विरूपाक्ष-पञ्चाशिका=4

अच्छा ! ऐसा है। तब तो सभी विश्व शरीर हैं। किन्तु ऐसा अनुभव में नहीं आता। क्यों ?इस पिण्ड शरीर में ही अहंता परिनिष्ठित हो गयी है। यह प्रत्यक्ष-सिद्ध है। ऐसी स्थिति में देह की अहंता को अन्यथा कैसे किया जा सकता है ? इसका उत्तर सुनिये। यह लोक सिद्ध अनुभव है कि मनुष्य जब मरने लगता है तब मालूम पड़ता है कि उसके प्राण कण्ठ में आकर अटक गये हैं। पूरे शरीर का प्राण कण्ठगत कैसे हो गया ? इसीको जीवन्मृत कहते हैं। ठीक इसी प्रकार यह सम्पूर्ण विश्व अपना शरीर है – शिव से लेकर पृथिवी तक। अपने स्वरुप का विमर्श न करने के कारण सम्पूर्ण विश्व में रहते हुये भी मानों उसके एक भाग, एक शरीर में अपनी अहंता संकुचित हो गयी है। शरीर है सम्पूर्ण विश्व किन्तु एक देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि में अपना अहंता, अस्मितारूढ़= परिपक्व हो गयी है। सचमुच यही दशा है,जीवन्मृत के समान। इस बात को हम काटते नहीं, परन्तु इसके कारण पर विचार करने से ज्ञात होता है, अपने स्वरुप का विमर्श न करना अर्थात् माया ही इसका कारण है। विमर्श प्राप्त हो जाने पर आत्मा विश्व-शरीर शिव ही है।

देखो- तुम अपने को समझते हो ज्ञाता। देह में मैं पना करके बैठे हो। तुम स्वच्छन्दता से, स्वेच्छा से, अपने दोनों हाथों से ताली बजा सकते हो। सचमुच !तुम एक शरीर में मैं करके इन्द्र बनकर बैठे हो। मैं चैतन्यात्मा हूँ। सम्पूर्ण जगत् मेरा शरीर है। जैसे तुम अपने दोनों हाथ परस्पर टकरा सकते हो, वैसे मैं दोनों पहाड़ों की टक्कर करा सकता हूँ। हाथों से ताली बजाने का कारण क्या है ? देह में दृढ़ता से अहम् भाव और इच्छा, और कोई कारण नहीं है। मेरा सम्पूर्ण विश्व में दृढ़ अहम् भाव और इच्छा है। विश्व में मेरा अभिनिवेश है, यही कारण है कि मैं दो पर्वतों को परस्पर लड़ा सकता हूँ। तुमको यह अनैश्वर्य कहाँ से प्राप्त हुआ ? जगत् में अहम् का अभिनिवेश शिथिल होने से। ईश्वर अनीश्वर की भाँति हो गया। अपनी ईश्वर-भावना को दृढ़ करो। तुम्हारा नित्य सिद्ध ऐश्वर्य प्रकट हो जायेगा।

(क्रमशः)

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