योगः कर्मसु कौशलम्

    भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में योग की एक बड़ी ही व्यावहारिक परिभाषा दी – ‘योगः कर्मसु कौशलम्’। बुद्धिमानी से काम करना, कौशल से काम करना, कौशल से रोटी बनाना; परन्तु रोटी भी न जले और हाथ भी न जले और ज्यादा कोयला भी खर्च न हो, ज्यादा गैस भी खर्च न हो, तवा भी न जले और रोटी बिलकुल ठीक-ठीक पके। यह क्या है ? योग है। यदि तुम्हारे मन में योग नहीं होगा, याद करोगे अपने यार की और बनाओगे रोटी, तो रोटी जल जायेगी। जल्दी-जल्दी उतार लोगे तो कच्ची उतर आयेगी। बेलते समय अगर मन में ख़्याल नहीं होगा तो बीच की मोटी हो जायेगी और किनारे की पतली हो जायेगी अथवा किनारे की मोटी हो जायेगी और बीच की पतली हो जायेगी। महाराज गोल-गोल होने की जगह षट्कोणी हो जायेगी, इधर गयी,उधर गयी। आज तो साग में दो बार नमक डाल दिया, या नमक डालना ही भूल गये। यह योग की कमी है। भगवान् कहते हैं कि जो काम तुम करते हो, उसे बिलकुल ठीक-ठीक सम्पन्न करो। अपने जीवन में प्रत्येक क्रिया में सावधान रहना, इसी का नाम योग है। यह तो तुम्हारे घर में सिद्ध होने वाला योग है। सावधानी का योग है। बोलने में सावधान, पाँव रखने में सावधान। 

    नारायण, व्यवहार का स्वर्ग यही है कि अगर तुम चाहते हो कि सास जी हमको बहुरानी कहकर पुकारें, तो तुम भी तो सास जी बोलना सीखो। डोकरी कहकर तुम पुकारो, तो वह पुकारेगी छोकरी, और तुम कहो माताजी, तो वह बोलेगी- ‘यह तो हमारी बेटी है’।

    तो जो मनुष्य अपने व्यवहार में सावधान नहीं है, वह अपनी भी बिगाड़े, दूसरे की भी बिगाड़े ! सबसे बर्ताव करते समय सजग रहोगे तो तुम सुखी रहोगे, दूसरा भी सुखी रहेगा।   

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‘अच्युतस्य पादाम्बुजोपासनं।’

     भगवान् को बोलते हैं ‘अच्युत’। आपके दादा-परदादा तो चू गए, च्युत हो गए, गिर गए। आपका धन भी च्युत हो गया। दुनिया में जो फरा सो झरा; जो बरा सो बुताना। सारी दुनिया चू जाती है। कब,कब !! जैसे आम पेड़ पर से चू जाते हैं, वैसे दुनिया में सब टपकते जा रहे हैं। दुनिया की सब चीजें टपक रही हैं। एक ऐसी चीज़ है, जो कभी आपको छोड़कर नहीं जा सकती। न आजतक कभी छोड़ा है, न आगे कभी छोड़ेगी। न छूट सकती है – ‘अच्युतस्य’। हमारी तो घड़ी कहीं छूट गई, पेन कहीं छूट गया, पुस्तक कहीं छूट गयी। बचपन कहीं छूट गया, जवानी कहीं छूट गयी। काले बाल कहीं छूट गए। दाँत कहीं छूट रहे हैं। है कि नहीं ? ये सब च्युत होते हैं। एक ऐसी चीज़ है जो अच्युत है। और, वह सबको नित्य प्राप्त है। सबके दिल में है। ‘न च्यवते इति’ वह कभी चू नहीं जाता, अच्युत है।  कौन ? परमात्मा। उसके चरणारविन्द में आसन जमा लो। आसनं उपासनं। ‘अच्युतस्य पादाम्बुजोपासनं’– बिलकुल उसके पास आसन लगाकर बैठ जाओ !

