श्रीवृन्दावन -1

वृन्दावन शब्द का अर्थ है – तुलसी का वन। तुलसी प्रेम की देवी है। उसे भगवान् ने आत्मीयरूप से स्वीकार किया है। उसे सर्वदा अपने सिर पर धारण करते हैं !आपने देखा होगा – शालग्राम पर तुलसीदल। बिना तुलसी के भगवान् को भोग नहीं लगता। तुलसी का भगवान् से प्रेम है। वह उनके स्पर्श के बिना नहीं रहती। भगवान् का तुलसी से प्रेम है, वे उसके बिना भोजन नहीं करते ! वृन्दावन अर्थात् परस्पर-समरस प्रेम का स्थान।

वृन्दावन : वृन्दा तुलसी के समान छोटे-छोटे पौधों का वन। बड़े-बड़े और पुराने वृक्षों के वन में हिंसक पशु निवास करते हैं। शेर, चीता, सांप अजगर- परन्तु वृन्दावन में हिंसक पशुओं का निवास नहीं है !भागवत शास्त्र के अनुसार वहाँ नैसर्गिक मित्रता का विलास है ! इसलिए वह भजन करने का पावन धाम है ! वैर, विरोध के स्थान में भजन नहीं होता। वहाँ शत्रु-मित्र चिन्तन होने लगता है ! वन शब्द का प्रकृतिगत अर्थ है- सम्यक् भक्ति ! संसार को अलग रखकर भगवत्प्रेम का रसास्वादन करना। सचमुच वृन्दावन ऐसा ही वन है :

वृन्दा श्रीराधारानी की एक सखी का नाम है ! सखी-शब्द का अर्थ है – जिसकी ख्याति समान हो !जहाँ वृन्दा वहाँ राधा – जहाँ राधा वहाँ वृन्दा ! जिस वन की व्यवस्था पर स्वामिनी वृन्दा हो – उसका नाम वृन्दावन ! वृन्दा सखी राधा-माधव की लीला सेवा के लिए सामग्री का सम्पादन करती है। शयन के समय शीतलता, मिलने के समय सायं काल, वियोग-लीला के समय प्रातः काल। स्नान के समय पद्यपरागमण्डित सरोवर, शयन के समय पुष्पों की सुख-शय्या, रास के समय कोमल-भूमिका विस्तार, सुगन्ध, माधुर्य, सुख-स्पर्श वायु, चन्द्रिका-चर्चित-आह्लाद-दायक प्रकाश, कोयल की कूक, पपीहा की पी-कहाँ, वस्त्र,अङ्ग-राग, वाद्य-संगीत- सबकी व्यवस्था वृंदा सखी करती है ! लीला में किसी वस्तु की न्यूनता न हो, इसलिए लीला की समग्रता सम्पादन करना इनका काम है! इनकी आज्ञा के बिना वृन्दावन में कोई प्रवेश नहीं कर सकता। वृन्दा का वन ही वृन्दावन है

(क्रमशः)

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