भगवान् और धर्म से बातचीत

     एक दिन मैं एक मन्दिर में गया। पुजारी जी सामने खड़े थे। भगवान् उनके पीछे खड़े थे। मैंने देखा कि भगवान् कुछ उदास हैं। मैंने पूछा : ‘प्रभु ! क्या बात है? चार छः बार आपको भोग लगता है।आरती होती है ?’ भगवान् बोले : ‘देखो स्वामीजी ! इस पुजारी ने हमको मन्दिर में कैद कर रखा है। हमको बाहर नहीं जाने देता। स्वयं हमारी ओर पीठ करके खड़ा है। पैसेवालों की ओर देखता है।’ मैंने पूछा : ‘महाराज !आपके खुश होने की कोई तरकीब है ?’ भगवान् बोले : ‘हाँ ! हमारे खुश होने की एक तरकीब है कि हम सिर्फ मन्दिर में कैद न रहें। हमको बाहर ले चलो और एक-एक आदमी के दिल में हमको देखो। हर पुरुष, स्त्री, पशु-पक्षी तथा हर जड़-चेतन में मुझे देखो।  सच बात यह है कि जब आप मुझे सबमें देखोगे तो मैं प्रसन्न हो जाऊँगा। किसी से द्वेष और किसी के साथ नफरत नहीं करोगे तो मैं प्रसन्न हो जाऊँगा।’

     एक दिन बहुत आग्रह करके भक्तजन हमको यज्ञशाला में ले गये। यज्ञशाला बहुत सुन्दर बनी हुई थी। ऊँची वेदी, सजे-धजे ब्राह्मण ! देवताओं की पूजा और हवन हो रहा था। परन्तु जब मेरी धर्म पर नजर गयी तो उनका शरीर धुएँ से काला पड़ गया था और उनकी आँखों से  आँसू  बह रहे थे। मैंने पूछा :’धर्म जी महाराज ! क्यों रो रहे हैं ? शरीर आपका काला पड़ गया है। आखिर क्यों ? खूब आहूतियाँ पड़ रही हैं और ब्राह्मणों को दक्षिणाएँ मिल रही है।’ धर्म बोले : ‘महाराज, यज्ञशाला में रहते-रहते अब मैं ऊब गया हूँ। अब मैं चाहता हूँ कि लोगों के आफिसों में जाऊँ, मिलों और दुकानों पर जाऊँ गृहस्थों के घरों में घूमूँ। वहाँ का भी थोड़ा आनन्द लूँ। क्योंकि यदि मैं (धर्म) आफिसों,मिलों, दुकानों और घरों में नहीं जाऊँगा तो यज्ञशाला के अन्दर रहनेवाला धर्म मनुष्य का भला कहाँतक कर सकेगा। मनुष्य का भला करने के लिए धर्म यज्ञशाला से निकल कर हमारे घरमें, हमारी दुकान में, हमारी मिलों और दफ्तरों में आना चाहिए। आज हम धर्म इसीलिए करते हैं कि उससे स्वर्ग मिलेगा। लेकिन धर्म यदि इस दृष्टि से हमारा भला करे कि मरने के बाद उससे हमको लाभ होगा तो वह धर्म हमारे आज के जीवन में टिक नहीं सकता। आज हमको वह धर्म चाहिए जो हमारे जीवन की समस्याओं को यहीं हल करें। यदि आज धर्म गरीबी को दूर करने में मददगार नहीं होगा, यदि आज  धर्म पिछड़े लोगों को साथ नहीं मिलायेगा, यदि आज धर्म मूर्ख को पण्डित नहीं बनायेगा, यदि आज धर्म नंगे को कपड़ा और भूखों को अन्न नहीं देगा, यदि आज धर्म हमारे हित की वर्तमान समस्याओं को हल नहीं करेगा तो भले ही आप आज के लोगों को कहो कि ये लोग धर्मभ्रष्ट हो गये हैं। हमारे बच्चे बिगड़ रहे हैं, ‘संस्कृति’ का नाश हो रहा है, तो भी धर्म उन्नति नहीं करेगा। धर्म की उन्नति के लिए आपको उसे यज्ञशाला से बाहर लाना होगा, ताकि वह आज की समस्याओं को हल करे जिन्हें हल करने की उसमें पूरी सामर्थ्य है।  

     यह भगवान् और धर्म के साथ हुआ हमारा संवाद आपको बहुत बड़ा संदेश देता है। हमारा भगवान् अब हमें मंदिरों में दीखना चाहिए और साथ ही हर प्राणी के रूप में भी, ताकि हमको विश्व के हर प्राणी से प्रेम हो जाय :

सिया राममय सब जग जानी। 

करहुँ प्रणाम जोरि जग पानी।।

     केवल धर्म-धर्म की दुहाई से अब काम नहीं चलेगा। अब तो धर्म हमारे जीवन में आना चाहिए। हमारे घरों, दूकानों, दफ्तरों और मिलों में  उसकी स्थापना होनी चाहिए, तभी यह दुराचार, बेईमानी, रिश्वतखोरी, काम-चोरी और एक दूसरे के साथ घृणा का अन्त हो सकेगा।

new sg  

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