     एक मछली मारने वाला मछुआरा जाल फैलाकर मछली पकड़ रहा था। सो वहीं एक संत नहा रहे थे। एक मछली ने संत को देखा। और उनकी ओर आकर्षण हुआ। उसने कहा कि महाराज, बचाओ। तो संत ने इशारा किया कि तुम मछुआरे के पाँव के पास चली जाओ। अब देखो, जाल में फँसेगी क्या मछली ? बिलकुल नहीं। जाल से छूट गयी। यह जो मायाजाल फैला हुआ है, वह जिसने फैलाया, उसके चरणों के पास बैठ जाओ। 

     दाल दली जा रही थी, आटा पिसा जा रहा था। उसमें था एक घुन। उसने अपने गुरुदेव का स्मरण किया। गुरुदेव ने कहा  कि  तुम  कील के पास चले जाओ ।  जहाँ  से  चक्की घूमती है,  बीच  में  कील होता है।  अरे महाराज, वह तो बच गया। सारे जौ पिस गए, मटर की दाल बन गयी,गेहूँ पिस गया  और घुन बच गया। 

     तो नारायण, यह दुनिया जिस कील के आधार पर घूम रही है, यह माया का जाल जिसने फैलाया है, उसके चरणारविन्द में चल कर बैठ जाओ ! आप जाल से बच जाओगे, आप पिसने से बच जाओगे !!

‘अच्युतस्य पादाम्बुजोपासनं’ ।  

 

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‘भगवद्-भक्ति’

    ईश्वर ने तुम्हें जो उत्तम अवसर दिया है, भोग-विलास में आसक्त न होकर त्याग, वैराग्य, सयंम से अपना भजन करने का, उसका पूरा लाभ उठाना चाहिए। यह मनुष्य जीवन बार-बार नहीं मिलता। इसलिए बड़े प्रेम से निरन्तर परमात्मा के स्मरण का अभ्यास करना चाहिए। सर्वत्र भगवद्-दर्शन करना चाहिए। आकाश को देखकर भगवान् के श्याम-रंग का आभास हो। बादल देखकर घनश्याम, गाय को देखकर गोपाल, मोर को देखकर मोर-पंख-धारी, मोर-मुकुटवाले, यहाँ तक कि गधे को देखकर होली के समय भगवान् के क्रीड़ा-कौतुक का स्मरण हो जाय। 

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    भगवत्प्राप्ति के लिए यदि भक्त सांसारिक मर्यादाओं का उल्लंघन कर सकता है तो भगवान् भी सारी मर्यादाएँ तोड़कर अपने प्रेमी भक्त के पास दौड़े आते हैं। वे अपने भक्त को कदापि नहीं छोड़ सकते। यह उनके वश की बात नहीं है। 

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‘त्यागेनैके अमरत्त्वमानशुः’

    भाई मेरे ! देखो ! यदि तुम संसार में कहीं भी फँस जाओगे, तो तुम्हें रोना पड़ेगा। यह बात बिलकुल सच्ची है। तुम चाहे धन में फँसो, चाहे मकान में फँसो, चाहे परिवार में फँसो, चाहे यार-प्यार में फँसो, चाहे शरीर में फँसो, चाहे अन्य कहीं भी फँसो। हाँ, यदि तुम संसार में फँसोगे, तो तुम्हें रोना पड़ेगा। जिसके जीवन में फँसाव नहीं है, वह रो नहीं सकता है। बन्धन और रोना- ये दोनों दुनिया में आसक्ति मानने से हैं। आसक्ति मानी हुई चीज़ है भला। आसक्ति है नहीं। तुम्हारे पास जन्म के पहले क्या था ? तुम्हारे पास मरने के बाद क्या रहेगा ? यह शरीर भी तो तुम्हारे पास रहने वाला नहीं है। जहाँ तुम फँसे हो, वह तुम्हे हमेशा के लिए नहीं मिला है। बस, आप अपने सामर्थ्य को समझिये। आपके अन्दर इतना सामर्थ्य है कि आप धन, मकान, बेटा-बेटी, पति-पत्नी, माता-पिता, भाई-बहन शरीरादि सबको छोड़ सकते हो। 

    जब मैं सन् 35-36 में बम्बई आया था, तब एक बड़ा भारी मकान बिलकुल अकेला-उजाड़ पड़ा देखा। पूछने पर मालूम पड़ा कि यह मकान किसी नरीमन का था। इसके मालिक इसको छोड़कर चले गए हैं; अब इसमें भूत रहता है। भला बताओ ! भूत के भय से इतना बड़ा मकान बिलकुल खाली पड़ा था। देखो ! नारायण ! आपके भीतर मकान का त्याग करने का सामर्थ्य है। जब पत्नी दूसरे से फँस जाती है, तब पति के मन में पत्नी के परित्याग की बात आ जाती है। जब पति पराये घर जाने लगता है और ज्यादा शराब पीने लगता है, तब पत्नी के मन में पति को छोड़ने की बात आती है। भले ये उसको छोड़ सकें अथवा न छोड़ सकें। 

