विरूपाक्ष-पञ्चाशिका=2

पहला प्रश्न यह है कि इस शरीर से कोई पृथक् तत्त्व है ? इस पर विरूपाक्ष जी का यह उत्तर है – शून्य से लेकर पृथिवी पर्यन्त जो कुछ मालूम पड़ रहा है वह आत्मचैतन्य का शरीर ही है। बात यह हुई कि मैं ज्ञाता हूँ; मैं ग्रहण करने वाला हूँ- इस अभिमान के कारण देह के बाहर और देह के रूप में भी अन्य जड़ वस्तु की प्रतीति होती है। इस पर थोड़ा ध्यान दीजिये। तुम्हें यह मांसपिण्ड शरीर आत्मा क्यों मालूम पड़ता है ? ज्ञातापने के अभिमान से तुमने अपने आपको परिच्छिन्न मान लिया है। यदि यह विचार किया जाय कि चाहे शरीर हो या उसके बाहर जो कुछ मालूम पड़ता है , वह दृश्य के रूप में एक है। यह देह या बाह्य संसार का भेद आत्मा को परिच्छिन्न नहीं कर सकता। देहावच्छिन्न और विश्वावच्छिन्न चैतन्य एक है। दृश्य होने के कारण शरीर और विश्व एक हैं। अतः यह शरीर ही मेरा शरीर नहीं है, सम्पूर्ण विश्व मेरा शरीर है। विश्व ही शरीर है- यह प्रतिज्ञा है। दृश्यता हेतु है। अतएव विश्व का शरीर होना युक्तिसिद्ध है। जैसे मनुष्य कभी नीला-पीला आदि रूप देखना चाहता है; तो उस समय वह केवल उसी-उसी रूप का ज्ञाता हो जाता है। परन्तु ज्ञाता की यह परिच्छिन्नता नीले-पीले रूप की उपाधि से है, स्वयं नहीं है। जब यह सभी वस्तुओं को सामान्य रूप से अनुसन्धान का विषय बनाता है, तब इसका प्रकाश अवच्छेद रहित, अपरिच्छिन्न होता है। जो देश-कालादि का प्रकाशक है, वह उनसे परिच्छिन्न हो ही नहीं सकता। तब समस्त विश्व दृश्य होता है और वही अपना शरीर होता है। यदि सम्पूर्ण विश्व दृश्यरूप से अपना शरीर न हो तो यह मांसपिण्ड भी अपना शरीर नहीं हो सकता क्योंकि दोनों की स्थिति एक ही है। अतएव जब मैं कुछ विषयों का ज्ञाता हूँ, यह परिच्छिन्न अभिमान गल जाता है, तब यह सम्पूर्ण विश्व ही आत्म चैतन्य का शरीर है, ऐसा अनुभव होने लगता है। देहाभिमान ही पूर्णता की अनुभूति में प्रतिबन्ध है।

(क्रमशः)

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