उलूखल बन्धन लीला-31

     श्रीवीरराघवाचार्य का भाव है कि भगवत्प्रसाद भक्ति से ही प्राप्त होता है। उसके लिए ब्रह्मा-शंकर या लक्ष्मी होने की आवश्यकता नहीं है, प्रेम-पूर्वक अनुध्यानादि-रूप भक्ति की आवश्यकता है। जब वह गोपी के हृदय में विद्यमान है तब उसे भगवत्प्रसाद अवश्य ही प्राप्त चाहिए। उसी के लिए वे सुख-साध्य हैं। 

    श्री विजयध्वजतीर्थ कहते हैं कि निरन्तर निरतिशय भक्ति ही वह परम सुन्दरी नायिका है जो भगवान् को भी अपनी ओर आकृष्ट करने में परम विदग्ध है। 

    आचार्य वल्लभ ने कहा – भगवान् श्रीकृष्ण ने यहाँ नयी बात क्या दिखलाई ? ऐसा भाव तो पुरातन काल से ही शास्त्रों में प्रसिद्ध है। इसकी मीमांसा कीजिये। जो प्रसाद यशोदा को मिला वह इससे पहले किसी को नहीं मिला। यह महान् भक्तों को ही प्राप्त होता है। भक्तों में भक्ति से और स्वरुप से तीन महान् हैं- ब्रह्मा पुत्र हैं, भक्त हैं, प्रवृत्तिमार्ग के सब धर्मों के प्रवर्तक  हैं और सबके पिता हैं। महादेव पौत्र हैं, निवृत्तिधर्मों के प्रवर्तक हैं, प्रलय के हेतु एवं गुणावतार हैं। भगवान् के लिए ही सब कुछ छोड़ कर तपस्या करते हैं। इन दोनों से अंतरंग हैं लक्ष्मी। वह पत्नी हैं। ब्रह्मानन्द स्वरुप हैं, जगज्जननी हैं। वक्षःस्थल पर निवास प्राप्त होने पर भी चरणसेवा में संलग्न हैं। जब इन्हीं को यह प्रसाद नहीं मिला तो दूसरे को कहाँ-से मिलेगा ? इनमें -से किसी एक को नहीं मिला तथा पूरे समुदाय को नहीं मिला – यह सूचित करने के लिए तीन बार नकार और बहुवचन में ‘लेभिरे’क्रिया का प्रयोग है। इनमें कोई त्रुटि भी नहीं है; क्योंकि तीनों भगवान् के अंगाश्रित हैं। वक्षःस्थल पर लक्ष्मी, नाभि में ब्रह्मा और चरणों में शंकर। यशोदा में ये तीनों विशेषताएँ नहीं हैं। जो प्रसाद मिला वह अनिर्वचनीय है। सबको मुक्ति देने वाला अपने को बन्धन में डाल दे, यह क्या कम आश्चर्य है ? यदि यशोदा का दुःख ही दूर करना था तो ज्ञान या कैवल्य देकर उसे दूर कर सकते थे। सचमुच भक्त को भक्ति के बन्धन में डाल देना सबसे बड़ा प्रसाद है।

     ब्रह्मा आदि महान् हैं और यशोदा तो श्रीकृष्ण को ईश्वर के रूप में पहचानती भी नहीं। ऐसी स्थिति में यशोदा के प्रति प्रसादानुग्रह उनके प्रति किये गये प्रसादानुग्रह से बड़ा कैसे हो सकता है ? ध्यान दीजिये, यहाँ बन्धनमात्र विवक्षित नहीं है।किन्तु वश्यता,भक्तवश्यता विवक्षित है।वह किसी और को नहीं मिलती। देहाभिमानी कर्मी और निरभिमान मुक्तज्ञानी दोनों के लिए यह भगवान् सुखलभ्य नहीं हैं। एक में देहाभिमान दोष है तो दूसरे में भगवान् के प्रति भी निरपेक्षता। क्या पार जाने मात्र से ही महाराज की प्राप्ति हो जाती है। विशेषता यह है कि भक्तों को इसी लोक में मिल जाते हैं; क्योंकि वे गोपी के पुत्र हो गये हैं। इसका अभिप्राय ही यह है कि लोग इसी लोक में, इसी अवतार में भक्ति करें।

(क्रमशः)

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