    तो नारायण, मनुष्य जीवन का एक सत्य है, त्याग। अतः वेद-वचन है- ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः’ तेन त्यक्तेन अर्थात् त्यागेन भावेन- त्याग का भाव रखते हुए भोग करो। ‘आत्मानं पालयेथाः’– अपनी रक्षा करो। मकान की रक्षा में मत लग जाओ। पैसे की रक्षा मत करो। परिवार एवं अपने देह की रक्षा में मत लगो। अपने आत्मा की रक्षा करो। सबको त्याग कर रहना – यह आत्मा का स्वरुप है। यदि इसको अपने जीवन में विकसित कर लोगे, तो वह तुम्हारे जीवन को सुखी रखेगा।      

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जीवन-निर्माण की शैली

    जो सुख-दुःख का भोक्ता है उसको बोलते हैं जीव। जो सुख-दुःख का निमित्त है उसको बोलते हैं भोग्य संसार और जो सुख-दुःख का दाता है उसका नाम है ईश्वर। यह सारा-का-सारा प्रपञ्च सुख-दुःख से ही विस्तृत हुआ है। हमारे मन में जो सुख के प्रति राग और दुःख के प्रति द्वेष है, उसी से हमने यह सारी दुनिया बनायी है।

    यहाँ एक प्रश्न अवश्य उठता है ! वह यह कि क्यों न हम सुख की प्राप्ति  और दुःख को दूर करने के लिए अपनी वासना पूरी करें ? लेकिन क्या इसके लिए जहाँ-जहाँ सुख मालूम पड़ेगा, वहाँ-वहाँ आप टूट पड़ेंगे ? यहीं मनुष्य-शरीर की विशेषता सामने आती है। वह क्या है ? मनुष्य के शरीर में एक मर्यादा की आवश्यकता है। यह नहीं कि जो मन में आया सो खा लिया, जो मन में आया सो कर लिया, जो मन में आया सो बोल दिया  और जो मन में आया सो ले लिया। इसके लिए एक मर्यादा होनी चाहिए। नहीं तो तुम द्वेष से मरोगे, राग से मरोगे और दूसरों को भी राग और द्वेष से मारोगे। यहाँ शास्त्र की आवश्यकता होती है, जिससे यह ज्ञात होता है कि हम किससे राग करें और किससे द्वेष करें? राग-द्वेष को व्यवस्थित करने के लिए ही विधि-निषेध के रूप में शास्त्र की आवश्यकता होती है।

    राग-द्वेष मूलक देह को इधर-उधर जाने से रोकने के लिए, उससे ऊपर उठाने के लिए ही हमारे शास्त्रकारों ने स्वर्ग,नरक तथा पुनर्जन्म का वर्णन किया है। वे कहते हैं कि तुम देह-मात्र नहीं हो। तुम तो जब देह नहीं था तब भी थे। अनादिकाल से वासनाओं के अनुसार तुमको यह देह प्राप्त होता रहा है और इस देह के पश्चात् भी तुम्हें दूसरा देह प्राप्त होगा। ईश्वर भी जो देता है, वह कर्म-सापेक्ष होकर ही देता है। तो नारायण, हमको कर्म के अनुसार ही शरीर की प्राप्ति होती है और शरीर में ‘मैं ‘ होने से ही संसार में राग-द्वेष होता है। इस स्थिति से मुक्त होने के लिए हमारे राग का जो विषय है, जिसको हम चाहते हैं और जहाँ हमको पहुँचना है, वह ऐसी चीज़ होनी चाहिए जो अविनाशी हो। उपनिषद् का कहना है कि दुनिया में जिससे तुम प्रेम करोगे, वह तुम्हे रुलायेगा – प्रियं रोत्स्यति’ (बृहदारण्यक 1.4.8) जहाँ कहीं संसार में बाहर का प्रेम होगा – वह एक-न-एक दिन तुम्हें रुलायेगा अथवा एक-न-एक दिन तुम्हें बाँधेगा। 

