चलो- दुःख में – से सुख बनायें ।

     सुख या  दुःख बाहर की कोई परिस्थिति नहीं है, मन की स्थिति है। 

     मन के सम्वेदन में  सुख या दुःख बैठे हैं। वासना की दुर्गन्ध अर्थात् दुःख। 

     निस्पृहता की सौरभ माने सुख। 

     हमारे जीवन में सुख-दुःख दूसरे किसी के हाथ में नहीं, अपने ही हाथ में है। 

    हमारे माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी-पुत्र सुख या दुःख नहीं दे सकते। हमारे मन की वृत्ति ही सुख-दुःख की जननी बनती है।

     किसी लड़की से मैं पूछता हूँ कि, ‘क्या तुम्हें रोटी बनाना आता है।’ तो तुरन्त ‘हाँ’ कहती है, किन्तु मैं जो ऐसे पूछूँ  कि क्या तुम्हें दुखमें-से सुख बनाना आता है ? तो तुरन्त ही शरमा जाती है या मुरझा जाती है। 

     अच्छा भोजन मिले तो आनन्द से पाओ, किन्तु भोजन बिलकुल ही न मिले  तो एकादशी मानकर खुश हो जाओ। 

    एक दिन एक महात्मा ने मुझे बहुत गालियाँ दी !!

     मैं तो बैठा ही रहा। फिर जब वे शान्त हुए तब मैंने गाली देने का कारण पूछा।

     उन्होंने कहा : ‘अरे भाई ! तुझे इस संसार में बहुत ही गालियां खानी पड़ेंगी। उस समय तू घबड़ा न जाय उसकी शिक्षा देने के लिए ही गालियाँ देता हूँ। गालियाँ आनन्द से खाने की आदत पड़ जाय तो अवसर आने पर चित्त कितना प्रसन्न रह सके !’

     इसलिए हम सबको सुख पैदा करने की विद्या सीख लेनी चाहिए।  

     एक समय हम प्रेमपुरी जी महाराज के साथ वर्षा के दिनों में मोटर में जा रहे थे, एक दूसरी मोटर तेजी से पास से निकल गयी, और कीचड़ का फुहारा उड़ाया और हम सबके कपड़े रङ्ग दिये, साथ ही साथ कीचड़ स्वामीजी के मुँह में भी घुस गया।

     प्रसंग तो मोटरवाले के ऊपर गुस्सा आ जाय, ऐसा था, किन्तु प्रेमपुरी जी महाराज खुश हो गये और बोले; ‘वाह ,आज तो मोटर का चरणामृत मिल गया।’

     दुःख को सुख में पलटने की कितनी सुन्दर कला है !

     प्रतिकूलता को अनुकूलता में पलट देने की कला आ जाये तो सदासर्वदा परमानन्द ही परमानन्द रहे।  

new sg

 

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