तमसो मा ज्योतिर्गमय

  • सत्य सर्वदा सरल होता है। उसमें दावपेंच नहीं होते। चेष्टा सत्य की प्राप्ति के लिए नहीं, असत्य के त्याग के लिए करनी चाहिए।
  • धर्म क्रिया प्रधान है इसलिए उसके लिए स्थूल शरीर की अपेक्षा है। धर्म अधर्म का निवर्तक है।

           उपासना भाव प्रधान है, इष्टाकार-वृत्ति है। इसमें सूक्ष्म शरीर की अपेक्षा है। यह अनेकाकारता को                  निवृत्त करती है। 

           योग निराकार स्थित्यात्मक है। अतः कारण शरीर प्रधान है। यह विकल्प का निवर्तक है।

  • हठयोग में क्रियालम्बन है। मंत्रयोग में शब्दालम्बन है। लययोग में इदंरूप प्रतीकालम्बन और राजयोग में अहंरूपालम्बन है।
  • सेवा में दुःख तब होता है जब वह ज्ञानशून्य हो, विवेकरहित  हो तथा संसार के पदार्थों में राग हो।
  • परमात्मा के साक्षात्कार के लिए ज्ञान अनिवार्य है। परन्तु अंतःकरण की शुद्धि के बिना ज्ञान नहीं हो सकता। अंतःकरण की शुद्धि के लिए सबसे बड़ी औषध भक्तिरूप रसायन है। अंतःकरण शुद्धि के लिए एक आलंबन की आवश्यकता है।
  • भक्ति का संयोग यदि भगवान् के साथ ठीक-ठीक होगा तो पुत्ररूप में ज्ञान का प्रकाश और वैराग्य की निर्मलता एक साथ प्राप्त होंगे। वैराग्य अर्थात्त् चित्त में राग-द्वेषका न होना। अंतःकरण के संकल्परूप मन की शुद्धि भगवान् के स्मरण से होती है। स्मरण से राग-द्वेष दोनों क्षीण होंगे।
  •   अज्ञान के चार विकास हैं –

        (1) स्वरूपज्ञान 

        (2) सत्य को असत्य और असत्य को सत्य समझना। 

        (3) सत्य से राग और असत्य से द्वेष। 

        (4) सत्य में चिपक जाना अर्थात् दुराग्रह। 

  • ज्ञान (विचार) तत्त्व शोधन के लिए प्रयोज्य है और भक्ति जीवन-शोधन के लिए। 
  • कोई भी संसार नहीं चाहता। वह चाहता है शाश्वत सुख। शाश्वत सुख संसार में नहीं है; वह तो ईश्वररूप है। इसलिए सर्वत्र, सर्वदा, सर्वथा और सब में परिपूर्ण सुख का अभिलाषी ईश्वर की ही उपासना करता है। 
  • भक्ति क्या है ? सर्वरूप में विराजमान परमात्मा की सेवा और इसकी पूर्णता है – सर्वत्र भगवद्भाव। 
  • पूतना का अंतःकरण शुद्ध है। वह भगवान् की ओर चलती है। स्तन में विष लगाकर- अपने दोषों को प्रकट करके  भगवान् के पास आती है। परन्तु उसके भीतर है अमृततुल्य दूध। भगवान् उसके दोषों को पचा लेते हैं और दूध पी जाते हैं। उसे माता की गति देते हैं। तात्पर्य यह है कि तुम जैसे हो, वैसे ही भगवान् की ओर चलो, उनसे मिलो। भगवान् भी जैसे हैं, वैसे ही तुमसे मिल जायेंगे। दोषों से डरो मत।
  •  एक महात्मा गये भिक्षा माँगने। बुढ़िया ने नाराज़ होकर घर लीपने-पोतने का पोतना फेंककर मारा। महात्मा उसे उठाकर कुटिया पर ले आये। धो-सुखाकर बत्ती बनायी और भगवान् के लिये दीपक में प्रयुक्त किया। भगवान् की कृपा हुई। बुढ़िया को पोता हुआ। 

           पूतना भी भगवान् को दूध पिलाने के लिए गयी, परन्तु बहार से लपेटा विष। भगवान् ने पोतने की                तरह उस जहर को भी स्वीकार कर लिया। भगवान् की कृपा से पूतना को मातृत्व मिला। महात्मा और             भगवान् की इस महिमा को स्वीकार कर उनकी ओर चलो। 

 

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