल्वार, नायनार आदि संतों को भगवान् ने हमारे कल्याण के लिए कृपा करके पृथिवी पर भेजा। भगवान् ने हमें हृदय दिया कि उनसे प्रेम करें। बुद्धि दी कि उनके विषय में सोचें। 

     आपको एक सूची बनानी चाहिए कि प्रतिदिन आप कितनी देर अपने और अपने परिवार के लिए काम करने में लगाते हैं ? कितना समय समाज तथा दूसरों को देते हैं तथा कितना समय ईश्वर के लिए लगाते हैं ? यदि आठ घण्टे अपने परिवार के लिए लगाते हैं तो दो घण्टे समाज लिए तथा दो घण्टे  ईश्वर के लिए भी लगाइये। सारा जीवन स्वार्थ के लिए ही लग जाये, यह कैसा जीवन है ?

(क्रमशः)

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‘संन्यास क्या है ?’

    देखो, बुरा समझ करके सम्बन्ध-त्याग करना संन्यास का धर्म-पक्ष है। अच्छाई को भगवदर्पित करना उपासना-पक्ष है। सबसे सम्बन्ध-रहित होना योग-पक्ष है। ‘यह मठ मेरा है’, ‘यह चेला मेरा है’, यह बैंक-बैलेंस मेरा है’- इसका नाम संन्यास नहीं है। किसी भी स्थान, व्यक्ति, वस्तु से अपना सम्बन्ध न मानना संन्यास की उच्चकोटि की अवस्था है। जो सम्बन्ध-त्याग मनमाना होता है, वह टिकाऊ नहीं होता है। विवेक और शास्त्रादेश दोनों चाहिए। कभी-कभी हमारा विवेक हमको गलत रास्ते पर ले जाता है, क्योंकि हमारी बुद्धि में वासना मिली रहती है। अतः शास्त्रादेश के तराजू पर अपने विवेक को तौल लेना चाहिए कि हमारा विवेक हमको ठीक रास्ते पर ले जा रहा है कि नहीं ! शास्त्र के तराजू पर विवेक की समीक्षा करनी चाहिए। अब जो सरकारी कानून बनते हैं, उनको मूलभूत संविधान के न्याय पर जाँचना पड़ता है। आज राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री प्रधान नहीं है। कोई संसद-सदस्य या सरकारी अधिकारी प्रधान नहीं है। सबके सिर पर संविधान बैठा हुआ है।  जो भी सरकारी अध्यादेश जारी होता है, उसकी जाँच-पड़ताल होती है कि वह संविधान के अनुकूल है या प्रतिकूल।  भाई मेरे ! वेद के आधार पर जो संविधान है, वह सत्य है, शाश्वत है, यथार्थ प्रमाण है। अतः वेद-शास्त्रादेशानुसार अपने विवेक की समीक्षा करनी चाहिए। शास्त्रसम्मत  विवेकयुक्त-बुद्धि के द्वारा समस्त दृश्य-प्रपञ्च के सम्बन्ध से रहित होकर अपने असङ्ग आत्मस्वरूप में अवस्थित होना ही संन्यास है। 

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ईश्वर का चिन्तन कैसे करें ? (6)

     ‘मद्रचनानुचिन्तया’ऐसी कोई क्रिया नहीं होती, जिसमें भगवान् की दया, करुणा, वात्सल्य न हो। मनुष्य की बुद्धि दूसरी ओर लगी रहती है, अतः इस लीला में भगवान् की कृपा समझ में नहीं आती। कभी-कभी किसी से वियोग होने में लाभ होता है। कभी पैसा खोने में भी लाभ होता है। कभी-कभी किसी के मरने में भी लाभ होता है। संन्यासी होना त्यागमय जीवन-अकेला जीवन बिताना, इसमें भी भगवान् की कृपा है। 

     एकबार मैं घर से भागकर चित्रकूट जा रहा था। मार्ग में एक परिचित मिले। बोले- ‘अकेले जा रहे हो या कोई साथ है?’

     मैंने कहा – ‘मैं हूँ और मेरा भगवान् है।’ जब दूसरे साथ होते हैं, तब भगवान् का पता नहीं लगता। हम अकेले होते हैं तब भगवान् का पता चलता है कि वह हमारी कैसे सहायता करता है। मुझे ऐसे स्थान पर रोटी मिली है, जहाँ रोटी मिलने की कोई आशा नहीं थी। भूखे थे तो मार्ग में चलते-चलते किसी ने बुलाकर खिला दिया। जिसने आपको मुख दिया, शरीर दिया, पेट दिया, उसी ने रोटी दी है। आपकी एक-एक चेष्टा भगवान् की दृष्टि में है। जीवन में जो भी घटना घटे, उसमें  भगवान् का हाथ-भगवान् की करुणा देखो-

तत्तेsनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्। 

हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते  जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक्।।

     भगवान् की कृपा को भली प्रकार देखता हुआ, अपने शुभाशुभ कर्म फल को भोगते हुए, हृदय, वाणी, शरीर से जो भगवान् के सम्मुख नत रहता है, मुक्तिपद का वह उत्तराधिकारी  है। 

                                                                                                                               (क्रमशः)

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