भगवान् की गोद-5

     यदि ऐसी भावना जो कि वास्तविक और उनके अङ्क तथा सान्निध्य का अनुभव करने की है, न चले तो भागवत अर्थात् भगवान् के भक्तों का ही अङ्क सामीप्य प्राप्त हो। सर्वात्मना विषयी पुरुषों का सङ्ग त्याग कर इन्हीं का सङ्ग किया जाय। ये तो भगवान् के मूर्तिमान्विग्रह ही हैं। इनका सङ्ग दुर्लभ अगम्य और अमोघ है। ये मृत्यु में संसार-सागर से परे पहुँचाकर अवश्य-अवश्य प्रभु की आनन्दमयी गोदी में बैठा देंगे।

     परन्तु समय के प्रभाव से या हमारे दुर्भाग्य अथवा बहिर्मुखता से संतों का मिलना, उनका पहिचाना जाना भी इस समय असम्भव-सा है। वे ही कृपा करके हमारे सन्मुख अपनेको प्रकट करें तो सम्भव है,हम कल्याणमय प्रभु को पाने का तत्परता से यत्न करने में लग जायें अन्यथा अपनी दुष्टता के फलस्वरूप हम उन विषयों में भी मृत्युमय संसार में बद्ध होने की ही उत्तेजना प्राप्त करेंगे।

     इसलिए आजकल श्रीमद्भागवताङ्ककी अर्थात् भगवान् के साक्षात् श्रीविग्रह भागवत-महापुराण की शरण ही एकमात्र हम जीवों के कल्याण के लिए स्वर्ण-सोपान रह गयी है। इस युग में यही भगवान् की साकार मूर्ति है। सब धर्मों के प्रतिष्ठा स्वरुप होने के कारण और धर्मों का परित्याग करके अन्य धर्मों की अपेक्षा न करके एक मात्र इसी का आश्रय-शरण ग्रहण करनी चाहिए। वेद के, उपनिषद् के सार-तत्त्व अमृतत्व की, ब्रह्मसूत्र के वास्तविक तात्पर्य की, गायत्री और प्रणव के लक्ष्यार्थ की, तथा महावाक्यों के द्वारा सङ्कलित वस्तु की सरल अनुभूति इसी भगवद्विग्रह की उपासना से इसी के अङ्क में विश्वास के साथ पड़ जाने से होगी। हम अज्ञानान्ध जीवों के नेत्र पटल खोलने के लिए श्रीप्रभु ने यह विग्रह धारण किया है, इसीलिए श्रीभागवतरूपी भुवनभास्कर के रूप में भगवान् प्रकट हुए हैं। इस युग में इसके श्रवण, कीर्त्तन, स्मरण, पूजन और परिणामतः आत्म-निवेदन से परमानन्द की प्राप्ति होगी। इसी के पावन प्रसाद से शोक-मोहप्रद अज्ञान भस्मसात् होगा। ज्ञान वैराग्य की प्रतिष्ठा होगी। इसी के बल पर देवर्षि नारदने जो कि भक्ति-मार्ग के आचार्य हैं, घोर प्रतिज्ञा की है कि घर-घर में, व्यक्ति-व्यक्ति में भक्ति की प्रतिष्ठा करूँगा श्रीभागवत भगवान् दया करके हमें अपने अङ्क में शरण दें कि यह जीवन उन्हीं के पद-पद्मसुधारस का आस्वादन करते हुए व्यतीत हो। 

श्रीमद्भागवतानन्दसुधाब्धौ रमतां सताम्।

पादारविन्द विन्दूद-प्लावितः स्यां भवे भवे।।  

 

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