श्रीवृन्दावन-2

वृन्दा माने श्री राधा। उनका वन-वृन्दावन ! वृन्दावन श्रीराधारानी का व्यक्तिगत उद्यान है ! वह चिन्मय है ! जड़ तत्त्वों से बना हुआ नहीं है ! उसमें काल की दाल नहीं गलती। अनादि-अनन्त है ! आवश्यकता के अनुसार स्थान का संकोच-विस्तार प्रकट होता है। उसमें लौकिक देश का प्रवेश नहीं है ! वहाँ स्त्री जाति का जो कुछ है – वह सब राधा है ! वहाँ पुरुष जाति का जो कुछ है, वह कृष्ण है। लता-वृक्ष, पशु-पक्षी, कण-कण राधा कृष्ण स्वरुप हैं। एक प्यास है दूसरी तृप्ति। एक तृप्ति है – दूसरी प्यास। प्यास और तृप्ति के तरंगों का नाम ही वन है ! यह रस का वन है। ब्रह्म वन है ! रसिक संत इसी में निवास करते हैं ! वेदों में वन के नाम से ब्रह्म का वर्णन है ! उपनिषदों में ब्रह्म को ही वन कहा गया है। वन अर्थात् अनेकता में एकता ! सबमें वही सच्चिदानन्द भरपूर है, नाम, रूप चाहे कुछ भी क्यों ना हो। भू देवी का प्रेमोल्लास, हास-विलास, हार्द-विकास वृन्दावन है।

यह वृन्दावन स्थूल, सूक्ष्म और कारण की कल्पना से युक्त है ! व्रज सत् है ! लता-वृक्ष, पशु-पक्षी, ग्वाल-बाल चित् हैं ! गोप-गोपी,सखा-सखी आनन्द हैं ! श्री राधा-कृष्ण परमानन्द- रस सर्वस्व-सार हैं। भू-देवी का विलास होने के कारण ही रस के घनीभाव में तारतम्य होता है ! वन, कुञ्ज, निकुञ्ज ! निकुञ्ज में भी लीला-निकुञ्ज, नित्य-निकुञ्ज, निभृत-निकुञ्ज, निभृत-निकुञ्ज में सखा सखी किसी का प्रवेश नहीं है। वहाँ केवल आह्लाद आह्लादिनी युग्म की रसमयी क्रीड़ा है, मुस्कान है, चितवन है, परस्पर स्पर्श है। वहाँ न मान है, न भ्रम है, न विरह है ! पस्पर मिलन की तीव्र लालसा एक को दूसरे का रूप बना देती है। राधा कृष्ण से मिलने के लिए राधा हैं। कृष्ण राधा से मिलने के लिए कृष्ण हैं। दोनों लालसा रूप हैं ! परस्पर बदलते हैं। परस्पर नवीन मिलन होता है ! नया रस, नयी पहचान। नया मिलन। नये -नये राधा-कृष्ण। भेद है प्रेम का विलास, प्रेम का उल्लास ! दोनों ही प्रेम के द्वारा संचालित होते हैं। सबके नियन्ता को भी प्रेम-नियंत्रित करता है ! वैकुण्ठ लक्ष्मी का विलास है ! वहाँ ऐश्वर्य की प्रधानता है ! वृन्दावन भू-देवी का विलास है, यहाँ माधुर्य की प्रधानता है !श्री और भू दोनों ही राधारानी के अङ्ग हैं, अङ्गी राधा हैं। कृष्ण अङ्ग हैं- राधा अङ्गी हैं ! राधा अङ्ग हैं कृष्ण अङ्गी हैं ! विलास के लिए नाम दो हैं, वस्तु एक ही है।

सत् एक है, आकार दो हैं ! जैसे स्वर्ण और आभूषण ! चित् एक है, वृत्तियाँ दो हैं ! जैसे नेत्रेन्द्रिय एक गोलक दो ! आनन्द एक है, रस तरङ्ग दो हैं ! श्रीराधा-कृष्ण में कोई विभाजक रेखा नहीं है ! जहाँ दो होते हैं वहीं मिलन में देरी, दूरी या दूसरापन होता है ! एक में इनकी गति नहीं है। विपरीत ज्ञान भ्रम है, दूसरे से विरह है ! अपनेपन में मान है। रस-लीला में ये तीनों ही विवर्त हैं, वास्तविक नहीं। अतएव नित्य-निभृत-निकुञ्ज में इन भावों का प्रवेश नहीं है। ये लीला के बहिरंग भाव हैं, अंतरंग नहीं ! “एक स्वरुप सदा द्वै नाम, आनन्द की आह्लादिनी श्यामा, आह्लादिनी के आनन्द श्याम।” यहाँ आराधिका, आराधना एवं आराध्य का विभाग नहीं है। वे न द्वैत हैं, न त्रैत हैं ! न एकत्व है, न बहुत्व है !सच्चिदानंद वाग्वृत्ति, क्रियावृत्ति, अथवा भोगवृत्ति में आरूढ़ नहीं है ! स्पन्द एवं निःस्पन्द दोनों हित हैं, प्रेम-रस बोध है।

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