जिज्ञासा और समाधान

प्रश्न -आपने कृपा करके बतलाया था कि इष्टमंत्र चौबीसों घण्टे वैखरी वाणी से जप करना शास्त्र-विहित है। इसका आपने प्रमाण के रूप में श्लोक भी कहा था। क्या मैं अपने इष्ट गोपाल-मन्त्र का भी इसी प्रकार जप कर सकता हूँ ?

उत्तर – तन्त्रसार में यह श्लोक है –

मन्त्रैकशरणो विद्वान्

मंत्रमेव सदाभ्यसेत्।’

तथा योगशिखामणि उपनिषत् में –

अशुचिर्वा शुचिर्वापि

प्रणवं यः स्मरेत् सदा।’

यहाँ ‘प्रणव’ शब्द का अर्थ इष्टमन्त्र है। आप अपने इष्टमंत्र का जप चौबीसों घण्टे कर सकते हैं। वैसे, गोपाल-मन्त्र का जप चाहे जब करें, परन्तु एक तो दूसरे मन्त्र का जप न करें और दूसरे अपना नित्य नियम पवित्र आसन पर बैठकर पूरा कर लें। चौबीस घण्टे की छुट्टी के नाम पर अपना नित्य नियम न तोड़ें।

“ध्रुव को बाल्यावस्था में यह ज्ञात नहीं था कि मैंने पूर्वजन्मों में कितने साधन किये हैं। वह तो अपमान की असहिष्णुता से ही घर से निकले थे। वैराग्य भी नहीं था; फिर भी वे भगवत्कृपापात्र हो गये। आपको ज्ञात न हो मेरा विश्वास है कि आपने भी अपने पूर्व जन्मों में बहुत से साधन अभ्यास किये हैं; अन्यथा इतने पवित्र विचार आपके मन में कहाँ से उठते ? अतः आप अगले जन्म में क्या होंगे, इसका विचार छोड़कर, ‘मैं मनुष्य बनूँ’, इस वासना का भी परित्याग करके इसी जन्म में भगवत्प्राप्ति के लिए साधन कीजिये। क्या ‘आनन्दवाणी’ में यह पढ़ने को नहीं मिला कि जिसको अगणित जन्मों से भगवत्प्राप्ति होने वाली थी, उसको एक ही जन्म में हो गयी।”

new sg

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