पत्रोत्तर

परम प्रिय

सप्रेम श्रीकृष्णस्मरण !

शरणागति धर्म बहुत कठिन है। जिसको संसार की किसी वस्तु का सहारा न हो और किसी दूसरे से किसी प्रकार की आशा-आकांक्षा न हो वह शरणागत होता है। अकिंचन और अनन्यगति होना शरणागत की पात्रता है।

शरणागति आत्मबोध है। पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, दिशा-काल,चंद्र-सूर्य आदि जिसके द्वारा नियंत्रित हैं वही हमारे इस जीवन का भी नियंता है। सब कुछ जिसके अधीन है, मैं भी उसीके अधीन हूँ। यह केवल विश्वास नहीं है, सत्य है, बोध है, अनुभव है। मैं शरणागत नहीं, स्वतंत्र हूँ- यह असत्य है, भ्रम है, कल्पनामात्र है। आप अपनी शरणागति को पहचानिये, उसका अनुभव कीजिये। आप पहले से ही शरणागत हैं। प्रभु के हाथों के खिलौना हैं। वह यंत्री है। आप यंत्र हैं।

उमा दारु जोषित की नाईं। सबहीं नचावत राम गुसाईं। ।

आपके जीवन-क्रम में अध्ययन है। अधिवक्ता का काम है। साथ ही परिवार भी है। कर्त्तव्य-पालन भी भगवान् के भजन का ही एक अंग है। आप अपने जीवन को व्यवस्थित कीजिये। जो लोग विधि-विधान को नहीं जानते, उनकी बात सुनने-समझने और परामर्श देने के लिए एक निश्चित समय रखिये। न्यायालय में उन्हें ठीक-ठीक न्याय मिल सके,इसके लिए प्रयत्न कीजिये। कोई अज्ञान के कारण न्याय से वञ्चित न रह जाये। यह प्रभु के सद्भाव व चिद्भाव की सेवा है।

शेष भगवत्कृपा !

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