अपनी प्रियता को पहचानिये तो !

     आपके घर में कुत्ता होगा तो आप जब बाहर से आयेंगे तब तुरन्त ही आपका स्वागत करने के लिए पूँछ हिला-हिलाकर सामने दौड़कर आयेगा और आपको अनोखे प्यार से चाहने लगेगा, चाटने लगेगा। आपकी मिठास और आपकी प्रियता को वह पहचानता है इसलिए ही वह ऐसा करता है। आप अपनी मिठास और प्रियता नहीं पहचानते इसलिए ही आप अपने को चाहते नहीं। 

     मच्छर को, कुत्ते को, मक्खी को, आप में जो स्वाद दिखाई देता है, उसे आप देखेंगे तो आपको भी मस्ती आ जायेगी। 

     आपके भीतर सोयी हुई प्रियता को जगाने के लिए ही ‘हरे राम हरे राम’ आदि भगवान् की धुन है। 

    जैसे किसी बालक को मिठाई दी जाय, जो उसको बहुत ही पसन्द आये, और जिसके खतम होने पर वह उसी मिठाई की रट लगाता रहे, जैसे कोई प्यासा रेगिस्तान में खो जाये और निरन्तर ‘पानी-पानी’ ही करता रहे।

     उसी रीति से, नाम-जप भी हृदय के रस को व्यक्त करने की अनोखी प्रक्रिया है। हृदय के रस को बाहर निकाल कर हड्डी,मांस और चाम में भर देती है।

    और, ऐसा मनुष्य जिसको देखता है, जिसको स्पर्श करता है, जिसको बुलाता है, उसके जीवन में आनन्द बरसने लगता है।

     जैसे कई लोग आटा लेकर चींटियों के बिलों में डालते हैं और श्रीमान् लोग रुपयों को गरीबों में बाँटते हैं वैसे ही आप भी अपने भीतर के आनन्द के खजाने को सर्वत्र बाँटने के लिए तत्पर रहिये।  

new sg

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