भगवान् की गोद-2

     हम तो त्रिगुण की लीलाभूमि हो रहे हैं, अनिमेष दृष्टि से उन्हीं को देख रहे हैं, सोच रहे हैं। उन्हीं में सने हुए हैं और वही हो गये हैं। गुण तज्जन्य त्रिविध शरीर और अवस्थाओं को भोगते हुए तद्रूप=तादात्म्यापन्न होते हुए हम अपने वास्तविक ‘स्व’ को, आनन्दघन प्रभु को भूल गये हैं। उसीका यह दुष्परिणाम हुआ है कि हम काल के कराल गति चक्र के खिलौने हो रहे हैं, अहंता-ममता, राग-द्वेष, जन्म-मृत्यु, आधि-व्याधि आदि द्वंद्वों के भार से हमारा हृदय मष्तिष्क और शरीर दब रहा है, चकनाचूर हो रहा है। उन्हीं को वास्तविक रमणीय और सुखप्रद समझकर उनकी अवास्तविकता, अरमणीयता तथा दुःखरूपता को न जानकर सर्वान्तःकरण से परमानन्द प्रभु की ही कामना होने पर भी हम उन्हीं गुणों के मृगजल से प्यास बुझा कर तृप्ति प्राप्त करने के मोह में पड़े हुए हैं। जैसे हड्डी चबाने के कारण तालु फूट जाता है,  तब अपने खून का आस्वादन करके कुत्ता अपने को सुखी मान लेता है, वैसे ही विषयों के प्राप्त होने पर एक क्षण के लिए जब कामना शान्त होती है, अभाव दूर हो जाता है, तब वृत्तियों की एकाग्रता से कुछ सुखाभास की उपलब्धि, अनुभूति-सी हो जाती है, क्योंकि वृत्ति लहरियों की शान्ति में मानस-सर में आनन्द-सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ने लगता है- तब हम सुखाभास को विषयों से प्राप्त हुआ मान कर और भी बन्धन में – राग की वंशपरम्परा में पड़ जाते हैं। किन्तु दूसरे ही क्षण में वासना-वायु के झकोरों से मानस क्षुब्ध हो जाता है, वृत्तियों की चंचलता से दृश्य व्याकुल हो जाता है और उन भगवान् सूर्य का प्रतिबिम्ब भी नहीं दीख पड़ता। फिर उसी मोह के हम शिकार हो जाते हैं। उन्हीं की मौज से, इच्छा से, प्रेरणा से यह सब हो रहा है, ऐसा सोच-विचारकर हम संतोष का मार्ग भी निकाल लेते हैं, किन्तु विषय-भोग से संतोष नहीं होता। यह भी उन्हीं की मर्जी पर छोड़ने को जी नहीं चाहता, उसके लिए सरतोड़ परिश्रम करते रहते हैं। कितनी विडंबना है ! बात ऐसी है कि यदि उन्हीं की इच्छा पर छोड़ना है, तो स्वार्थ और परमार्थ दोनों को छोड़ दें, कामना न करें, वाञ्छा  न करें, वे ही सारी व्यवस्था करते हैं, करेंगे, करने दें, अपनी डेढ़ चावल की खिचड़ी अलग न पकायें। पूर्ण आत्मसमर्पण हो, सर्वतोभावेन शरण हो, लोक-परलोक, धर्म-अधर्म  और ज्ञान-अज्ञान सब कुछ उनके चरणों पर निछावर करके सच्ची प्रपन्नता हो। और यदि स्वार्थ के लिए तो अहर्निश प्रयत्न करते रहें, जब परमार्थ का स्मरण हो, चर्चा आवे, तब उनपर छोड़ दें, यह तो घोर प्रमाद है, तामसिकता है, और बहिर्मुखता का परिणाम है।

     वास्तविकता यह है कि जन्म से ही हमें अपने दोष अस्वीकार करके उन्हें दूसरे के सिर मढ़ देने की आदत पड़ गयी है, जिसके कारण हम अपने प्रमाद की ओर दृष्टिपात न करके, उसे दूर न करके, ईश्वर, काल और प्रारब्ध पर मिथ्या दोष लगा कर अपने अनिवार्य कर्तव्य, प्रभु प्राप्ति की चेष्टा, साधन से विमुख रहने की भूल या जी चुराने की चेष्टा करते हैं।  इसका प्रतिकार होना चाहिए। अपनी सारी शक्ति-बल अपने पास जो कुछ है सबका प्रवाह उसी ओर कर देना चाहिए। उनकी अपार करुणा, प्रेम वात्सल्य का रसास्वादन करने के लिए अपने हृदय को सर्वदा उन्मुक्त कर देना चाहिए। 

(क्रमशः)

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