भगवान् की गोद-4

     हमारे सिर पर मृत्यु का उद्दण्ड तांडव नृत्य हो रहा है, प्रतिपल उस प्रभु को कालरूप में ही अनुभव करने के लिए हम आगे बढ़ रहे हैं, तो अपने नियमानुसार उसे भी मृत्युरूप में ही हमारे सन्मुख आना ही चाहिए। वही प्रभु हमारे अन्तरतल में पुरुषरूप से ,आत्मरूप से अमृतत्व की धारा बहा रहा है, बाहर कालरूप से मृत्यु के आवागमन के कराल गतिचक्र में डालकर पीस रहा है। कारण यह है कि उसने रमणके, विहारके, क्रीड़ा के उद्देश्य से ही अपने बहुत रूप किये हुए हैं। प्रत्येक अंतःकरण से भिन्न-भिन्न रूप में एक अखण्डानन्दका पृथक्-पृथक् आस्वादन करनेके लिए ही बिखरे हुए अणुओं को प्रेमसे, आकर्षणसे, चुम्बनसे पिण्डीभूत करके स्वयं ही उन-उन रूपों में अपने परमानन्द का आस्वादन कर रहा है। जहाँ आनन्द की ओर दृष्टि नहीं है, कालरूपसे, मृत्युरूपसे, उन्हें आत्मसाक्षात् करना भी उसका ही अनुग्रह है। परन्तु अपना वास्तविक स्वरुप, स्वभाव, अमृत और आनन्द होने के कारण हम उसे अनुग्रह के रूप में ग्रहण करना नहीं चाहते।

     विकर्षण यह कि हमारी ही भूल से, अज्ञान से प्रभु की आनन्दमयी किरणों का प्रकाश हमारे अनुभव में नहीं आ रहा है।  हम अमृत सिंधु में आनन्द की अनन्त धारा में निवास करते हुए भी प्यास के कारण, अतृप्ति के कारण व्याकुल हो रहे हैं, छटपटा रहे हैं। परम प्रकाश को भी अन्धकार समझकर हम इधर-उधर टटोल रहे हैं। हम अपने गले में ही स्थित हार को भूलकर कस्तूरी मृगकी तरह इधर-उधर भयानकता में भ्रमण कर रहे हैं अपने ही स्वरुप अंतःस्थिर प्रभु = वास्तविक स्व को छोड़कर अन्यत्र ढूंढने को दौड़ लगा रहे हैं।

     इन सब अनर्थों का एकमात्र भेषज है ‘श्रीमद्भागवताङ्क ‘ जिसकी अनुभूति से, संगसे, सेवासे यह भूल मिटकर प्रभु का चिदानंदमय स्वरुप उपलब्ध हो सकने की आशा की जा सकती है।

     भागवताङ्क का अर्थ है भगवान् की गोद और उनकी सन्निधि ‘अङ्क समीप उत्सङ्गे’। हम प्रतिपल चलते, बैठते, सोते उसी का अनुभव करें। चलते समय हमारी भावना हो प्रभु के अनन्त आनन्द पारावार की एक सुधामयी तरङ्ग हैं। बैठने के समय हमें ऐसा मालूम पड़ता रहे कि अखण्ड चित्स्वरूप प्रकाश के धागे में पिरोये हुए हम एक मणि हैं। सोने के समय हमारे अंतस्थल की वृत्तियाँ उसी अपार चिदानन्दमय प्रभु में ही डूब जायें। विषयों की प्रतीति और उनके द्वारा प्राप्त यत्किञ्चित् सुख में भी हम अन्तरानन्द से ही तृप्त हो रहे हैं, यह भावना-उपासना, प्रभु की सच्ची आराधना चलती रहे।  

(क्रमशः)

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