उलूखल बन्धन लीला-30

     करोड़ कल्प में भी भगवत्स्वरूप बन्धन की संभावना से युक्त नहीं हो सकता परन्तु भक्त के संकल्प और अल्पप्रयत्न से ही बन्ध गये। यह लीला वस्तुतः भक्तों का हृदय अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए ही है और क्या कहूँ, भगवान् भक्त के वश में।

     श्रीधर स्वामी ने अवतरणिका में कहा है कि भगवत्प्रसाद तो दूसरे भक्तों को भी प्राप्त होता है परन्तु यशोदा माता को जो कुछ मिला वह अत्यन्त विचित्र है। पुलकित शरीर से शुकदेव जी ने कहा  कि ब्रह्मा पुत्र हैं, शंकर आत्मा हैं और लक्ष्मी पत्नी हैं फिर भी उन्हें यह प्रसाद नहीं मिला। देहाभिमानी तपस्वी और अभिमानरहित ज्ञानियों के लिए भी यह गोपीकानन्दन भगवान् सुलभ नहीं हैं। उन्हें मिलते तो हैं परन्तु भक्तों के लिए सुगम हैं उतने उनके लिए नहीं।

     श्रीजीवगोस्वामी विस्तार से अपना अभिप्राय प्रकट करते हैं। उनका कहना है कि जब राजा परीक्षित ने यशोदा -नन्द के उस पुण्याचरण के सम्बन्ध में प्रश्न किया जिससे भगवान् की बाल लीला का आनन्द उन्हें मिला, तब शुकदेव जी ने सामान्यरूप से उन्हें महापुरुष ब्रह्मा के कृपा-प्रसाद का उल्लेख कर दिया। तब क्या धरा-द्रोण  वसु दम्पती को नैमित्तिक रूप से ही यह शुभावसर प्राप्त हुआ ? नहीं, अब तात्त्विक समाधान किया जाता है। भक्तों के आदि गुरु हैं ब्रह्मा। वैष्णवों के आदर्श हैं शंकर। नित्य प्रेयसी हैं लक्ष्मी। वह तो वक्षःस्थल पर निवास करती हैं। उन्हें भक्तिरूप प्रसाद की प्राप्ति हुई ? भगवान् मुक्ति देना = जेलखाने से छोड़ देना तो पसन्द करते हैं परन्तु भक्ति देना अर्थात् अपनी सेवा में लगा लेना सबके लिए सुलभ नहीं करते। परन्तु जो प्रसाद – अनिर्वचनीय महाप्रसाद जिसका ठीक-ठीक निरूपण प्रसाद शब्द के द्वारा भी नहीं हो सकता, वह प्रेम-परिपाक यशोदा को प्राप्त हुआ। वह ब्रह्मा, शंकर और लक्ष्मी को भी न मिला, न मिला, न मिला। तीनों नकार अन्वय ‘लेभिरे’ के साथ है। लक्ष्मी को ऐश्वर्य का ज्ञान है। अवश्य ही पति के रूप में उनकी ममता विशेष है परन्तु यशोदा को ऐश्वर्य ज्ञान न होने के कारण केवल ममता ही ममता है। इसलिए यशोदा की प्रीति ब्रह्मा का प्रसाद नहीं है। वह नित्यसिद्ध श्रीकृष्ण-माता हैं। ब्रह्मा तो स्वयं ब्रजरज की प्राप्ति के लिए लालायित रहते हैं।

    मूल में स्पष्ट है कि भले ही तपस्या और ज्ञान से महानारायण या परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति होती हो परन्तु गोपिकानन्दन की प्राप्ति उनके लिए भी कठिन है बिना किसी विशेषण के गोपिका-सुत कहने का अभिप्राय यह है कि गोपिका ही सबके लिए उपादेय है। ‘इह’ शब्द के प्रयोग का  यह भाव है कि गोपिका और गोपिका-सुत की स्थिति नित्य है और सभी देश में, सभी काल में सच्चे प्रेमियों के लिए सुलभ हैं। यशोदा के समान ही नन्दबाबा आदि परिकर भी नित्य ही हैं। धरा-द्रोण के रूप में जो निरूपण किया गया था वह तो जब तक पूर्णतया लीला-रहस्य का प्रबोध न हो जाय, तभी तक के लिए कहा गया था।  

(क्रमशः)

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