पत्रोत्तर

परम प्रेमास्पद

सप्रेम श्रीकृष्णस्मरण

शरणागति धर्म बहुत कठिन है। जिसको संसार की वस्तु का सहारा न हो और किसी दूसरे से किसी प्रकार की आशा-आकांक्षा न हो वह शरणागत होता है। अकिंचन और अनन्यगति होना शरणागत की पात्रता है।

शरणागति आत्मबोध है। पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, दिशा-काल, चन्द्र-सूर्य आदि जिसके द्वारा नियंत्रित हैं, वही हमारे इस जीवन का भी नियन्ता है। सब कुछ जिसके अधीन है, मैं भी उसी के अधीन हूँ। यह केवल विश्वास नहीं है, सत्य है, बोध है, अनुभव है। मैं शरणागत नहीं, स्वतंत्र हूँ- यह असत्य है, भ्रम है, कल्पना मात्र है। आप अपनी शरणागति को पहचानिये, उसका अनुभव कीजिये। आप पहले से ही शरणागत हैं। प्रभु के हाथों के खिलौना हैं। वह यंत्री हैं। आप यंत्र हैं।

आपके जीवन-क्रम में अध्ययन है। अधिवक्ता का काम है। साथ ही परिवार भी है। कर्त्तव्य-पालन भी भगवान् के भजन का ही एक अंग है। आप अपने जीवन को व्यवस्थित कीजिये। जो लोग विधि-विधान को नहीं जानते, उनकी बात सुनने-समझने और परामर्श देने के लिए एक निश्चित समय रखिये। न्यायालय में उन्हें ठीक-ठीक न्याय मिल सके,इसके लिए प्रयत्न कीजिये। कोई अज्ञान के कारण न्याय से वञ्चित न रह जाये यह प्रभु के सद्भाव व चिद्भाव की सेवा है।

आपको प्रभु का दिया हुआ युवा शरीर और तत्सम्बन्धी परिवार प्राप्त है। प्रभु के इस दान की उपेक्षा मत कीजिये। शरीर ठीक रखिये। परिवार का भरण-पोषण कीजिये। सम्बन्धियों के प्रति जो कर्त्तव्य है, उसका उचित निर्वाह कीजिये। अपने सोने-जागने का समय निश्चित कीजिये। जीवन में प्रमाद-आलस्य को स्थान मत दीजिये। युवा अवस्था का सहज धर्म है- उत्साह। उत्साह वीर रस का स्थायी भाव है। इससे शरीर और मन में सुषुप्त शक्तियों का जागरण होता है। सफलता आकाश से नहीं टपकती। वह सेना, सामग्री से भी प्राप्त नहीं होती। भीख माँगने से भी नहीं मिलती। आशावान् होकर दृढ़ता से अपने पथ पर चलते रहिये। पहुँचना सिद्धि नहीं है, चलना ही सिद्धि है। चरैवेति। जीवन में जो मिलता है, वह सपना है। सपने बदलते रहते हैं, जीवन चलता रहता है।

आपके शरीर में रोग की अधिकता है, वह भोजन-पान आदि की अनियमितता के कारण है। मन कहीं, तन कहीं, दोनों में सामञ्जस्य नहीं है। जिसके मन में कर्त्तव्य-पालन के समय भी ग्लानि भर रही हो, वह स्वस्थ कैसे रह सकेगा ? आपका मन जीवन की मुख्य धारा से अलग हो गया है। आप क्यों नहीं अपने जीवन में भगवान् के भजन के लिए घण्टे -दो-घण्टे का एक या दो समय निश्चित कर देते। उतनी देर तक जप-पूजा कीजिये। बाकी समय सामाजिक, पारिवारिक और शारीरिक कर्म कीजिये। निरन्तर भजन करने की जिद्द अज्ञानमूलक है। कोई भी व्यष्टि सृष्टि में ऐसा नहीं है जो निरन्तर एक ही वृत्ति रख सके। एक अशक्य अनुष्ठान का संकल्प करके पूरा न होने पर मनुष्य दुःखी होता है।

जब शरीर की स्थिति और मन के भजन में समन्वय नहीं हो पाता तब नाना प्रकार की व्याधि उत्पन्न होते हैं। आपके कष्ट का अधिकांश मानसिक है। क्योंकि भजन छोड़ते ही आपका आधा कष्ट दूर हो जाता है। मानसिक कष्ट अधिक दिनों तक रहने पर शारीरिक बन जाता है। आप अपनी जीवनचर्या की एक समय-सारिणी बनाइये। उसमें घण्टे या दो घण्टे से अधिक नामस्मरण के लिए मत रखिये। शुद्ध आहार-विहार कीजिये। वह अधिक या न्यून नहीं होना चाहिए। नियमित होना चाहिए। प्रातःकाल ही एक कार्यक्रम बना लीजिये कि आज दिन में इतने काम करने हैं। रोग के चार कारण हैं। मन के अनुकूल परिस्थिति न बनना; बार-बार विपरीत परिस्थितियों का आना; अधिक श्रम करना; और शरीर में धातुओं का विषम हो जाना। आप निश्चय कर लीजिये कि समाज का, परिवार का, शरीर का ठीक-ठीक व्यवहार निर्वाह करना मुख्य है और बीच में या आदि-अन्त में भगवान् का स्मरण कर लेना आवश्यक है। बैटरी में बिजली भर लेने के बराबर मन को भगवान् के साथ जोड़ना आवश्यक है। यदि एक क्षण भी ठीक-ठीक मन की कड़ी भगवान् के साथ जुड़ जाये तो सारा दिन आनन्दमय हो जाता है। आप निराश न हों, उदास न हों। अपने जीवन को कर्त्तव्य-पथपर अग्रसर करें और अपने प्रत्येक कर्म के द्वारा सर्वात्मा प्रभु की आरधना करें।

शेष भगवत्कृपा !

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