विरूपाक्ष-पञ्चाशिका=3

इस प्रसङ्ग में एक विचार उदय होता है। क्या केवल दृश्य होने से ही हम देह को अपना देह मानते हैं? ऐसा तो नहीं है। देह अहम् के रूप में मैं-मैं प्रतीत होता है। यह मांसपिण्ड मैं के रूप में जान पड़ता है। और विश्व इदम्, यह के रूप में जान पड़ता है। ‘मैं’ और ‘यह’ का भेद होने से देह और विश्व अलग-अलग हैं, एक नहीं। इस प्रश्न का उत्तर आगे दिया जाता है।

यह आत्मचैतन्य घर, खेत, धन-धान्य के कारण समझता है कि मैं संपन्न हूँ। शरीर दुबला हो तो मान बैठता है कि मैं कृश हूँ। मेरी आँखों में आँसू हैं, शरीर में रोमाञ्च है, मैं बड़ा प्रेमी हूँ। अंतःकरण सुखाकार होता है और यह मानता है कि मैं सुखी हूँ। वायु शरीर के भीतर आती-जाती है और यह मानता है कि मैं प्राणी हूँ। सुषुप्ति की माया, मैं शून्य हूँ, इस अनुभव का कारण बन जाती है- इन अवस्थाओं में अस्मिता=मैंपने का अभिमान अपने ही अनुभव से सिद्ध है। यदि इसी प्रकार, जो देह के बाहर स्थित है, उससे भी मैं पने का अभिमान बनता है तो विश्वरूप विषय भी अपना ही शरीर है क्योंकि शरीर के समान ही वह भी दृश्य है। यदि अहम् का मैं पने का अभिमान न हो तो देह, इन्द्रिय आदि भी शरीर नहीं हैं। अतएव देह मैं है और बाहर की वस्तुएँ यह हैं, ऐसी विषमता का निश्चय करना युक्तियुक्त नहीं है। अपने स्वरुप का विमर्श अथवा अनुसन्धान न करने के कारण ही शरीर और विश्व का भेद मालूम पड़ता है। यह एक धोखा है।

यह जो छः स्थानों में अस्मिता अर्थात् मैं पन देखा जाता है, वह अपने स्वरुप का विमर्श न करके मैं पनेका सम्वेदनमात्र ही है। ये छः हैं- सम्पत्ति, कृशता, स्नेह, आनन्द, जीवन और शून्यता। इनमें मैं पना एक धोखा है। ठीक है, फिर भी इन छहों में तो अस्मिता होती है, सर्वत्र नहीं। इसका उत्तर है- विषय, शरीर, इन्द्रिय, मन, प्राण और निरोध इन सबमें अस्मिता, अहंता किसकी होती है ? चेतन की ही तो । तब केवल परिच्छिन्न विषयों में ही क्यों ? समस्त विषय, शरीर, इन्द्रिय, मन, प्राण और सुषुप्ति, समाधि आदि निरोध दशाएँ अपनी ही अस्मिता के विषय क्यों नहीं ? इसका अभिप्राय है कि जैसे हम एक शरीर को अपना शरीर मानते हैं, वैसे ही सम्पूर्ण विश्व को अपना शरीर मानना चाहिए। शिव से लेकर पृथिवी पर्यन्त अपना ही शरीर है। दृढ़ता से इस नित्य शुद्ध प्रत्यभिज्ञा = पुनः स्मृति का अनुसन्धान करना चाहिए। ग्राहक= ज्ञाता विश्व शरीर नहीं है। जो किसी से अवच्छिन्न होनेवाली चिति नहीं है; वह केवल विशेष विषय को ही अस्मिता का विषय नहीं बना सकती, वह सभी को अपनी अस्मिता का विषय बना सकती है। यदि तुम यह विमर्श करो कि यह आत्मचिति सर्वग नित्य-सिद्ध परिपूर्ण मैं ही है, तो इसकी दृढ़ता हो जाने पर सम्पूर्ण विश्व अपने शरीर के रूप में जान पड़ेगा। पहले भी ऐसा ही था। अब पुनः प्रत्यभिज्ञा हो जायेगी।

(क्रमशः)

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