पत्रोत्तर

परम प्रिय

आनन्द में मस्त रहा करो।

अलमस्त फकीरा रहम अल्ला। अल्ला की रहम से फकीर अलमस्त हो गया है। सचमुच गुरु, दीक्षा के साथ ही शिष्य के हृदयदेश में प्रवेश करता है। यदि हृदय में पहले से कोई रह रहा हो या बहुत कुछ रह रहा हो, तो उनका असर खत्म करने में या उन्हें बाहर निकालने में देर लगती है। रोग प्रबल हो तो पहले इंजेक्शन से कोई फायदा दीखने में नहीं आता। वैसे कुछ-न-कुछ फायदा तो होता ही है। जब गुरु रोम-रोम में प्रवेश कर जाता है, तब मौत का डर, मूर्खता और दुःख भाग जाते हैं। गुरु जब अपने आत्मा से एक हो जाते हैं तब वही मन्त्र परमेश्वर के प्रेम के रूप में प्रकट होता है। जो भीतर प्यारा लगता है उसको बाहर देखने का भी मन होता है। जिससे हृदय में प्रेम है,उसको बाहर भी देखना चाहते हैं। ठाकुरजी की एक मूर्ति मंदिर में अचल बैठी रहती है, दूसरी उत्सव-मूर्ति रथ पर बैठाकर बाहर घुमाई जाती है। क्यों ठीक है न ? जो भीतर अच्छा लगता है, वह बाहर भी मिलता रहे, तो कितना अच्छा है ? क्या आँख बन्द करने पर दोस्त दीखे और खोलने पर दुश्मन, तो अच्छा लगेगा? सेवा तो प्रेम का अनुभाव है। प्रेम अन्तरङ्ग है, सेवा उसका जाहिर रूप है। सेवा के बिना प्रेम कैदी है। प्रेम के बिना सेवा केवल बटन दबाकर मिलनेवाली मिठाई है।

शेष भगवत्कृपा

new sg

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