पत्रोत्तर

परम प्रेमास्पद

नारायण, नारायण, नारायण

1.

किश्ती खुदा पर छोड़ दो – यह ठीक है। परन्तु सचमुच खुदा पर छूट गयी क्या ? उसका प्रमाण है लंगर को तोड़ दो। अगर लंगर अपने पास रखकर किश्ती धारा में छोड़ी जाती है, तो इसका अर्थ है कि हम अपने अनुसार किश्ती को चलाना या छोड़ना चाहते हैं। क्या हम खुदा या नाखुदा से भी अपने मन के अनुसार करवाना नहीं चाहते ? तब किश्ती छूटी कहाँ ? लंगर की पकड़ टूटी कहाँ ? जरा मन-ही-मन सोचो – मैं तो गिरधर हाथ बिकानी, होनी होय सो होय।

2.

सेवा क्या है ? अपनी बाहरी और भीतरी योग्यताओं को सामनेवाले के हित में लगाना। मुस्काना भी सेवा है, प्रेम से देखना भी सेवा है। ऑपरेशन करना भी सेवा है। बच्चे के हाथ में-से चाकू छीन लेना भी सेवा है। सामनेवाला माँगे तो सेवा करना असली सेवा नहीं है। वह भिखारी हो जाये और हम दाता बनें। यह क्या सेवा है ? सेवा करना अपने दिल की माँग है। पराई आवश्यकता नहीं। जब सेवा किये बिना मन में कुछ कचोटे;अपने को मन में कुछ कमी महसूस हो, सेवा किये बिना अपने को संतोष न हो तब सेवा होती है। सेवा करने में अपने को सुख होता है। जो सेवा का जन्मस्थान है, वही सुख छलकने का जन्मस्थान है। सेवा प्रेम से निकले; तन्मयता के साथ रहे। सेवा के बाद अभिमान पैदा न हो। हमारी सेवा कितनी कम है। काश ! मैं कुछ और कर पाता। सेवा बढ़ती हुई गंगा है, घटती हुई नहर नहीं। सेवा में शान्ति है, थकान नहीं। आनन्द है, ग्लानि नहीं। प्रेम उद्गम है, सेवा धर्म है। यह झरना आगे बढ़कर सूखता नहीं, गहरा और गंभीर होता जाता है।

शेष भगवत्कृपा

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