श्री श्रीउड़ियाबाबाजी महाराज के संस्मरण

     महाराजश्री के सामने मैंने उनके आश्रम में बहुत दिनों तक श्रीमद्भागवत आदि सद्ग्रन्थों की कथा कही है। एक दिन किसी प्रसङ्गवश मैंने कहा,- ‘जीव अपने को भगवान् का भोग्य समझने लगे-इसी का नाम भक्ति है। भक्त की दृष्टि अपने सुख पर कभी नहीं होती, वह तो सर्वदा अपने प्रियतम को ही सुख प्रदान करना चाहता है।’ कथा समाप्त होने पर सायंकाल जब मैं आश्रम की छत पर आपके सत्सङ्ग में गया तो इसी प्रसङ्ग को लेकर चर्चा चली। आप बोले, ‘भैया! जीव का परम प्रेमास्पद तो अपना आत्मा ही है। वह भ्रम से भले ही किसी अन्य को अपना प्रियतम माने। जीव चेतन है, अतः वह किसी का भोग्य या दृश्य नहीं हो सकता। वस्तुतः वही सबका भोक्ता या द्रष्टा है। जो जीव विषय का भोक्ता होता है उसे ‘संसारी’ कहते हैं और जो भगवान् का भोक्ता होता है वह ‘भक्त’ कहलाता है। इसी प्रकार समाधि का भोक्ता ‘योगी’ कहा जाता है और जो भोक्ता एवं भोग्य का बाध कर देता है वह ‘ज्ञानी’ है। ‘मैं भगवान् का भोग्य हूँ’ इस भावना में जो दिव्य एवं आलौकिक रस है भक्त उसका भोक्ता ही है। ‘मैं भोग्य हूँ’ यह भावना तो उसकी भोग्य ही है। अतः ‘आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति'(बृ० उ० 2/4/5) यह श्रुति समान रूप से सभी जीवों के स्वभाव का निर्देश करती है।

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