विरूपाक्ष-पञ्चाशिका=5

यह प्रश्न उठता है कि केवल अस्मिता अर्थात् अहम्-भाव और इच्छामात्र से ही हाथों से ताली नहीं बजायी जाती। उसमें तो बिन्दु, प्राणादि की चेष्टा भी सामग्री के रूप में विद्यमान है। पर्वत-सञ्चालन में क्या चेष्टा है ? इसका उत्तर यों समझिये। तुम्हारी अहंता बिन्दु, प्राण, शक्ति, मन, इंद्रियमण्डल और शरीर में प्रवेश करके सबको चेष्टायुक्त बना रही है। सम्पूर्ण विश्व को तुम्हीं चेष्टवान् बना रहे हो। ज्ञाता और ज्ञेय की विशेष प्रतीति का उदय होने के कारण स्वरस- वाहिनी दृश्यमान, सामान्य, सूक्ष्म अहम् प्रतीति को ही बिन्दु कहते हैं। जो अभिमान-अध्यवसाय आदि रूप अंतःकरण को धारण करता है, वह प्राण है। बुद्धि और अहंकार शक्ति है। आत्म-चैतन्य अपने किंचित् स्पर्श की महिमा से इन सबको स्पन्दित चेष्टित करता है। इस आत्म-चैतन्य को अहम् रूप से सर्वत्र धारण करो। जिस दृढ़ता से शरीर में, उसी दृढ़ता से सर्वत्र। सम्पूर्ण विश्व तुम्हारा शरीर है। सारी सिद्धियाँ तुममें नित्यसिद्ध रूप से निवास करती हैं।

अब प्रश्न यह है कि यह जो अहंता है, भावना मात्र से ही इसका विकास सम्पन्न होता है। इसमें ईश्वरत्व, कर्तृत्व आदि का स्वभावसिद्ध धर्मोत्कर्ष नहीं है। अतः ऐसी सिद्धि कैसे सम्भव है ?आपका प्रश्न ठीक है। इसका उत्तर यह है कि यह जो विश्व में अहंता की प्रत्यभिज्ञा होती है,वही ईश्वरता, कर्तृत्व, स्वातन्त्र्य और चिन्मयता है। शास्त्रों में जो ऐश्वर्य या सिद्धियों का वर्णन है, वह अहंतामय ही है। अतः ईश्वर आदि शब्द पर्यायवाची हैं। अहंता में ईश्वरत्व आदि के अनुभव पर अनास्था मत करो। जैसे-जैसे प्रत्यभिज्ञा दृढ़ होती है वैसे ही वैसे नित्यसिद्ध ईश्वरत्व, कर्तृत्व आदि सिद्धियों का आविर्भाव होता है।

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