श्रम या धर्म

     वस्तु-शिक्षा और धर्मशिक्षा में कुछ अन्तर होता है। पहली, विज्ञान की प्रधानता से होती है और वह यांत्रिक विज्ञान की कसौटी पर निरीक्षण करके प्रत्यक्ष प्रमाणित की जा सकती है। बाह्य वस्तु में परिवर्तन करना या उस पर आधिपत्य प्राप्त करके उसे लोकोपयोगी बनाना विज्ञान का काम है। वह श्रम को सफल करता है और दिशा भी देता है। धर्म का क्षेत्र इससे भिन्न है। वह हृदय में शोधन, परिवर्तन अथवा विशेष का आधान करने के लिए है। धर्म में इतनी सामर्थ्य है कि वह अंतःकरण को निर्वासन बना दे, ईश्वराकार बना दे, समाधि लगा दे अथवा परम सत्य से अभिन्न स्थिति प्राप्त करा दे। श्रम बाह्य-वस्तु प्रधान होता है तो धर्म आन्तर-वस्तुप्रधान। इसलिए धर्म-शिक्षा में केवल बाह्य-वस्तु-विज्ञान, यांत्रिक परीक्षण-निरीक्षण की प्रधानता अथवा प्रबल तर्कयुक्तियों का बल काम नहीं दे सकते; क्योंकि धर्म की रासायनिक परिणति यंत्र के द्वारा नहीं दिखाई जा सकती, कम-से-कम तत्काल। अतः धर्म की शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रारंभ में थोड़ी-सी श्रद्धा की अपेक्षा होती है। श्रद्धा से धर्म-रस की उत्पत्ति होती है। यह रस ही कर्तव्य के प्रति उत्साह, लगन, निष्ठा और लक्ष्य की प्राप्ति में प्रेरणा का उद्गम होता है।

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