    इसलिए भाई मेरे, तुम व्यवहार तो सबसे ठीक करो। तुम्हारा व्यवहार तो हो धर्म के अनुसार, किन्तु तुम्हारी प्रीति के विषय हों सबमें रहनेवाले भगवान्। क्योंकि प्रभु अविनाशी हैं, तुम्हें जन्म-मरण के चक्कर से छुड़ाएंगे। वे ज्ञानस्वरूप हैं, तुम्हें बेवकूफी, नासमझी, अविद्या, अज्ञान, भ्रम से छुड़ाएंगे। वे आनन्द-स्वरुप हैं, तुम्हें दुःख से छुड़ाएंगे। वे अद्वितीय हैं, तुम्हें द्वैत के चक्कर से, राग-द्वेष के चक्कर से छुड़ाएंगे, आत्यन्तिक निवृत्ति करेंगे। अतः भगवान् ही हमारे प्रेम के विषय हैं, भगवान् से ही हमें  प्रेम करना चाहिए। लेकिन भगवान् से हमारा प्रेम साधारण नहीं, असाधारण होना चाहिए। जितनी भेदक या भेद-रूप वस्तुएँ हैं, उन सबमें जो अभिन्न रूप से विद्यमान परमेश्वर है, उसके प्रति हमारे हृदय में भक्ति होनी चाहिए और हमारा हृदय भक्तिमय हो जाना चाहिए। निषिद्ध कर्मों में हमारी रुचि न रहे, निषिद्ध से हमारा प्रेम न हो और हम कभी भी नासमझी में, अज्ञान में स्थित न होने पायें- इन बातों का ध्यान हमें बराबर बनाये रखकर अपने जीवन का निर्माण करना चाहिए।     

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विश्वास

    विश्वास करना ही पड़ता है- अपनी बुद्धि पर करो, चाहे परायी पर। विश्वास करने के लिए आत्मबल की आवश्यकता है। दुर्बल हृदय किसी पर विश्वास नहीं कर सकता। चरित्रभ्रष्ट पुरुष जितना जल्दी प्रभावित होता है, उतना ही जल्दी अविश्वास भी करता है। क्या तुम किसी पर विश्वास करते हो कि ये गला भी काट दें तो हमारा हित ही करते हैं ? परमात्मा पर ऐसा ही विश्वास करो। तुम निर्भय रहो। क्योंकि यदि तुम परमात्मा के प्रति हृदय से सच्चे रहे तो तुम्हारी हानि कभी हो ही नहीं सकती। जिसे संसारी लोग हानि समझते हैं, वह तो साधक के लिए परम लाभ है। भगवान् तुम्हारे चारों ओर और हृदय में रहकर तुम्हारी रक्षा कर रहे हैं। 

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    संसार में सुख-शांति से रहने के लिए ‘भगवान् का आशीर्वाद मेरे साथ है, इस विश्वास से बढ़कर कोई उपाय है ही नहीं। 

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जब अपना मन ही ईश्वर है,

जब अपना मन ही गुरुवर है,

तब बार-बार क्यों पूछ रहे,

विश्वास बिना सब पत्थर है 

जो होता है वह ईश्वर का 

करुणा से पूर्ण विधान भला,

यदि अपने मन को खलता है,

तो क्या पथ पर वह ठीक चला ?

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‘दुर्गुण और सद्-गुण’

    धन के लिए सेठ की पूजा, ईश्वर की नहीं, धन की पूजा है। स्त्री को ‘प्राणेश्वरी, हृदयेश्वरी’ कहना उसके रूप की, काम की पूजा है। किसी के दोष भी गुण दीखना, राग वश उसे ही पूर्ण मानना ईश्वर की नहीं, मोह की पूजा है। अपने को सर्व श्रेष्ठ मानकर दूसरों को हेय समझना, तिरस्कार करना अपने अहं की पूजा है। 

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    जीव के जीवन में चार सबसे बड़े बन्धन हैं-अज्ञान अनैश्वर्य, अवैराग्य और अधर्म। ये बन्धन ही उसके दुःख के कारण हैं। अज्ञान को ज्ञान से, शरणागति द्वारा अनैश्वर्य को, भक्ति से अवैराग्य को और धर्म से अधर्म रूप बन्धन को काटो और सुखी हो जाओ। 

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    जो जितना अधिक निर्वासन होगा, उसे भगवद्-भजन, भगवन्नाम का उतना ही अधिक रस, आनन्द आयेगा। संसार के पदार्थों में मन अटका रहे तो नाम-जप, कीर्तन आदि से संसार ही मिलेगा, भगवान् नहीं। भजन का नियम यह है कि निर्वासन होकर करने से भगवान् मिलते हैं। वासना युक्त भजन विलम्ब से चित्त शुद्ध करता है। 

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    निन्दा की परवाह न करना बहादुरी हो सकती है; परन्तु स्तुति का मीठा ज़हर पचा लेना उससे भी बड़ी बहादुरी है।  

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